परम पूज्य मुनि श्री निराकुल सागरजी द्वारा रचित पूजन क्रंमाक 714 =हाईकू=उठ न रहा था पलड़ा, ‘जी ‘गुरु’ सो नाम पड़ा ।।स्थापना।। ए ! सुमेर-वत् चारित अविचल, भेंटूँ दृग् जल ।।जलं।। ए ! पाँच पाप हिंसादि निकंदन, भेंटूँ चन्दन ।।चन्दनं।। ए […]
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