पारोला के
चन्द्र-प्रभु भगवान् की पूजन
पारोला प्रभ चन्दा देवा ।
देव आपकी करते सेवा ।।
मम आराध्य, न पूजूँ क्यूँ मैं,
ले जल, चन्दन, मिसरी, मेवा ।
कृपया पार लगा दो खेवा ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्र !
अत्र अवतर अवतर संवौषट्
(इति आह्वानन)
अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ:
(इति स्थापनम्)
अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट्
(इति सन्निधिकरणम्) ।
आश विश्वास लिये आना ।
नीर नयनों में भर लाना ।।
बताता भक्तों का ताँता,
रही ना झोली खाली ।
म्हार पारोला प्रभ चन्दा,
बड़े ही अतिशय कारी ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय नमः
जलं निर्वपामीति स्वाहा ।।
पारोला प्रभ चन्दा सबके ।
भूल भुलाई, कभी न डांटा ।
कहाँ पराया-अपना छाँटा ।।
अपनाया बस आना नव के ।
पारोला प्रभ चन्दा सबके ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय नमः
चंदनं निर्वपामीति स्वाहा ।।
पारोला प्रभ चन्दा अपने भाँती ।
जिसका नहिं कोई, है उसके साथी ।।
चमरी गाय बाल सुलझाता ।
जात वैर तज सींह दिखाता ।।
समशरणा कब और किसी की थाती ।
पारोला प्रभ चन्दा अपने भाँती ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय नमः
अक्षतं निर्वपामीति स्वाहा ।।
पारोला प्रभ चन्दा भाग विधाता ।
अगनी का पानी कर डाला ।
घड़े साँप थे निकली माला ।।
चीर बढ़ा दुश्शासन हारा, जीता सत् विख्याता ।
पारोला प्रभ चन्दा भाग विधाता ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय नमः
पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा ।।
पारोला प्रभ चन्दा मूरत मनहारी ।
सोम सौम्य आभा दृग नासा ।
भीतर गहरे उतर निवासा ।
दृग पद्मा, माथा सुमेर, लट घुंघराली ।
पारोला प्रभ चन्दा मूरत मनहारी ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय नमः
नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।
पारोला प्रभ चन्दा केवलज्ञानी ।
अमरित से मीठी वाणी कल्याणी ।।
जन्म जरा मृतु रोग विदाई ।
स्व-पर भेद विज्ञान सहाई ।।
माटी मटकी मिटती आनी जानी ।
पारोला प्रभ चन्दा केवलज्ञानी ।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय नमः
दीपं निर्वपामीति स्वाहा ।।
पारोला प्रभ चन्दा छव चन्दा दूजी ।
जय चन्दा जयकार जगत भर में गूॅंजी ।।
हित उपदेशी ! दया निधाना !
वीतराग ! निध केवल ज्ञाना ।।
करते ही दर्शन सम्यक् दर्शन पूँजी ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय नमः
धूपं निर्वपामीति स्वाहा ।।
पारोला प्रभ चन्दा दोष अठारह रीते ।
नन्त चतुष्टय जीवन मुक्ता ।
अनन्य एक सहायक भक्ता ।।
दो वरदान श्वास अंतिम तुम द्वारे बीते ।
पारोला प्रभ चन्दा दोष अठारह रीते ।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय नमः
फलं निर्वपामीति स्वाहा ।।
नाहिं बस दर्शन करता हूँ ।
चरण स्पर्शन करता हूँ ।
द्रव्य वसु अर्पण करता हूँ ।
आश मुझे विश्वास न दूंगा अब भव फेरे ।
पारोला प्रभ-चन्दा मेरे ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय नमः
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।
कल्याण अर्घ्य
सातिशय अनोखी ।
बरसा रत्नों की ।।
जन-जन पुण्योदय ।
कल्याणक जय-जय ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
चैत्र कृृष्ण पंचम्यां
गर्भ कल्याणक प्राप्ताय
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय नमः
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।
क्षीर नीर कलशा ।
मेर न्हवन जलसा ।।
शचि अनेक भव क्षय ।
कल्याणक जय-जय ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
पौष्य कृष्ण एकादश्यां
जन्म कल्याणक प्राप्ताय
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय नमः
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।
हित जित मन-अक्षा ।
दैगम्बर दीक्षा ।।
सिद्ध साक्ष सविनय ।
कल्याणक जय-जय ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
पौष-कृष्ण-एकादश्यां
दीक्षा कल्याणक प्राप्ताय
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय नमः
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।
सुरभी सम शरणा ।
सुनते सिंह हिरणा ।।
कल…यान अरिंजय ।
कल्याणक जय-जय ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
फाल्गुुन-कृष्ण-सप्तम्यां
ज्ञान कल्याणक प्राप्ताय
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय नमः
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।
शुक्ल ध्यान अगनी ।
दह करनी-भरणी ।।
शिव थान जनम क्षय ।
कल्याणक जय-जय ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
फाल्गुन-शुक्ल-सप्तम्यां
मोक्ष कल्याणक प्राप्ताय
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय नमः
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।
दोहा
अपने जैसे एक हैं,
पारोला प्रभ चन्द्र ।
भेंटत हंस विवेक हैं,
निस्पृह करुणा-वन्त ।।
जयमाला
जयतु जय प्रभ चन्द्र-देवा ।
देव करते आप सेवा ।।
क्यूँ न सेवा करूॅंगा मैं,
आप मम आराध्य देवा ।।
वीतरागी ! विगत-द्वेषी ! ।
एक सर्वग ! हितुप-देशी ! ।।
रत्न खन-खन तीन जेबा ।
देव करते आप सेवा ।
आप मम आराध्य देवा ।।
नन्त दर्शन, ज्ञान नन्ता ।
सुख अनन्ता वीर्यवन्ता ।।
तट चतुष्ट्य-नन्त खेवा ।
देव करते आप सेवा ।
आप मम आराध्य देवा ।।
छत्र, चॉंवर, पुष्प बरसा ।
सिंहासन, धुनि-दिव्य सरसा ।।
भा-वलय, तर-तूर-देवा ।
देव करते आप सेवा ।
आप मम आराध्य देवा ।।
चॅंवर, पंखा, छतर, ढोना ।
कलश, झारी, ध्वज सलोना ।।
सार्थ दर्प-ण मं-गलेवा ।
देव करते आप सेवा ।
आप मम आराध्य देवा ।।
पूर्ण शशि मुख नयन-हारी ।
चन्द्र प्रभ छव गौर न्यारी ।।
विनिर्गत परिणत फरेबा ।
देव करते आप सेवा ।
आप मम आराध्य देवा ।।
माथ रवि तम-बाह्य हाना ।
मण-प्रदीवा शुक्ल ध्याना ।।
विहर तम मानस कुटेवा ।
देव करते आप सेवा ।
आप मम आराध्य देवा ।।
वचन जिन सिंह-नाद दूजी ।
धुनि ‘दिगम्बर-आदि’ गूॅंजी ।।
ताम्र कब ? दृग् गंग-रेवा ।
देव करते आप सेवा ।
आप मम आराध्य देवा ।।
ज्ञान केवल दृगस्-थाई ।
धन्य ! शासन दुख विदाई ।।
खुश गगन उड़ते परेवा ।
देव करते आप सेवा ।
आप मम आराध्य देवा ।।
कुमुद भवि प्रति-बुद्ध चन्दा ।
दोष घन-हन, प्रदानन्दा ! ।।
कृपा बरसाते सदैवा ।
जयतु जय प्रभ-चन्द्र-देवा ।
देव करते आप सेवा ।।
क्यूँ न सेवा करूॅंगा मैं,
आप मम आराध्य देवा ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय नमः
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।
दोहा
पारोला प्रभु चन्द्र में,
अन्तर यही विशेष ।
जिस चाहे को दे चलें,
राखे राग न द्वेष ।।
(पुष्पांजलि क्षिपामि)
विधान प्रारंभ
अष्ट दलकमल पूजा
विधान की जय
सिध, अरिहंताणं णमो,
आयरिय, उवज्ञाय ।
नित सब साहूणं णमो,
सभक्ति मन, वच, काय ।।१।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो जिणाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।
मंगल अरिहंता प्रभो,
सिद्धा मंगल साध ।
दया धर्म मंगल अहो !,
सिमरत अन्त समाध ।।२।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो ओहि जिणाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।
अरिहत, सिध अनगीनती,
उत्तम यति अनगार ।
धर्म अहिंसा नित नुती,
मन, वच, काय संभार ।।३।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो परमोहि जिणाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।
प्रथम शरण अरिहंत हैं,
शरण सिद्ध निर्ग्रन्थ ।
शरण करुण जिन ग्रन्थ हैं,
चार शरण जिन पन्थ ।।४।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो सव्वोहि जिणाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।
अरिहन्ता, सिद्धा-अगणन्ता ।
आ-यरिया, उवज्ञाया, सन्ता ।।
जिन-धर्म, जिनागम-जगदम्बा ।।
जिन बिम्बालय, जय जिन-बिम्बा ।।५।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो अणंतोहि जिणाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।
श्री आदि, अजित, संभव, नन्दन ।
जिन सुमति, पद्म, सुपार्श्व वन्दन ।।
प्रभ-चन्द्र, सुविधि, शीतल स्वामी ।
नुति श्रेय, पूज्य अन्तर्यामी ।।
श्री विमल, अनन्त, धर्म-नाथा ।
नुति शांति, कुन्थ, अर वरदाता ।।
श्री मल्लि, सुव्रत, नम दृग-रेवा ।
नुति नेम, पार्श्व, सन्मत देवा ।।६।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो कोट्ठ-बुद्धीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।
माथे कलंक चन्द्रमा,
आप चरित निष्कलंक ।
खुद जैसा कर लो हमें,
स्वर्ण यम-जनम-पंक ।।७।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो बीय-बुद्धीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।
भव-जल एक किनारे ।
कलजुुग एक सहारे ।
जय बाबा बाबा चन्दा जय,
दुनिया भर से न्यारे ।।८।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो पदाणु-सारीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।
जल, मनहारी चन्दन झारी ।
अक्षत शाली, नन्दन क्यारी ।।
स्वीकारो, मम आराध्य-देव,
चरु, दीप, धूप, श्री-फल थाली ।।01।।
ॐ ह्रां ह्रीं ह्रूं ह्रौं ह्र:
अ-सि-आ-उ-सा नमः
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
अष्टदल कमल हृदयस्-थिताय
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय
पूर्णार्घं निर्वपामीति स्वाहा ।।
षोडश दलकमल पूजा
विधान की जय
पूर्व विदेह धातकी विरली ।
मंगल रत्न संचयन् नगरी ।।
भव यह पिछला तीजा जानो ।
पद्म नाभि नृृप नाम पिछानो ।।९।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो सं-भिण्ण-सोदा-राणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।
वर्ण, स्वर्ण के जैसा दीखे ।
ग्यारह-अंग इन्होंने सीखे ।।
थे मांडलिक यहाँ पर राजा ।
बाद श्रमण भव-जलधि-जहाजा ।।१०।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो सयं-बुद्धाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।
शगुन नेक सद्-गुण आभरणा ।
व्रत सिंह निष्क्रीड़ित आचरणा ।।
धन ! प्रायोपगमन सन्यासी ।
स्वर्गिक वैजयन्त अधिशासी ।।११।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो पत्तेय-बुद्धाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।
‘गर्भ-पर्व’ छह महीने पहले ।
रत्न बरसने लगे रुपहले ।।
लिये हाथ में भेंट अनोखी ।
माँ सेविका देवि-देवों की ।।१२।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो बोहिय-बुद्धाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।
सार्थ नाम धर ऊरध-रेता ।
महासेन नृप विश्व विजेता ।।
पट्टन चन्द्रपुरी रजधानी ।
देवी सुलक्षणा पटरानी ।।१३।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो उजु-मदीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।
सपने लगे हुये से अपने ।
देखे माँ ने सोलह सपने ।।
मानो कोई बाल पुकारे ।
“जागो माँ हम आये द्वारे” ।।१४।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो विउल-मदीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।
गर्भ चैत्र थित पाँचें श्यामा ।
प्रात-काल रिख ज्येष्ठा नामा ।।
कुल इक्ष्वाकु-प्रदीप कहाये ।
कौशल देश स्वर्ग से आये ।।१५।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो दस-पुव्वीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।
पौष्य कृष्ण एकादश जनमें ।
स्वर्ग उतर आया भू छिन में ।।
‘जनमत’ योग शक्र विख्याता ।
वृषभ राशि जुड़ चाला नाता ।।१६।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो चउ-दस-पुव्वीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।
धन ! रिख अनुराधा अवतारी ।
प्रभा शुभ्र गुल कुन्द निराली ।।
शचि आई, बालक को लाई ।
अवतारी भव-एक कहाई ।।१७।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो अट्ठंग-महा-णिमित्त कु-सलाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।
हिवरा फूला नहीं समाया ।
बाल गोद सौधर्म थमाया ।।
पार रुप कब नेत्र सफीने ।
नेत्र हजार इन्द्र ने कीने ।।१८।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो वि-उव्वण-इड्ढि-पत्ताणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।
ऐरावत की किस्मत जागी ।
सेवा हाथ भागवत लागी ।।
रच सुमेर अभिषेक अनोखा ।
सुर-गण पुण्य कमाया चोखा ।।१९।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो विज्जा-हराणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।
पैर उखड़ते दीखे यम के ।
नृत्य किया ताण्डव फिर जमके ।।
यादगार ये दृश्य अनूठे ।
चीन चन्द्रमा पाँव अँगूठे ।।२०।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो चा-रणाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।
बढ़ने लगे दूज चन्दा से ।
निष्कलंक शशि पूनम भासे ।।
दर्श मात्र अपहारक-पीडा ।
धनुष डेढ़ सौ तुंग, शरीरा ।।२१।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो पण्ण-समणाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।
वय लख पूर्व अढ़ाई कुमारा ।
पूरब लाख दशक वय धारा ।।
निमित्त बिजुरी चमक बनाया ।
यह संसार जान के माया ।।२२।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो आयास-गामीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।
बारह सभी भावना भाये ।
देव तभी लौकान्तिक आये ।।
”विरला थामे केतु-अहिंसा” ।
लगे बाँधने सेतु-प्रशंसा ।।२३।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो आसी-विसाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।
बिन ओड़े दैगम्बर-बाना ।
भ्रम व्रत-मन्दिर कलश चढ़ाना ।।
देव-शास्त्र-गुरु का कहना है ।
संयम भव-मानव गहना है ।।२४।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो दिट्ठि-वि-साणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।
जल, मनहारी चन्दन झारी ।
अक्षत शाली, नन्दन क्यारी ।।
स्वीकारो, मम आराध्य-देव,
चरु, दीप, धूप, श्री-फल थाली ।।02।।
ॐ क्षां क्षीं क्षूं क्षें क्षैं क्षों क्षौं क्षं क्षः
नमोर्-ऽहते सर्वं रक्ष रक्ष हूं फट् नमः
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
षोडशदल-कमल हृदयस्-थिताय
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय
पूर्णार्घं निर्वपामीति स्वाहा ।।
चतुर्विंशतिदल कमल पूजा
विधान की जय
सिर्फ न लोचन, मन-मन भाई ।
विमला नाम पालकी आई ।।
राजन् चन्द्र पधारे आ के ।
हर्षाये सुर-असुर उठा के ।।२५।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो उग्ग-तवाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।
पुर परिजन ने दूर तलक आ ।
किया विदा निज-नैन-उदक ला ।।
नगर चन्द्र पुर जाना माना ।
रम्य सुवर्तक तप उद्याना ।।२६।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो दित्त-तवाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।
मुँह लग वृक्ष गगन बतियाई ।
धनुष अठारह सौ ऊँचाई ।।
साथ सहस राजे महराजे ।
वृक्ष नाग तर आन विराजे ।।२७।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो तत्त-तवाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।
‘नमो सव्व सिद्धाणं’ बोला ।
दिया उतार राजसी चोला ।।
पंच मुष्टी लुंचन अपना के ।
खड़े हो गये ध्यान लगा के ।।२८।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो महा-तवाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।
पौष्य इकादश कृष्ण विरागी ।
बेला अपराह्निक बड़भागी ।।
रिख दीक्षा अनुराधा न्यारा ।
षष्टम भक्त नियम उर धारा ।।२९।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो घोर-तवाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।
विसर पूर्व-भव-तापस शेखी ।
लगा टक-टकी नासा देखी ।।
कर अफसोश दोष-कृत पिछले ।
हरकत बिना तीन दिन निकले ।।३०।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो घोर गुण-परक्-कमाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।
रखे दर्श-मुनि हित बेशबरी ।
पुण्य भूम नलिनापुर नगरी ।।
हेत पारणा आये स्वामी ।
पुष्य-मित्र नामा नृप नामी ।।३१।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो घोर-गुणाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।
नवधा भक्ति से पड़गाया ।
गो-क्षीरान्न अहार कराया ।।
पुण्य सातिशय अबकि बोने ।
पञ्चाश्चर्य किये देवों ने ।।३२।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो ऽघोर-गुण-बंभ-यारीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।
सहजो बीत चले तिय मासा ।
गले उतार ध्यान परिभाषा ।।
बस अन्तर्मुहूर्त इक लागा ।
सुप्त चतुष्टय-अनन्त जागा ।।३३।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो आमो-सहि-पत्ताणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।
फाल्गुन कृष्ण सप्तमी न्यारी ।
अपराह्निक बेला सुखकारी ।।
नियम धारणा धारी बेला ।
रिख अनुराधा वाली बेला ।।३४।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो खेल्लो-सहि-पत्ताणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।
वृक्ष नाग तर छव लासानी ।
उपवन सवर्थि केवलज्ञानी ।।
ऊँचाई धनु मानस्तंभा ।
शत अठदश धुनि माँ जगदम्बा ।।३५।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो जल्लो-सहि-पत्ताणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।
कोट उँचाई यही बताई ।
चैत्य ‘वृक्ष’ सिद्धार्थ गुसाईं ।।
गिरि-तोरण भी इतने ऊँचे ।
इतने ऊँचे ध्वज नभ गूँजे ।।३६।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो विट्ठो-सहि-पत्ताणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।
वेदिस्-तूप न इससे ज्यादा ।
विस्तृत इतने ही प्रासाद ।।
कोट, वेदि सम-शरणा साँची ।
चौड़े सार्ध शतक चौ वाँची ।।३७।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो सव्वो-सहि-पत्ताणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।
धनुष शतक द्वादश गिर चौड़े ।
तूप सार्ध शत धनु अर थोड़े ।।
‘युज’ वसु अर्ध प्रमाण सभा का ।
‘कुस’ चउतीस वितान सभा का ।।३८।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो मण-बलीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।
सिंहासन पद्मासन माड़े ।
चौषठ चँवर लिये सुर ठाड़े ।।
छतर तीन सिर-ऊपर डोलें ।
देव-दुन्दुभि मिसरी घोलें ।।३९।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो वचि-बलीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।
भामण्ड़ल भव-भव दर्पण है ।
झिर लग गंधोदक बर्सण है ।।
मन्द-मन्द चाले पवमाना ।
पुष्प-वृष्टि नन्दन बागाना ।।४०।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो काय-बलीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।
तर अशोक तर छटा निराली ।
ध्वनि शिव-स्वर्ग भिंटाने वाली ।।
गुण अनुरूप नाम सम शरणा ।
वैर छोड़ बैठे सिंह-हिरणा ।।४१।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो खीर-सवीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।
अठदश सहस सहज सर्वज्ञा ।
चार हजार पूर्व धर प्रज्ञा ।।
दृग् नम तेरानवे गणेशा ।
गुरु गुरुत्व रखते निज जैसा ।।४२।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो सप्पि-सवीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।
सप्त सहस्र वादि अभिलेखा ।
वसु सहस्र मति विपुल विवेका ।।
विक्रिय धर दश सहस चार सौ ।
अवधिज्ञान धारी हजार दो ।।४३।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो महुर-सवीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।
गणि श्री दत्त घाट वैतरणी ।
प्रमुख वरुण-श्री नामा गणनी ।।
फिर हजा-अस्सी तिय-लाखा ।
नृप मघवा मुख श्रोतरि भाखा ।।४४।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो अमइ-सवीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।
लाख-तीन सुधि श्रावक शोभें ।
पाँच-लाख श्राविका सुशोभें ।।
‘यग-यक्ष’ श्री अजित सुनो जी ।
ज्वाल मालिनी ‘यक्षि’ चुनो जी ।।४५।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो अक्खीण-महा-णसाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।
निस्पृह सिखला आखर-ढ़ाई ।
मास पूर्व ली सभा विदाई ।।
फाल्गुन शुक्ल सप्तमी मोखा ।
प्रातः ज्येष्ठा रिक्ष अनोखा ।।४६।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो वड्ढमाण-बुद्धि-रिसस्स
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।
ललित-कूट गिरवर सम्मेदा ।
मुद्रा कायोत्सर्ग समेता ।।
जा पहुँचे शिव समय मात्र में ।
ऋषि-गण सिद्ध हजार साथ में ।।४७।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो सव्व-सिद्धा-यद-णाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।
चौरासी केवली अनबद्धा ।
लख जुग सहस तीस चौ सिद्धा ।।
कहूँ कहाँ तक पार न आता ।
‘सहज-निराकुल’ मौन सुहाता ।।४८।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो भयवदो महदि
महावीर वड्ढमाण बुद्धिरिसीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।
पूर्णार्घ
जल, मनहारी चन्दन झारी ।
अक्षत शाली, नन्दन क्यारी ।।
स्वीकारो, मम आराध्य-देव,
चरु, दीप, धूप, श्री-फल थाली ।।03।।
श्री वृषभादि वर्धमान पर्यंत
परम-देव भगवन् तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
चतुर्विंशति दल कमल
हृदयस्-थिताय
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय
पूर्णार्घं निर्वपामीति स्वाहा ।।
महा-अर्घं
दोहा
बिन माँगे मिलता यहाँ,
कहते हैं ‘जिन बोल’ ।
चेहरा पढ़ना जानते,
प्रभु होते अनमोल ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
नव देव भगवन् तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
अष्ट-चत्वारिंशद्-दलकमल
हृदयस्-थिताय
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय नमः
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।
:: जाप्य ::
।। ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री चन्द्रप्-प्रभ तीर्थंकराय नमः ।।
जयमाला
हमारी रोज दिवाली है ।
तुम्हारी कृपा निराली है ।।
स्व…स्थ तन-मन ।
विदा अनबन ।
जेब खनखन ।
झुकी डाली, हरियाली है ।
तुम्हारी कृपा निराली है ।।१।।
चैन निंदिया ।
सुलझी धिया ।
मित्र दुनिया ।
नज़र काली झर चाली है ।
तुम्हारी कृपा निराली है ।।२।।
साधु संगत ।
पुण्य सम्पत ।
शान्त परणत ।
हार हारी बलिहारी है ।
तुम्हारी कृपा निराली है ।।३।।
भीगे नयन ।
मीठे वचन ।
सीझे सुपन ।
चुनर शश तारों वाली है ।
तुम्हारी कृपा निराली है ।।४।।
जग कुटुम है ।
जलन गुम है ।
दुख खतम है ।
खड़ी दर यम बदहाली है ।
तुम्हारी कृपा निराली है ।।५।।
दोहा
हाथ ‘निराकुलता’ लगी,
किरपा सिर्फ तुम्हार ।
धका धका यूॅं दो लगा,
नैय्या मेरी पार ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय नमः
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।
श्री सरसुति-मंत्र*
ॐ ह्रीम्
अर्हन् मुख कमल-वासिनि
पा-पात्म क्षयंकरि
श्रुत-ज्ञान
ज्वाला सहस्र प्रज्ज्वलिते
सरस्वति !
मत् पापम् हन हन दह दह
क्षाम् क्षीम् क्षूम् क्षौम् क्षः
क्षीरवर-धवले
अ-मृत संभवे
वम् वम् हूम् फट् स्वाहा
मम सन्-निधि-करणे
मम सन्-निधि-करणे
मम सन्-निधि-करणे ।
ॐ ह्रीं जिन मुखोद्-भूत्यै
श्री सरस्वति-देव्यै
अर्घं निर्वपामीति स्वाहा
शांति पाठ
अथ पौर्वाह-निक (अप-राह-निक)
देव-शास्त्र-गुरु-वन्दना-क्रियायाम्
पूर्वाचार्या-नुक्-क्रमेण,
सकल-कर्मक्-क्षयार्-थम्,
भाव-पूजा-वन्दना-स्तव समेतम्
श्री शांति-भक्ति कायोत्सर्गम् करोम्यहम्
(९ बार णमोकार )
*चौपाई*
दर्शन मात्र मेंटता दुखड़ा ।
भाँत चन्द्रमा सुन्दर मुखड़ा ।।
नासा टिके नैन मनहारी ।
करें वन्दना नाथ ! तुम्हारी ।।१।।
आप चक्रधर-पञ्चम नामी ।
वन्द्य इन्द्र शत, अन्तर्-यामी ।।
प्रभो शान्ति-जिन करके करुणा ।
करो शान्ति ! जश निरखो अपना ।।२।।
छत्र, सिंहासन, वृक्ष-अशोका ।
धुनि, दुन्दुभि, दल-चँवर अनोखा ।।
भा-मण्डल झिर-पुष्प-अनूठी ।
प्रातिहार्य-वसु आप विभूती ।।३।।
अर्चित-जगत् ! शान्ति करतारी ।
ढ़ोक करो स्वीकार हमारी ।।
प्राण-भूत, सत्, जीव समस्ता ।
पायें परिणति शान्त प्रशस्ता ।।४।।
देवों में जो देव बड़े हैं ।
चरणों में हित सेव खड़े हैं ।।
हंस-वंश वे जग उजियारे ।
करें शान्ति मण्डित जग सारे ।।५।।
(निम्न श्लोक को पढ़कर
जल छोड़ना चाहिए)
शान्ति कीजिये गाँव-गाँव में ।
विश्व लीजिये पाँव-छाँव में ।।
डूब ‘साध-जन’ उतरें गहरे ।
लहर लहर-पचरंगा लहरे ।।६।।
नृप धार्मिक बलशाली होवे ।
विकृत-प्रकृत मनमानी खोवे ।।
धर्म-चक्र-जिन सौख्य प्रदाता ।
रहे प्रवाहित यूँ हि विधाता ।।७।।
द्रव्य सुमंगल-कारी होवे ।
क्षेत्र अमंगल-हारी होवे ।।
होवे काल सुमंगल-कारी ।
होवें भाव अमंगल-हारी ।।८।।
कर्मन-घात घात मद सारा ।
सहजो सिद्ध रिद्ध परिवारा ।।
आदि आदि अर्हन् चौबीसा ।
शान्ति प्रदान करें निशि दीसा ।।९।।
*दोहा*
किया शान्ति जिन भक्ति का,
भगवन् कायोत्सर्ग ।।
करूँ दोष आलोचना,
जो प्रद-स्वर्ग-पवर्ग ।।१०।।
*चौपाई*
पाँच सभी कल्याणक धारी ।
आठ प्राति-हारज मन-हारी ।।
अतिशय तीस चार मण्डित हैं ।
अर बत्तीस इन्द्र वन्दित हैं ।।११।।
चौ-विध संघ नखत मानिन्दा ।
राम श्याम चक्री, प्रभु ! चन्दा ।।
‘निलय-विनय’ अन-गिनत गभीरा ।
आद-आद जिन अंतिम वीरा ।।१२।।
अर्चन-पूजन-वन्दन करता ।
उनका मैं अभिनन्दन करता ।।
पीड़ा-दुक्ख-दरद-भय खोवे ।
मेरे कर्मों का क्षय होवे ।।१३।।
रत्नत्रय का मुझे लाभ हो ।
मेरी ‘गति-पंचम-उपाध’ हो ।।
मृत्यु-महोत्सव मना सकूँ मैं ।
जिन-गुण-सम्पद् कमा सकूँ मैं ।।१४।।
अथ पौर्वाह-निक (अप-राह-निक)
देव-शास्त्र-गुरु-वन्दना-क्रियायाम्
पूर्वाचार्या-नुक्-क्रमेण,
सकल-कर्मक्-क्षयार्-थम्,
भाव-पूजा-वन्दना-स्तव समेतम्
श्री समाधि-भक्ति कायोत्सर्गम्
करोम्यहम्
(९बार णमोकार )
*चौपाई*
सदा शास्त्र अभ्यास करूँ मैं ।
सन्त समीप निवास करूँ मैं ।।
मौन धरूँ क्यूँ, गुणी दिखाये ।
गौण करूँ, यूँ दोष-पराये ।।१५।।
भावन-आत्म तत्व, नम-नयना ।
हित-मित रखूँ मधुरतम वयना ।।
जब तक राधा-मुक्ति रिझाऊँ ।
इन्हें जन्म जन्मान्तर पाऊँ ।।१६।।
तारण हारे…शरण सहारे ।
हृदय हमारे…चरण तुम्हारे ।।
चरण तुम्हारे…हृदय हमारा ।
रहे, तलक जब भव-जल-धारा ।।१७।।
स्वर-अक्षर पद मात्रा गलती ।
हुईं, चाहते बिन अनगिनती ।।
हो अपराध क्षमा यह मेरा ।
‘जैसा भी’ मैं अपना तेरा ।।१८।।
*दोहा*
किया समाधी, भक्ति का,
भगवन् कायोत्सर्ग ।।
करूँ दोष आलोचना,
जो प्रद-स्वर्ग-पवर्ग ।।१९।।
*चौपाई*
सम्यक्-दर्शन, सम्यक्-ज्ञाना ।
सम्यक्-चारित, ताना-बाना ।।
रूप अनूप ध्यान परमातम ।
बुद्ध-विशुद्ध ज्ञान धर आतम ।।२०।।
पूजन नित वन्दन करता हूँ ।
अर्चन अभिनन्दन करता हूँ ।।
क्षय होवें दुख संकट सारे ।
क्षय हो जावें कर्म हमारे ।।२१।।
मुझे लाभ रत्नत्रय होवे ।
सुगति गमन, भय-सप्तक खोवे ।।
पाऊँ मरण-समाधी स्वामी ।
बनूँ रतन जिन-गुण आसामी ।।२२।।
‘पुष्पाञ्जलिं क्षिपेत्’
( यहाँ पर नौ बार णमोकार मंत्र
पढ़ना चाहिए )
विसर्जन पाठ
अञ्जन को पार किया ।
चन्दन को तार दिया ।।
नहिं तोर दया का पार ।
नागों का हार किया ।।१।।
धूली-चन्दन-बावन ।
की शूली सिंहासन ।।
धरणेन्द्र देवी-पद्मा ।
मामूली अहि-नागिन ।।२।।
अगनी ‘सर’ नीर किया ।
भगिनी ‘सर’ चीर किया ।।
नहिं तोर दया का पार ।
केशर महावीर किया ।।३।।
बन पड़ीं भूल से भूल ।
कृपया कर दो निर्मूल ।।
बिन कारण तारण हार ।
नहिं तोर दया का पार ।।४।।
दोहा
बस आता, अब धारता,
ईश आशिका सीस ।
कृपा निराकुल आपकी,
बनी रहे निशि-दीस ।।
(पुष्पांजलि क्षिपामि)
आरती
आरती उतारूॅं ‘रे
मैं तो आरती उतारूॅं ‘रे
चन्दा प्रभु भगवान की
समन्त भद्र पहचान की
पहली आरती गर्भ समय की ।
बर्षा रतन, अनोखी देखी ।।१।।
दूसरी आरती जन्म समय की ।
जलसा न्हवन, कतार घड़े की ।।२।।
तीसरी आरती त्याग समय की ।
शिक्षा वन दूजे दर्जे की ।।३।।
चौथी आरती ज्ञान समय की ।
पा समशरण घृणा मृग फेंकी ।।४।।
पांचवी आरती मोक्ष समय की ।
पा शिव सदन, पूर्ण यात्रा की ।।५।।
आरती उतारूॅं ‘रे
मैं तो आरती उतारूॅं ‘रे
चन्दा प्रभु भगवान की
समन्त भद्र पहचान की
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