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चौबीस तीर्थंकर विधान  ·  तीर्थक्षेत्र पूजन

कोपर-गांव के -चन्द्र प्रभ भगवान् की पूजन

By मुनि श्री निराकुल सागर जी महाराज 

 

कोपर-गांव के
चन्द्र प्रभ भगवान् की पूजन
धूप जग, आप कृपा छॉंवा ।
चन्द्र प्रभ जिन ! कोपर गांवा ।।
शरण में मुझको रख लो ना ।
दे भले छोटा सा कोना ।।
चरण यह कल-जुग शिव नावा ।
हमारा कौन तुम अलावा ।
धूप जग, आप कृपा छॉंवा ।
चन्द्र प्रभ जिन ! कोपर गांवा ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्र !
अत्र अवतर अवतर संवौषट्
(इति आह्वानन)
अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ:
(इति स्थापनम्)
अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट्
(इति सन्निधिकरणम्) ।

नीर मैं, क्षीर आप स्वामी ।
स्वयं सा कर लो निष्कामी ।।
भाँत मॉं त्रुटि करके गौणा ।
शरण में मुझको रख लो ना ।।
धूप जग, आप कृपा छॉंवा ।
चन्द्र प्रभ जिन ! कोपर गांवा ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय नमः
जलं निर्वपामीति स्वाहा ।।

बनूॅं चन्दन, छोडूॅं सुरभी ।
घिसा जाऊँ, ‘कि जलूॅं फिर भी ।
बना लो स्वयं सा सलौना ।
शरण में मुझको रख लो ना ।।
धूप जग, आप कृपा छॉंवा ।
चन्द्र प्रभ जिन ! कोपर गांवा ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय नमः
चंदनं निर्वपामीति स्वाहा ।।

आप अक्षत न फिर जनमना ।
शुद्ध नय जीव कोइ कम ना ।
हरो चौरास लाख जोना ।
शरण में मुझको रख लो ना ।।
धूप जग, आप कृपा छॉंवा ।
चन्द्र प्रभ जिन ! कोपर गांवा ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय नमः
अक्षतं निर्वपामीति स्वाहा ।।

सुमन बिच शूल मुस्कुराते ।
बनें मर… हम मरहम गाते ।।
सींह सम-शरण हिरण छौना ।
शरण में मुझको रख लो ना ।।
धूप जग, आप कृपा छॉंवा ।
चन्द्र प्रभ जिन ! कोपर गांवा ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय नमः
पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा ।।

बगल झॉंकें बिन स्वर व्यंजन ।
निरंजन तुम बल खल-अंजन ।।
दृष्टि छिन मात्र डाल दो ना ।
शरण में मुझको रख लो ना ।।
धूप जग, आप कृपा छॉंवा ।
चन्द्र प्रभ जिन ! कोपर गांवा ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय नमः
नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

वर्तिका काली हो चाली ।
निश अमावस कर उजियाली ।।
मुझे भी अब न जल बिलोना ।
शरण में मुझको रख लो ना ।।
धूप जग, आप कृपा छॉंवा ।
चन्द्र प्रभ जिन ! कोपर गांवा ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय नमः
दीपं निर्वपामीति स्वाहा ।।

धूप ले जा कोने छोड़ी ।
कौन मैं, कहे आन दौड़ी ।।
करो पर हितु पाछी पौना ।
शरण में मुझको रख लो ना ।।
धूप जग, आप कृपा छॉंवा ।
चन्द्र प्रभ जिन ! कोपर गांवा ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय नमः
धूपं निर्वपामीति स्वाहा ।।

सफल बनने फल साथ चुना ।
सार्थ औ-गुण तज, गुणन गुना ।।
किरण आशा तुम तिहुॅं-भौना ।
शरण में मुझको रख लो ना ।।
धूप जग, आप कृपा छॉंवा ।
चन्द्र प्रभ जिन ! कोपर गांवा ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय नमः
फलं निर्वपामीति स्वाहा ।।
नीर, चन्दन, अक्षत, फुलवा ।
चारु चरु, दीप, धूप, फल वा ।।
अर्घ्य भेंटूॅं पातर सोना ।
शरण में मुझको रख लो ना ।।
धूप जग, आप कृपा छॉंवा ।
चन्द्र प्रभ जिन ! कोपर गांवा ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय नमः
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

कल्याण अर्घ्य
कल…यान हाथ कर दो ।
सु…मरण समाध वर दो ।।

माँ का अपना सपना ।
झोली जन-जन रतना ।।
पूरण मुराद कर दो ।
सु…मरण समाध वर दो ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
चैत्र कृृष्ण पंचम्यां
गर्भ कल्याणक प्राप्ताय
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय नमः
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

शचि भव इक अवतरना ।
सौधरम सहस नयना ।।
दूधिया रात कर दो ।
सु…मरण समाध वर दो ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
पौष्य कृष्ण एकादश्यां
जन्म कल्याणक प्राप्ताय
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय नमः
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

लट-गुच्छ क्षीर गहना ।
वन जीवन क्या कहना ।।
वसु मात साथ कर दो ।
सु…मरण समाध वर दो ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
पौष-कृष्ण-एकादश्यां
दीक्षा कल्याणक प्राप्ताय
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय नमः
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

गुण सारथ सम-शरणा ।।
सहजो केशर हिरणा ।।
वैतरण घाट धर दो ।
सु…मरण समाध वर दो ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
फाल्गुुन-कृष्ण-सप्तम्यां
ज्ञान कल्याणक प्राप्ताय
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय नमः
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

वधु मुक्ति नैन झरना ।
दीवाली शिव सदना ।।
‘कुल…निरा साध‘ कर दो ।
सु…मरण समाध वर दो ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
फाल्गुन-शुक्ल-सप्तम्यां
मोक्ष कल्याणक प्राप्ताय
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय नमः
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

सोरठा छन्द
एक भेद विज्ञान,
सार-भूत तिहूँ-लोक सुन ! ।
ज्ञान, चरित, सरधान,
साध नृभव भव कोटि पुन ।।
जयमाला

बारह भावना
खिला फूल मुरझा चला,
लगा लगा ही डाल ।
रखता गला दबोच के,
भले घोटता काल ।।१।।

शिशु निगले मॉं सर्पिणी,
कौन बचावन-हार ।
शरण एक तिहुँ-लोक में,
महा-मंत्र नवकार ।।२।।

बन मसान कण-कण चुका,
रज-रज जन्मस्-थान‌ ।
पीछे सुख कस्तूर के,
आखिर प्राण प्रयाण ।।३।।

कर्म आन पड़ते गले,
पुण्य-पाप के जोर ।
बोने वाला काटता,
विधि न किसी विधि तोड़ ।।४।।

एक-मेक दिखते भले,
क्षीर भिन्न, भिन नीर ।
हंस नजर बस डाल दे,
नीर भिन्न, भिन क्षीर ।।५।।

देह न बनती देखते,
हटती झींनी चाम ।
काना पौड़ा बुब चलो,
धर्म-भूम हित-शाम ।।६।।

‘आ’ यानी चहुॅं ओर से,
‘स्रव’ यानी झिर-स्राव ।
चंचल योग सॅंयोग से,
लागे कर्मन दाँव ।।७।।

सछिद्र नौका डॉंट दो,
जल उलीच, लो घाट ।
साधो प्रवचन मात्रिका,
समिति-गुप्ति मिल आठ ।।८।।

पाल पूर्व रित फल पका,
जाग ! साध तप-त्याग ।
निर्जर अविपाकी भली,
मंजिल आती भाग ।।९।।

अनादि, अकृतिक, अक्षरा ।
हाथ न हरादि लोक ।
स्वयं मोह वशि जिय भ्रमे,
बन निर्मोही मोख ।।१०।।

दुर्लभ श्री गुरु देशना,
स्वानुभूति दिन-रात ।
देश-सकल व्रत साधना,
जागृत मरण समाध ।।११।।

कहे शब्द धरमा स्वयं,
मैं दूॅं धर…मॉं गोद ।
रह लो विधि, विधि ज्यों रखे,
धारा, बह तट पोत ।।१२।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय नमः
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

दोहा
राखी रख लेना सदा,
बाबा मेरी लाज ।
रोज बुला लेना मुझे,
पाँव पखारन काज ।।
(पुष्पांजलि क्षिपामि)
विधान प्रारंभ

अष्ट दलकमल पूजा
विधान की जय

नमो जिणवर अरि-हंताणं ।
णमो सिद्धम् आ-यरि-याणं ।।
उवज्झायाणं णमो णमो ।
सव्व साहूणं णमो णमो ।।१।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो जिणाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

बुध मंगल, लोकोत्तम, शरणा ।
सिध मंगल, लोकोत्तम, शरणा ।।
मुनि मंगल, लोकोत्तम, शरणा ।
धुनि मंगल, लोकोत्तम, शरणा ।।२।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो ओहि जिणाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

श्री आदि, अजित, संभव, नन्दन ।
जिन सुमति, पद्म, सुपार्श्व वन्दन ।।
प्रभ-चन्द्र, सुविधि, शीतल स्वामी ।
नुति श्रेय, पूज्य अन्तर्यामी ।।
श्री विमल, अनन्त, धर्म-नाथा ।
नुति शांति, कुन्थ, अर वरदाता ।।
श्री मल्लि, सुव्रत, नम दृग-रेवा ।
नुति नेम, पार्श्व, सन्मत देवा ।।३।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो परमोहि जिणाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

अरिहन्ता, सिद्धा-अगणन्ता ।
आ-यरिया, उवज्ञाया, सन्ता ।।
जिन-धर्म, जिनागम-जगदम्बा ।।
जिन बिम्बालय, जय जिन-बिम्बा ।।४।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो सव्वोहि जिणाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

राग जीता द्वेष जीता,
जान लीना जग सभी ।
वचन जिनके वेद गीता,
ज्ञान दीना निस्पृही ।।
बुध्द, हरि-हर, वीर, ब्रह्मा,
या जिसे जिनवर कहो ।
भक्ति धारा में उसी की,
अय ! मिरे मन तुम बहो ।।५।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो अणंतोहि जिणाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

जीते राग-द्वेष मद माया ।
निस्पृह मोक्ष-मार्ग दिखलाया ।।
हरि, हर, ब्रह्म, कहो या वीरा ।
नमन उसे नित, उड़ा अबीरा ।।६।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो कोट्ठ-बुद्धीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

राग द्वेषना ।
धर्म देशना ।।
ब्रह्म, बुध, जिना ।
तिन्हें वन्दना ।।७।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो बीय-बुद्धीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

वीतराग ।
‘भी’ चिराग ।।
सुगत राम ।
नित् प्रणाम ।।८।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो पदाणु-सारीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

जल, मनहारी चन्दन झारी ।
अक्षत शाली, नन्दन क्यारी ।।
स्वीकारो, मम आराध्य-देव,
चरु, दीप, धूप, श्री-फल थाली ।।01।।
ॐ ह्रां ह्रीं ह्रूं ह्रौं ह्र:
अ-सि-आ-उ-सा नमः
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
अष्टदल कमल हृदयस्-थिताय
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय
पूर्णार्घं निर्वपामीति स्वाहा ।।

षोडश दलकमल पूजा
विधान की जय

राग द्वेष खो चला ।
आत्म ज्ञान हो चला ।।
बुद्ध, वीर, शंकरा ।
नुति उसे निरंतरा ।।९।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो सं-भिण्ण-सोदा-राणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

राग द्वेष नाहीं ।
जाग देश राही ।।
ब्रह्म, वीर, बुद्धा ।
तिस प्रति मम श्रद्धा ।।१०।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो सयं-बुद्धाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

अभिजित राग, द्वेष, मद काम ।
उपदेशक मग दिव-शिव धाम ।।
ब्रह्मा, रुद्र, कहो या राम ।
भक्ति भाव से उसे प्रणाम ।।११।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो पत्तेय-बुद्धाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

राग-द्वेष अरि जीत के,
जाना आतम राम ।
जिन ! हरि ! हर ! परमात्मा !
सविनय तिन्हें प्रणाम ।।१२।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो बोहिय-बुद्धाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

जीत के राग द्वेष, मद काम ।
दिखाया मार्ग स्वर्ग शिव धाम ।।
कहो शंकर ब्रह्मा या राम ।
उसे श्रद्धा के साथ प्रमाण ।।१३।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो उजु-मदीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

खो राग-द्वेष, उपदेश दिया ।
वह जिसे पूर्व स्वयमेव जिया ।।
शिव, ब्रह्म, बुद्ध या कहो राम ।
मन वचन काय पूर्वक प्रणाम ।।१४।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो विउल-मदीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

द्वेष जीता ना किसने ।
राग भी जीता जिसने ।।
बुद्ध, शिव, विष्णु, विधाता ।
उसे मैं शीश नवाता ।।१५।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो दस-पुव्वीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

राग-द्वेष कामादिक जीते,
जान लिया जग सारा ।।
मोक्ष मार्ग क्या ? हुआ बताना,
निस्पृह जिसके द्वारा ।।
ब्रह्मा, विष्णु, महेशा ।
बोलो भले जिनेशा ।
वन्दन उसे हमारा ।
कोटि कोटि शत-बारा ।।१६।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो चउ-दस-पुव्वीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

अरि जीते सब जग जान लिया ।
निस्पृह हो शिव उपदेश दिया ।।
हरि, हर, ब्रह्मा, स्वाधीन कहो ।
अय ! चित्त उसी में लीन रहो ।।१७।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो अट्ठंग-महा-णिमित्त कु-सलाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

पास जिसके राग ना, है द्वेष ना ।
दी जिन्होंने मुक्त होने देशना ।
ब्रह्म, हरि, हर जिसे जिन या बुध कहो ।
भक्ति धारा में उसी की नित बहो ।।१८।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो वि-उव्वण-इड्ढि-पत्ताणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

विजय श्री राग द्वेष पाई ।
राह निस्पृह शिव दिखलाई ।।
ब्रह्म, हरि, हर, जिन बुध वीरा ।
उसे वन्दन ले दृग् नीरा ।।१९।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो विज्जा-हराणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

जीता राग, जीता द्वेष ।
निस्पृह दिया शिव उपदेश ।।
हरि, हर बुद्ध ब्रह्मा ‘री ।
सविनय उसे नुति म्हारी ।।२०।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो चा-रणाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

जग जाना, जीते राग, द्वेष ।
निस्पृह पथ दिखलाया स्वदेश ।।
हरि, हर, ब्रह्मा या बुद्ध कहो ।
भक्ती में उसकी लीन रहो ।।२१।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो पण्ण-समणाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

राग, द्वेष, कामाद जीत जग जाना ।
निस्पृह हुआ स्वर्ग-शिव मार्ग दिखाना ।।
नाम भले जिन, ब्रह्मा, विष्णु महेशा ।
भाव भक्ति से वन्दन उसे हमेशा ।।२२।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो आयास-गामीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

राग जीता, द्वेष जीता ।
वचन जिसके वेद गीता ।।
ब्रह्म, हरि-हर, बुद्ध, वीरा ।
नुति उसे ले नयन नीरा ।।२३।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो आसी-विसाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

राग-द्वेष कामादिक जीते,
सब जग जान लिया ।
निस्पृह मोक्ष-मार्ग दिखला कर,
जग कल्याण किया ।।
ब्रह्मा, विष्णु, महेशा ।
बुध या कहो जिनेशा ।
मैं क्या ? गणधर भगवन् ने भी,
उसका ध्यान किया ।।२४।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो दिट्ठि-वि-साणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

जल, मनहारी चन्दन झारी ।
अक्षत शाली, नन्दन क्यारी ।।
स्वीकारो, मम आराध्य-देव,
चरु, दीप, धूप, श्री-फल थाली ।।02।।
ॐ क्षां क्षीं क्षूं क्षें क्षैं क्षों क्षौं क्षं क्षः
नमोर्-ऽहते सर्वं रक्ष रक्ष हूं फट् नमः
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
षोडशदल-कमल हृदयस्-थिताय
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय
पूर्णार्घं निर्वपामीति स्वाहा ।।

चतुर्विंशतिदल कमल पूजा
विधान की जय

राग-द्वेष जीत,
स्याद्वाद गीत,
जाना तिहु-लोक ।
वीर, ब्रह्म, बुद्ध,
कहो विष्णु, रूद्र,
उसे फर्श-ढ़ोक ।।२५।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो उग्ग-तवाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

राग देष कामादिक जीते
जान लिया संसार ।
निस्पृह मोक्ष मार्ग दिखलाकर,
किया बड़ा उपकार ।।
ब्रह्मा, विष्णु, महेशा ।
भले कहो तीर्थेशा ।
श्रद्धा सुमन चढ़ा चरणों में,
उसकी जय जयकार ।।२६।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो दित्त-तवाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

जीते हैं जिसने राग द्वेष,
जाना है जिसने जग सारा ।
निस्पृह सब जीवों के हित में,
बरसाई ज्ञान अमृत धारा ।।
जिन, बुद्ध, वीर, हरि, हर, ब्रह्मा,
या कहो उसे त्रिभुवन त्राता ।
श्रृद्धा से उसके चरणों में,
हम झुका रहे अपना माथा ।।२७।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो तत्त-तवाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

राग-द्वेष कामादिक जीते,
जिसने सब जग जाना ।
धका, बढ़ाया मोक्ष मार्ग पर,
बन पाछी पवमाना ।
कहो बुद्ध, जिन, ब्रह्म, विष्णु या,
शिव भोला भंडारी ।
उसे वचन मन काया पूर्वक,
सविनय ढ़ोक हमारी ।।२८।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो महा-तवाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

जयतु अर्हम, जयतु अर्हम ।
जयतु सिद्धम्, जयतु सिद्धम् ।।
‘सूर’ श्रुत पुल प्रशंस बाँधो ।
जयतु साधो, जयतु साधो ।।२९।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो घोर-तवाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

होकर आत्म ध्यान लवलीन ।
किये घातिया कर्म विलीन ।।
सत्य अहिंसा धर्म प्रचार ।
नुति भगवत् अरहत शत-बार ।।३०।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो घोर गुण-परक्-कमाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

बैर भाव छोड़ के
सभी हाथ जोड़ के
बैठे अरहत चरण
समशरण, समशरण, समशरण ।।३१।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो घोर-गुणाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

जयतु जयतु श्री जी अरिहन्त ।
जयतु जयतु श्री सिद्ध अनंत ।।
प्रनुति सूर, उवझाय प्रणाम ।
नूर जैन नभ नुति अविराम ।।३२।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो ऽघोर-गुण-बंभ-यारीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

आज तुम दर्शन क्या पाये ।
कूप माँ गर्भ बहिर आये ।।
पा गई आँख रोशनी ‘नौ’ ।
आज भव सफल हुआ मानो ।।३३।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो आमो-सहि-पत्ताणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

अब बँधने वाली शिव पगड़ी ।
जाने, जानें दुनिया सगरी ।।
अरिहन्तों का हमें सहारा ।
नमस्कार गुरु पञ्च हमारा ।।३४।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो खेल्लो-सहि-पत्ताणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

अध्यक्ष, अगण ।
प्रद दीक्ष नगन ।
जित अक्ष नमन, अनवीक्ष ध्यान ।
महिमा भगवन् गुरु पन महान ।।३५।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो जल्लो-सहि-पत्ताणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

हित उपदेशी ।
मत खुद जैसी ।
गत रत द्वैषी ।
अरिहन्त शरण ।
मम लगी लगन ।
अनगिन वन्दन ।।३६।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो विट्ठो-सहि-पत्ताणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

इक सर्वग ।
दय रग-रग ।
दृग जग जग ।
पुन अक्षय ।
धन ! नन्त चतुष्टय ।
जयतु अरिहन्त जय ।।३७।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो सव्वो-सहि-पत्ताणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

पड़े कर्म पे भारी ।
सेना मोह पछाड़ी ।
सम शरणा बलहारी ।
नन्त चतुष्टय जेबा ।
जयवन्तो जिन देवा ।।३८।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो मण-बलीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

युगपत् जग जाना ।
जन-जन हित ठाना ।
अगणित गुणवाना ।
धन पुण्य पिटारे हैं ।
जिन-देव हमारे है ।।३९।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो वचि-बलीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

वीतरागी निरे ।
देव देवी घिरे ।
चतुष्टय अनन्त जय ।
देव अरिहन्त जय ।
देव जिन जयन्त जय ।।४०।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो काय-बलीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

झिर नन्द सुमन ।
जल गन्ध पवन ।
सिंह वृन्द हिरण ।
सुख नन्त परम ।
अरिहन्ताणम् अरिहन्ताणम् ।।४१।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो खीर-सवीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

धन धन्य सम-शरण ।
जल गन्ध, झिर सुमन ।
मृग सींह धुन श्रवण ।
व्रत शील शिरोमण ।
अरिहन्त जपो-मन ।
जिन-देव जपो-मन ।।४२।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो सप्पि-सवीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

धन नन्त चतुष्टय रीझे ।
चउ कर्म घातिया झीजे ।
पा लिये सुलोचन तीजे ।
अरिहन्तों के सुमरण से ।
जुड़ चलें अन्त सु…मरण से ।।४३।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो महुर-सवीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

भव्य जन जे प्रमाद तज के ।
पुलक, दृग् मुक्ताफल सज के ।।
निरखते अपलक तुम आनन ।
विरचते आप भजन, वे धन ।।४४।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो अमइ-सवीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

कर्म घातिया घात जे,
नन्त चतुष्टय वन्त ।
हितु शिशु दीनानाथ वे,
जयतु जयतु अरिहन्त ।।४५।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो अक्खीण-महा-णसाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

हित उपदेशा ।
गत रत-द्वेषा ।
विदित अशेषा ।
जयतु जयतु अरिहन्त जिनेशा ।।४६।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो वड्ढमाण-बुद्धि-रिसस्स
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

कर्मन घात घात अशेष ।
सुख, बल, ज्ञान, दर्श विशेष ।।
जिन अरिहन्त सुख-कारी ।
जय जिन-देव जय थारी ।।४७।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो सव्व-सिद्धा-यद-णाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

सुख सहजो-निराकुल खूब ।।
तव थव सरसि साधो डूब ।।
दर्शन आश पुनि थारी ।।
भगवत् कृपा बलिहारी ।।४८।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो भयवदो महदि
महावीर वड्ढमाण बुद्धिरिसीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

पूर्णार्घ
जल, मनहारी चन्दन झारी ।
अक्षत शाली, नन्दन क्यारी ।।
स्वीकारो, मम आराध्य-देव,
चरु, दीप, धूप, श्री-फल थाली ।।03।।
श्री वृषभादि वर्धमान पर्यंत
परम-देव भगवन् तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
चतुर्विंशति दल कमल
हृदयस्-थिताय
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय
पूर्णार्घं निर्वपामीति स्वाहा ।।

महा-अर्घं
दीप, चरु, जल, धूप, गुल, फल, गन्ध, अक्षत ।
ले खड़ा तुम द्वार पर, दे रहा दस्तक ।
सुख ‘निराकुल’ हाथ में मेरे लगेगा,
आश रख विश्वास चरणन रखा मस्तक ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
नव देव भगवन् तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
अष्ट-चत्वारिंशद्-दलकमल
हृदयस्-थिताय
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय नमः
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

:: जाप्य ::
।। ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री चन्द्रप्-प्रभ तीर्थंकराय नमः ।।

जयमाला
गर्मी दे करा जल प्रीत ।
चरणन खड़ा आन विनीत ।।
कारण जन्म जल दुखड़ा ।
न ‘कि अनुराग प्रभु तुमरा ।।१।।

विद्या, मन्त्र, औषध, नीर ।
हरती शीघ्र विषमय पीर ।।
संस्तुति आप की साधी ।
विच्छुति आप ही व्याधी ।।२।।

नैनन ज्योति हर अंधियार ।
रवि इक किरण जाता हार ।।
तुमने लिया सिर बीड़ा ।
सिर से उतरती पीड़ा ।।३।।

रक्षक आप संस्तुति ताल ।
यदि रहता न त्रिभुवन-पाल ।।
यम दवाग्नि जित-जगती ।
परणति कौन ? बच सकती ।।४।।

सिंह गर्जना पड़ती कान ।
गज-मद लोक-यम प्रस्थान ।।
संस्तुति शान्त मन गाई ।
शामत रोग मनु आई ।।५।।

इन्द्रिय सुख न कम सुरलोक ।
आ भू-मर्त्य दें सुर धोक ।।
धन ! दृग निराकुल तीजे ।
इक तुम भक्त पे रीझे ।।६।।

करता भानु न उपकार ।
ढोता कमल निद्रा भार ।।
किरपा आप की होती ।
सहसा पाप धी खोती ।।७।।

दृग प्रभु पद टिका टक-एक ।
पाये शान्ति भव्य अनेक ।।
बारी आज है मेरी ।
आदत दया की तेरी ।।८।।

दोहा
हाथ ‘निराकुलता’ लगी,
किरपा सिर्फ तुम्हार ।
धका धका यूॅं दो लगा,
नैय्या मेरी पार ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय नमः
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

श्री सरसुति-मंत्र*
ॐ ह्रीम्
अर्हन् मुख कमल-वासिनि
पा-पात्म क्षयंकरि
श्रुत-ज्ञान
ज्वाला सहस्र प्रज्ज्वलिते
सरस्वति !
मत् पापम् हन हन दह दह
क्षाम् क्षीम् क्षूम् क्षौम् क्षः
क्षीरवर-धवले
अ-मृत संभवे
वम् वम् हूम् फट् स्वाहा
मम सन्-निधि-करणे
मम सन्-निधि-करणे
मम सन्-निधि-करणे ।
ॐ ह्रीं जिन मुखोद्-भूत्यै
श्री सरस्वति-देव्यै
अर्घं निर्वपामीति स्वाहा

शांति पाठ
अथ पौर्वाह-निक (अप-राह-निक)
देव-शास्त्र-गुरु-वन्दना-क्रियायाम्
पूर्वाचार्या-नुक्-क्रमेण,
सकल-कर्मक्-क्षयार्-थम्,
भाव-पूजा-वन्दना-स्तव समेतम्
श्री शांति-भक्ति कायोत्सर्गम् करोम्यहम्
(९ बार णमोकार )

*चौपाई*
दर्शन मात्र मेंटता दुखड़ा ।
भाँत चन्द्रमा सुन्दर मुखड़ा ।।
नासा टिके नैन मनहारी ।
करें वन्दना नाथ ! तुम्हारी ।।१।।

आप चक्रधर-पञ्चम नामी ।
वन्द्य इन्द्र शत, अन्तर्-यामी ।।
प्रभो शान्ति-जिन करके करुणा ।
करो शान्ति ! जश निरखो अपना ।।२।।

छत्र, सिंहासन, वृक्ष-अशोका ।
धुनि, दुन्दुभि, दल-चँवर अनोखा ।।
भा-मण्डल झिर-पुष्प-अनूठी ।
प्रातिहार्य-वसु आप विभूती ।।३।।

अर्चित-जगत् ! शान्ति करतारी ।
ढ़ोक करो स्वीकार हमारी ।।
प्राण-भूत, सत्, जीव समस्ता ।
पायें परिणति शान्त प्रशस्ता ।।४।।

देवों में जो देव बड़े हैं ।
चरणों में हित सेव खड़े हैं ।।
हंस-वंश वे जग उजियारे ।
करें शान्ति मण्डित जग सारे ।।५।।
(निम्न श्लोक को पढ़कर
जल छोड़ना चाहिए)

शान्ति कीजिये गाँव-गाँव में ।
विश्व लीजिये पाँव-छाँव में ।।
डूब ‘साध-जन’ उतरें गहरे ।
लहर लहर-पचरंगा लहरे ।।६।।

नृप धार्मिक बलशाली होवे ।
विकृत-प्रकृत मनमानी खोवे ।।
धर्म-चक्र-जिन सौख्य प्रदाता ।
रहे प्रवाहित यूँ हि विधाता ।।७।।

द्रव्य सुमंगल-कारी होवे ।
क्षेत्र अमंगल-हारी होवे ।।
होवे काल सुमंगल-कारी ।
होवें भाव अमंगल-हारी ।।८।।

कर्मन-घात घात मद सारा ।
सहजो सिद्ध रिद्ध परिवारा ।।
आदि आदि अर्हन् चौबीसा ।
शान्ति प्रदान करें निशि दीसा ।।९।।

*दोहा*
किया शान्ति जिन भक्ति का,
भगवन् कायोत्सर्ग ।।
करूँ दोष आलोचना,
जो प्रद-स्वर्ग-पवर्ग ।।१०।।

*चौपाई*
पाँच सभी कल्याणक धारी ।
आठ प्राति-हारज मन-हारी ।।
अतिशय तीस चार मण्डित हैं ।
अर बत्तीस इन्द्र वन्दित हैं ।।११।।

चौ-विध संघ नखत मानिन्दा ।
राम श्याम चक्री, प्रभु ! चन्दा ।।
‘निलय-विनय’ अन-गिनत गभीरा ।
आद-आद जिन अंतिम वीरा ।।१२।।

अर्चन-पूजन-वन्दन करता ।
उनका मैं अभिनन्दन करता ।।
पीड़ा-दुक्ख-दरद-भय खोवे ।
मेरे कर्मों का क्षय होवे ।।१३।।

रत्नत्रय का मुझे लाभ हो ।
मेरी ‘गति-पंचम-उपाध’ हो ।।
मृत्यु-महोत्सव मना सकूँ मैं ।
जिन-गुण-सम्पद् कमा सकूँ मैं ।।१४।।
अथ पौर्वाह-निक (अप-राह-निक)
देव-शास्त्र-गुरु-वन्दना-क्रियायाम्
पूर्वाचार्या-नुक्-क्रमेण,
सकल-कर्मक्-क्षयार्-थम्,
भाव-पूजा-वन्दना-स्तव समेतम्
श्री समाधि-भक्ति कायोत्सर्गम्
करोम्यहम्
(९बार णमोकार )

*चौपाई*
सदा शास्त्र अभ्यास करूँ मैं ।
सन्त समीप निवास करूँ मैं ।।
मौन धरूँ क्यूँ, गुणी दिखाये ।
गौण करूँ, यूँ दोष-पराये ।।१५।।

भावन-आत्म तत्व, नम-नयना ।
हित-मित रखूँ मधुरतम वयना ।।
जब तक राधा-मुक्ति रिझाऊँ ।
इन्हें जन्म जन्मान्तर पाऊँ ।।१६।।

तारण हारे…शरण सहारे ।
हृदय हमारे…चरण तुम्हारे ।।
चरण तुम्हारे…हृदय हमारा ।
रहे, तलक जब भव-जल-धारा ।।१७।।

स्वर-अक्षर पद मात्रा गलती ।
हुईं, चाहते बिन अनगिनती ।।
हो अपराध क्षमा यह मेरा ।
‘जैसा भी’ मैं अपना तेरा ।।१८।।

*दोहा*
किया समाधी, भक्ति का,
भगवन् कायोत्सर्ग ।।
करूँ दोष आलोचना,
जो प्रद-स्वर्ग-पवर्ग ।।१९।।

*चौपाई*
सम्यक्-दर्शन, सम्यक्-ज्ञाना ।
सम्यक्-चारित, ताना-बाना ।।
रूप अनूप ध्यान परमातम ।
बुद्ध-विशुद्ध ज्ञान धर आतम ।।२०।।

पूजन नित वन्दन करता हूँ ।
अर्चन अभिनन्दन करता हूँ ।।
क्षय होवें दुख संकट सारे ।
क्षय हो जावें कर्म हमारे ।।२१।।

मुझे लाभ रत्नत्रय होवे ।
सुगति गमन, भय-सप्तक खोवे ।।
पाऊँ मरण-समाधी स्वामी ।
बनूँ रतन जिन-गुण आसामी ।।२२।।
‘पुष्पाञ्जलिं क्षिपेत्’
( यहाँ पर नौ बार णमोकार मंत्र
पढ़ना चाहिए )

विसर्जन पाठ
अञ्जन को पार किया ।
चन्दन को तार दिया ।।
नहिं तोर दया का पार ।
नागों का हार किया ।।१।।

धूली-चन्दन-बावन ।
की शूली सिंहासन ।।
धरणेन्द्र देवी-पद्मा ।
मामूली अहि-नागिन ।।२।।

अगनी ‘सर’ नीर किया ।
भगिनी ‘सर’ चीर किया ।।
नहिं तोर दया का पार ।
केशर महावीर किया ।।३।।

बन पड़ीं भूल से भूल ।
कृपया कर दो निर्मूल ।।
बिन कारण तारण हार ।
नहिं तोर दया का पार ।।४।।
दोहा
बस आता, अब धारता,
ईश आशिका सीस ।
कृपा निराकुल आपकी,
बनी रहे निशि-दीस ।।
(पुष्पांजलि क्षिपामि)

आरती
ऐरा नन्दा ।
बाबा चन्दा ।।
स्वर्ण सुगंधा ।
पाप निकन्दा ।
जयतु जयतु जय, चन्द्र जिनन्दा ।।
दीप हाथ ले ।
भक्ति साथ ले ।
करूँ आरती मैं सानन्दा ।।
जयतु जयतु जय, चन्द्र जिनन्दा ।।

आरती प्रथम गर्भ कल्याणा ।
इन्द्र कुबेर रत्न बरसाना ।।
साँझ साँझ ले भक्ति अमन्दा ।
करूँ आरती मैं सानन्दा ।
जयतु जयतु जय, चन्द्र जिनन्दा ।।१।।

आरती द्वितिय जन्म कल्याणा ।
मेर न्हवन सौधर्म रचाना ।
ताण्डव करे भक्त बन अंधा ।
करूँ आरती मैं सानन्दा ।
जयतु जयतु जय, चन्द्र जिनन्दा ।।२।।

आरती तृतिय त्याग कल्याणा ।
कच लुञ्चल, दैगम्बर बाना ।
छोड़ छाड़ सब गौरख धंधा ।
करूँ आरती मैं सानन्दा ।
जयतु जयतु जय, चन्द्र जिनन्दा ।।३।।

आरती तुरिय ज्ञान कल्याणा ।
सींह हिरण समशरण दिखाना ।
बैठे दे कंधे से कंधा ।
करूँ आरती मैं सानन्दा ।
जयतु जयतु जय, चन्द्र जिनन्दा ।।४।।

आरती और मोक्ष कल्याणा ।
समय मात्र ऋज गति शिव थाना ।
टूट चला वसु कर्मन फंदा ।
जयतु जयतु जय, चन्द्र जिनन्दा ।।
दीप हाथ ले ।
भक्ति साथ ले ।
करूँ आरती मैं सानन्दा ।।
जयतु जयतु जय, चन्द्र जिनन्दा ।।५।।

 

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