पारोला के
आदिनाथ भगवान् की पूजन
खान देश की शान ।
जैन समाज गुमान ।
करुणा दया निधान ।
आदि ब्रह्मा पारोला ।
साथ श्रृद्धा क्या बोला ।
स्वर्ग छोड़ो भक्तों ने,
मोक्ष दरवाज़ा खोला ।
साथ श्रृद्धा क्या बोला ।
आदि ब्रह्मा पारोला ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्र !
अत्र अवतर अवतर संवौषट्
(इति आह्वानन)
अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ:
(इति स्थापनम्)
अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट्
(इति सन्निधिकरणम्) ।
आदि ब्रह्मा पारोला जय ।
जपा होता मनवा हल्का ।
भिंटाऊॅं क्यूँ न कलश जल का ।
आश ले मेंटन तापत्-त्रय ।
आदि ब्रह्मा पारोला जय ।
जपा होता पापों का क्षय ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय नमः
जलं निर्वपामीति स्वाहा ।।
आदि ब्रह्मा पारोला जय ।
जपा होता सुदूर क्रन्दन ।
भिंटाऊॅं क्यूँ न मलय चन्दन ।
आश ले धन्य पुण्य संचय ।
आदि ब्रह्मा पारोला जय ।
जपा होता पापों का क्षय ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय नमः
चंदनं निर्वपामीति स्वाहा ।।
आदि ब्रह्मा पारोला जय ।
जपा मिलती पदवी अनछत ।
भिंटाऊॅं क्यूँ न धान अक्षत ।।
आश ले पद अखण्ड अक्षय ।
आदि ब्रह्मा पारोला जय ।
जपा होता पापों का क्षय ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय नमः
अक्षतं निर्वपामीति स्वाहा ।।
आदि ब्रह्मा पारोला जय ।
जपा होती मति अविकारी ।
भिंटाऊॅं क्यूँ न पुष्प क्यारी ।।
आश ले इन्द्रिय पञ्च विजय ।
आदि ब्रह्मा पारोला जय ।
जपा होता पापों का क्षय ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय नमः
पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा ।।
आदि ब्रह्मा पारोला जय ।
जपा फैले दिश दश सुरभी ।
भिंटाऊॅं क्यूँ न थाल चरु घी ।।
आश ले निरसन क्षुध् आमय ।
आदि ब्रह्मा पारोला जय ।
जपा होता पापों का क्षय ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय नमः
नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।
आदि ब्रह्मा पारोला जय ।
जपा होता हृदय उजाला ।
भिंटाऊॅं क्यूँ न दीप माला ।।
आश ले मिथ्या तिमिर विलय ।
आदि ब्रह्मा पारोला जय ।
जपा होता पापों का क्षय ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय नमः
दीपं निर्वपामीति स्वाहा ।।
आदि ब्रह्मा पारोला जय ।
जपा होता समिचीन दरश ।
भिंटाऊॅं क्यूँ न गन्ध विध दश ।।
आश ले वधु विमुक्ति परिणय ।
आदि ब्रह्मा पारोला जय ।
जपा होता पापों का क्षय ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय नमः
धूपं निर्वपामीति स्वाहा ।।
आदि ब्रह्मा पारोला जय ।
जपा होता भविष्य उज्ज्वल ।
भिंटाऊॅं क्यूँ न दिव्य श्री फल ।।
आश ले गुण अनगिनत प्रशय ।
आदि ब्रह्मा पारोला जय ।
जपा होता पापों का क्षय ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय नमः
फलं निर्वपामीति स्वाहा ।।
आदि ब्रह्मा पारोला जय ।
जपा वसु कर्म सभी हारे ।।
भिंटाऊॅं क्यूँ न द्रव्य सारे ।
आश ले सुख निराकुल निलय ।
आदि ब्रह्मा पारोला जय ।
जपा होता पापों का क्षय ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय नमः
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।
कल्याण अर्घ्य
गर्भ पूर्व बरसे नभ रतना ।
कहाँ और का वैभव इतना ।।
देव-देव तुम, आदि-ब्रह्म तुम,
रहा न माँ का सपना सपना ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
आषाढ़-कृष्ण-द्वितीयायां
गर्भ कल्याणक प्राप्ताय
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय नमः
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।
नाम नरक भी पलटी खाया ।
सुख बढ़-के स्वर्गों से पाया ।।
देव-देव तुम, आदि-ब्रह्म तुम,
समय जन्म का ज्यों ही आया ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
चैत्र-कृष्ण-नवम्यां
जन्म कल्याणक प्राप्ताय
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय नमः
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।
तजा जान विष विषयन बीचा ।
चूँकि पूर्व कञ्चन बिच कीचा ।।
देव-देव तुम, आदि-ब्रह्म तुम,
नग्न हुये, दल-कुंतल खींचा ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
चैत्र-कृष्ण-नवम्यां
दीक्षा कल्याणक प्राप्ताय
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय नमः
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।
सार्थक नाम सम-शरण लागा ।
बैठे वैर छोड़ सिंह, छागा ।।
देव-देव तुम, आदि-ब्रह्म तुम,
भाग सभावन बारह जागा ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
फागुन-कृष्ण-एकादश्यां
ज्ञान कल्याणक प्राप्ताय
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय नमः
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।
शुकल ध्यान फिर अगन प्रजारी ।
सेन कर्म वसु अबकी हारी ।।
देव-देव तुम, आदि-ब्रह्म तुम,
व्याही सुख निर्बाध दुलारी ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
माघ-कृष्ण-चतुर्दश्यां
मोक्ष कल्याणक प्राप्ताय
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय नमः
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।
दोहा
पारोला प्रभ आद की,
महिमा आप समान ।
करें पार नैय्या थकी,
ले साँचा सरधान ।।
जयमाला लघु भक्तामर
काल तरण । काल शरण ।।१।।
और छोर । और मोर ।।२।।
हाँप आप । आप नाप ।।३।।
जलधि पार । जड़ ‘धि कार ।।४।।
भक्ति तोर । भक्ति जोर ।।५।।
पीकि बौंर । पिकी और ।।६।।
तोर जाप । तोड़ पाप ।।७।।
जाप इतर । आप इतर ।।८।।
तोर कथा । तोड़ व्यथा ।।९।।
आप साथ । आप भाँत ।।१०।।
आप् रूप । आप नूप ।।११।।
गेह दिव्य । देह द्रव्य ।।१२।।
चन्द्र वदन । चन्द्र ग्रहण ।।१३।।
शगुन लोक । सुगुण ढ़ोक ।।१४।।
मार दिया । नार दीया ।।१५।।
जगत् धूम । विगत धूम ।।१६।।
जगत् नूर । जगत सूर ।।१७।।
जगत् नन्द । जगत चन्द ।।१८।।
भान आप । भा-न माप ।।१९।।
तोर ज्ञान । और ज्ञान ।।२०।।
आप मेल । आप् खेल ।।२१।।
आप भाँत । आप मात ।।२२।।
प्रथम आप । ब्रहम आप ।।२३।।
आप जिष्णु । आप विष्णु ।।२४।।
रुद्र आप । बुद्ध आप ।।२५।।
पीर हरन । वीर शरण ।।२६।।
आप और । छाप और ।।२७।।
सोख शोक । थोक ढ़ोक ।।२८।।
सुरम पीठ । धरम पीठ ।।२९।।
नेक चँवर । नेक अमर ।।३०।।
इतर चीन । छतर तीन ।।३१।।
वाद्य यंत्र । साध्य यंत्र ।।३२।।
दृष्टि सु…मन । वृष्टि सुमन ।।३३।।
प्रभा वलय । प्रभा निलय ।।३४।।
दिव्य नयन । दिव्य वयन ।।३५।।
पाँय कमल । पाय कमल ।।३६।।
तोर विभव । और वि…भव ।।३७।।
दुवा करी । हवा करी ।।३८।।
तोर राग । तोड़ बाघ ।।३९।।
आप मगन । आप् अगन ।।४०।।
तोर जाप । तोड़ साँप ।।४१।।
तोर चक्र । और चक्र ।।४२।।
तोर नजर । तोड़ समर ।।४३।।
आप भजन । आप् तरण ।।४४।।
तोर छाह । तोड़ आह ।।४५।।
तोर पास । तोड़ पाश ।।४६।।
तोर प्रीति । तोड़ भीति ।।४७।।
माल जै-य । काल जेय ।।४८।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय नमः
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।
दोहा
अपने जैसे एक हैं,
पारोला पुरु-देव ।
पीर पराई सुन बहें,
आँखें गंगा रेव ।।
(पुष्पांजलि क्षिपामि)
विधान प्रारंभ
अष्ट दलकमल पूजा
विधान की जय
सुर सविनत मणि मुकुट कान्ति उद्योत ।
सघन तिमिर पन पाप मिटावन ज्योत ।।
आदि पतित भव-जल इक तारणहार ।
वन्दन तिन्हें समर्पित कर शत-बार ।।१।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो जिणाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।
सकल वाङ्मय तत्त्व बुद्धि सम्पन्न ।
सुरपति वह सौधर्म ऋद्धि सम्पन्न ।।
करे भक्ति साँझन कुछ अलग विशेष ।
मैं भी जजूँ तिन्हें वे आदि जिनेश ।।२।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो ओहि जिणाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।
मैं अबोध तुम बुध वन्दित पद-पीठ ।
फिर भी रचूँ, थवन तव मैं बन ढ़ीठ ।।
जल में शशि प्रति-बिम्ब पड़ा निशि आन ।
छूने दौड़ा कौन छोड़ नादान ।।३।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो परमोहि जिणाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।
शशि गुण सिन्ध ! आप कह सकता कौन ।
सुर गुरु पहले ही ले बैठे मौन ।।
कौन भुजाओं से पहुँचा उस-पार ।
भँवर मगर जिस पारावार अपार ।।४।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो सव्वोहि जिणाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।
शक्ति बिना विरचूँ थुति तुम मुनि-नाथ ।
प्रेरित करे मुझे तुम भक्ति बलात् ।।
कारण शिशु पालन हिरणी अविचार ।
निर्बल भले करे सिंह ऊपर वार ।।५।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो अणंतोहि जिणाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।
हँसी उड़ायेंगे बुध मैं मति-मन्द ।
भक्ति कराये पर थुति तुम अनुबन्ध ।।
कोकिल छेड़े तान, तान सिर-मौर ।
और न कारण, सिर्फ आम्र-वन बौर ।।६।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो कोट्ठ-बुद्धीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।
तव संस्तव भो ! आशुतोष-अविनाश ।
चिर संचित पापों का करे विनाश ।।
फैला मानस अंधकार घन-घोर ।
करे पलायन, झलक पलक लख भोर ।।७।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो बीय-बुद्धीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।
मैं मानूँ भगवन् ! पा आप प्रसाद ।
थुति यह मनहर होगी पूर्ण-मुराद ।।
पड़ बूँदें जल जैसे कमलन पात ।
चमचम चमकें मुक्ता फल के भाँत ।।८।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो पदाणु-सारीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।
जल, मनहारी चन्दन झारी ।
अक्षत शाली, नन्दन क्यारी ।।
स्वीकारो, मम आराध्य-देव,
चरु, दीप, धूप, श्री-फल थाली ।।01।।
ॐ ह्रां ह्रीं ह्रूं ह्रौं ह्र:
अ-सि-आ-उ-सा नमः
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
अष्टदल कमल हृदयस्-थिताय
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय
पूर्णार्घं निर्वपामीति स्वाहा ।।
षोडश दलकमल पूजा
विधान की जय
नख-शिख थव निर्दोष रहे तव दूर ।
आप कथा भी पाप करे चकचूर ।।
सूरज गगन भिजा भुवि रश्मि प्रजाल ।
भर देता सर कमल जाग तत्काल ।।९।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो सं-भिण्ण-सोदा-राणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।
इसमें अचरज करने की क्या बात ।
भक्त आप कर लेते अपने भाँत ।।
लाभ भला क्या करके उसकी सेव ।
निर्धन ही जो रखता बना सदैव ।।१०।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो सयं-बुद्धाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।
एक बार लें तुम्हें देख भर नैन ।
और कहीं भी पाते ना फिर चैन ।।
मीठे जल की हाथ लगी जब राह ।
खारे जल की रही किसे फिर चाह ।।११।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो पत्तेय-बुद्धाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।
परमाणुक वे उतने ही परिमाण ।
हुआ आप तन का जिनसे निर्माण ।।
आप आप सा अद्भुत और अनूप ।
जैसा आप न वैसा तिहुजग रूप ।।१२।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो बोहिय-बुद्धाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।
जिसे सभी उपमाएँ देती ढ़ोक ।
कहाँ आपका मुख मनहर तिहुँ लोक ।।
कहाँ चन्द्र मण्डल कलंक जिस पास ।
दिन में वैसे, जैसे लगे पलाश ।।१३।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो उजु-मदीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।
शगुन आप-गुण पूरणमासी चाँद ।
अखिल विश्व सीमाएँ रहे उलाँघ ।।
विचर रहे मनमाने लोक अलोक ।
टोक न पाया, कोई उन्हें न रोक ।।१४।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो विउल-मदीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।
पुष्प बाण ले सुर-तिय आईं पास ।
अपने पाश न तुमको पाईं फांस ।।
भले पवन ले प्रलय काल की घेर ।
डिगा जरा भी पाये कहाँ सुमेर ।।१५।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो दस-पुव्वीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।
तूफाँ करे न, जाँ से जिसकी खेल ।
धुँआ रहित जो बाती विरहित तेल ।।
आप अनोखे ऐसे दिव्य प्रदीव ।
जगत् प्रकाशित करते तीन सदीव ।।१६।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो चउ-दस-पुव्वीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।
दूर ओट घन, गिरहण राहु सुदूर ।
अलि अन्धर, पल अन्दर करते चूर ।।
खिलते कमल भविक मन तुमको देख ।
आप अनोखे ऐसे सूरज एक ।।१७।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो अट्ठंग-महा-णिमित्त कु-सलाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।
गिरहण राहु सुदूर, दूर घन ओट ।
अस्त न होना जिसे, न जिसमें खोट ।।
उमड़े सिन्धु भविक मन लख तुम-रूप ।
इन्दु अनोखे ऐसे तुम शिव-भूप ।।१८।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो वि-उव्वण-इड्ढि-पत्ताणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।
निशि में शशि, क्या दिन में रवि का काम ।
मुख तव करे तिमिर जब काम तमाम ।।
खेत फसल लहलहा रही चहुओर ।
लाभ भला क्या ? क्यों बरसें घन घोर ।।१९।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो विज्जा-हराणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।
जैसा पास आपके सम्यक् ज्ञान ।
वैसा और न पास भेद-विज्ञान ।।
मणि रत्नों का जैसा दिव्य प्रकाश ।
किरणाकुल भी कहाँ काँच के पास ।।२०।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो चा-रणाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।
समुचित ही जो देखे दूजे देव ।
तुमसे हो अनुराग गया स्वयमेव ।।
तुम्हें देखना गया किन्तु बेकार ।
पाँखी पोत भाँत लौटा मन हार ।।२१।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो पण्ण-समणाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।
जन्म दे रहीं माएँ अनगिन लाल ।
कहाँ पुत्र पर, तुम सा उन्नत भाल ।।
नक्षत्रों से भरा पड़ा आकाश ।
गौरव सूर्योदय पर पूरब पास ।।२२।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो आयास-गामीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।
परम पुरुष इक माने तुम्हें मुनीश ।
हर अन्धर ! आदित्य ! नित्य ! आदीश ।।
चर्चित जग-दर्चित ! मृत्युंजय नाम ।
तुम्हीं नेक इक पधराते शिव धाम ।।२३।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो आसी-विसाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।
तुम असंख्य ! अव्यय ! अचिन्त्य ! विभु ! नन्त ।
एक ! अनेक ! अनंग-केत ! पुरु ! सन्त ।।
ईश्वर ! योगीश्वर ! विद्-जोग जिनेश ।
आदि-ब्रह्म ! हरि ! ज्ञान स्वरूप महेश ।।२४।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो दिट्ठि-वि-साणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।
जल, मनहारी चन्दन झारी ।
अक्षत शाली, नन्दन क्यारी ।।
स्वीकारो, मम आराध्य-देव,
चरु, दीप, धूप, श्री-फल थाली ।।02।।
ॐ क्षां क्षीं क्षूं क्षें क्षैं क्षों क्षौं क्षं क्षः
नमोर्-ऽहते सर्वं रक्ष रक्ष हूं फट् नमः
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
षोडशदल-कमल हृदयस्-थिताय
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय
पूर्णार्घं निर्वपामीति स्वाहा ।।
चतुर्विंशतिदल कमल पूजा
विधान की जय
जगत ! विबुध अर्चित इक तुम्हीं प्रबुद्ध ।
जगत् क्षान्तिकर शंकर तुम्हीं विशुद्ध ।।
तुम्हीं विधाता पथ-शिव किया विधान ।
देह चरम परमोत्तम तुम्हीं पुमान ।।२५।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो उग्ग-तवाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।
नमो नमः जगदापद हरण प्रवीण ।
नमो नमः इक परमेश्वर जग तीन ।।
नमो नमः संपोषक जग श्रृंगार ।
नमो नमः शोषक भव पारावार ।।२६।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो दित्त-तवाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।
गुण-गण मिला न और कहीं अवकाश ।
तभी सभी दौड़े आये तुम पास ।।
दोष विविध आश्रित हो मद में चूर ।
रहें स्वप्न भी तुमसे कोसों दूर ।।२७।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो तत्त-तवाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।
विरले वृक्ष अशोक तले छविवन्त ।
किरणोन्नत तुम रूप अनूप भदन्त ।।
दिपै मनोहर निकट पयोधर भान ।
तिमिर मदिर-चिर काल चीरता मान ।।२८।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो महा-तवाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।
रत्न खचित सिंहासन ऊपर आप ।
वर्ण सुवर्ण विराजे वपु निष्पाप |।
उदयाचल से मानो किरण समेत ।
उदित भान-भवि पंकज विकसन हेत ।।२९।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो घोर-तवाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।
अमर ढ़ोरते चमर पुष्प सित कुन्द ।
वर्ण सुवर्ण आप तन स्वर्ण सुगन्ध ।।
झर झर झरती सुमेर निर्झर धार ।
मानो चन्द्र प्रभा सी जनमन-हार ।।३०।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो घोर गुण-परक्-कमाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।
भासे शशि भा से छत्रत्-त्रय आप ।
करते हतप्रभ रश्मि सहस्र प्रताप ।।
बोलें ढुल झालर मुक्ताफल नेक ।
तीन तीन जग परमेश्वर तुम एक ।।३१।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो घोर-गुणाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।
जन-त्रिभुवन सम्पद शुभ संगम दक्ष ।
कहें विराजे यहाँ धर्म अध्यक्ष ।।
नभ गभीर बाजे दुंदुभि दिश् चार ।
लगा अहिंसा धर्म सत्य जयकार ।।३२।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो ऽघोर-गुण-बंभ-यारीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।
गन्धदार मन्दार सु-पारजात ।
आद-आद इन पुष्पों की बरसात ।।
साथ वृष्टि-गन्धोदक, मन्द बयार ।
पंक्ति बद्ध तुम पंक्ति शब्द अवतार ।।३३।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो आमो-सहि-पत्ताणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।
भा-मण्डल तुम विभा विभो ! अक्षीण ।
करे भुवन द्युति उपमावन छवि क्षीण ।।
कोटिक सूर्य प्रताप, न पै आताप ।
जीत रहा छवि सौम्य सोम भी आप ।।३४।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो खेल्लो-सहि-पत्ताणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।
एक प्रदर्शक स्वर्ग मोक्ष सद्पन्थ ।
उपदेशक सद्धर्म गृहस्थ महन्त ।।
दिव्य ध्वनि तुम लिये अर्थ गहराव ।
भाषा आप आप परिणाम स्वभाव ।।३५।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो जल्लो-सहि-पत्ताणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।
पुलकित नूतन शतदल कमल प्रसून ।
नख शशि करते आभा जिनकी दून ।।
जहाँ आप पद रखते दिव्य ललाम ।
वहाँ कमल जा रचते सुर अभिराम ।।३६।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो विट्ठो-सहि-पत्ताणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।
तुम विभूति जिन जैसी पल-उपदेश ।
दिखी न वैसी और कहीं लव-लेश ।।
तेज दिवा-कर में जैसा भर-पूर ।
कहाँ भाग तारागण वैसा नूर ।।३७।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो सव्वो-सहि-पत्ताणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।
मद के झरने जिसके मूल कपोल ।
छेड़ें जिसे विहरते शिलिमुख बोल ।।
क्रोधित गज ऐरावत दूजा काल ।
कर न सका बाँका तुम-भक्तन बाल ।।३८।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो मण-बलीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।
गण्डस्थल करके गज लोहु-लुहान ।
गज मुक्ता चादर दी जिसने तान ।
बढ़ा चला आये सिंह मार दहाड़ ।
कर पाये कब भक्तन आप बिगाड़ ।।३९।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो वचि-बलीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।
थाम हाथ बढ़ रही वायु कल्पान्त ।
नहीं सिन्धु जल से भी होगी शान्त ।।
दावानल वो निगला चाहे लोक ।
आप भक्त आगे आ देती ढ़ोक ।।४०।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो काय-बलीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।
फणा उठाये, हो क्रोधित विकराल ।
समद कण्ठ कोकिल काला, दृग्-लाल ।।
ऐसा सर्प न उसका करे विघात ।
नाम-नाग दमनी तुम जिसके साथ ।।४१।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो खीर-सवीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।
जहाँ अश्व हुँकार, दन्ति चिंघाड़ ।
शूर सैन्य मिस रही मृत्यु मुख फाड़ ।।
हार सुनिश्चित हा ! दुर्गम संग्राम ।
पल में दे पलटा पाँसे तुम नाम ।।४२।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो सप्पि-सवीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।
बहे रक्त गज, हा ! भालों की मार ।
आतुर शूर रुधिर जल करने पार ।।
अरि दुर्जेय, सहज लेते वह जीत ।
जिन्हें घनी तुम पद-पकंज से प्रीत ।।४३।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो महुर-सवीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।
छिलती मगर मगर आपस में पीठ ।
उठती लहर भंवर ही तो भी ठीक ।।
वडवानल भी ऐसा सिन्धु गभीर ।
यान नाम तुम पर्श, दे लगा तीर ।।४४।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो अमइ-सवीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।
जन्मा रोग न जिसका कहीं निदान ।
जाने वाला नाँहि लिये बिन प्राण ।।
आप जलज पद-रज मलते ही माथ ।
रोग विदाई लेते हाथों हाथ ।।४५।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो अक्खीण-महा-णसाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।
हों साँकल से जकड़े आंगोपांग ।
छिले जा रहे कंधे घुटने जाँघ ।।
आप नाम जपते ही मनके-माल ।
खुल जाते बन्धन सारे तत्काल ।।४६।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो वड्ढमाण-बुद्धि-रिसस्स
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।
और और भी ऐसे कष्ट अनेक ।
तुम चरणों में मस्तक अपना टेक ।
छू-मन्तर हो जाते अपने आप ।
मोर शोर सुन जैसे चन्दन साँप ।।४७।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो सव्व-सिद्धा-यद-णाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।
चुन-चुन विविध वर्णमय पुष्प संभाल ।
की तैयार गूँथ ये तुम गुण माल ।।
जो इसको धारण करते भवि कण्ठ ।
मान तुंग श्री शिव पाते निष्कण्ट ।।४८।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो भयवदो महदि
महावीर वड्ढमाण बुद्धिरिसीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।
पूर्णार्घ
जल, मनहारी चन्दन झारी ।
अक्षत शाली, नन्दन क्यारी ।।
स्वीकारो, मम आराध्य-देव,
चरु, दीप, धूप, श्री-फल थाली ।।03।।
श्री वृषभादि वर्धमान पर्यंत
परम-देव भगवन् तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
चतुर्विंशति दल कमल
हृदयस्-थिताय
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय
पूर्णार्घं निर्वपामीति स्वाहा ।।
महा-अर्घं
दोहा
लोग बड़े, रख लें भले,
बड़े-बड़े अरमान ।
मरण-समाधी का मुझे,
दे दो बस वरदान ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
नव देव भगवन् तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
अष्ट-चत्वारिंशद्-दलकमल
हृदयस्-थिताय
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय नमः
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।
:: जाप्य ::
।। ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री आदि-नाथ तीर्थंकराय नमः ।।
जयमाला
तेरी बड़ी कृपा है ।
धक रही इक तरफा है ।
चैन की वंशी बाजे ।
धरा अम्बर जश गाजे ।
चरण तुम हृदय विराजे ।
दुष्कृत कॅंपा कॅंपा है ।
तेरी बड़ी कृपा है ।।१।।
थाप दे चांद सुलाऊँ ।
जाग के सूर्य जगाऊँ ।
डूबे ले, खूब कमाऊॅं ।
निश-दिन नफा नफा है ।
तेरी बड़ी कृपा है ।।२।।
बला घर तरफ न बढ़ती ।
धूप घर दिन भर पड़ती ।
खनक धन सिर ना चढ़ती ।
अनबन रफा दफा है ।
तेरी बड़ी कृपा है ।।३।।
खुशी के अश्रु बपौती ।
किसी से जलन न होती ।
‘रत’ जुगाली पढ़ पोथी ।
दुर्मत खफा खपा है ।
तेरी बड़ी कृपा है ।।४।।
लाज दोई आंखों में ।
दया जो ई हाथों में ।
साफ-गोई बातों में ।
दुर्गुण लुपा छुपा है ।
तेरी बड़ी कृपा है ।।
धक रही इक तरफा है ।
तेरी बड़ी कृपा है ।।५।।
दोहा
धसी निराकुलता बसी,
किरपा बड़ी तुम्हार ।
बस कीजे ‘के हो चलें,
शिव वधु आंखें चार ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय नमः
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।
श्री सरसुति-मंत्र*
ॐ ह्रीम्
अर्हन् मुख कमल-वासिनि
पा-पात्म क्षयंकरि
श्रुत-ज्ञान
ज्वाला सहस्र प्रज्ज्वलिते
सरस्वति !
मत् पापम् हन हन दह दह
क्षाम् क्षीम् क्षूम् क्षौम् क्षः
क्षीरवर-धवले
अ-मृत संभवे
वम् वम् हूम् फट् स्वाहा
मम सन्-निधि-करणे
मम सन्-निधि-करणे
मम सन्-निधि-करणे ।
ॐ ह्रीं जिन मुखोद्-भूत्यै
श्री सरस्वति-देव्यै
अर्घं निर्वपामीति स्वाहा
शांति पाठ
अथ पौर्वाह-निक (अप-राह-निक)
देव-शास्त्र-गुरु-वन्दना-क्रियायाम्
पूर्वाचार्या-नुक्-क्रमेण,
सकल-कर्मक्-क्षयार्-थम्,
भाव-पूजा-वन्दना-स्तव समेतम्
श्री शांति-भक्ति कायोत्सर्गम् करोम्यहम्
(९ बार णमोकार )
*चौपाई*
दर्शन मात्र मेंटता दुखड़ा ।
भाँत चन्द्रमा सुन्दर मुखड़ा ।।
नासा टिके नैन मनहारी ।
करें वन्दना नाथ ! तुम्हारी ।।१।।
आप चक्रधर-पञ्चम नामी ।
वन्द्य इन्द्र शत, अन्तर्-यामी ।।
प्रभो शान्ति-जिन करके करुणा ।
करो शान्ति ! जश निरखो अपना ।।२।।
छत्र, सिंहासन, वृक्ष-अशोका ।
धुनि, दुन्दुभि, दल-चँवर अनोखा ।।
भा-मण्डल झिर-पुष्प-अनूठी ।
प्रातिहार्य-वसु आप विभूती ।।३।।
अर्चित-जगत् ! शान्ति करतारी ।
ढ़ोक करो स्वीकार हमारी ।।
प्राण-भूत, सत्, जीव समस्ता ।
पायें परिणति शान्त प्रशस्ता ।।४।।
देवों में जो देव बड़े हैं ।
चरणों में हित सेव खड़े हैं ।।
हंस-वंश वे जग उजियारे ।
करें शान्ति मण्डित जग सारे ।।५।।
(निम्न श्लोक को पढ़कर
जल छोड़ना चाहिए)
शान्ति कीजिये गाँव-गाँव में ।
विश्व लीजिये पाँव-छाँव में ।।
डूब ‘साध-जन’ उतरें गहरे ।
लहर लहर-पचरंगा लहरे ।।६।।
नृप धार्मिक बलशाली होवे ।
विकृत-प्रकृत मनमानी खोवे ।।
धर्म-चक्र-जिन सौख्य प्रदाता ।
रहे प्रवाहित यूँ हि विधाता ।।७।।
द्रव्य सुमंगल-कारी होवे ।
क्षेत्र अमंगल-हारी होवे ।।
होवे काल सुमंगल-कारी ।
होवें भाव अमंगल-हारी ।।८।।
कर्मन-घात घात मद सारा ।
सहजो सिद्ध रिद्ध परिवारा ।।
आदि आदि अर्हन् चौबीसा ।
शान्ति प्रदान करें निशि दीसा ।।९।।
*दोहा*
किया शान्ति जिन भक्ति का,
भगवन् कायोत्सर्ग ।।
करूँ दोष आलोचना,
जो प्रद-स्वर्ग-पवर्ग ।।१०।।
*चौपाई*
पाँच सभी कल्याणक धारी ।
आठ प्राति-हारज मन-हारी ।।
अतिशय तीस चार मण्डित हैं ।
अर बत्तीस इन्द्र वन्दित हैं ।।११।।
चौ-विध संघ नखत मानिन्दा ।
राम श्याम चक्री, प्रभु ! चन्दा ।।
‘निलय-विनय’ अन-गिनत गभीरा ।
आद-आद जिन अंतिम वीरा ।।१२।।
अर्चन-पूजन-वन्दन करता ।
उनका मैं अभिनन्दन करता ।।
पीड़ा-दुक्ख-दरद-भय खोवे ।
मेरे कर्मों का क्षय होवे ।।१३।।
रत्नत्रय का मुझे लाभ हो ।
मेरी ‘गति-पंचम-उपाध’ हो ।।
मृत्यु-महोत्सव मना सकूँ मैं ।
जिन-गुण-सम्पद् कमा सकूँ मैं ।।१४।।
अथ पौर्वाह-निक (अप-राह-निक)
देव-शास्त्र-गुरु-वन्दना-क्रियायाम्
पूर्वाचार्या-नुक्-क्रमेण,
सकल-कर्मक्-क्षयार्-थम्,
भाव-पूजा-वन्दना-स्तव समेतम्
श्री समाधि-भक्ति कायोत्सर्गम्
करोम्यहम्
(९बार णमोकार )
*चौपाई*
सदा शास्त्र अभ्यास करूँ मैं ।
सन्त समीप निवास करूँ मैं ।।
मौन धरूँ क्यूँ, गुणी दिखाये ।
गौण करूँ, यूँ दोष-पराये ।।१५।।
भावन-आत्म तत्व, नम-नयना ।
हित-मित रखूँ मधुरतम वयना ।।
जब तक राधा-मुक्ति रिझाऊँ ।
इन्हें जन्म जन्मान्तर पाऊँ ।।१६।।
तारण हारे…शरण सहारे ।
हृदय हमारे…चरण तुम्हारे ।।
चरण तुम्हारे…हृदय हमारा ।
रहे, तलक जब भव-जल-धारा ।।१७।।
स्वर-अक्षर पद मात्रा गलती ।
हुईं, चाहते बिन अनगिनती ।।
हो अपराध क्षमा यह मेरा ।
‘जैसा भी’ मैं अपना तेरा ।।१८।।
*दोहा*
किया समाधी, भक्ति का,
भगवन् कायोत्सर्ग ।।
करूँ दोष आलोचना,
जो प्रद-स्वर्ग-पवर्ग ।।१९।।
*चौपाई*
सम्यक्-दर्शन, सम्यक्-ज्ञाना ।
सम्यक्-चारित, ताना-बाना ।।
रूप अनूप ध्यान परमातम ।
बुद्ध-विशुद्ध ज्ञान धर आतम ।।२०।।
पूजन नित वन्दन करता हूँ ।
अर्चन अभिनन्दन करता हूँ ।।
क्षय होवें दुख संकट सारे ।
क्षय हो जावें कर्म हमारे ।।२१।।
मुझे लाभ रत्नत्रय होवे ।
सुगति गमन, भय-सप्तक खोवे ।।
पाऊँ मरण-समाधी स्वामी ।
बनूँ रतन जिन-गुण आसामी ।।२२।।
‘पुष्पाञ्जलिं क्षिपेत्’
( यहाँ पर नौ बार णमोकार मंत्र
पढ़ना चाहिए )
विसर्जन पाठ
अञ्जन को पार किया ।
चन्दन को तार दिया ।।
नहिं तोर दया का पार ।
नागों का हार किया ।।१।।
धूली-चन्दन-बावन ।
की शूली सिंहासन ।।
धरणेन्द्र देवी-पद्मा ।
मामूली अहि-नागिन ।।२।।
अगनी ‘सर’ नीर किया ।
भगिनी ‘सर’ चीर किया ।।
नहिं तोर दया का पार ।
केशर महावीर किया ।।३।।
बन पड़ीं भूल से भूल ।
कृपया कर दो निर्मूल ।।
बिन कारण तारण हार ।
नहिं तोर दया का पार ।।४।।
दोहा
बस आता, अब धारता,
ईश आशिका सीस ।
कृपा निराकुल आपकी,
बनी रहे निशि-दीस ।।
(पुष्पांजलि क्षिपामि)
आरती
आदि ब्रह्मा वृषभ देवा ।
देव करते आप सेवा ।।
गर्भ आना अभी देरी ।
नभ लगाये रतन ढ़ेरी ।।
सौ-धरम-शच पार खेवा ।
आदि ब्रह्मा वृषभ देवा ।
देव करते आप सेवा ।।१।।
मेर गिर जल क्षीर कलशा ।
नृत्य ताण्डव जन्म जलसा ।।
दृग् खुशी से गंग-रेवा ।
आदि ब्रह्मा वृषभ देवा ।
देव करते आप सेवा ।।२।।
राज-पाट विमुंच वन धन ! ।
वेष मुचंन केश लुचंन ।।
डूब भीतर इक सदैवा ।
आदि ब्रह्मा वृषभ देवा ।
देव करते आप सेवा ।।३।।
सम-शरण सिंह हिरण आया ।
जात-वैर विडार, माया ।।
सुने जिन धुन बिन कुटेवा ।
आदि ब्रह्मा वृषभ देवा ।
देव करते आप सेवा ।।४।।
कर्म ध्यानानल जला के ।
सुख निराकुल धाम आ के ।।
हो चला कृत-कृत परेवा ।
आदि ब्रह्मा वृषभ देवा ।
देव करते आप सेवा ।।५।।
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