परम पूज्य मुनि श्री निराकुल सागरजी द्वारा रचित पूजन क्रंमाक 430 =हाईकू= रब-से, ‘गुरु’ सरस्वती पुत्रों में आगे सबसे ।।स्थापना।। पीड़ा समझ ली,तभी तुम्हें, भेंट की, ये जल की ।।जलं।। तपन मिटी, तभी तुम्हें, भेंट की, ये चन्दन की ।।चन्दनं।। […]
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