परम पूज्य मुनि श्री निराकुल सागरजी द्वारा रचित पूजन क्रंमाक 674 =हाईकू=छोड़ सागर विद्या, और सागर हैं खारे पता ।।स्थापना।। दृग् जल करूँ अर्पण, ‘कि पखार पाऊँ चरण ।।जलं।। चन्दन करूँ अर्पण,‘कि निखार पाऊँ ऽऽचरण ।।चन्दनं।। अक्षत करूँ अर्पण, ‘कि […]
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