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चौबीस तीर्थंकर विधान  ·  तीर्थक्षेत्र पूजन

पठारी वाले बड़े बाबा पूजन

By मुनि श्री निराकुल सागर जी महाराज 

 

लघु भक्तामर
आदि नाव, गाँव मोख ।।१।।
मोद और, मोर शोक ।।२।।
काज हाँप, नाप तोर ।।३।।
धार हहा, कहाँ छोर ।।४।।

दौड़ थवन, लगन तोर ।।५।।
बौंर पिकी, ‘जि की चोर ।।६।।
थवन आप, पाप चूर ।।७।।
नजर आप, आप् नूर ।।८।।

हरण व्यथा, कथा आप ।।९।।
भाँत भक्त, वक्त छाप ।।१०।।
न दृग् ठौर, तोर बिना ।।११।।
देह जुदा, मृदा बना ।।१२।।

चित्त चोर, और वदन ।।१३।।
पार शगुन, सुगुण भुवन ।।१५।।
आँख राख, नाक तिया ।।१५।।
गैर धूम, झूम दिया ।।१६।।

भान आप, ताप ओम ।।१७।।
उदित सदा, जुदा सोम ।।१८।।
शूर तमस्, विहस दौड़ ।।१९।।
ज्ञान आप्, छाप और ।।२०।।

चयन तोर, और हाथ ।।२१।।
भाँत आप,आप माँत ।।२२।।
दातृ भुक्ति, मुक्ति पन्थ ।।२३।।
शंभु जिष्णु, विष्णु नन्त ।।२४।।

प्रथम रुद्र, बुद्ध बिहम ।।२५।।
नमो नमः, क्षमा धरम ।।२६।।
तोर छोर, और हाँप ।।२७।।
वृक्ष सोख, शोक आप ।।२८।।

हरण दीठ, पीठ एक ।।२९।।
लिये अमर, चमर नेक ।।३०।।
लोप नूर, शूर छतर ।।३१।।
नाँद भूर, तूर अपर ।।३२।।

वृष्टि सुमन, पवन मन्द ।।३३।।
वलय प्रभा, विभा चन्द ।।३४।।
और नयन, वयन दिव्य ।।३५।।
स्वर्ण धवल, कवँल नव्य ।।३६।।

तोर विभव, वि–भव और ।।३७।।
तोर विरद, द्विरद तोड़ ।।३८।।
सींह हाँप, आप स्मरण ।।३९।।
नाम आप, आप् अगन ।।४०।।

नाम आप, साँप माल ।।४१।।
आप चक्र, चक्र काल ।।४२।।
शत्रु जोर, तोर हार ।।४३।।
आप छाँव, नाव पार ।।४४।।

आप योग, रोग झूठ ।।४५।।
नाम तोर, तोड़ मूठ ।।४६।।
आप जपा, दफा विघन ।।४७।।
काल जेय, एय थवन ।।४८।।

पठारी वाले
बड़े बाबा की पूजन

भर श्रद्धा से तुम्हें पुकारा ।
सिवा तुम्हारे कौन हमारा ।।
ग्राम पठारी वाले बाबा,
साँचा एक तुम्हारा द्वारा ।।

सार्थ नाम है तुमने पाया ।
देवों ने भी शीश नवाया ।।
देव-देव तुम, आदि-ब्रह्म तुम,
ऋषि-मुनिंयों ने विरद रचाया ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्र !
अत्र अवतर अवतर संवौषट्
(इति आह्वानन)
अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ:
(इति स्थापनम्)
अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट्
(इति सन्निधिकरणम्) ।

कमल भिन्न-जल भरत बनाया ।
तेरा ही मैं, नहीं पराया ।।
देव-देव तुम, आदि-ब्रह्म तुम,
चरणन मैं भी दृग् जल लाया ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय नमः
जलं निर्वपामीति स्वाहा ।।

जश-तापस पोदनपुर-राया ।
तेरा ही मैं, नहीं पराया ।।
देव-देव तुम, आदि-ब्रह्म तुम,
चरणन मैं भी चन्दन लाया ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय नमः
चंदनं निर्वपामीति स्वाहा ।।

अक्षर सत् शिव सुन्दरि पाया ।
तेरा ही मैं, नहीं पराया ।।
देव-देव तुम, आदि-ब्रह्म तुम,
चरणन मैं भी अक्षत लाया ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय नमः
अक्षतं निर्वपामीति स्वाहा ।।

लिपि गौरव ब्राह्मी ने पाया ।
तेरा ही मैं, नहीं पराया ।।
देव-देव तुम, आदि-ब्रह्म तुम,
चरणन मैं भी प्रसून लाया ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय नमः
पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा ।।

पिता नाभि जश ध्वज लहराया ।
तेरा ही मैं, नहीं पराया ।।
देव-देव तुम, आदि-ब्रह्म तुम,
चरणन मैं भी नैवज लाया ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय नमः
नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

सीझ पड़ा ‘मरू‘ महि…मा माया ।
तेरा ही मैं, नहीं पराया ।।
देव-देव तुम, आदि-ब्रह्म तुम,
चरणन मैं भी प्रदीप लाया ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय नमः
दीपं निर्वपामीति स्वाहा ।।

पुन साकेत सातिशय पाया ।
तेरा ही मैं, नहीं पराया ।।
देव-देव तुम, आदि-ब्रह्म तुम,
चरणन मैं भी सुगंध लाया ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय नमः
धूपं निर्वपामीति स्वाहा ।।

सोम श्रियांस न क्या क्या पाया ।
तेरा ही मैं, नहीं पराया ।।
देव-देव तुम, आदि-ब्रह्म तुम,
चरणन मैं भी श्री फल लाया ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय नमः
फलं निर्वपामीति स्वाहा ।।

जीव गिंजाई भाग जगाया ।
तेरा ही मैं, नहीं पराया ।।
देव-देव तुम, आदि-ब्रह्म तुम,
चरणन मैं भी सब कुछ लाया ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय नमः
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

कल्याण अर्घ्य
पुण्य कुमारी छप्पन न्यारा ।
माँ मरु शोधन गर्भ प्रभारा ।।
बरसा रतन विमान ।
धन्य गर्भ कल्याण ।।
करुणा दया निधान ।
ग्राम पठारी के बड़े बाबा,
आदिनाथ भगवान् ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
आषाढ़-कृष्ण-द्वितीयायां
गर्भ कल्याणक प्राप्ताय
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय नमः
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

बाल तीर्थकर प्रथम निहारा ।
धन शचि पुन इक भव अवतारा ।।
न्हवन सुमेर विधान ।
धन्य जन्म कल्याण ।।
करुणा दया निधान ।
ग्राम पठारी के बड़े बाबा,
आदिनाथ भगवान् ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
चैत्र-कृष्ण-नवम्यां
जन्म कल्याणक प्राप्ताय
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय नमः
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

धन विराग लौकान्त उचारा ।
पावन भेष दिगम्बर धारा ।।
जिन दीक्षा वन आन ।
धन्य त्याग कल्याण ।।
करुणा दया निधान ।
ग्राम पठारी के बड़े बाबा,
आदिनाथ भगवान् ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
चैत्र-कृष्ण-नवम्यां
दीक्षा कल्याणक प्राप्ताय
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय नमः
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

अतिशय पुण्य सभावन बारा ।
अंजुल कर्ण हृदय ‘भी‘ धारा ।।
झलके तीन जहान ।
धन्य ज्ञान कल्याण ।।
करुणा दया निधान ।
ग्राम पठारी के बड़े बाबा,
आदिनाथ भगवान् ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
फागुन-कृष्ण-एकादश्यां
ज्ञान कल्याणक प्राप्ताय
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय नमः
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

ध्यान खड्ग अरि कर्म पछारा ।
धन पुन शिव राधा श्रृंगारा ।।
अष्टापद निर्वाण ।
धन्य मोक्ष कल्याण ।।
करुणा दया निधान ।
ग्राम पठारी के बड़े बाबा,
आदिनाथ भगवान् ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
माघ-कृष्ण-चतुर्दश्यां
मोक्ष कल्याणक प्राप्ताय
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय नमः
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

दोहा
संकट मोचन नाम से,
बाबा जग विख्यात ।
चलो पठारी ग्राम को,
पुरजन-परिजन साथ ।।

जयमाला
जय जय कारा जय जय कारा ।
बड़े-बाबा का साँचा द्वारा ।।

आगी पानी ।
सीता रानी ।।
दूनी सारी ।
दुपद दुलारी ।।
शील पताका, किल्विष हारा ।
जय जय कारा जय जय कारा ।
बड़े-बाबा का साँचा द्वारा ।।

अहि गुल-माला ।
सोमा तारा ।।
नीलि प्रहारा ।
खुले किवारा ।।
शील पताका, किल्विष हारा ।
जय जय कारा जय जय कारा ।
बड़े-बाबा का साँचा द्वारा ।।

चन्दन बाला ।
बाहिर कारा ।।
भक्ती-अंधी ।
सुत बजरंगी ।।
शील पताका, किल्विष हारा ।
जय जय कारा जय जय कारा ।
बड़े-बाबा का साँचा द्वारा ।।

मती अनन्ता ।
पथ निष्कण्टा ।।
सुलोचना ‘री ।
जै बलिहारी ।।
शील पताका, किल्विष हारा ।
जय जय कारा जय जय कारा ।
बड़े-बाबा का साँचा द्वारा ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय नमः
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

दोहा
दिखे नहीं बलजोर भी,
तब गुण-सागर घाट ।
‘सहज-निराकुल‘ लो बना,
बाबा अपने भाँत ।।
(पुष्पांजलि क्षिपामि)

विधान प्रारंभ

अष्ट दलकमल पूजा
विधान की जय
सुर उर प्रमोद ।
तम विहर ज्योत ।।
जुग आदि पोत ।
लो उठा गोद ।।१।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो जिणाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

नित निरत सेव ।
सिर-मौर देव ।।
वन्दूॅं सदैव ।
जिन देव-देव ।।२।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो ओहि जिणाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

बुध वक्र खीर ।
थव-तव गभीर ।।
हित चाँद नीर ।
बस शिशु अधीर ।।३।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो परमोहि जिणाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

गुण आप भाष ।
सुर-गुरु निराश ।।
असफल प्रयास ।
तट नीर-राश ।।४।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो सव्वोहि जिणाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

दे रति तुम्हार ।
थुति तव प्रभार ।।
रत सिंह प्रहार ।
मृग हित कुमार ।।५।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो अणंतोहि जिणाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

तव-थवन दौड़ ।
बल भक्ति तोर ।।
पिक चित्त-चौर ।
इक हेत बौर ।।६।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो कोट्ठ-बुद्धीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

तुम नाम जाप ।
दे मेंट पाप ।।
तम, तर-प्रलाप ।
लख रवि प्रताप ।।७।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो बीय-बुद्धीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

पद रज अबीर ।
तव थवन तीर ।।
दल-कमल नीर ।
मोतियन झील ।।८।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो पदाणु-सारीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

जल, मनहारी चन्दन झारी ।
अक्षत शाली, नन्दन क्यारी ।।
स्वीकारो, मम आराध्य-देव,
चरु, दीप, धूप, श्री-फल थाली ।।01।।
ॐ ह्रां ह्रीं ह्रूं ह्रौं ह्र:
अ-सि-आ-उ-सा नमः
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
अष्टदल कमल हृदयस्-थिताय
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय
पूर्णार्घं निर्वपामीति स्वाहा ।।

षोडश दलकमल पूजा
विधान की जय
जप पाप चूर ।
तव थव सुदूर ।।
रवि भले दूर ।
प्रद पद्म तूर ।।९।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो सं-भिण्ण-सोदा-राणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

करुणा निधान ।
शरणा प्रधान ।।
सेवक समान ।
धनपति महान ।।१०।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो सयं-बुद्धाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

तुम पद निहार ।
दृग् और भार ।।
पा दुग्ध धार ।
कब रुचा क्षार ।।११।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो पत्तेय-बुद्धाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

माटी बखूब ।
तुम रचा डूब ।।
तुम सा अनूप ।
दूजा न रूप ।।१२।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो बोहिय-बुद्धाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

तुम मुख ललाम ।
नयनाभि-राम ।।
शशि दाग चाम ।
दिन हास-धाम ।।१३।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो उजु-मदीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

गुण प्रभा चन्द ।
विचरें स्वछन्द ।।
को ? रोक-वन्त ।
जब आप कन्त ।।१४।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो विउल-मदीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

तिय नेत्र तीर ।
नहिं तुम अधीर ।
कब लय-समीर ।।
प्रद मेरु पीर ।।१५।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो दस-पुव्वीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

बाती न तेल ।
जग तीन केल ।।
गत वात खेल ।
दीवा अकेल ।।१६।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो चउ-दस-पुव्वीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

गत राहु ग्रास ।
गत मेघ पाश ।।
प्रद जग प्रकाश ।
रवि कान्त-राश ।।१७।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो अट्ठंग-महा-णिमित्त कु-सलाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

गत राहु ग्राह ।
गत मेघ छाह ।।
भवि विहर दाह ।
शशि दूज राह ।।१८।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो वि-उव्वण-इड्ढि-पत्ताणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

तुम चन्द्र-भान ।
ले कर प्रयाण ।।
पक खड़ी धान ।
घन वृथा-गान ।।१९।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो विज्जा-हराणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

जग और बाल ।
मति तुम मराल ।।
कब काँच चाल ।
ज्यों मणि प्रवाल ।।२०।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो चा-रणाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

देखा सराग ।
तुम हुआ राग ।।
हा ! सूर्य आग ।
चन्द्रमा दाग ।।२१।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो पण्ण-समणाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

माँ नार खूब ।
तुम सुत बखूब ।।
तारक अपूर्व ।
माँ भानु-पूर्व ।।२२।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो आयास-गामीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

वर-नर ! भदन्त ! ।
तम-हर ! अनन्त ! ।।
अवलम्ब अन्त ।
प्रद मोक्ष-पन्थ ।।२३।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो आसी-विसाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

विभु ! काम-केत ।
अवगम समेत ।।
पुरु ! आद्य ! एक ! ।
ईश्वर ! अनेक ।।२४।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो दिट्ठि-वि-साणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

जल, मनहारी चन्दन झारी ।
अक्षत शाली, नन्दन क्यारी ।।
स्वीकारो, मम आराध्य-देव,
चरु, दीप, धूप, श्री-फल थाली ।।02।।
ॐ क्षां क्षीं क्षूं क्षें क्षैं क्षों क्षौं क्षं क्षः
नमोर्-ऽहते सर्वं रक्ष रक्ष हूं फट् नमः
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
षोडशदल-कमल हृदयस्-थिताय
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय
पूर्णार्घं निर्वपामीति स्वाहा ।।

चतुर्विंशतिदल कमल पूजा
विधान की जय
इक ! शुद्ध ! बुद्ध ।
शंकर ! विशुद्ध ! ।।
हर ! ब्रह्म ! सिद्ध ! ।
नर-सिंह ! प्रसिद्ध ।।२५।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो उग्ग-तवाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

हर भुवन पीर ।
त्रिभुवन अबीर ।।
जै गुण गभीर ।
भव सिन्धु-तीर ।।२६।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो दित्त-तवाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

गुण सकल जोड़ ।
गत आप होड़ ।।
दें और छोड़ ।
बद तकें तोर ।।२७।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो तत्त-तवाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

नहिं और लोक ।
तन तर अशोक ।।
रवि, तिमिर सोख ।
घन निकट, ढ़ोक ।।२८।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो महा-तवाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

सिंहासनेक ।
तन स्वर्ण नेक ।।
रवि लिखे लेख ।
गिरि उदय देख ।।२९।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो घोर-तवाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

चामर सलील ।
कंचन शरीर ।।
तट मेर नीर ।
झरना सुनील ।।३०।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो घोर गुण-परक्-कमाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

हर रवि प्रताप ।
त्रिक छतर आप ।।
झालर अलाप ।
विभु ! अपर आप ।।३१।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो घोर-गुणाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

जय धर्म-वीर ।
बिखरा अबीर ।।
नभ रही चीर ।
भेरी गभीर ।।३२।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो ऽघोर-गुण-बंभ-यारीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

गुल भॉंत-भाँत ।
बरसात साथ ।।
कण-गंध वात ।
तुम वचन पॉंत ।।३३।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो आमो-सहि-पत्ताणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

भा-वलय आप ।।
भा-कुल विलाप ।
रवि-लख प्रताप ।
छवि शशि प्रमाप ।।३४।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो खेल्लो-सहि-पत्ताणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

इक मुक्ति द्वार ।
इक तत्त्व सार ।।
धुनि ओम-कार ।
भाषा ‘स्व’ धार ।।३५।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो जल्लो-सहि-पत्ताणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

ना चॉंद दोज ।
तर, पद पयोज ।
रचते सरोज ।
सुर सयुत ओज ।।३६।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो विट्ठो-सहि-पत्ताणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

श्रुत सार्थ आप ।
पथ और हांप ।।
कब ग्रह मिलाप ।
सूरज प्रताप ।।३७।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो सव्वो-सहि-पत्ताणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

गज मदा-सक्त ।
अल-कुपित मत्त ।।
भय यम प्रदत्त ।
तुम भक्त भक्त ।।३८।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो मण-बलीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

गज कुम्भ चूर ।
भुवि मणि प्रपूर ।।
सिंह यथा शूर ।
वशि जप हुजूर ।।३९।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो वचि-बलीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

लय वायु कान्त ।
हा ! पुरु-उपान्त ।।
दव, दूर दान्त ।
तुम जप प्रशान्त ।।४०।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो काय-बलीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

दृग् रक्त, श्याम ।
विष रद तमाम ।।
अहि यथा वाम ।
वशि आप नाम ।।४१।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो खीर-सवीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

रत मार-धाड़ ।
‘बल’ चीतकार ।।
हो शत्रु-हार ।
लें तुम पुकार ।।४२।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो सप्पि-सवीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

शोणित प्रपात ।
अरि मुख-प्रसाद ।।
रण, करे-हाथ ।
तुम-भक्त नाथ ।।४३।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो महुर-सवीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

घड़ियाल जाल ।
बड़वा कराल ।।
जल-यान धार ।
तुम नाम पार ।।४४।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो अमइ-सवीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

प्रद पीर-चूल ।
कफ-पित्त-शूल ।।
मेंटे समूल ।
तुम नाम धूल ।।४५।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो अक्खीण-महा-णसाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

यम और दाम ।
छिल गई चाम ।।
बन्धन तमाम ।
हर आप नाम ।।४६।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो वड्ढमाण-बुद्धि-रिसस्स
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

दुख और घोर ।
लें राह, छोड़ ।।
सुन नाम तोर ।
अहि यथा मोर ।।४७।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो सव्व-सिद्धा-यद-णाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

गुल-वर्ण चार ।
गुण रचित हार ।।
भवि कण्ठ धार ।
निष्कण्ट पार ।।४८।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो भयवदो महदि
महावीर वड्ढमाण बुद्धिरिसीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

पूर्णार्घ
जल, मनहारी चन्दन झारी ।
अक्षत शाली, नन्दन क्यारी ।।
स्वीकारो, मम आराध्य-देव,
चरु, दीप, धूप, श्री-फल थाली ।।03।।
श्री वृषभादि वर्धमान पर्यंत
परम-देव भगवन् तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
चतुर्विंशति दल कमल
हृदयस्-थिताय
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय
पूर्णार्घं निर्वपामीति स्वाहा ।।

महा-अर्घं
दोहा
हरते कष्ट-दुख सारे ।
बाबा पठारी वाले ।।
मंगलकर अमंगलहार ।
मंशा पूर्ण इक दरबार ।।
माँ सी फूँक भव छाले ।।
बाबा पठारी वाले ।।
कंचन झार, प्रासुक नीर ।
भेंटूॅं, हेत भव-जल तीर ।।
चन्दन सुगंधित मनहार ।
भेंटूॅं, हेत मन अविकार ।।
स्वर्ण पिटार, अक्षत धान ।
भेंटूॅं, हेत शाश्वत थान ।।
सुरभित पुष्प, नन्दन बाग ।
भेंटूॅं, हेत भीतर जाग ।।
षट् रस घृत अमृत नैवेद ।
भेंटूॅं, क्षुधा मेटन हेत ।।
गो घृत दीप ज्योत अखण्ड ।
भेंटूॅं, हेत सरसुत कण्ठ ।।
अगर कपूर चन्दन चूर ।
भेंटूॅं, हेत संयम नूर ।।
फल रसदार फूटे गन्ध ।
भेंटूॅं, हेत सहजानन्द ।।
युगपत् द्रव्य सबरे आठ ।
भेंटूॅं, हेत अन्त-समाध ।।
सारे जहाँ से न्यारे ।।
बाबा पठारी वाले ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
नव देव भगवन् तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
अष्ट-चत्वारिंशद्-दलकमल
हृदयस्-थिताय
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय नमः
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

:: जाप्य ::
।। ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री आदि-नाथ तीर्थंकराय नमः ।।

जयमाला
दोहा
द्वार आदि भगवान का,
मंशा पूरण एक ।
अगर नहीं विश्वास तो,
आन पठारी देख ।।१।।

दर्श मात्र झर चालते,
कर्म निधत्त निकाच ।
बड़े बाबा आदीश का,
द्वार पठारी साँच ।।२।।

आप सरीखे आप हैं,
चाँद दाग, रवि ताप ।।
माटी ही कुछ दूसरी,
आप विरचना आप ।।३।।

मेले में कब छोड़ती,
माँ बच्चे का हाथ ।
आश मुझे विश्वास भी,
तुम हो मेरे साथ ।।४।।

मुँह-माँगा सो मिल रहा,
बिन मुँह माँगे लेख ।
गूंगे बाबा द्वार से,
चले छुपा कुछ देख ।।५।।

सहज-निराकुल और ना,
धरा, गगन, पाताल ।
क्यों न हो ऊँचा, कहो,
आप भक्त का भाल ।।६।।

व्रत मंदिर कलशा चढ़े,
और न बस फरियाद ।
ग्राम पठारी के बड़े,
बाबा भगवन् आद ।।७।।

जिन शासन पहचान ।
हम भक्तों की जान ।
करुणा दया निधान ।
ग्राम पठारी के बड़े बाबा,
आदिनाथ भगवान् ।।८।।

हित सम्यक् श्रद्धान ।
हित इक महल-मशान ।।
हित विभिन्न असि म्यान ।।
हित मन बाल समान ।।

हित, मित, परिमित वान ।।
हित सरसुत आह्वान ।।
हित चित् अनुसंधान ।।
हित सु…मरण वरदान ।।

भेंटूँ द्रव्य प्रधान ।
हित दिव-शिव सोपान ।।
करुणा दया निधान ।
ग्राम पठारी के बड़े बाबा,
आदिनाथ भगवान् ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय नमः
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

श्री सरसुति-मंत्र*
ॐ ह्रीम्
अर्हन् मुख कमल-वासिनि
पा-पात्म क्षयंकरि
श्रुत-ज्ञान
ज्वाला सहस्र प्रज्ज्वलिते
सरस्वति !
मत् पापम् हन हन दह दह
क्षाम् क्षीम् क्षूम् क्षौम् क्षः
क्षीरवर-धवले
अ-मृत संभवे
वम् वम् हूम् फट् स्वाहा
मम सन्-निधि-करणे
मम सन्-निधि-करणे
मम सन्-निधि-करणे ।
ॐ ह्रीं जिन मुखोद्-भूत्यै
श्री सरस्वति-देव्यै
अर्घं निर्वपामीति स्वाहा

शांति पाठ
अथ पौर्वाह-निक (अप-राह-निक)
देव-शास्त्र-गुरु-वन्दना-क्रियायाम्
पूर्वाचार्या-नुक्-क्रमेण,
सकल-कर्मक्-क्षयार्-थम्,
भाव-पूजा-वन्दना-स्तव समेतम्
श्री शांति-भक्ति कायोत्सर्गम् करोम्यहम्
(९ बार णमोकार )

*चौपाई*
दर्शन मात्र मेंटता दुखड़ा ।
भाँत चन्द्रमा सुन्दर मुखड़ा ।।
नासा टिके नैन मनहारी ।
करें वन्दना नाथ ! तुम्हारी ।।१।।

आप चक्रधर-पञ्चम नामी ।
वन्द्य इन्द्र शत, अन्तर्-यामी ।।
प्रभो शान्ति-जिन करके करुणा ।
करो शान्ति ! जश निरखो अपना ।।२।।

छत्र, सिंहासन, वृक्ष-अशोका ।
धुनि, दुन्दुभि, दल-चँवर अनोखा ।।
भा-मण्डल झिर-पुष्प-अनूठी ।
प्रातिहार्य-वसु आप विभूती ।।३।।

अर्चित-जगत् ! शान्ति करतारी ।
ढ़ोक करो स्वीकार हमारी ।।
प्राण-भूत, सत्, जीव समस्ता ।
पायें परिणति शान्त प्रशस्ता ।।४।।

देवों में जो देव बड़े हैं ।
चरणों में हित सेव खड़े हैं ।।
हंस-वंश वे जग उजियारे ।
करें शान्ति मण्डित जग सारे ।।५।।
(निम्न श्लोक को पढ़कर
जल छोड़ना चाहिए)

शान्ति कीजिये गाँव-गाँव में ।
विश्व लीजिये पाँव-छाँव में ।।
डूब ‘साध-जन’ उतरें गहरे ।
लहर लहर-पचरंगा लहरे ।।६।।

नृप धार्मिक बलशाली होवे ।
विकृत-प्रकृत मनमानी खोवे ।।
धर्म-चक्र-जिन सौख्य प्रदाता ।
रहे प्रवाहित यूँ हि विधाता ।।७।।

द्रव्य सुमंगल-कारी होवे ।
क्षेत्र अमंगल-हारी होवे ।।
होवे काल सुमंगल-कारी ।
होवें भाव अमंगल-हारी ।।८।।

कर्मन-घात घात मद सारा ।
सहजो सिद्ध रिद्ध परिवारा ।।
आदि आदि अर्हन् चौबीसा ।
शान्ति प्रदान करें निशि दीसा ।।९।।

*दोहा*
किया शान्ति जिन भक्ति का,
भगवन् कायोत्सर्ग ।।
करूँ दोष आलोचना,
जो प्रद-स्वर्ग-पवर्ग ।।१०।।

*चौपाई*
पाँच सभी कल्याणक धारी ।
आठ प्राति-हारज मन-हारी ।।
अतिशय तीस चार मण्डित हैं ।
अर बत्तीस इन्द्र वन्दित हैं ।।११।।

चौ-विध संघ नखत मानिन्दा ।
राम श्याम चक्री, प्रभु ! चन्दा ।।
‘निलय-विनय’ अन-गिनत गभीरा ।
आद-आद जिन अंतिम वीरा ।।१२।।

अर्चन-पूजन-वन्दन करता ।
उनका मैं अभिनन्दन करता ।।
पीड़ा-दुक्ख-दरद-भय खोवे ।
मेरे कर्मों का क्षय होवे ।।१३।।

रत्नत्रय का मुझे लाभ हो ।
मेरी ‘गति-पंचम-उपाध’ हो ।।
मृत्यु-महोत्सव मना सकूँ मैं ।
जिन-गुण-सम्पद् कमा सकूँ मैं ।।१४।।
अथ पौर्वाह-निक (अप-राह-निक)
देव-शास्त्र-गुरु-वन्दना-क्रियायाम्
पूर्वाचार्या-नुक्-क्रमेण,
सकल-कर्मक्-क्षयार्-थम्,
भाव-पूजा-वन्दना-स्तव समेतम्
श्री समाधि-भक्ति कायोत्सर्गम्
करोम्यहम्
(९बार णमोकार )

*चौपाई*
सदा शास्त्र अभ्यास करूँ मैं ।
सन्त समीप निवास करूँ मैं ।।
मौन धरूँ क्यूँ, गुणी दिखाये ।
गौण करूँ, यूँ दोष-पराये ।।१५।।

भावन-आत्म तत्व, नम-नयना ।
हित-मित रखूँ मधुरतम वयना ।।
जब तक राधा-मुक्ति रिझाऊँ ।
इन्हें जन्म जन्मान्तर पाऊँ ।।१६।।

तारण हारे…शरण सहारे ।
हृदय हमारे…चरण तुम्हारे ।।
चरण तुम्हारे…हृदय हमारा ।
रहे, तलक जब भव-जल-धारा ।।१७।।

स्वर-अक्षर पद मात्रा गलती ।
हुईं, चाहते बिन अनगिनती ।।
हो अपराध क्षमा यह मेरा ।
‘जैसा भी’ मैं अपना तेरा ।।१८।।

*दोहा*
किया समाधी, भक्ति का,
भगवन् कायोत्सर्ग ।।
करूँ दोष आलोचना,
जो प्रद-स्वर्ग-पवर्ग ।।१९।।

*चौपाई*
सम्यक्-दर्शन, सम्यक्-ज्ञाना ।
सम्यक्-चारित, ताना-बाना ।।
रूप अनूप ध्यान परमातम ।
बुद्ध-विशुद्ध ज्ञान धर आतम ।।२०।।

पूजन नित वन्दन करता हूँ ।
अर्चन अभिनन्दन करता हूँ ।।
क्षय होवें दुख संकट सारे ।
क्षय हो जावें कर्म हमारे ।।२१।।

मुझे लाभ रत्नत्रय होवे ।
सुगति गमन, भय-सप्तक खोवे ।।
पाऊँ मरण-समाधी स्वामी ।
बनूँ रतन जिन-गुण आसामी ।।२२।।
‘पुष्पाञ्जलिं क्षिपेत्’
( यहाँ पर नौ बार णमोकार मंत्र
पढ़ना चाहिए )

विसर्जन पाठ
अञ्जन को पार किया ।
चन्दन को तार दिया ।।
नहिं तोर दया का पार ।
नागों का हार किया ।।१।।

धूली-चन्दन-बावन ।
की शूली सिंहासन ।।
धरणेन्द्र देवी-पद्मा ।
मामूली अहि-नागिन ।।२।।

अगनी ‘सर’ नीर किया ।
भगिनी ‘सर’ चीर किया ।।
नहिं तोर दया का पार ।
केशर महावीर किया ।।३।।

बन पड़ीं भूल से भूल ।
कृपया कर दो निर्मूल ।।
बिन कारण तारण हार ।
नहिं तोर दया का पार ।।४।।
दोहा
बस आता, अब धारता,
ईश आशिका सीस ।
कृपा निराकुल आपकी,
बनी रहे निशि-दीस ।।
(पुष्पांजलि क्षिपामि)

आरती

आरती उतारें,
आओ आरती उतारें
ग्राम पठारी के बड़े बाबा, संकट निवारें ।।

पहली आरति गर्भ समय की ।
बरसा रतन, गगन जय-जय की ।
मन से पुकारें ।
आओ आरती उतारें
ग्राम पठारी के बड़े बाबा, संकट निवारें ।।

दूसरी आरति जन्म समय की ।
दर्श मात्र शचि पुन अक्षय की ।
मूरत निहारें ।
आओ आरती उतारें
ग्राम पठारी के बड़े बाबा, संकट निवारें ।।

तीसरी आरति त्याग समय की ।
दीक्षा नगन विराग विषय की ।
चरणा पखारें ।
आओ आरती उतारें
ग्राम पठारी के बड़े बाबा, संकट निवारें ।।

चौथी आरति ज्ञान समय की ।
सार्थ सम-शरण दान अभय की ।
भक्ति उर धारें ।
आओ आरती उतारें
ग्राम पठारी के बड़े बाबा, संकट निवारें ।।

पाँचवी आरति मोक्ष समय की ।
ऋजु-गत शिव-पत, कर्म विलय की ।
जीवन सॅंवारें ।
आओ आरती उतारें
ग्राम पठारी के बड़े बाबा, संकट निवारें ।।

 

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