पाक्षिक प्रतिक्रमण श्रमण भगवन् ! नमस्कार करता हूँ । हृदय प्रतिष्ठापन धरता हूँ ।। कायोत्सर्ग भक्ति श्री सिद्धा- चार्य वन्दना आदरता हूॅं ।। सिद्ध अष्ट गुण दर्शन ज्ञाना । वीर्य, सूक्ष्म, अविचल श्रद्धाना ।। अवगाहन, गुण, अव्या-बाधरु, शगुन अगुरु लघु […]

पाक्षिक प्रतिक्रमण श्रमण भगवन् ! नमस्कार करता हूँ । हृदय प्रतिष्ठापन धरता हूँ ।। कायोत्सर्ग भक्ति श्री सिद्धा- चार्य वन्दना आदरता हूॅं ।। सिद्ध अष्ट गुण दर्शन ज्ञाना । वीर्य, सूक्ष्म, अविचल श्रद्धाना ।। अवगाहन, गुण, अव्या-बाधरु, शगुन अगुरु लघु […]
श्रावक प्रतिक्रमण हाईकू *संकल्प* प्रति कम न, सुमन ! क्यों दुखाना किसी का मन ।।१।। भूल करने निर्मूल, पाद-मूल-गुरु खड़ा मैं ।।२।। क्षमा सभी से, क्षमा सभी को, नहीं किसी से वैर ।।३।। आग से राग द्वेष, त्याग, सो जाग […]
परम पूज्य १०८ मुनिश्री निराकुलसागर महाराजजी द्वारा रचित आचार्य छत्तीसी विधान *पूजन* कपि मद गले पड़े ऐसी, ठण्डी गुजरे चौराहे पर । तीर बन चुभे बूँद-बूँद,थित वृक्ष-मूल चौमासे भर ।। गर्मी पड़े दरार फोड़, बन- सूर्यमुखी गिर चढ़ आये । […]
श्रावक प्रतिक्रमण *संकल्प*दोष बने आभरण हमारे । करे तिन्हें प्रतिक्रमण किनारे ।। ले विशुद्धि अभिलाष नाथ ! मैं, प्रकट करूँ दिन दुष्कृत सारे ।।१।। मानी हम मायावी-पापी ।बन अपराध पड़े हा ! काफी ।।खड़े आप दर, हाथ जोड़ कर, दे […]
दैवसिक प्रतिक्रमण श्रमण ==हाईकू== प्रति कम न, सुमन ! क्यों दुखाना किसी का मन । भूल करने निर्मूल, पाद-मूल-गुरु खड़ा मैं ।। क्षमा सभी से, क्षमा सभी को, नहीं किसी से वैर । आग से राग द्वेष, त्याग, सो जाग […]
दैवसिक प्रतिक्रमण श्रमण दोष बने आभरण हमारे । करे तिन्हें प्रतिक्रमण किनारे ।। ले विशुद्धि अभिलाष नाथ ! मैं, प्रकट करूँ दिन दुष्कृत सारे ।। मानी हम मायावी-पापी । बन अपराध पड़े हा ! काफी ।। खड़े आप दर, हाथ […]
परम पूज्य १०८ मुनिश्री निराकुलसागर महाराजजी द्वारा रचित चौरासी लाख योनिपरिभ्रमण निवारण विधान पूजन बातें सरगम ।आँखें मरहम ।जागें हरदम, सिद्धम् सिद्धम् ॥जप, टिकता देर न भ्रम ।लख सूरज किरण प्रथम ।कँप, टिकता देर न तम ।जय जयतु जयतु सिद्धम् […]
परम पूज्य मुनि श्री निराकुल सागरजी द्वारा रचित पूजन क्रंमाक 1008 आ भक्ति धारा में बहते जय विद्या, जय विद्या कहते जय विद्या मन्त्र आश-पूरण जय विद्या, जय विद्या जप मन ।।स्थापना।। ले हाथो में घट जल कंचन जय विद्या, […]
परम पूज्य मुनि श्री निराकुल सागरजी द्वारा रचित पूजन क्रंमाक 1007 श्री गुरु डोर, मैं पतंग श्री गुरु सिन्धु, मैं तरंग गुरु पद पंकज, मैं भृंग चढ़ा मुझ पे गुरु भक्ति रंग जयवन्त जयवन्त श्री गुरु विद्यासिन्ध जयवन्त ।।स्थापना।। क्यूँ […]
परम पूज्य मुनि श्री निराकुल सागरजी द्वारा रचित पूजन क्रंमाक 1006 आ मिल कर करते पूजा गुरु भगवन् जैसा दूजा नहीं कोई जहां दोई मैनें जा जा कर खोजा जहां दोई नहीं कोई गुरु भगवन् जैसा दूजा आ मिल कर […]
© Copyright 2021 . Design & Deployment by : Coder Point
© Copyright 2021 . Design & Deployment by : Coder Point