पावागिर स्थित
मुनि मणि-भद्रादि-पूजन
मणि भद्र, जयतु-जय, स्वर्ण-भद्र ।
गुण-भद्र, जयतु-जय, नील-भद्र ।।
तट नदी चेलना शिव गामी ।
पावागिरि सिद्ध क्षेत्र नामी ।।
आवाज दे रहा दृग् सीले ।
आओ भी उतर गगन नीले ।।
‘मन-दर’ तुुम बिन खाली खाली ।
आ कर, दो मनवा दीवाली ।।
ॐ ह्रीं श्री पावागिर स्थित
मणि-भद्रादि मुनीन्द्र !
अत्र अवतर ! अवतर ! संवौषट् !
(इति आह्वाननम्)
अत्र तिष्ठ ! तिष्ठ ! ठ: ! ठ: !
(इति स्थापनम्)
अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् !
(इति सन्निधिकरणम्
पाने तुम चरण शरण आया ।
जल प्रासुक कर, घट भर लाया ।।
मुझको अपने जैसा कर लो ।
अपना रुपया-पैसा धर लो ।।
ॐ ह्रीं पावागिर स्थित
मणि-भद्रादि मुनि वरेभ्यो:
जन्म-जरा-मृत्यु विनाशनाय
जलं निर्वपामीति स्वाहा ।।
पाने तुम चरण शरण आया ।
घिस कर मलयज चन्दन लाया ।।
लो उठा इधर भी एक नजर ।
जाये ‘कि उतर सब थकन सफर ।।
ॐ ह्रीं पावागिर स्थित
मणि-भद्रादि मुनि वरेभ्यो:
संसारताप विनाशनाय
चंदनं निर्वपामीति स्वाहा ।।
पाने तुम चरण शरण आया ।
सित साबुत शालि धान लाया ।।
सिर मेरे रख दो आप हाथ ।
कर लिया करो ना रोज बात ।।
ॐ ह्रीं पावागिर स्थित
मणि-भद्रादि मुनि वरेभ्यो:
अक्षयपद प्राप्तये
अक्षतान् निर्वपामीति स्वाहा ।।
पाने तुम चरण शरण आया ।
कुछ हटके महक पुष्प लाया ।।
पा जाऊँ पावन पाँवन रज ।
बन सकूँ निराकुल और सहज ।।
ॐ ह्रीं पावागिर स्थित
मणि-भद्रादि मुनि वरेभ्यो:
कामबाण-विध्वंसनाय
पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा ।।
पाने तुम चरण शरण आया ।
मनहर मन भर व्यन्जन लाया ।।
चिर-मिलन भक्त भगवान् रेख ।
दो भेंट मन्द-मुस्कान एक ।।
ॐ ह्रीं पावागिर स्थित
मणि-भद्रादि मुनि वरेभ्यो:
क्षुधारोग-विनाशनाय
नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।
पाने तुम चरण शरण आया ।
अठपहरी घृत दीपक लाया ।।
छू पाया सपने सपनों में ।
बैठा लो अपने अपनों में ।।
ॐ ह्रीं पावागिर स्थित
मणि-भद्रादि मुनि वरेभ्यो:
मोहांधकार विनाशनाय
दीपं निर्वपामीति स्वाहा ।।
पाने तुम चरण शरण आया ।
दश-गंध अनूप धूप लाया ।।
जर्रा सी जगह पास चरणन ।
दो भेंट समय-साँझन सुमरण ।।
ॐ ह्रीं पावागिर स्थित
मणि-भद्रादि मुनि वरेभ्यो:
अष्टकर्म-दहनाय
धूपं निर्वपामीति स्वाहा ।।
पाने तुम चरण शरण आया ।
रसदार सुगंधित फल लाया ।।
दो भेंट आप आशीष छाँव ।
लग सके ताकि तट-मोक्ष नाव ।।
ॐ ह्रीं पावागिर स्थित
मणि-भद्रादि मुनि वरेभ्यो:
मोक्षफल-प्राप्तये
फलं निर्वपामीति स्वाहा ।।
भेंटूँ जल, चन्दन, शाली धाँ ।
फुलवा प्रफुल्ल, गो-घृत पकवाँ ।।
घृत दीप, धूप, फल, अष्ट दरब ।
करने अरि अष्टक नष्ट सरब ।।
ॐ ह्रीं पावागिर स्थित
मणि-भद्रादि मुनि वरेभ्यो:
अनर्घ्यपद-प्राप्तये
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।
दोहा
सुना ! आप दुखड़ा सुने,
आया रख विश्वास ।
मत ठुकरा देना हमें,
रख लो चरणन पास ।।१।।
जयमाला
जयकारा गया न खाली है ।
अब तलक मनी दीवाली है ।।
सॉंचे दरबार भक्त आते ।
झलकत भर ले झोली जाते ।।२।।
अंधों ने आ पाई आँखें ।
बहरे न कभी बगलें झाँकें ।।
साढ़े-साती मिलती माटी ।
बाधा-ऊपर, ऊपर जाती ।।३।।
गुम काल-सर्प इक योग तुरत ।
झट सर्व-रोग गुम तुम सुमरत ।।
हो जाती मन-मुराद पूरी ।
खो जाती दो मन की दूरी ।।४।।
खुशिंयों से जुड़ जाता नाता ।
आ नाम सुर्ख़िंयों में जाता ।।
जिसको चाहे दुनिया सारी ।
हो स्वानुभूति वो, बलिहारी ।।५।।
कुछ न कहता, सब कुछ सहता ।
सोने सा जग कीचड़ रहता ।।
यानी वो जल से भिन्न कमल ।
रहने लगता जागृत पल-पल ।।६।।
अब दूर न उससे शिव राधा ।
सब सधे कहाँ, अब इक साधा ।।
कुछ और न यह, है प्रभु किरपा ।
वो रहे सुखी अपना घर पा ।।७।।
दोहा
बच्चा ही देवे बता,
माँ को अपना लाल ।
नहीं कौन सा कीमती,
माँ अवतार दयाल ।।८।।
ॐ ह्रीं पावागिर स्थित
मणि-भद्रादि मुनि वरेभ्यो:
अनर्घ्यपद-प्राप्तये
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।
ऊन के शान्ति कुन्थु अरह-नाथ
भगवान् की पूजन
ऊन पावागिर की पहचान ।
शान्ति श्री कुन्थु अरह भगवान् ।
स्वर्ण भद्रादि मुनीश्वर चार ।
गये निर्माण लगा कर ध्यान ।।
सुमन श्रृद्धा ले रहा पुकार ।
हृदय वेदिका पधारो आन ।।
लगा लाखन भव सिन्धु किनार ।
स्वयं भी जा पहुँचे उस पार ।
दृष्टि इक मुझ पर भी दो डाल ।।
सजल दृग् साध रहा गुण-गान ।
शान्ति, श्री कुन्थु, अरह भगवान् ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री शान्ति-कुन्थु अर जिनेन्द्र !
अत्र अवतर अवतर संवौषट्
(इति आह्वानन)
अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ:
(इति स्थापनम्)
अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट्
(इति सन्निधिकरणम्) ।
अश्रु बन झिरे देख पर पीर ।
रहे तुम हिल-मिल जैसे नीर ।
न होवें बोल विष बुझे तीर,
लिये जल गंग स्वच्छ अम्लान ।।
सजल दृग् साध रहा गुण-गान ।
शान्ति, श्री कुन्थु, अरह भगवान् ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री शान्ति-कुन्थु अर जिनेन्द्राय नमः
जलं निर्वपामीति स्वाहा ।।
महक छोड़ी घिस चन्दन भॉंत ।
आप कब ‘विष-मय’ भुजंग साथ ।
आप सा बनने हृदय विराट,
लिये घिस चन्दन आप समान ।।
सजल दृग् साध रहा गुण-गान ।
शान्ति, श्री कुन्थु, अरह भगवान् ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री शान्ति-कुन्थु अर जिनेन्द्राय नमः
चंदनं निर्वपामीति स्वाहा ।।
भाँत चावल बहि रन्तर एक ।
आप कब रीते हंस विवेक ।
आप सी खिंचे हाथ शिव रेख,
लिये नामा शाली एक धान ।।
सजल दृग् साध रहा गुण-गान ।
शान्ति, श्री कुन्थु, अरह भगवान् ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री शान्ति-कुन्थु अर जिनेन्द्राय नमः
अक्षतं निर्वपामीति स्वाहा ।।
छिद्र पर देख रखी दृग मींच ।
सुमन तुम शोभित कण्टक बीच ।।
करो, खाऊँ न जंग बिच कीच,
चढ़ाऊॅं पुष्प स्वर्ग बागान ।
सजल दृग् साध रहा गुण-गान ।
शान्ति, श्री कुन्थु, अरह भगवान् ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री शान्ति-कुन्थु अर जिनेन्द्राय नमः
पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा ।।
चुने व्यंजन स्वर सियादवाद ।
खड़ा जा तुमसे दूर विवाद ।।
फेर पाऊॅं स्वर व्यंजन या…द,
रसीले लाया घृत पकवान ।।
सजल दृग् साध रहा गुण-गान ।
शान्ति, श्री कुन्थु, अरह भगवान् ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री शान्ति-कुन्थु अर जिनेन्द्राय नमः
नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।
झगड़ अपनों से जाते हार ।
आप दीपक न तले अंधियार ।
ज्योत संज्ञान लगे इस बार,
जगाऊँ दीप दूसरा भान ।।
सजल दृग् साध रहा गुण-गान ।
शान्ति, श्री कुन्थु, अरह भगवान् ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री शान्ति-कुन्थु अर जिनेन्द्राय नमः
दीपं निर्वपामीति स्वाहा ।।
आप कृत सोने और सुगंध ।
प्रकृति पुन प्रकट तीर्थ-कर बन्ध ।
रहे न जीवन और स्वछन्द,
खे रहा दिव्य सुगंध विमान ।।
सजल दृग् साध रहा गुण-गान ।
शान्ति, श्री कुन्थु, अरह भगवान् ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री शान्ति-कुन्थु अर जिनेन्द्राय नमः
धूपं निर्वपामीति स्वाहा ।।
नरम तुम भीतर श्री फल भॉंत ।
त्याग तप निरत बाह्य दिन-रात ।
खींच लो नाव मुक्ति दे हाथ,
भिंटाऊॅं फल परात दिव-थान ।।
सजल दृग् साध रहा गुण-गान ।
शान्ति, श्री कुन्थु, अरह भगवान् ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री शान्ति-कुन्थु अर जिनेन्द्राय नमः
फलं निर्वपामीति स्वाहा ।।
गंग जल, चन्दन, अक्षत, शाल ।
पुष्प, चरु, दीप, धूप, फल थाल ।।
झूम झुक झूम साथ करताल,
भिंटाऊॅं हेत एक कल्याण ।
सजल दृग् साध रहा गुण-गान ।
शान्ति, श्री कुन्थु, अरह भगवान् ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री शान्ति-कुन्थु अर जिनेन्द्राय नमः
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।
कल्याण अर्घ्य
गर्भ अभी माँ का सूना ।
बरसे रतन रजत ‘सो ना’ ।।
भेंट न क्या क्या सुर लायें ।
गर्भ शोंधतीं बालाएँ ।।
बाबा ऊन चमत्कारी ।
मंशा-पून, विपद्-हारी ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
गर्भ कल्याणक प्राप्ताय
श्री शान्ति-कुन्थु अर जिनेन्द्राय नमः
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।
किलकारी गूँजीं अँगना ।
छके न, तके सहस नयना ।।
ढ़ोरे बड़े कलश लाके ।
ताण्डव नृत्य करे आके ।।
बाबा ऊन चमत्कारी ।
मंशा-पून, विपद्-हारी ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
जन्म कल्याणक प्राप्ताय
श्री शान्ति-कुन्थु अर जिनेन्द्राय नमः
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।
राज पाठ कब रोक सका ।
अनुमोदन लोकान्त सखा ।।
कर कच-लोंच वस्त्र फेंके ।
ध्याया निज दीक्षा लेके ।।
बाबा ऊन चमत्कारी ।
मंशा-पून, विपद्-हारी ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
दीक्षा कल्याणक प्राप्ताय
श्री शान्ति-कुन्थु अर जिनेन्द्राय नमः
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।
धू-धू कर्म घातियाँ चौ ।
शुक्ल ध्यान पा अनबुझ ‘दौ’ ।।
ज्ञान अपूरब समशरणा ।
हिरणी सिंह भाई बहना ।।
बाबा ऊन चमत्कारी ।
मंशा-पून, विपद्-हारी ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
ज्ञान कल्याणक प्राप्ताय
श्री शान्ति-कुन्थु अर जिनेन्द्राय नमः
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।
कर्म शेष जल, पड़े सभी ।
आप देश चल पड़े तभी ।।
गये समय इक वहाँ पहुँच ।
नहीं कर्म इक जहाँ पहुँच ।।
बाबा ऊन चमत्कारी ।
मंशा-पून, विपद्-हारी ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
मोक्ष कल्याणक प्राप्ताय
श्री शान्ति-कुन्थु अर जिनेन्द्राय नमः
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।
दोहा
बाबा के दरबार की,
अजब निराली बात ।
तलक आज लौटा नहीं,
कोई खाली हाथ ।।
जयमाला
शान्ति, कुन्थ्वर देव देवा ।
देव करते आप सेवा ।।
क्यूँ न सेवा करूॅंगा मैं,
आप मम आराध्य देवा ।।१।।
तीर्थ-कर जश गगन गाजा ।
चक्रधर षट् खण्ड राजा ।।
पुण्य फल पद कामदेवा ।
देव करते आप सेवा ।
आप मम आराध्य देवा ।।२।।
वीतरागी ! विगत-द्वेषी ! ।
एक सर्वग ! हितुप-देशी ! ।।
रत्न खन-खन तीन जेबा ।
देव करते आप सेवा ।
आप मम आराध्य देवा ।।३।।
नन्त दर्शन, ज्ञान नन्ता ।
सुख अनन्ता वीर्यवन्ता ।।
तट चतुष्ट्य-नन्त खेवा ।
देव करते आप सेवा ।
आप मम आराध्य देवा ।।४।।
छत्र, चॉंवर, पुष्प बरसा ।
सिंहासन, धुनि-दिव्य सरसा ।।
भा-वलय, तर-तूर-देवा ।
देव करते आप सेवा ।
आप मम आराध्य देवा ।।५।।
चॅंवर, पंखा, छतर, ढोना ।
कलश, झारी, ध्वज सलोना ।।
सार्थ दर्प-ण मं-गलेवा ।
देव करते आप सेवा ।
आप मम आराध्य देवा ।।६।।
ज्ञान केवल दृगस्-थाई ।
धन्य ! शासन दुख विदाई ।।
खुश गगन उड़ते परेवा ।
देव करते आप सेवा ।
आप मम आराध्य देवा ।।७।।
कुमुद भवि प्रति-बुद्ध चन्दा ।
दोष घन-हन, प्रदानन्दा ! ।।
कृपा बरसाते सदैवा ।
शान्ति, कुन्थ्वर देव देवा ।
देव करते आप सेवा ।।
क्यूँ न सेवा करूॅंगा मैं,
आप मम आराध्य देवा ।।८।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री शान्ति-कुन्थु अर जिनेन्द्राय नमः
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।
दोहा
एक बार आना पड़े,
बाबा बड़े दयाल ।
माँ से कब कहना पड़े,
माँ खुद रखे ख्याल ।।
।। पुष्पांजलि क्षिपामि ।।
विधान प्रारंभ
अष्ट दलकमल पूजा
विधान की जय
णमो णमो अरि-हं-ता-णं ।
सिद्-धा-णं, आ-यरि-या-णं ।।
णमो णमो उ-वज्-झा-या-णं ।
णमो लोए सव्व सा-हू-णं ।।१।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो जिणाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री शान्ति-कुन्थु अर जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।
बुध मंगल, लोकोत्तम, शरणा ।
सिध मंगल, लोकोत्तम, शरणा ।।
शरणा, लोकोत्तम, मुनि मंगल ।
शरणा, लोकोत्तम, धुनि मंगल ।।२।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो ओहि जिणाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री शान्ति-कुन्थु अर जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।
वृषभ, अजित, संभव-जिन देवा ।
वन्दन नन्दन, सुमत सदैवा ।।
पुष्प-दन्त, शीतल-जिन स्वामी ।
पद्म सुपार्श्व चन्द्र भा-नामी ।।
श्रेयस, सुनु-वसु-पूज जिनेशा ।
विमल, अनन्त, धर्म सन्देशा ।।
शान्ति, कुन्थु, अर, मल्ल-गभीरा ।
मुनि, नमि, नेम, पार्श्व, अति-वीरा ।।३।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो परमोहि जिणाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री शान्ति-कुन्थु अर जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।
अरिहन्त, सिद्ध, आचारज ।
उवज्ञाय, साधु चरणारज ।।
जिन-धर्म, जिनागम धन-धन ! ।।
जिन चैत्य, जिनालय वन्दन ।।४।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो सव्वोहि जिणाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री शान्ति-कुन्थु अर जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।
सूना सूना मन आँगन ।
बने नैन भादो-सावन ।।
बारिस में रोना हर लो ।
आ सोना सोना कर दो ।। ।।५।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो अणंतोहि जिणाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री शान्ति-कुन्थु अर जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।
अन्तर्यामी
त्रिभुवन-स्वामी
शान्ति कुन्थ अर नाथ ।।
वन्दन, हेत समाध ।
जोड़ हाथ, नत माथ ।।
झट सुनते फ़रियाद ।
शान्ति कुन्थ अर नाथ ।।६।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो कोट्ठ-बुद्धीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री शान्ति-कुन्थु अर जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।
हृदय छलके करुणा ।
आँख गंगा जमुना ।।
शान्ति जय, जयतु कुन्थ ।
जयतु जय अर जिनन्द ।।७।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो बीय-बुद्धीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री शान्ति-कुन्थु अर जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।
भू स्वाम देव ।
भो ! काम देव ।
अर तीर्थंकर ।
शांति कुन्थ अर, अर तीर्थंकर ।।
वन्दन सदैव ।
हित पार खेव ।।
गुण-रत्नाकर ।
शांति कुन्थ अर, अर तीर्थंकर ।।८।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो पदाणु-सारीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री शान्ति-कुन्थु अर जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।
देवाधिदेव ! ।
दृग गंग-रेव ! ।
तुम तीर्थंकर, तुम चक्रवर्ती, तुम कामदेव ।
श्री शान्ति, कुन्थु, अर-नाथा ।
चरणों में शीश नवाता ।।
बलि बलि जाऊॅं, भव-भव पाऊॅं, तुम चरण सेव ।
तुम तीर्थंकर, तुम चक्रवर्ती, तुम कामदेव ।।01।।
ॐ ह्रां ह्रीं ह्रूं ह्रौं ह्र:
अ-सि-आ-उ-सा नमः
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
अष्टदल कमल हृदयस्-थिताय
श्री शान्ति-कुन्थु अर जिनेन्द्राय
पूर्णार्घं निर्वपामीति स्वाहा ।।
षोडश दलकमल पूजा
विधान की जय
देव दर्शन जो नित करता ।
पाप का नाम निशां मिटता ।।
स्वर्ग सुख सीढ़ी जिनदर्शन ।
प्रथम शिव पैड़ी जिन दर्शन ।।९।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो सं-भिण्ण-सोदा-राणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री शान्ति-कुन्थु अर जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।
देव दर्शन से अभी अभी ।
सहज छू मन्तर पाप सभी ।।
छेद वाली अंजुल पाकर ।
टिके कब नीर भले सागर ।।१०।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो सयं-बुद्धाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री शान्ति-कुन्थु अर जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।
प्रभा मानिन्द पदम रागा ।
देख मुख चन्द प्रशम रागा ।।
पाप भव भवनान्तर जोड़े ।
आप यम द्वार तरफ दोड़े ।।११।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो पत्तेय-बुद्धाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री शान्ति-कुन्थु अर जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।
किया जिन रूप सूर दर्शन ।
तिमिर संसार दूर तत्क्षण ।।
कमल मन पुलकित हो चाला ।
पदारथ पाते उजियाला ।।१२।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो बोहिय-बुद्धाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री शान्ति-कुन्थु अर जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।
किया दर्शन मुख जिन चन्दा ।
सिन्ध वृद्धिंगत आनंदा ।।
अमृत सद्धर्म सतत बरसा ।
ताप-भव हाँप उठा सहसा ।।१३।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो उजु-मदीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री शान्ति-कुन्थु अर जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।
सिन्ध गुण सम्यक्-त्वादिक धन ।
तत्व जीवादिक प्रतिपादन ।।
दिगम्बर जिन प्रशान्त रूपा ।
ढ़ोक हित स्वानूभूत नूपा ।।१४।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो विउल-मदीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री शान्ति-कुन्थु अर जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।
एक आनन्द आत्म चिन्मय ।
अटल परमात्म तत्व निर्णय ।।
सिद्ध परमात्म वे अनंता ।
हृदय आ पहुंचे दृग् पन्था ।।१५।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो दस-पुव्वीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री शान्ति-कुन्थु अर जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।
शरण तुम मुझे जगत दोई ।
शरण तुम सिवा नहीं कोई ।।
दया करके, करके करुणा ।
मुझे ले-लो अपनी शरणा ।।१६।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो चउ-दस-पुव्वीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री शान्ति-कुन्थु अर जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।
आज, कल तुम रक्षक मेरे ।
आप थे कल रक्षक मेरे ।।
बने रहना रक्षक कल भी ।
न होना ओझल तुम पल भी ।।१७।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो अट्ठंग-महा-णिमित्त कु-सलाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री शान्ति-कुन्थु अर जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।
मिले जिन भक्ति मुझे दिन दिन ।
मिले जिन भक्ति मुझे छिन छिन ।।
सदा जिन भक्ति ज्योत जागे ।
सदा जिन भक्ति लगन लागे ।।१८।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो वि-उव्वण-इड्ढि-पत्ताणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री शान्ति-कुन्थु अर जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।
रहित सद्धर्म जिन अहिंसा ।
प्रशंसित कहाँ पद शहंशा ।।
दास भी, भले गरीबा भी ।
सहित सद्-धर्म जिन प्रभावी ।।१९।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो विज्जा-हराणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री शान्ति-कुन्थु अर जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।
पाप जो संज्ञा ‘गिर’ पाते ।
आप दर्शन से झिर जाते ।।
रोग त्रय जन्म जरा मरणा ।
मिटें छूते ही जिन चरणा ।।२०।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो चा-रणाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
नष्ट-पदार्थ-चिन्ता-ज्ञानं भवतु
श्री शान्ति-कुन्थु अर जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।
दर्शन जिन-देव पाप-हारी ।
सोपान-स्वर्ग, शिव-सुख-कारी ।।
जिन-दर्शन पाप विघटता सब ।
अंजुल-सछिद्र, जल टिकता कब
ॐ ह्रीं अर्हं णमो पण्ण-समणाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री शान्ति-कुन्थु अर जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।
मुख प्रभा-पद्म लख वीतराग ।
जा पाप खड़े हों, दूर भाग ।।
दर्शन जिन-सूर, चूर भव तम ।
मन कमल प्रफुल्ल पदार्थ सुगम ।।२२।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो आयास-गामीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री शान्ति-कुन्थु अर जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।
दर्शन जिन इन्दु सिन्धु-सुख-कर ।
झिर-धर्मामृत भव-दाह-विहर ।।
गुण-सागर ! नगन-प्रशान्त-रूप ।
वन्दन प्रतिपादक तत्त्व-नूप ।।२३।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो आसी-विसाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री शान्ति-कुन्थु अर जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।
सिद्धात्म रूप इक चिदानन्द ।
जिन बुध-परमात्म नमन अनन्त ।।
नहिं और, शरण तुम पद्म चरण ।
कर कृपा करो मेरा रक्षण ।।२४।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो दिट्ठि-वि-साणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री शान्ति-कुन्थु अर जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।
देवाधिदेव ! ।
दृग गंग-रेव ! ।
तुम तीर्थंकर, तुम चक्रवर्ती, तुम कामदेव ।
श्री शान्ति, कुन्थु, अर-नाथा ।
चरणों में शीश नवाता ।।
बलि बलि जाऊॅं, भव-भव पाऊॅं, तुम चरण सेव ।
तुम तीर्थंकर, तुम चक्रवर्ती, तुम कामदेव ।।02।।
ॐ क्षां क्षीं क्षूं क्षें क्षैं क्षों क्षौं क्षं क्षः
नमोर्-ऽहते सर्वं रक्ष रक्ष हूं फट् नमः
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
षोडशदल-कमल हृदयस्-थिताय
श्री शान्ति-कुन्थु अर जिनेन्द्राय
पूर्णार्घं निर्वपामीति स्वाहा ।।
चतुर्विंशतिदल कमल पूजा
विधान की जय
था रक्षक और न होगा कल ।
जिन वीतराग ! इक बल निर्बल ।।
जिन भक्ति मिले, जिन भक्ति मिले ।
जब तक न मुझे भव-मुक्ति मिले ।।२५।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो उग्ग-तवाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री शान्ति-कुन्थु अर जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।
निधि रतन व्यथा जिन-धर्म रहित ।
दारिद्र भला जिन-धर्म सहित ।।
क्षय आमय-त्रय, जिन-दर्श आप ।
संचित विनष्ट भव-कोटि-पाप ।।२६।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो दित्त-तवाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री शान्ति-कुन्थु अर जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।
करते ही जिन-दर्शन ।
यम प्रीय पाप तत्क्षण ।।
जिन-दर्शन रथ दिवि का ।
जिन-दर्शन शिव शिविका ।।२७।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो तत्त-तवाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री शान्ति-कुन्थु अर जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।
दर्शन से जिनवर के ।
वन्दन से मुनिवर के ।।
टिकते न पाप त्यों पल ।
अंजुल सछिद्र ज्यों जल ।।२८।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो महा-तवाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री शान्ति-कुन्थु अर जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।
लख पद्म-राग मनहर ।
मुख वीतराग जिनवर ।।
कृत जन्म-जन्म कल्मष ।
जाता खुदबखुद विहँस ।।२९।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो घोर-तवाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री शान्ति-कुन्थु अर जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।
जिनवर सूरज दर्शन ।
भवि ! मन पंकज विकसन ।।
रोशन पदार्थ सारे ।
हारे भव अँधियारे ।।३०।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो घोर गुण-परक्-कमाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री शान्ति-कुन्थु अर जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।
जिन-देव इन्दु दर्शन ।
सुख रूप सिन्धु वर्धन ।।
सद् धर्मामृत बरसा ।
गुम जन्म दाह सहसा ।।३१।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो घोर-गुणाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री शान्ति-कुन्थु अर जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।
जीवादि-तत्व चर्चा ।
गुण समकितादि अर्चा ।।
छवि दिव्य प्रशान्त नगन ।
देवाधिदेव वन्दन ।।३२।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो ऽघोर-गुण-बंभ-यारीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री शान्ति-कुन्थु अर जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।
चिच्-चिदानन्द चिन्मय ।
सिद्धात्म नन्त-छिन-मय ।।
परमात्म-प्रकाशक जिन ! ।
नम नैन नमन निश-दिन ।।३३।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो आमो-सहि-पत्ताणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री शान्ति-कुन्थु अर जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।
इक सिवा आप चरणा ।
नहिं और मुझे शरणा ।।
कर दया, न कर देरी ।
कीजो रक्षा मेरी ।।३४।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो खेल्लो-सहि-पत्ताणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री शान्ति-कुन्थु अर जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।
त्राता तुम सा ना था ।
है तुम सा ना त्राता ।।
त्राता जगत् प्रभावी ।
त्राता तुम ही भावी ।।३५।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो जल्लो-सहि-पत्ताणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री शान्ति-कुन्थु अर जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।
जिन भक्ति मिले छिन-छिन ।
जिन भक्ति मिले दिन-दिन ।।
जिन भक्ति मिले नव-भव ।
जिन भक्ति मिले भव-भव ।।३६।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो विट्ठो-सहि-पत्ताणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री शान्ति-कुन्थु अर जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।
पद-चक्र खुद सरीखा ।
बिन-दया धरम फीका ।।
जिन धर्म सहित भगवन् ! ।
है भला जन्म निर्धन ।।३७।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो सव्वो-सहि-पत्ताणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री शान्ति-कुन्थु अर जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।
अघ संचित जन्मान्तर ।
कृत पाप भव-भवान्तर ।।
जिन दर्शन से झट क्षय ।
यम-जनम-जरा आमय ।।३८।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो मण-बलीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री शान्ति-कुन्थु अर जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।
वन्दन देव-देव अरिहन्त ।
चरणन सेव सदैव महन्त ।।
करे पापों का पूर्ण विनाश ।
टिके कब छिद्र हस्त जल राश ।।३९।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो वचि-बलीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री शान्ति-कुन्थु अर जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।
भा-मणि-पद्म-राग मानिन्द ।
आनन वीत-रागी जिनन्द ।।
हृदय करते ही नैनन पन्थ ।
पाप परिपाटी पाती अन्त ।।४०।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो काय-बलीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री शान्ति-कुन्थु अर जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।
दर्शन करते ही जिन-सूर ।
तत्क्षण तिमिर-मोह काफूर ।।
फुल्ल मन-भवि जन कमल प्रसून ।
आप रोशन पदार्थ सम्पून ।।४१।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो खीर-सवीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री शान्ति-कुन्थु अर जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।
दर्शन करते ही जिन चन्द ।
वर्धन सागर सहजानन्द ।।
अमृत सद्धर्म अनवरत धार ।
तुरत उपशमत दाह संसार ।।४२।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो सप्पि-सवीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री शान्ति-कुन्थु अर जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।
भवि जीवादि तत्त्व उपदेश ।
शान्त स्वरूप ! दिगम्बर भेष ।।
चिन्मय चिदानन्द इक रूप ।
आतम-परम शुद्ध चिद्रूप ।।४३।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो महुर-सवीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री शान्ति-कुन्थु अर जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।
प्रकाशक परमातम गुण धाम ।
हृदय से बारम्बार प्रणाम ।।
सिन्धु गुण अपूर्व सम्यक्त्वाद ।
वन्दना जोड़ हाथ नत माथ ।।४४।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो अमइ-सवीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री शान्ति-कुन्थु अर जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।
चरणा, साधु सन्त शिर मौर ।
शरणा, आप सिवाय न और ।।
कीजिये कृपया करुणा नाथ ।
शिव तलक निभा दीजिये साथ ।।४५।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो अक्खीण-महा-णसाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री शान्ति-कुन्थु अर जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।
रक्षक जग दोई तो आप ।
रक्षक था कोई तो आप ।।
आप ही भावी रक्षक एक ।
कहे कोने-कोने अभिलेख ।।४६।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो वड्ढमाण-बुद्धि-रिसस्स
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री शान्ति-कुन्थु अर जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।
संचित-सिंचित पाप अशेष ।
पहुँचे दर्श-आप यम-देश ।।
रोग यम-जनम-जरा निर्मूल ।
योग सिर-मम, तुम-पाँवन-धूल ।।४७।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो सव्व-सिद्धा-यद-णाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री शान्ति-कुन्थु अर जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।
छिन-छिन मिले भक्ति जिन देव ।
दिन-दिन मिले भक्ति जिन देव ।।
जन्म-भर मिले भक्ति जिन-देव ।
जन्म-हर मिले भक्ति जिन-देव ।।४८।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो भयवदो महदि
महावीर वड्ढमाण बुद्धिरिसीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री शान्ति-कुन्थु अर जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।
पूर्णार्घ
देवाधिदेव ! ।
दृग गंग-रेव ! ।
तुम तीर्थंकर, तुम चक्रवर्ती, तुम कामदेव ।
श्री शान्ति, कुन्थु, अर-नाथा ।
चरणों में शीश नवाता ।।
बलि बलि जाऊॅं, भव-भव पाऊॅं, तुम चरण सेव ।
तुम तीर्थंकर, तुम चक्रवर्ती, तुम कामदेव ।।03।।
श्री वृषभादि वर्धमान पर्यंत
परम-देव भगवन् तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
चतुर्विंशति दल कमल
हृदयस्-थिताय
श्री शान्ति-कुन्थु अर जिनेन्द्राय
पूर्णार्घं निर्वपामीति स्वाहा ।।
महा-अर्घं
वृष-माहन आराधन भूल ।
पदवी चक्रवर्ती भी धूल ।।
भला दारिद वाला भव-भ्रात ।
रात-दिन धर्म अहिंसा साथ ।।
दोहा
कर दर्शन जिन देव के,
लोचन आज निहाल ।
चुलुक जन्म जल रह गया,
पुनि पुनि नुति नत भाल
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
नव देव भगवन् तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
अष्ट-चत्वारिंशद्-दलकमल
हृदयस्-थिताय
श्री शान्ति-कुन्थु अर जिनेन्द्राय नमः
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।
:: जाप्य ::
।। ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री शान्ति-कुन्थु अर तीर्थंकराय नमः ।।
जयमाला चालीसा
दोहा
बाबा बड़े दयाल है,
रखते सब का ख्याल ।
बाँस बना दी बाँसुरी,
माटी घट तत्काल ।।
नृप बल्लाल रचित मन्दर हैं ।
बढ़कर इक से इक सुन्दर हैं ।।
साढ़े बारह फुट ऊँचाई ।
जाने कौन हृदय गहराई ।।१।।
शान्ति नाथ जिन-राज विराजे ।
खड़े विनत राजे महराजे ।।
कुन्थु नाथ अद्वितिय तरफ हैं ।
अर ‘अर-अरहत’ द्वितिय तरफ हैं ।।२।।
दोनों आठ-आठ फुट ऊँचे ।
दो गज-राज विराजे नीचे ।।
यक्ष-राज, यक्षणी सुशोभित ।
छवि भगवन् करती मन मोहित ।।३।।
बात बने भजते ही भजते ।
बाबा मंशा पूरण बजते ।।
जिन गन्धोदक महिमा शाली ।
ज्योति-नैन बढ़, मने दिवाली ।।४।।
सदी बारवीं भूमि गोद थे ।
चरण चिन्ह पल मिले खोदते ।।
हाथ नाथ-संभव इक मूरत ।
संकट-मोचन, मोहन-सूरत ।।५।।
चित्-चोरी करने वाली है ।
चिन कच्छप, मूरत-प्यारी है ।।
सहस कूट चैत्यालय न्यारा ।
दर्श-मात्र आनंद अपारा ।।६।।
परम्परा आचारज दर्शन ।
मन-मोहक पौराणिक चित्रण ।।
देकर स्वप्न भूमि से निकली ।
वर्धमान जिन प्रतिमा विरली ।।७।।
ढ़पली, ढ़ोलक लिये मजीरा ।
कहते हुये जयति-जय-वीरा ।।
दौड़े जैन अजैन सभी जन ।
फूलों से उठ चाले भगवन् ।।८।।
वर्ण स्वर्ण ले काँच बनाया ।
मंदिर लगे स्वर्ण, है माया ।।
छोड़-छाड़ कर और झमेले ।
बस निहारते रहो अकेले ।।९।।
कहूँ कहाँ तक छोर न आता ।
हाथ जोड़ा बस सीस नवाता ।।
रही टूट, दो टूक बना लो ।
तेरा ही अपना, अपना लो ।।१०।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री शान्ति-कुन्थु अर जिनेन्द्राय नमः
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।
दोहा
ठुकराना आता नहीं,
बाबा बड़े दयाल ।
उठा, लगा लेते गले,
देख विनत नत-भाल ।।
(पुष्पांजलि क्षिपामि)
श्री सरसुति-मंत्र*
ॐ ह्रीम्
अर्हन् मुख कमल-वासिनि
पा-पात्म क्षयंकरि
श्रुत-ज्ञान
ज्वाला सहस्र प्रज्ज्वलिते
सरस्वति !
मत् पापम् हन हन दह दह
क्षाम् क्षीम् क्षूम् क्षौम् क्षः
क्षीरवर-धवले
अ-मृत संभवे
वम् वम् हूम् फट् स्वाहा
मम सन्-निधि-करणे
मम सन्-निधि-करणे
मम सन्-निधि-करणे ।
ॐ ह्रीं जिन मुखोद्-भूत्यै
श्री सरस्वति-देव्यै
अर्घं निर्वपामीति स्वाहा
शांति पाठ
अथ पौर्वाह-निक (अप-राह-निक)
देव-शास्त्र-गुरु-वन्दना-क्रियायाम्
पूर्वाचार्या-नुक्-क्रमेण,
सकल-कर्मक्-क्षयार्-थम्,
भाव-पूजा-वन्दना-स्तव समेतम्
श्री शांति-भक्ति कायोत्सर्गम् करोम्यहम्
(९ बार णमोकार )
*चौपाई*
दर्शन मात्र मेंटता दुखड़ा ।
भाँत चन्द्रमा सुन्दर मुखड़ा ।।
नासा टिके नैन मनहारी ।
करें वन्दना नाथ ! तुम्हारी ।।१।।
आप चक्रधर-पञ्चम नामी ।
वन्द्य इन्द्र शत, अन्तर्-यामी ।।
प्रभो शान्ति-जिन करके करुणा ।
करो शान्ति ! जश निरखो अपना ।।२।।
छत्र, सिंहासन, वृक्ष-अशोका ।
धुनि, दुन्दुभि, दल-चँवर अनोखा ।।
भा-मण्डल झिर-पुष्प-अनूठी ।
प्रातिहार्य-वसु आप विभूती ।।३।।
अर्चित-जगत् ! शान्ति करतारी ।
ढ़ोक करो स्वीकार हमारी ।।
प्राण-भूत, सत्, जीव समस्ता ।
पायें परिणति शान्त प्रशस्ता ।।४।।
देवों में जो देव बड़े हैं ।
चरणों में हित सेव खड़े हैं ।।
हंस-वंश वे जग उजियारे ।
करें शान्ति मण्डित जग सारे ।।५।।
(निम्न श्लोक को पढ़कर
जल छोड़ना चाहिए)
शान्ति कीजिये गाँव-गाँव में ।
विश्व लीजिये पाँव-छाँव में ।।
डूब ‘साध-जन’ उतरें गहरे ।
लहर लहर-पचरंगा लहरे ।।६।।
नृप धार्मिक बलशाली होवे ।
विकृत-प्रकृत मनमानी खोवे ।।
धर्म-चक्र-जिन सौख्य प्रदाता ।
रहे प्रवाहित यूँ हि विधाता ।।७।।
द्रव्य सुमंगल-कारी होवे ।
क्षेत्र अमंगल-हारी होवे ।।
होवे काल सुमंगल-कारी ।
होवें भाव अमंगल-हारी ।।८।।
कर्मन-घात घात मद सारा ।
सहजो सिद्ध रिद्ध परिवारा ।।
आदि आदि अर्हन् चौबीसा ।
शान्ति प्रदान करें निशि दीसा ।।९।।
*दोहा*
किया शान्ति जिन भक्ति का,
भगवन् कायोत्सर्ग ।।
करूँ दोष आलोचना,
जो प्रद-स्वर्ग-पवर्ग ।।१०।।
*चौपाई*
पाँच सभी कल्याणक धारी ।
आठ प्राति-हारज मन-हारी ।।
अतिशय तीस चार मण्डित हैं ।
अर बत्तीस इन्द्र वन्दित हैं ।।११।।
चौ-विध संघ नखत मानिन्दा ।
राम श्याम चक्री, प्रभु ! चन्दा ।।
‘निलय-विनय’ अन-गिनत गभीरा ।
आद-आद जिन अंतिम वीरा ।।१२।।
अर्चन-पूजन-वन्दन करता ।
उनका मैं अभिनन्दन करता ।।
पीड़ा-दुक्ख-दरद-भय खोवे ।
मेरे कर्मों का क्षय होवे ।।१३।।
रत्नत्रय का मुझे लाभ हो ।
मेरी ‘गति-पंचम-उपाध’ हो ।।
मृत्यु-महोत्सव मना सकूँ मैं ।
जिन-गुण-सम्पद् कमा सकूँ मैं ।।१४।।
अथ पौर्वाह-निक (अप-राह-निक)
देव-शास्त्र-गुरु-वन्दना-क्रियायाम्
पूर्वाचार्या-नुक्-क्रमेण,
सकल-कर्मक्-क्षयार्-थम्,
भाव-पूजा-वन्दना-स्तव समेतम्
श्री समाधि-भक्ति कायोत्सर्गम्
करोम्यहम्
(९बार णमोकार )
*चौपाई*
सदा शास्त्र अभ्यास करूँ मैं ।
सन्त समीप निवास करूँ मैं ।।
मौन धरूँ क्यूँ, गुणी दिखाये ।
गौण करूँ, यूँ दोष-पराये ।।१५।।
भावन-आत्म तत्व, नम-नयना ।
हित-मित रखूँ मधुरतम वयना ।।
जब तक राधा-मुक्ति रिझाऊँ ।
इन्हें जन्म जन्मान्तर पाऊँ ।।१६।।
तारण हारे…शरण सहारे ।
हृदय हमारे…चरण तुम्हारे ।।
चरण तुम्हारे…हृदय हमारा ।
रहे, तलक जब भव-जल-धारा ।।१७।।
स्वर-अक्षर पद मात्रा गलती ।
हुईं, चाहते बिन अनगिनती ।।
हो अपराध क्षमा यह मेरा ।
‘जैसा भी’ मैं अपना तेरा ।।१८।।
*दोहा*
किया समाधी, भक्ति का,
भगवन् कायोत्सर्ग ।।
करूँ दोष आलोचना,
जो प्रद-स्वर्ग-पवर्ग ।।१९।।
*चौपाई*
सम्यक्-दर्शन, सम्यक्-ज्ञाना ।
सम्यक्-चारित, ताना-बाना ।।
रूप अनूप ध्यान परमातम ।
बुद्ध-विशुद्ध ज्ञान धर आतम ।।२०।।
पूजन नित वन्दन करता हूँ ।
अर्चन अभिनन्दन करता हूँ ।।
क्षय होवें दुख संकट सारे ।
क्षय हो जावें कर्म हमारे ।।२१।।
मुझे लाभ रत्नत्रय होवे ।
सुगति गमन, भय-सप्तक खोवे ।।
पाऊँ मरण-समाधी स्वामी ।
बनूँ रतन जिन-गुण आसामी ।।२२।।
‘पुष्पाञ्जलिं क्षिपेत्’
( यहाँ पर नौ बार णमोकार मंत्र
पढ़ना चाहिए )
विसर्जन पाठ
अञ्जन को पार किया ।
चन्दन को तार दिया ।।
नहिं तोर दया का पार ।
नागों का हार किया ।।१।।
धूली-चन्दन-बावन ।
की शूली सिंहासन ।।
धरणेन्द्र देवी-पद्मा ।
मामूली अहि-नागिन ।।२।।
अगनी ‘सर’ नीर किया ।
भगिनी ‘सर’ चीर किया ।।
नहिं तोर दया का पार ।
केशर महावीर किया ।।३।।
बन पड़ीं भूल से भूल ।
कृपया कर दो निर्मूल ।।
बिन कारण तारण हार ।
नहिं तोर दया का पार ।।४।।
दोहा
बस आता, अब धारता,
ईश आशिका सीस ।
कृपा निराकुल आपकी,
बनी रहे निशि-दीस ।।
(पुष्पांजलि क्षिपामि)
आरती
निहारो मूरतिया
शान्ति, कुन्थ, अर स्वामी की
उतारो आरतिया
चाँदी की थरिया
ले सोने का दिया
शान्ति, कुन्थ, अर स्वामी की
उतारो आरतिया
रत्न अपूर्व गगन से बरसे ।
स्वप्न देख महतारी हरषे ।।
‘रे जाने कब बीत चली रतिया ।
शान्ति, कुन्थ, अर स्वामी की
उतारो आरतिया
शच इक भव अवतार कहाई ।
न्हवन मेर सौधर्म रचाई ।।
थमा बाल माँ ताण्डव नृत्य किया ।
शान्ति, कुन्थ, अर स्वामी की
उतारो आरतिया
राजपाट तज, केश उखाड़े ।
हुए दिगम्बर, वस्त्र उतारे ।।
और टिका ली नासा पे अँखिया ।
शान्ति, कुन्थ, अर स्वामी की
उतारो आरतिया
सभा सम शरण नामनु-रूपा ।
हिरण वहीं सिंह, अहि-मण्डूका ।।
जात वैर ने रस्ता नाप लिया ।
शान्ति, कुन्थ, अर स्वामी की
उतारो आरतिया
ध्यानानल सित कर्म जला के ।
लगा समय इक शिवपुर आके ।।
हो चाले शिव राधा सांवरिया ।।
शान्ति, कुन्थ, अर स्वामी की
उतारो आरतिया
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