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चौबीस तीर्थंकर विधान  ·  तीर्थक्षेत्र पूजन

ऊन के चमत्कारी महावीर स्वामी का पूजन विधान

By मुनि श्री निराकुल सागर जी महाराज 

 

ऊन के चमत्कारी महावीर
स्वामी का पूजन
भूगरभ अवतार लीना ।
धन्य ! ऊन निमाड़ कीना ।।
तीर पहुँचे लगा तीरा ।
महा-वीरा महा-वीरा ।।
हृदय मन्दिर पड़ा सूना ।
आ विराजो देव ऊना ।।
अब न रखते बने धीरा ।
महा-वीरा महा-वीरा ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री महा-वीर जिनेन्द्र !
अत्र अवतर अवतर संवौषट्
(इति आह्वानन)
अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ:
(इति स्थापनम्)
अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट्
(इति सन्निधिकरणम्) ।

दूर गाथा नाम काफी ।
ग्रीष्म भरता पथिक हॉंपी ।।
तृप्ति-कर सरिता समीरा ।
महा-वीरा महा-वीरा ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री महा-वीर जिनेन्द्राय नमः
जलं निर्वपामीति स्वाहा ।।

साध रिसते स्वार्थ रिश्ते ।
आप चन्दन भॉंत घिसते ।।
महक देते गुण गभीरा ।
महा-वीरा महा-वीरा ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री महा-वीर जिनेन्द्राय नमः
चंदनं निर्वपामीति स्वाहा ।।

मोक्ष से कब लौटना है ।
आप में अब खोट ना है ।।
उड़ाते सुर-गण अबीरा ।
महा-वीरा महा-वीरा ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री महा-वीर जिनेन्द्राय नमः
अक्षतान् निर्वपामीति स्वाहा ।।

आप परिणति सुकोमल गुल ।
हो निराकुल मिला के कुल ।।
दृग सजल लख और पीड़ा ।
महा-वीरा महा-वीरा ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री महा-वीर जिनेन्द्राय नमः
पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा ।।

मिलन आटा, घिरत, बूरा ।
कीमती अरमान पूरा ।।
नीर हूँ, लो बना क्षीरा ।
महा-वीरा महा-वीरा ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री महा-वीर जिनेन्द्राय नमः
नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

स्वयं को तिल-तिल जलाता ।
दीप अंधियारा मिटाता ।।
सलज, दृग भर सकूॅं नीरा ।
महा-वीरा महा-वीरा ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री महा-वीर जिनेन्द्राय नमः
दीपं निर्वपामीति स्वाहा ।।

धूप ने बढ़ महक छोड़ी ।
हवा ने दिश्-विदिश् जोड़ी ।।
कोयला ही काल हीरा ।
महा-वीरा महा-वीरा ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री महा-वीर जिनेन्द्राय नमः
धूपं निर्वपामीति स्वाहा ।।

समय रहते गिरि गिरा ली ।
नारियल हट पॉंत पा ली ।।
यूॅं न द्रोपदि बढ़ा चीरा ।
महा-वीरा महा-वीरा ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री महा-वीर जिनेन्द्राय नमः
फलं निर्वपामीति स्वाहा ।।

अछत चन्दन, पुष्प, नन्दन ।
धूप, व्यंजन, दीप, जल-कण ।।
भेंट फल सु-मरण अखीरा ।
महा-वीरा महा-वीरा ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री महा-वीर जिनेन्द्राय नमः
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

कल्याण अर्घ्य

छ: महिने अभी गर्भ आने ।
सुर रत्न लगे नभ बरसाने ।।
सूनी सूनी सी स्वर्ग धरा ।
लग रही सुहानी वसुन्धरा ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
आषाढ़-शुक्ल-षष्ठ्यां
गर्भ कल्याणक प्राप्ताय
श्री महा-वीर जिनेन्द्राय नमः
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

प्रभु जन्मे सिंहासन काँपा ।।
सुरपति पथ मर्त्य भूमि नापा ।।
अभिषेक मेरु पर्वत कीना ।
श्रद्धा जिसकी समकित चीना ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
चैत्र-शुक्ल-त्रयोदश्यां
जन्म कल्याणक प्राप्ताय
श्री महा-वीर जिनेन्द्राय नमः
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

चित्-चिदानन्द चिन्तन डूबा ।
भव, भोग, शरीरन मन ऊबा ।
तज राज-पाट पहुँचे वन में ।
तन नगन निरत कच-लुंचन में ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
मार्ग-शीर्ष-कृष्ण-दशम्यां
दीक्षा कल्याणक प्राप्ताय
श्री महा-वीर जिनेन्द्राय नमः
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

चउ कर्म घातिया विघटाये ।
चउ नन्त चतुष्टय प्रकटाये ।।
सम-शरण भेक-अहि, सिंह-हिरणा ।
बैठे तज जात-वैर अपना ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
वैशाख-शुक्ल-दशम्यां
ज्ञान कल्याणक प्राप्ताय
श्री महा-वीर जिनेन्द्राय नमः
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

ध्यानानल शुक्ल जलाई अब ।
अवशेष कर्म भू-साई सब ।।
इक समय मात्र शिव पहुँचे जा ।
मैंने नित नमन तिन्हें भेजा ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
कार्तिक-कृष्ण-अमावस्यां
मोक्ष कल्याणक प्राप्ताय
श्री महा-वीर जिनेन्द्राय नमः
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

दोहा
शिशु हित दिल मॉं रख रहे,
वीर निमाड़ी ऊन ।
यूँ ही न बाबा बज रहे,
मनो-कामना पून ।।

जयमाला
आने में सुर-पुर से देरी ।
झर झर नभ रतन लगी ढ़ेरी ।।
अवतरे स्वपन दिखला-कर जो ।
प्रभु-वीर भजो, प्रभु-वीर भजो ।
रॅंग भक्ति सजो, प्रभु-वीर भजो ।।१।।

सौ-धरम मेरु गिर ले आया ।
जल क्षीर नवाया, हरषाया ।।
जनमत वधि-ज्ञान दिवाकर जो ।
प्रभु-वीर भजो, प्रभु-वीर भजो ।
रॅंग भक्ति सजो, प्रभु-वीर भजो ।।२।।

जौवन जा वन आश्रय लीना ।
पट मुंचन, लट लुंचन कीना ।।
बैठे प्रण मौन उठा कर जो ।
प्रभु-वीर भजो, प्रभु-वीर भजो ।
रॅंग भक्ति सजो, प्रभु-वीर भजो ।।३।।

सुख वीर्य अनन्त हुआ पाना ।
पाया अनन्त दर्शन ज्ञाना ।।
वसु प्रातिहार्य एक धारक जो ।
प्रभु-वीर भजो, प्रभु-वीर भजो ।
रॅंग भक्ति सजो, प्रभु-वीर भजो ।।४।।

धन ! समशरणा सींहा, हिरणा ।
रग दुग्ध बहा चीना करुणा ।।
धुन दिव्य सार्थ उपकारक जो ।
प्रभु-वीर भजो, प्रभु-वीर भजो ।
रॅंग भक्ति सजो, प्रभु-वीर भजो ।।५।।

ध्यानानल परम शुक्ल साधा ।
थिर देव निजात्म आराधा ।।
सुध सुवर्ण किट्ट जला कर जो ।
प्रभु-वीर भजो, प्रभु-वीर भजो ।
रॅंग भक्ति सजो, प्रभु-वीर भजो ।।६।।

बस लगा समय जा शिव ठहरे ।
सुख सहज निराकुल अब लहरे ।।
अवतार न लें पुनि आकर जो ।
प्रभु-वीर भजो, प्रभु-वीर भजो ।
रॅंग भक्ति सजो, प्रभु-वीर भजो ।।७।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री महा-वीर जिनेन्द्राय नमः
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

।। दोहा ।।
चेहरा पढ़ना जानते,
बाबा माँ के भाँत ।
मनमाना रखते रहें,
ला-ला लाला-हाथ ।।
।। पुष्पांजलि क्षिपामि ।।

विधान प्रारंभ

अष्ट दलकमल पूजा
विधान की जय

करुँ ह्रदय से आह्वानन मैं ।
आओ चाँद-मिरे आंगन में ।।
बजे रागनी उसके आंगन ।
सजे चाँदनी उसके आंगन ।।
मेरा आँगन सूना-सूना ।
आ, कर-देते पूनो क्यूँ ना ।।१।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो जिणाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री महा-वीर जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

राज पाट मन लुभा न पाया ।
भेष दिगम्बर लुञ्चन भाया ।।
परिषह शीत, उष्ण, जल-धार ।
जय-जय-कार, जय-जय-कार ।।२।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो ओहि जिणाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री महा-वीर जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

कर्म घातिया ध्यान अगन में ।
विहँसाये आनन-फानन में ।।
गंध-कुटी धुनि तारण हार ।
जय-जय-कार, जय-जय-कार ।।३।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो परमोहि जिणाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री महा-वीर जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

समय एक शिव-नगर पधारे ।
फूटे सौख्य-अबाध फबारे ।।
आखिर गया भ्रमण-भव-हार ।
जय-जय-कार, जय-जय-कार ।।४।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो सव्वोहि जिणाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री महा-वीर जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

विषय भोग विष से लागे ।
और न अलसाये, जागे ।।
जा वन वस्त्र उतार दिये ।
तत्क्षण केश उखाड़ लिये ।।५।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो अणंतोहि जिणाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री महा-वीर जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

नन्त चतुष्टय आ रीझा ।
हृदय ज्ञान केवल भींजा ।।
मोर वहीं अहि, सिंह, हिरणा ।
पाई जन-जन सम-शरणा ।।६।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो कोट्ठ-बुद्धीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री महा-वीर जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

शुक्ल ध्यान अगनी जारी ।
जले कर्म बारी-बारी ।।
समय मात्र लागा भाई ।
लगी हाथ शिव ठकुराई ।।७।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो बीय-बुद्धीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री महा-वीर जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

राज-पाट तृण-जीरण छोड़ा ।
मुख अपना वन तरफी मोड़ा ।।
आके वस्त्र उतारे वन में ।
सारे केश उखाड़े छिन में ।।८।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो पदाणु-सारीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री महा-वीर जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

जल, मनहारी चन्दन झारी ।
अक्षत शाली, नन्दन क्यारी ।।
स्वीकारो, मम आराध्य-देव,
चरु, दीप, धूप, श्री-फल थाली ।।01।।
ॐ ह्रां ह्रीं ह्रूं ह्रौं ह्र:
अ-सि-आ-उ-सा नमः
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
अष्टदल कमल हृदयस्-थिताय
श्री महा-वीर जिनेन्द्राय
पूर्णार्घं निर्वपामीति स्वाहा ।।

षोडश दलकमल पूजा
विधान की जय

घात घात पाया समशरणा ।
बैठा सिंह करीब ही हिरणा ।।
प्रातिहार्य आठों मनहारी ।
प्रभु चन्द्रा, चातक नर नारी ।।९।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो सं-भिण्ण-सोदा-राणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री महा-वीर जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

ह्रश्व पाँच आखर पढ़ पाते ।
गुणस्थान ऊपर उठ जाते ।।
घात अघात समय इक लागा ।
निज घर लगे, भाग शिव जागा ।।१०।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो सयं-बुद्धाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री महा-वीर जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

विष विषय न डाल सके डोरे ।
काजर कोठरि निकले कोरे ।।
वन आये, वस्त्र उतार लिये ।
घुँघराले केश उखाड़ दिये ।।११।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो पत्तेय-बुद्धाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री महा-वीर जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

कृत कर्म-पूर्व अपने लेखे ।
अरि सुर संगम घुटने टेके ।।
सम शरण मोर-अहि, सिंह-हिरणा ।
धुनि-दिव्य भव्य तारण-तरणा ।।१२।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो बोहिय-बुद्धाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री महा-वीर जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

ध्यानाग्नि शुक्ल फिर प्रकटाई ।
इक एक कर्म ला विघटाई ।।
यूॅं बन्धन काम तमाम हुआ ।
जा समय मात्र शिव धाम छुआ ।।१३।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो उजु-मदीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री महा-वीर जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

बैठे रहे न भाग भरोसे ।
शीघ्र छके विष-से विषयों से ।।
अम्बर, आडम्बर तज दीना ।
आ वन में कच लुंचन कीना ।।१४।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो विउल-मदीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री महा-वीर जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

कर्म घाति जैसे ही विघटे ।
सहसा नन्त चतुष्टय प्रकटे ।।
नामनुरूप लगा सम-शरणा ।
वैर छोड़ बैठे सिंह हिरणा ।।१५।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो दस-पुव्वीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री महा-वीर जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

समोशरण से बाहर आये ।
ध्यान अगन में कर्म जलाये ।।
अश्रु विमुक्ति राधिका पोंछे ।
समय मात्र में शिव जा पहुँचे ।।१६।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो चउ-दस-पुव्वीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री महा-वीर जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

भला सभी का करने वाले ।
हरने वाले दिल के छाले ।।
नयनन नीर समन्दर झलका ।
सुन दुखड़ा, कर दें मन हल्का ।।१७।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो अट्ठंग-महा-णिमित्त कु-सलाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री महा-वीर जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

मुद्रा दैगम्बर अविकारी ।
मूरतिया अतिशय मनहारी ।।
लगे देख तेजस्वी माथा ।
जुड़ा दूसरे सूरज नाता ।।१८।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो वि-उव्वण-इड्ढि-पत्ताणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री महा-वीर जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

मुखड़ा मात चाँद को देता ।
आके तभी नखों में बैठा ।।
काँधे तलक झूलने वालीं ।
कालीं कालीं लट घुँघरालीं ।।१९।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो विज्जा-हराणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री महा-वीर जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

देख पीर-पर सीलीं सीलीं ।
झील सरीखीं, आँखें नीलीं ।।
देख आप नासा क्या आया ।
चम्पक नाम पुष्प शरमाया ।।२०।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो चा-रणाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री महा-वीर जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

सुर-नर-नाग न अन्य किसी के ।
ऐसे होंठ बिम्ब फल फीके ।।
आ काँधों तक नर्तन करते ।
कर्ण लोल तब कुछ हट फबते ।।२१।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो पण्ण-समणाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री महा-वीर जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

ग्रीवा शंखावर्तों वाली ।
चित्त चुराये चिबुक निराली ।।
ककुद भाँत काँधे उतुंग हैं ।
आप सरीखे अंग अंग हैं ।।२२।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो आयास-गामीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री महा-वीर जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

भाग अशोक वृक्ष के जागे ।
पाँव थमे प्रभु बढ़े न आगे ।।
नाव लगाव न सिंहासन से ।
अधर विराजे पद्मासन से ।।२३।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो आसी-विसाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री महा-वीर जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

भले प्रताप, न आतप थोड़ा ।
भा-मण्डल शशि दूजा जोड़ा ।।
ढुरते चौंषठ चॅंवर न कमती ।
झालर छतर मोति अनगिनती ।।२४।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो दिट्ठि-वि-साणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री महा-वीर जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

जल, मनहारी चन्दन झारी ।
अक्षत शाली, नन्दन क्यारी ।।
स्वीकारो, मम आराध्य-देव,
चरु, दीप, धूप, श्री-फल थाली ।।02।।
ॐ क्षां क्षीं क्षूं क्षें क्षैं क्षों क्षौं क्षं क्षः
नमोर्-ऽहते सर्वं रक्ष रक्ष हूं फट् नमः
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
षोडशदल-कमल हृदयस्-थिताय
श्री महा-वीर जिनेन्द्राय
पूर्णार्घं निर्वपामीति स्वाहा ।।

चतुर्विंशतिदल कमल पूजा
विधान की जय
उतरा जमीं सम-शरण लागे ।
कर दर्शन मिथ्यातम भागे ।।
दी प्रदक्षिणा तीन जिन्होंने ।
फेरे किये विलीन उन्होंने ।।२५।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो उग्ग-तवाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री महा-वीर जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

जिनने आके छतर चढ़ाया ।
ऊपर अपने छतर लगाया ।।
चँवर ढुराये जिनने आके ।
लीन निजात्म अमर पद पाके ।।२६।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो दित्त-तवाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री महा-वीर जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

आ सुबहो जो ढ़ारे कलशा ।
उत्सव रोज मनाये जलसा ।।
दृग् ललाट गंधोदक धारे ।
जनम, जरा, यम रोग निवारे ।।२७।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो तत्त-तवाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री महा-वीर जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

पूजन अष्ट द्रव्य से करता ।
सहसा अष्ट कर्म अपहरता ।।
करे आरती दिया सजा के ।
विघटे दुख-आरत झट ताके ।।२८।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो महा-तवाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री महा-वीर जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

मंगल अष्ट द्रव्य जो भेंटे ।
कष्ट अमंगल अरिष्ट मेंटे ।।
बाबा बड़े दयाल सुना है ।
निहाल, जिसने उन्हें चुना है ।।२९।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो घोर-तवाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री महा-वीर जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

श्रीफल पास न चावल पीले ।
जुड़े-हाथ, नत, नैन पनीले ।।
जो कुछ यही इसे स्वीकारो ।
और शीघ्र मम हृदय पधारो ।।३०।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो घोर गुण-परक्-कमाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री महा-वीर जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

हाथ सुमरनी लेता जो ।
करनी भरनी देता खो ।।
दी प्रदक्षिणा तीन सिरफ ।
महकी खुशबू चार तरफ ।।३१।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो घोर-गुणाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री महा-वीर जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

की आरतियाँ भावों से ।
जीवन रिक्त अभावों से ।।
दर्श एक बस क्या पाता ।
सम्यक् दर्श जुड़े नाता ।।३२।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो ऽघोर-गुण-बंभ-यारीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री महा-वीर जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

चँवर ढुराये गर साथी ! ।
काली नजर उतर जाती ।।
छतर चढ़ा क्या बस आया ।
बदली करे घाम छाया ।।३३।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो आमो-सहि-पत्ताणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री महा-वीर जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

गंधोदक सर-पर धारा ।
रोग-शोक परिकर हारा ।।
शीश, सिंहासन पधराता ।
लगता ताँता सुख साता ।।३४।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो खेल्लो-सहि-पत्ताणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री महा-वीर जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

मंगल द्रव्य रखे आके ।
स्वप्न न दालद्दर झाँके ।।
दीप रखा क्या आगे है ।
साढ़े-साती भागे है ।।३५।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो जल्लो-सहि-पत्ताणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री महा-वीर जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

आता चढ़ा चँदोबा जो ।
देश विदेश घरोबा हो ।।
किया नाद घण्टा आकर ।
जिया याद ढ़ाई आखर ।।३६।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो विट्ठो-सहि-पत्ताणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री महा-वीर जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

पद-रज छुई ‘कि छू मन्तर ।
मंत्र, मूठ, जादू-मन्तर ।।
लगा गुहार हृदय सच्चे ।
रोजगार लगते बच्चे ।।३७।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो सव्वो-सहि-पत्ताणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री महा-वीर जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

रखते ही चरणों में पगड़ी ।
रहती बने बग़ैर न बिगड़ी ।।
दी प्रदक्षिणा रख विश्वासा ।
अग्नि परीक्षा भी हो आसाँ ।।३८।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो मण-बलीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री महा-वीर जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

मत्था श्रद्धा से टेका है ।
सूनी गोद भरी देखा है ।।
की पूजा अक्षत ला धो-के ।
पीले हुए हाथ लाड़ो के ।।३९।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो वचि-बलीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री महा-वीर जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

आंख देख माँ सके न रोती ।
मनो-कामना पूरण होती ।।
साढ़े-साती खाती गोटे ।
माया मिले उतार मुखोटे ।।४०।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो काय-बलीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री महा-वीर जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

कृपा बरस क्या बाबा जाये ।
रंग जिंदगी तितली पाये ।।
होता अशर्फिंयों से नाता ।
नाम सुर्खिंयों में छा जाता ।।४१।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो खीर-सवीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री महा-वीर जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

जान जिन्दगी जल बुद्-बुद सी ।
ली खुद-ही दीक्षा अद्‌भुत सी ।।
विजय सभी कर्मों पर पाई ।
मुक्ति-प्रिया प्रभु ने परिणाई ।।४२।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो सप्पि-सवीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री महा-वीर जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

रतन चार-दश, नव निधि छोड़ी ।
प्रीत शिखर-गिरि-कन्दर जोड़ी ।।
ध्यानानल-सब कर्म जला-के ।
हुये निवासी सिद्ध शिक्षा के ।।४३।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो महुर-सवीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री महा-वीर जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

अति-वीर, वीर ।
जय महावीर ।।
सन्मत-विधान ।
जय वर्ध-मान ।।४४।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो अमइ-सवीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री महा-वीर जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

शासन नायक वर्तमाँ,
हाथ अहिंसा ड़ोर ।
वर्धमान भगवान् वे,
तिन्हें नमन ‘कर’-जोड़ ।।४५।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो अक्खीण-महा-णसाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री महा-वीर जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

कृपया मुझे बना लो अपना ।
कोई और न मेरा सपना ।।
बिन तेरे और न शरण मुझे ।
बस लाज रखना नाथ तुझे ।।४६।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो वड्ढमाण-बुद्धि-रिसस्स
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री महा-वीर जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

कभी खबरिया ले लो म्हारी ।
बीती जाय उमरिया सारी ।।
बिन तेरे और न शरण मुझे ।
बस लाज रखना नाथ तुझे ।।४७।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो सव्व-सिद्धा-यद-णाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री महा-वीर जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

हुआ खूब वन निर्जन रोना ।
पास चरण इक दे दो कोना ।।
बिन तेरे और न शरण मुझे ।
बस लाज रखना नाथ तुझे ।।४८।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो भयवदो महदि
महावीर वड्ढमाण बुद्धिरिसीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री महा-वीर जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

पूर्णार्घ
जल, मनहारी चन्दन झारी ।
अक्षत शाली, नन्दन क्यारी ।।
स्वीकारो, मम आराध्य-देव,
चरु, दीप, धूप, श्री-फल थाली ।।03।।
श्री वृषभादि वर्धमान पर्यंत
परम-देव भगवन् तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
चतुर्विंशति दल कमल
हृदयस्-थिताय
श्री महा-वीर जिनेन्द्राय
पूर्णार्घं निर्वपामीति स्वाहा ।।

महा-अर्घं
प्रासुक जल, घिस बावन चंदन ।
अक्षत अछत, पुष्प वन-नंदन ।।
पकवां घृत-अठपहरी दीवा ।
धूप-नूप फल मधुर अतीवा ।।
मिला सभी को द्रव्य बनाया ।
सदा बनी यूॅं रहे ‘कि छाया ।।
मंसा-पूरण ! आप चरण में ।
भेंटूँ, ले लो मुझे शरण में ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
नव देव भगवन् तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
अष्ट-चत्वारिंशद्-दलकमल
हृदयस्-थिताय
श्री महा-वीर जिनेन्द्राय नमः
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

:: जाप्य ::
।। ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री महावीर तीर्थंकराय नमः ।।

जयमाला
दोहा
और कौन मेरा यहाँ,
दूँ दस्तक जिस द्वार ।
माॅंझी नौका पार-तू
पाल तुहीं पतवार ।।

नहीं विश्वास अकेला है ।
मुझे भरोसा पूरा है ।।
तुम रहते हो मेरे साथ,
ले हाथों में मेरा हाथ ।।

सूरज नहिं आने पाता,
मुझे जगाने आ जाता ।।
सत् संगत साबुन से तूँ,
रोज मुझे नहला जाता ।।

लाजो-हया आँज काजल,
देता मुझे दिठौना है ।।
दिखा आइना, करे मुझे,
सुन्दर और सलोना है ।।

ज्ञान रूप-अमृत पल पल,
अंजुली कर्ण पिलाता है ।
सब्र खिलाये, पर न कभी,
चुगली मुझे खिलाता है ।।

खेल खिलाये मुझे न कम,
जीत दिलाये हार स्वयम् ।
देख मुझे जख्मी तू चीखे,
करता अपनी आँखे नम ।।

पढ़ा मुझे कक्षा दूजी,
दृग् मेरी खोली तीजी ।
कारण तुम परिणति मेरी,
रहे सहजता रस भींजी ।।

चाँद-सितारे बीच मुझे,
दे थपकिंयाँ सुलाता है ।
सोये गई रात आधी,
रही जाग तू जाता है ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री महा-वीर जिनेन्द्राय नमः
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

दोहा
रग रग है निवासी दया,
छुपी न जग से बात ।
भजत भजत भवि भक्त के,
लगता सब कुछ हाथ ।।
।। पुष्पांजलि क्षिपामि ।।

श्री सरसुति-मंत्र*
ॐ ह्रीम्
अर्हन् मुख कमल-वासिनि
पा-पात्म क्षयंकरि
श्रुत-ज्ञान
ज्वाला सहस्र प्रज्ज्वलिते
सरस्वति !
मत् पापम् हन हन दह दह
क्षाम् क्षीम् क्षूम् क्षौम् क्षः
क्षीरवर-धवले
अ-मृत संभवे
वम् वम् हूम् फट् स्वाहा
मम सन्-निधि-करणे
मम सन्-निधि-करणे
मम सन्-निधि-करणे ।
ॐ ह्रीं जिन मुखोद्-भूत्यै
श्री सरस्वति-देव्यै
अर्घं निर्वपामीति स्वाहा

शांति पाठ
अथ पौर्वाह-निक (अप-राह-निक)
देव-शास्त्र-गुरु-वन्दना-क्रियायाम्
पूर्वाचार्या-नुक्-क्रमेण,
सकल-कर्मक्-क्षयार्-थम्,
भाव-पूजा-वन्दना-स्तव समेतम्
श्री शांति-भक्ति कायोत्सर्गम् करोम्यहम्
(९ बार णमोकार )

*चौपाई*
दर्शन मात्र मेंटता दुखड़ा ।
भाँत चन्द्रमा सुन्दर मुखड़ा ।।
नासा टिके नैन मनहारी ।
करें वन्दना नाथ ! तुम्हारी ।।१।।

आप चक्रधर-पञ्चम नामी ।
वन्द्य इन्द्र शत, अन्तर्-यामी ।।
प्रभो शान्ति-जिन करके करुणा ।
करो शान्ति ! जश निरखो अपना ।।२।।

छत्र, सिंहासन, वृक्ष-अशोका ।
धुनि, दुन्दुभि, दल-चँवर अनोखा ।।
भा-मण्डल झिर-पुष्प-अनूठी ।
प्रातिहार्य-वसु आप विभूती ।।३।।

अर्चित-जगत् ! शान्ति करतारी ।
ढ़ोक करो स्वीकार हमारी ।।
प्राण-भूत, सत्, जीव समस्ता ।
पायें परिणति शान्त प्रशस्ता ।।४।।

देवों में जो देव बड़े हैं ।
चरणों में हित सेव खड़े हैं ।।
हंस-वंश वे जग उजियारे ।
करें शान्ति मण्डित जग सारे ।।५।।
(निम्न श्लोक को पढ़कर
जल छोड़ना चाहिए)

शान्ति कीजिये गाँव-गाँव में ।
विश्व लीजिये पाँव-छाँव में ।।
डूब ‘साध-जन’ उतरें गहरे ।
लहर लहर-पचरंगा लहरे ।।६।।

नृप धार्मिक बलशाली होवे ।
विकृत-प्रकृत मनमानी खोवे ।।
धर्म-चक्र-जिन सौख्य प्रदाता ।
रहे प्रवाहित यूँ हि विधाता ।।७।।

द्रव्य सुमंगल-कारी होवे ।
क्षेत्र अमंगल-हारी होवे ।।
होवे काल सुमंगल-कारी ।
होवें भाव अमंगल-हारी ।।८।।

कर्मन-घात घात मद सारा ।
सहजो सिद्ध रिद्ध परिवारा ।।
आदि आदि अर्हन् चौबीसा ।
शान्ति प्रदान करें निशि दीसा ।।९।।

*दोहा*
किया शान्ति जिन भक्ति का,
भगवन् कायोत्सर्ग ।।
करूँ दोष आलोचना,
जो प्रद-स्वर्ग-पवर्ग ।।१०।।

*चौपाई*
पाँच सभी कल्याणक धारी ।
आठ प्राति-हारज मन-हारी ।।
अतिशय तीस चार मण्डित हैं ।
अर बत्तीस इन्द्र वन्दित हैं ।।११।।

चौ-विध संघ नखत मानिन्दा ।
राम श्याम चक्री, प्रभु ! चन्दा ।।
‘निलय-विनय’ अन-गिनत गभीरा ।
आद-आद जिन अंतिम वीरा ।।१२।।

अर्चन-पूजन-वन्दन करता ।
उनका मैं अभिनन्दन करता ।।
पीड़ा-दुक्ख-दरद-भय खोवे ।
मेरे कर्मों का क्षय होवे ।।१३।।

रत्नत्रय का मुझे लाभ हो ।
मेरी ‘गति-पंचम-उपाध’ हो ।।
मृत्यु-महोत्सव मना सकूँ मैं ।
जिन-गुण-सम्पद् कमा सकूँ मैं ।।१४।।
अथ पौर्वाह-निक (अप-राह-निक)
देव-शास्त्र-गुरु-वन्दना-क्रियायाम्
पूर्वाचार्या-नुक्-क्रमेण,
सकल-कर्मक्-क्षयार्-थम्,
भाव-पूजा-वन्दना-स्तव समेतम्
श्री समाधि-भक्ति कायोत्सर्गम्
करोम्यहम्
(९बार णमोकार )

*चौपाई*
सदा शास्त्र अभ्यास करूँ मैं ।
सन्त समीप निवास करूँ मैं ।।
मौन धरूँ क्यूँ, गुणी दिखाये ।
गौण करूँ, यूँ दोष-पराये ।।१५।।

भावन-आत्म तत्व, नम-नयना ।
हित-मित रखूँ मधुरतम वयना ।।
जब तक राधा-मुक्ति रिझाऊँ ।
इन्हें जन्म जन्मान्तर पाऊँ ।।१६।।

तारण हारे…शरण सहारे ।
हृदय हमारे…चरण तुम्हारे ।।
चरण तुम्हारे…हृदय हमारा ।
रहे, तलक जब भव-जल-धारा ।।१७।।

स्वर-अक्षर पद मात्रा गलती ।
हुईं, चाहते बिन अनगिनती ।।
हो अपराध क्षमा यह मेरा ।
‘जैसा भी’ मैं अपना तेरा ।।१८।।

*दोहा*
किया समाधी, भक्ति का,
भगवन् कायोत्सर्ग ।।
करूँ दोष आलोचना,
जो प्रद-स्वर्ग-पवर्ग ।।१९।।

*चौपाई*
सम्यक्-दर्शन, सम्यक्-ज्ञाना ।
सम्यक्-चारित, ताना-बाना ।।
रूप अनूप ध्यान परमातम ।
बुद्ध-विशुद्ध ज्ञान धर आतम ।।२०।।

पूजन नित वन्दन करता हूँ ।
अर्चन अभिनन्दन करता हूँ ।।
क्षय होवें दुख संकट सारे ।
क्षय हो जावें कर्म हमारे ।।२१।।

मुझे लाभ रत्नत्रय होवे ।
सुगति गमन, भय-सप्तक खोवे ।।
पाऊँ मरण-समाधी स्वामी ।
बनूँ रतन जिन-गुण आसामी ।।२२।।
‘पुष्पाञ्जलिं क्षिपेत्’
( यहाँ पर नौ बार णमोकार मंत्र
पढ़ना चाहिए )

विसर्जन पाठ
अञ्जन को पार किया ।
चन्दन को तार दिया ।।
नहिं तोर दया का पार ।
नागों का हार किया ।।१।।

धूली-चन्दन-बावन ।
की शूली सिंहासन ।।
धरणेन्द्र देवी-पद्मा ।
मामूली अहि-नागिन ।।२।।

अगनी ‘सर’ नीर किया ।
भगिनी ‘सर’ चीर किया ।।
नहिं तोर दया का पार ।
केशर महावीर किया ।।३।।

बन पड़ीं भूल से भूल ।
कृपया कर दो निर्मूल ।।
बिन कारण तारण हार ।
नहिं तोर दया का पार ।।४।।
दोहा
बस आता, अब धारता,
ईश आशिका सीस ।
कृपा निराकुल आपकी,
बनी रहे निशि-दीस ।।
(पुष्पांजलि क्षिपामि)

आरती
आरती उतारूँ पहली, गर्भ कल्याण की ।
रत्न बरसात देव, देवि-साथ आन की ।।
दिये लिये आरती उतारता हूँ मैं ।
टकटकी लगा तुम्हें निहारता हूँ मैं ।।

आरती उतारूॅं दूजी, जन्म कल्याण की ।
निरत अभिषेक इन्द्र, प्रीत तज विमान की ।
दिये लिये आरती उतारता हूँ मैं ।
टकटकी लगा तुम्हें निहारता हूँ मैं ।।

आरती उतारूॅं तीजी, तप कल्याण की ।
स्वयं चीर चीर राह, ली विपिन प्रयाण की ।।
दिये लिये आरती उतारता हूँ मैं ।
टकटकी लगा तुम्हें निहारता हूँ मैं ।।

आरती उताऊँ चौथी, ज्ञान कल्याण की ।
प्राणी मात्र के लिये, समशरण प्रदान की ।।
दिये लिये आरती उतारता हूँ मैं ।
टकटकी लगा तुम्हें निहारता हूँ मैं ।।

आरती उतारूँ और, मोक्ष कल्याण की ।
समय मात्र पाई, ठकुराई मोक्ष थान की ।।
दिये लिये आरती उतारता हूँ मैं ।
टकटकी लगा तुम्हें निहारता हूँ मैं ।।

 

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