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चौबीस तीर्थंकर विधान  ·  तीर्थक्षेत्र पूजन

धरण-गाव के -पार्श्वनाथ भगवान् की पूजन

By मुनि श्री निराकुल सागर जी महाराज 

 

धरण-गाव के
पार्श्वनाथ भगवान् की पूजन
धरण-गाव के पार्श्व तुम्हारी,
मूरत अति मनहारी है ।
उड़ती हुई धूप भौंहरे में ।
जलती हुई ज्योत भौंहरे में ।
और बन्द भौंहरा चिर, खोला
मिली द्रव्य की थाली है ।
धरण-गाव के पार्श्व तुम्हारी,
महिमा अतिशय कारी है ।।
धरण-गाव के पार्श्व तुम्हारी,
मूरत अति मनहारी है ।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री पार्श्व-नाथ जिनेन्द्र !
अत्र अवतर अवतर संवौषट्
(इति आह्वानन)
अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ:
(इति स्थापनम्)
अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट्
(इति सन्निधिकरणम्) ।

धरण-गाव के पार्श्व तुम्हारी,
महिमा क्या गाऊँ ।
याँचत कल्पवृक्ष सुख देता ।
मन चिन्तन चिन्ता-मणि लेता ।।
चिन्तन बिना याँचना तुमसे,
मनचाहा पाऊँ ।
धरण-गाव के पार्श्व तुम्हारी,
महिमा क्या गाऊँ ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री पार्श्व-नाथ जिनेन्द्राय नमः
जलं निर्वपामीति स्वाहा ।।

धरण-गाव के पार्श्व आप पर श्रृद्धा मेरी ।
मुझे पूर्ण विश्वास न दूॅंगा अब भव फेरी ।।
वीतराग हे ! हित-उपदेशी ।
सर्वग ! निस्पृह ! विश्व हितैषी ।।
दर्शन मात्र ढ़ेर होती कर्मों की ढ़ेरी ।
मुझे पूर्ण विश्वास न दूॅंगा अब भव फेरी ।
धरण-गाव के पार्श्व आप पर श्रृद्धा मेरी ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री पार्श्व-नाथ जिनेन्द्राय नमः
चंदनं निर्वपामीति स्वाहा ।।

धरण-गाव के पार्श्व कृपा के क्या कहने ? ।
कुछ ना कुछ सब लेकर जाते ।
भक्तों के चेहरे बतलाते ।।
बिना कहे खुशियों के अश्रु लगें बहने ।
धरण-गाव के पार्श्व कृपा के क्या कहने ? ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री पार्श्व-नाथ जिनेन्द्राय नमः
अक्षतं निर्वपामीति स्वाहा ।।

निकल भू गर्भ दिया दर्शन ।
हमारा पुण्य किया वर्धन ।
क्यूँ न साधूॅं विधि-वत् अर्चन ।
आप आराध्य देव म्हारे ।
पार्श्व प्रभु धरण-गाव वाले ।
आप आराध्य देव म्हारे ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री पार्श्व-नाथ जिनेन्द्राय नमः
पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा ।।

धरण-गाव के पार्श्व हमारे तुम हो ।
मेरी तुमसे लागी है लगन ।
तेरा अपना ही, दे दो शरण ।
मॉं न देख सकती शिशु नम नयन ।
दया धर्म के माथे की कुमकुम हो ।
धरण-गाव के पार्श्व हमारे तुम हो ।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री पार्श्व-नाथ जिनेन्द्राय नमः
नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

धरण-गाव के पारस, रस-पारस से आगे हैं ।
लो-हा ! सिर्फ न सोना कीना ।
भक्त स्वयं जैसा कर लीना ।।
मान तुम्हें आराध्य देव हम सब बड़-भागे हैं ।।
धरण-गाव के पारस, रस-पारस से आगे हैं ।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री पार्श्व-नाथ जिनेन्द्राय नमः
दीपं निर्वपामीति स्वाहा ।।

धरण-गावा पार्श्व सत्, शिव, सुन्दरा ।
शंख ग्रीवा, माथ उन्नत मन्दरा ।
सौम्य अन्तर्मुखी-मुद्रा कह रही,
आपना बाहर न कुछ चल अन्दरा ।
धरण-गावा पार्श्व सत्, शिव, सुन्दरा ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री पार्श्व-नाथ जिनेन्द्राय नमः
धूपं निर्वपामीति स्वाहा ।।

धरण-गाव के पार्श्व भिंटाते सुख-साता ।
तभी कभी ना टूटे भक्तों का तॉंता ।।
जिसकी जैसी रही भावना ।
पूरी होती मनोकामना ।।
सिर्फ जोड़ना भगवन् और भक्त नाता ।
धरण-गाव के पार्श्व भिंटाते सुख-साता ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री पार्श्व-नाथ जिनेन्द्राय नमः
फलं निर्वपामीति स्वाहा ।।

धरण-गावा पार्श्व इक प्यारे मुझे ।
चढ़ाता हूँ द्रव्य ये सारे तुझे ।
आश बस, अभिलाष बस मेरी यही,
दीप श्वासों का ये तुम द्वारे बुझे ।
धरण-गावा पार्श्व इक प्यारे मुझे ।‌।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री पार्श्व-नाथ जिनेन्द्राय नमः
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

कल्याण अर्घ्य
पार्श्व बाबा ! धरण-गावा ।
कौन मेरा तुम अलावा ।
भार ज्यादा नहीं मेरा,
लो बिठा शिव गॉंव नावा ।।
कौन मेरा तुम अलावा ।
पार्श्व बाबा ! धरण-गावा ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
वैशाख-कृष्ण-द्वितीयायां
गर्भ कल्याणक प्राप्ताय
श्री पार्श्व-नाथ जिनेन्द्राय नमः
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

धरण-गावा पार्श्व स्वामी ।
एक अन्तर्याम नामी ।
सजल आना, काम बनता,
माँ न देखा करे खामी ।।
एक अन्तर्याम नामी ।
धरण-गावा पार्श्व स्वामी ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
पौष-कृष्ण-एकादश्यां
जन्म कल्याणक-प्राप्ताय
श्री पार्श्व-नाथ जिनेन्द्राय नमः
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

धरण-गावा पार्श्व भगवन् ।
देत सुलझा शीघ्र उलझन ।
सुना मैंने, और नहिं बस,
लेत भावों भरा वन्दन ।।
देत सुलझा शीघ्र उलझन ।
धरण-गावा पार्श्व भगवन् ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
पौष-कृष्ण-एकादश्यां
दीक्षा कल्याणक प्राप्ताय
श्री पार्श्व-नाथ जिनेन्द्राय नमः
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

धरण-गावा पार्श्व जिनवर ।
आप बीति सुनें दिन भर ।
उठ बनाते तुरत बिगड़ी,
चुके निशि यूॅं प्रकट दिनकर ।
आप बीति सुनें दिन भर ।
धरण-गावा पार्श्व जिनवर ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
चैत्र-कृष्ण-त्रयोदश्यां
ज्ञान कल्याणक प्राप्ताय
श्री पार्श्व-नाथ जिनेन्द्राय नमः
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

धरण-गावा पार्श्व देवा ।
धरण देवा निरत सेवा ।।
क्यूँ न सेवा करूॅंगा मैं,
आप मम आराध्य देवा ।।
धरण देवा निरत सेवा ।
धरण-गावा पार्श्व देवा ।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्रावण-शुक्ल-सप्तम्यां
मोक्ष कल्याणक प्राप्ताय
श्री पार्श्व-नाथ जिनेन्द्राय नमः
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

दोहा
धरण-गाव के पार्श्व की,
महिमा अपरम्पार ।
दृग क्या ? चरणों से टिकीं,
खुशियों से दृग चार ।।
जयमाला
प्रभु पार्श्व भजो, प्रभु पार्श्व भजो ।
रॅंग भक्ति सजो, प्रभु पार्श्व भजो ।।

दिव-सोला सपनों से नाता ।
वामा देवी जिनकी माता ।।
नृप अश्व-सेन घर जनमें जो ।
प्रभु पार्श्व भजो, प्रभु पार्श्व भजो ।
रॅंग भक्ति सजो, प्रभु पार्श्व भजो ।।१।।

सिर पर सुमेरु ने बैठाया ।
तब से ही यह मन में आया ।।
वह जौवन गुजरे वन में जो ।
प्रभु पार्श्व भजो, प्रभु पार्श्व भजो ।
रॅंग भक्ति सजो, प्रभु पार्श्व भजो ।।२।।

पट-लट उतार, भीतर कछुआ ।
समझाया चंचल मृग मनुआ ।।
धन ! लाज रखे नैनन में जो ।
प्रभु पार्श्व भजो, प्रभु पार्श्व भजो ।
रॅंग भक्ति सजो, प्रभु पार्श्व भजो ।।३।।

आ चला कमठ निज या वैरी ।
ढ़ा चला अत्त, न लगा देरी ।।
उतरे ‘सह’-ढ़ाला रण में जो ।
प्रभु पार्श्व भजो, प्रभु पार्श्व भजो ।
रॅंग भक्ति सजो, प्रभु पार्श्व भजो ।।४।।

धरणेन्दर-पद्मावत आये ।
प्रभु ऊपर तान फणा छाये ।।
रति-द्वेष न लाये मन में जो ।
प्रभु पार्श्व भजो, प्रभु पार्श्व भजो ।
रॅंग भक्ति सजो, प्रभु पार्श्व भजो ।।५।।

घातिया चतुष्टय संहारा ।
धन ! नन्त चतुष्टय श्रृंगारा ।।
चर्चित तीर्थक त्रिभुवन में जो ।
प्रभु पार्श्व भजो, प्रभु पार्श्व भजो ।
रॅंग भक्ति सजो, प्रभु पार्श्व भजो ।।६।।

सम-शरण भेक-अहि, सिंह-हिरणा ।
सुन धुन फूटी समकित किरणा ।।
कम किससे करुणा धन में जो ।
प्रभु पार्श्व भजो, प्रभु पार्श्व भजो ।
रॅंग भक्ति सजो, प्रभु पार्श्व भजो ।।७।।

फिर घात अघात-कर्म लीला ।
पुर-सौख्य-’निराकुल’ भव-तीरा ।।
जा पहुँचे ऋज-गत क्षण में जो ।
प्रभु पार्श्व भजो, प्रभु पार्श्व भजो ।
रॅंग भक्ति सजो, प्रभु पार्श्व भजो ।।८।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री पार्श्व-नाथ जिनेन्द्राय नमः
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

दोहा
धरण-गाव प्रभु पार्श्व हे !,
यही अरज कर जोड़ ।
यम जब चलने की कहे,
हो चालूॅं सॅंग दौड़ ।।
।। पुष्पांजलि क्षिपामि ।।

विधान प्रारंभ

अष्ट दलकमल पूजा
विधान की जय

अर्हम् णमो-णमो ।
सिद्धम् णमो-णमो ।।
आ-यरि, उवझाया,
साधो णमो-णमो ।।१।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो जिणाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री पार्श्व-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

मंगल जिन-देवा ।
मंगल तट खेवा ।।
रति-जंगल मंगल,
मंगल दृग रेवा ।।२।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो ओहि जिणाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री पार्श्व-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

उत्तम अरिहन्ता ।
उत्तम गुण-नन्ता ।।
दया धर्म उत्तम,
उत्तम निर्ग्रन्था ।।३।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो परमोहि जिणाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री पार्श्व-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

अरिहत जिन शरणा ।
अगणत गुण शरणा ।।
शरणा संयत मुन,
सन्मत धुन शरणा ।।४।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो सव्वोहि जिणाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री पार्श्व-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

मन्दिर कल…याना ।
पारस भगवाना ।
मुझे शरण तेरी,
मेंटो आना जाना ।।५।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो अणंतोहि जिणाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री पार्श्व-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

सुर-गुरु नत माथा ।
गा तुमरी गाथा ।
गाथा तुम गाऊँ,
पत रखना दाता ! ।।६।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो कोट्ठ-बुद्धीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री पार्श्व-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

कृत मम अविचारा ।
गुण कीर्तन थारा ।
कहे भानु कैसा ?,
मनु उलूक बाला ।।७।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो बीय-बुद्धीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री पार्श्व-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

भले मोह रीते ।
कब गुण गिनती ते ? ।।
कौन सिन्धु बिनु जल,
मण गणना जीते ।।८।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो पदाणु-सारीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री पार्श्व-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

जल, मनहारी चन्दन झारी ।
अक्षत शाली, नन्दन क्यारी ।।
स्वीकारो, मम आराध्य-देव,
चरु, दीप, धूप, श्री-फल थाली ।।01।।
ॐ ह्रां ह्रीं ह्रूं ह्रौं ह्र:
अ-सि-आ-उ-सा नमः
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
अष्टदल कमल हृदयस्-थिताय
श्री पार्श्व-नाथ जिनेन्द्राय
पूर्णार्घं निर्वपामीति स्वाहा ।।

षोडश दलकमल पूजा
विधान की जय

तुम गुण अनगणा ।
तदपि हुआ गिनना ।
शिशु पसार बाँहें,
कहे सिन्धु कितना ।।९।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो सं-भिण्ण-सोदा-राणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री पार्श्व-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

जोगी-जन हारे ।
गिन तुम गुण तारे ।।
भाँत चहक चिड़िया,
गाऊॅं गुण थारे ।।१०।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो सयं-बुद्धाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री पार्श्व-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

छोड़ो संस्तवना ।
नाम आप कम ना ।।
पीड़ा ग्रीष्म हरे,
सरवर तर पवना ।।११।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो पत्तेय-बुद्धाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री पार्श्व-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

थुति तुम मन जोड़ा ।
पापों ने छोड़ा ।।
साँप छोड़ चन्दन,
भागें सुन मोरा ।।१२।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो बोहिय-बुद्धाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री पार्श्व-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

दर्श मात्र तुमरा ।
करे दूर दुखड़ा ।
लख स्वामी गो…रख,
चोर खिसक निकला ।।१३।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो उजु-मदीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री पार्श्व-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

उर बिठाल जगती ।
तुम्हें पार करती ।।
भीतर जो पवना,
मसक तीर लगती ।।१४।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो विउल-मदीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री पार्श्व-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

मन्मथ जग जीता ।
तुम ढिग दृग तीता ।।
क्या नहिं वडवानल,
सागर जल पीता ।।१५।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो दस-पुव्वीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री पार्श्व-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

गुरु तुम उर राखा ।
तट भव जल झाँका ।।
अगम विरद थारा,
जाये नहिं आंका ।।१६।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो चउ-दस-पुव्वीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री पार्श्व-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

क्रोध पूर्व मारा ।
अरि किमि संहारा ।।
हरा भरा जंगल,
पड़ तुषार काला ।।१७।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो अट्ठंग-महा-णिमित्त कु-सलाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री पार्श्व-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

आप हृदय भक्ता ।
खोज आप करता ।।
कमल कर्णिका बिच,
बस पराग मिलता ।।१८।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो वि-उव्वण-इड्ढि-पत्ताणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री पार्श्व-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

आप ध्यान छूते ।
देह भाव छूटे ।।
पाथर स्वर्ण बने,
अगनी बलबूते ।।१९।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो विज्जा-हराणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री पार्श्व-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

तुम जिस मन रहते ।
तन खिसको कहते ।।
महत् स्वभाव यथा,
विग्रह कब सहते ।।२०।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो चा-रणाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री पार्श्व-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

सोऽहं रति होती ।
भक्त ‘तोय’ मोती ।।
जल कह अमृत पिया,
विष वेदन खोती ।।२१।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो पण्ण-समणाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री पार्श्व-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

तुझे ब्रह्म, भोला ।
हरि, जग ने बोला ।।
दृग पीलिया कृपा,
पीत शंख धौरा ।।२२।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो आयास-गामीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री पार्श्व-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

तुम प्रवचन नाता ।
तरु अशोक पॉंता ।।
जीव जगत जागे,
कमल जाग जाता ।।२३।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो आसी-विसाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री पार्श्व-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

नीचे डण्ठल वा ।
ऊर्ध्व-मुखी फुलवा ।।
बन्धन सु-मन अध:,
कहते, सुन मनुवा ।।२४।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो दिट्ठि-वि-साणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री पार्श्व-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

जल, मनहारी चन्दन झारी ।
अक्षत शाली, नन्दन क्यारी ।।
स्वीकारो, मम आराध्य-देव,
चरु, दीप, धूप, श्री-फल थाली ।।02।।
ॐ क्षां क्षीं क्षूं क्षें क्षैं क्षों क्षौं क्षं क्षः
नमोर्-ऽहते सर्वं रक्ष रक्ष हूं फट् नमः
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
षोडशदल-कमल हृदयस्-थिताय
श्री पार्श्व-नाथ जिनेन्द्राय
पूर्णार्घं निर्वपामीति स्वाहा ।।

चतुर्विंशतिदल कमल पूजा
विधान की जय

जन्म हृदय-पानी ।
आप अमृत वाणी ।।
आत्मसात करके,
अजर अमर प्राणी ।।२५।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो उग्ग-तवाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री पार्श्व-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

दूर झुके जाते ।
फिर ऊपर आते ।।
बतलाते चॉंमर,
नत उध-गत पाते ।।२६।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो दित्त-तवाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री पार्श्व-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

सिंहासन सोना ।
श्याम तन सलोना ।।
मनु सिर गिर स्वर्णा,
नव-घन देखो ना ।।२७।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो तत्त-तवाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री पार्श्व-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

वृत्त-भा सुनीला ।
तरु अशोक पीला ।।
ढिग विराग किसका,
राग नाहिं ढीला ।।२८।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो महा-तवाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री पार्श्व-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

मत छोड़ो मौका ।
आओ दो ढोका ।।
दुन्दुभि-देव कहे,
यहाँ नाव मोखा ।।२९।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो घोर-तवाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री पार्श्व-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

शश त्रिरूप धारे ।
कर झल्लर तारे ।।
प्रभु ऊपर छाया,
छत्र मिष अहा ‘रे ।।३०।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो घोर गुण-परक्-कमाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री पार्श्व-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

साल तीन वर्णा ।
मणि, चांदी, स्वर्णा ।।
कान्ति, यश, प्रतापा,
पिण्ड आप चरणा ।।३१।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो घोर-गुणाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री पार्श्व-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

मुकट माल देवा ।
रत तुम पद सेवा ।।
सु-मन शरण केवल,
चरण तुम सदैवा ।।३२।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो ऽघोर-गुण-बंभ-यारीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री पार्श्व-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

पृष्ठ उठा भारा ।
तुमने उत्तारा ।।
मृद-घट-वत् अचरज,
विपाक परिहारा ।।३३।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो आमो-सहि-पत्ताणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री पार्श्व-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

अलिपि अखर कैसै ? ।
नगन अधिप कैसे ? ।।
हो केवल ज्ञानी,
विद् जड़-जिय वैसे ।।३४।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो खेल्लो-सहि-पत्ताणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री पार्श्व-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

कमठ कहर ढाई ।
गगन रज उड़ाई ।।
तुम न बाल बांका,
आँख किर-किराई ।।३५।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो जल्लो-सहि-पत्ताणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री पार्श्व-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

बिजुरी घन काला ।
प्रेरित अरि द्वारा ।।
हा ! दुस्तर-वारी,
पांव निज प्रहारा ।।३६।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो विट्ठो-सहि-पत्ताणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री पार्श्व-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

मुख अगनी छोड़े ।
बाल वक्र थोड़े ।।
प्रेत कमठ भेजे,
खड़े हाथ जोड़े ।।३७।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो सव्वो-सहि-पत्ताणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री पार्श्व-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

कीनी तुम पूजा ।
छोड़ काम दूजा ।।
धन्य जन्म उनका,
गगनांगन गूंजा ।।३८।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो मण-बलीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री पार्श्व-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

मन्त्र आप नामा ।
सुन न, व्यर्थ शामा ।।
पीछे पड़ी तभी,
दुख नागिन श्यामा ।।३९।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो वचि-बलीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री पार्श्व-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

तुम पूजा नामी ।
की न कभी स्वामी ! ।।
क्यों ? न पराभव हो,
ओ ! अन्तर्यामी ।।४०।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो काय-बलीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री पार्श्व-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

क्या दिन ? क्या रैना ।
ढ़के मोह नैना ।।
देख न सके तुम्हें,
तभी छिना चैना ।।४१।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो खीर-सवीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री पार्श्व-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

सुना, जजा, देखा ।
मन न चरण टेका ।।
भाव शून किरिया,
असफल अभिलेखा ।।४२।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो सप्पि-सवीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री पार्श्व-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

दयाल ! गंभीरा ! ।
कृपाल ! दृग नीरा ।।
जला राख कर दो,
अंकुर दुख पीड़ा ।।४३।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो महुर-सवीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री पार्श्व-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

शरण ! वीतरागी ! ।
लगन न तुम लागी ।।
तुम पद ध्यान बिना,
भव-भव हतभागी ।।४४।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो अमइ-सवीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री पार्श्व-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

घनी वृक्ष छाँवा ! ।
अधिपति शिव गांवा ।।
डूबूं भव सागर,
लो बिठाल नावा ।।४५।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो अक्खीण-महा-णसाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री पार्श्व-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

भक्ति सजल दृग् ले ।
प्रतिफल यह निकले ।।
रहें आप स्वामी,
भव इस, भव अगले ।।४६।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो वड्ढमाण-बुद्धि-रिसस्स
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री पार्श्व-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

ले गदगद वाणी ।
कृति यह कल्याणी ।।
पढ़ी जिन्होंने भी,
वरी मुकति-रानी ।।४७।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो सव्व-सिद्धा-यद-णाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री पार्श्व-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

नयन ‘कुमुद चन्दा’ ! ।
भवि प्रद आनन्दा ।।
हित सुख ‘निराकुलम्’,
जयतु जय जिनन्द्रा ।।४८।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो भयवदो महदि
महावीर वड्ढमाण बुद्धिरिसीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री पार्श्व-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

पूर्णार्घ
जल, मनहारी चन्दन झारी ।
अक्षत शाली, नन्दन क्यारी ।।
स्वीकारो, मम आराध्य-देव,
चरु, दीप, धूप, श्री-फल थाली ।।03।।
श्री वृषभादि वर्धमान पर्यंत
परम-देव भगवन् तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
चतुर्विंशति दल कमल
हृदयस्-थिताय
श्री पार्श्व-नाथ जिनेन्द्राय
पूर्णार्घं निर्वपामीति स्वाहा ।।

महा-अर्घं
दीप, चरु, जल, धूप, गुल, फल, गन्ध, अक्षत ।
ले खड़ा तुम द्वार पर, दे रहा दस्तक ।
सुख ‘निराकुल’ हाथ में मेरे लगेगा,
आश रख विश्वास चरणन रखा मस्तक ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
नव देव भगवन् तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
अष्ट-चत्वारिंशद्-दलकमल
हृदयस्-थिताय
श्री पार्श्व-नाथ जिनेन्द्राय नमः
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

:: जाप्य ::
।। ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री पार्श्वनाथ तीर्थंकराय नमः ।।

जयमाला

दोहा
आश किरण इक रोशनी,
करुणा, दया निधान ।
विघ्न-हरण, चिंतामणी,
पार्श्व नाथ भगवान् ।।

वशि तुम नेह न आ खड़ा,
हेत जगत् दुख धाम ।
स्वयं छाहरी मनहरा,
देख तपन ऋत घाम ।।१।।

विद्या, औषध, मंत्र से,
दाह सर्प विष दूर ।
साधी संस्तुति भाव से,
आधि-व्याधि चकचूर ।।२।।

नेत्र-ज्योति-हर शर्वरी,
सूरज देख विनष्ट ।
रज चरणन तुम सिर धरी,
दूर दिखे जा कष्ट ।।३।।

तुम पद संस्तुति ताल से,
यदि न सुशोभित भौन ।
क्रूर दवानल काल से,
बच सकता फिर कौन ? ।।४।।

सुनते ही सिंह गर्जना,
हाथी जाते भाग ।
चुनते ही जिन अर्चना,
रोग न लगती लाग ।।५।।

यूँ सुख दिवि मायामयी,
उतरे भुवि सुरनाथ ।
सौख्य-निराकुल, अक्षयी,
एक भक्त तुम हाथ ।।६।।

कमल भार निद्रा रखे,
उदित न जब-तक भान ।
जगत् पाप ढोता दिखे,
विगत दृष्टि भगवान् ।।७।।

दृष्टि आप चरणन टिकी,
दृष्टिवान मतिमन्द ।
कृपा आप यह कृति लिखी,
पुनि पुनि धोक अनंत ।।८।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री पार्श्वनाथ जिनेन्द्राय नमः
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

।। दोहा ।।
यही प्रार्थना आप से,
भगवन् पारस-नाथ ।
वस्तु स्वरूप विचार के,
कहूॅं न, सह दिन-रात ।।

श्री सरसुति-मंत्र*
ॐ ह्रीम्
अर्हन् मुख कमल-वासिनि
पा-पात्म क्षयंकरि
श्रुत-ज्ञान
ज्वाला सहस्र प्रज्ज्वलिते
सरस्वति !
मत् पापम् हन हन दह दह
क्षाम् क्षीम् क्षूम् क्षौम् क्षः
क्षीरवर-धवले
अ-मृत संभवे
वम् वम् हूम् फट् स्वाहा
मम सन्-निधि-करणे
मम सन्-निधि-करणे
मम सन्-निधि-करणे ।
ॐ ह्रीं जिन मुखोद्-भूत्यै
श्री सरस्वति-देव्यै
अर्घं निर्वपामीति स्वाहा

शांति पाठ
अथ पौर्वाह-निक (अप-राह-निक)
देव-शास्त्र-गुरु-वन्दना-क्रियायाम्
पूर्वाचार्या-नुक्-क्रमेण,
सकल-कर्मक्-क्षयार्-थम्,
भाव-पूजा-वन्दना-स्तव समेतम्
श्री शांति-भक्ति कायोत्सर्गम् करोम्यहम्
(९ बार णमोकार )

*चौपाई*
दर्शन मात्र मेंटता दुखड़ा ।
भाँत चन्द्रमा सुन्दर मुखड़ा ।।
नासा टिके नैन मनहारी ।
करें वन्दना नाथ ! तुम्हारी ।।१।।

आप चक्रधर-पञ्चम नामी ।
वन्द्य इन्द्र शत, अन्तर्-यामी ।।
प्रभो शान्ति-जिन करके करुणा ।
करो शान्ति ! जश निरखो अपना ।।२।।

छत्र, सिंहासन, वृक्ष-अशोका ।
धुनि, दुन्दुभि, दल-चँवर अनोखा ।।
भा-मण्डल झिर-पुष्प-अनूठी ।
प्रातिहार्य-वसु आप विभूती ।।३।।

अर्चित-जगत् ! शान्ति करतारी ।
ढ़ोक करो स्वीकार हमारी ।।
प्राण-भूत, सत्, जीव समस्ता ।
पायें परिणति शान्त प्रशस्ता ।।४।।

देवों में जो देव बड़े हैं ।
चरणों में हित सेव खड़े हैं ।।
हंस-वंश वे जग उजियारे ।
करें शान्ति मण्डित जग सारे ।।५।।
(निम्न श्लोक को पढ़कर
जल छोड़ना चाहिए)

शान्ति कीजिये गाँव-गाँव में ।
विश्व लीजिये पाँव-छाँव में ।।
डूब ‘साध-जन’ उतरें गहरे ।
लहर लहर-पचरंगा लहरे ।।६।।

नृप धार्मिक बलशाली होवे ।
विकृत-प्रकृत मनमानी खोवे ।।
धर्म-चक्र-जिन सौख्य प्रदाता ।
रहे प्रवाहित यूँ हि विधाता ।।७।।

द्रव्य सुमंगल-कारी होवे ।
क्षेत्र अमंगल-हारी होवे ।।
होवे काल सुमंगल-कारी ।
होवें भाव अमंगल-हारी ।।८।।

कर्मन-घात घात मद सारा ।
सहजो सिद्ध रिद्ध परिवारा ।।
आदि आदि अर्हन् चौबीसा ।
शान्ति प्रदान करें निशि दीसा ।।९।।

*दोहा*
किया शान्ति जिन भक्ति का,
भगवन् कायोत्सर्ग ।।
करूँ दोष आलोचना,
जो प्रद-स्वर्ग-पवर्ग ।।१०।।

*चौपाई*
पाँच सभी कल्याणक धारी ।
आठ प्राति-हारज मन-हारी ।।
अतिशय तीस चार मण्डित हैं ।
अर बत्तीस इन्द्र वन्दित हैं ।।११।।

चौ-विध संघ नखत मानिन्दा ।
राम श्याम चक्री, प्रभु ! चन्दा ।।
‘निलय-विनय’ अन-गिनत गभीरा ।
आद-आद जिन अंतिम वीरा ।।१२।।

अर्चन-पूजन-वन्दन करता ।
उनका मैं अभिनन्दन करता ।।
पीड़ा-दुक्ख-दरद-भय खोवे ।
मेरे कर्मों का क्षय होवे ।।१३।।

रत्नत्रय का मुझे लाभ हो ।
मेरी ‘गति-पंचम-उपाध’ हो ।।
मृत्यु-महोत्सव मना सकूँ मैं ।
जिन-गुण-सम्पद् कमा सकूँ मैं ।।१४।।
अथ पौर्वाह-निक (अप-राह-निक)
देव-शास्त्र-गुरु-वन्दना-क्रियायाम्
पूर्वाचार्या-नुक्-क्रमेण,
सकल-कर्मक्-क्षयार्-थम्,
भाव-पूजा-वन्दना-स्तव समेतम्
श्री समाधि-भक्ति कायोत्सर्गम्
करोम्यहम्
(९बार णमोकार )

*चौपाई*
सदा शास्त्र अभ्यास करूँ मैं ।
सन्त समीप निवास करूँ मैं ।।
मौन धरूँ क्यूँ, गुणी दिखाये ।
गौण करूँ, यूँ दोष-पराये ।।१५।।

भावन-आत्म तत्व, नम-नयना ।
हित-मित रखूँ मधुरतम वयना ।।
जब तक राधा-मुक्ति रिझाऊँ ।
इन्हें जन्म जन्मान्तर पाऊँ ।।१६।।

तारण हारे…शरण सहारे ।
हृदय हमारे…चरण तुम्हारे ।।
चरण तुम्हारे…हृदय हमारा ।
रहे, तलक जब भव-जल-धारा ।।१७।।

स्वर-अक्षर पद मात्रा गलती ।
हुईं, चाहते बिन अनगिनती ।।
हो अपराध क्षमा यह मेरा ।
‘जैसा भी’ मैं अपना तेरा ।।१८।।

*दोहा*
किया समाधी, भक्ति का,
भगवन् कायोत्सर्ग ।।
करूँ दोष आलोचना,
जो प्रद-स्वर्ग-पवर्ग ।।१९।।

*चौपाई*
सम्यक्-दर्शन, सम्यक्-ज्ञाना ।
सम्यक्-चारित, ताना-बाना ।।
रूप अनूप ध्यान परमातम ।
बुद्ध-विशुद्ध ज्ञान धर आतम ।।२०।।

पूजन नित वन्दन करता हूँ ।
अर्चन अभिनन्दन करता हूँ ।।
क्षय होवें दुख संकट सारे ।
क्षय हो जावें कर्म हमारे ।।२१।।

मुझे लाभ रत्नत्रय होवे ।
सुगति गमन, भय-सप्तक खोवे ।।
पाऊँ मरण-समाधी स्वामी ।
बनूँ रतन जिन-गुण आसामी ।।२२।।
‘पुष्पाञ्जलिं क्षिपेत्’
( यहाँ पर नौ बार णमोकार मंत्र
पढ़ना चाहिए )

विसर्जन पाठ
अञ्जन को पार किया ।
चन्दन को तार दिया ।।
नहिं तोर दया का पार ।
नागों का हार किया ।।१।।

धूली-चन्दन-बावन ।
की शूली सिंहासन ।।
धरणेन्द्र देवी-पद्मा ।
मामूली अहि-नागिन ।।२।।

अगनी ‘सर’ नीर किया ।
भगिनी ‘सर’ चीर किया ।।
नहिं तोर दया का पार ।
केशर महावीर किया ।।३।।

बन पड़ीं भूल से भूल ।
कृपया कर दो निर्मूल ।।
बिन कारण तारण हार ।
नहिं तोर दया का पार ।।४।।
दोहा
बस आता, अब धारता,
ईश आशिका सीस ।
कृपा निराकुल आपकी,
बनी रहे निशि-दीस ।।
(पुष्पांजलि क्षिपामि)

आरती
जय पारस, जय पारस बोलो ।
बनता साध मौन जब खोलो ।।

माँ वामा के राज दुलारे ।
अश्वसेन कुल नभ ध्रुवतारे ।।
जन्मे काशी नाम नगरिया ।
बढ़ घी-मिसरी बोल मुरलिया ।।
पुण्य अपूर्व सातिशय बो लो ।
बनता साध मौन जब खोलो ।
जय पारस, जय पारस बोलो ।।१।।

राग रंग सर चढ़ ना पाया ।
बाल उमर वैराग्य समाया ।।
वस्त्र उतारे, केश उखारे ।
चार ज्ञान धर, तारणहारे ! ।।
हर्ष अश्रु से नयन भिंजो लो ।
बनता साध मौन जब खोलो ।
जय पारस, जय पारस बोलो ।।२।।

सार्थक नाम सम-शरण लागा ।
दृग्-नम मृग, सिंह, मेंढ़क, नागा ।।
घात अघात ब्याह शिव राधा ।
हित सुख ‘निराकुलम्’ आराधा ।।
सम दृग्, ज्ञान, चरित मण गो लो ।
बनता साध मौन जब खोलो ।
जय पारस, जय पारस बोलो ।।३।।

 

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