परम पूज्य मुनि श्री निराकुल सागरजी द्वारा रचितपूजन क्रंमाक 379 =हाईकू= ‘जी’ बीचों-बीच हैं जो जगह,तेरे लिये है वह ।।स्थापना।। जन्म मरण दीजे मिटा,दृग्-जल मैं रहा भिंटा ।।जलं।। आवागमन दीजे मिटा,चन्दन मैं रहा भिंटा ।।चन्दनं।। वन-रुदन दीजे मिटा,अक्षत मैं रहा […]
