परम पूज्य मुनि श्री निराकुल सागरजी द्वारा रचित पूजन क्रंमाक 289 तुम्हें पा,मेरी कुटिया ने आखर अढ़ाई पढ़ा ।।स्थापना।। तुम्हें पा मेरी कुटिया पाई सुकूँ,दृग् जल भेंटूँ ।।जलं।। तुम्हें पा मेरी कुटिया द्यु-स्यंदन,भेंटूँ चन्दन ।।चन्दनं।। तुम्हें पा मेरी कुटिया पाई […]
