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चौबीस तीर्थंकर विधान  ·  तीर्थक्षेत्र पूजन

विद्-वास के -चन्द्र-प्रभु भगवान् की पूजन

By मुनि श्री निराकुल सागर जी महाराज 

 

विद्-वास के
चन्द्र-प्रभु भगवान् की पूजन
प्रथम विश्वासा ।
आखरी आशा ।
सेवक रहूँगा तब तक,
जब तक टिकेगी श्वासा ।
चन्दा बाबा विद्-वासा ।।
रखना चरणों में दासा ।
और न इतनी अरदासा ।।
है मुझे पूरा भरोसा,
पूरी होगी अभिलाषा ।
चन्दा बाबा विद्-वासा ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्र !
अत्र अवतर अवतर संवौषट्
(इति आह्वानन)
अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ:
(इति स्थापनम्)
अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट्
(इति सन्निधिकरणम्) ।

आराध्य देवा ।
करें सुर सेवा ।
सेवक रहूॅंगा तब तक,
जब तक बहेगी रेवा ।
जब तक टिकेगी श्वासा ।
प्रथम विश्वासा ।
आखरी आशा ।
चन्दा बाबा विद्-वासा ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय नमः
जलं निर्वपामीति स्वाहा ।।

जल भिन्न नीरज ।
आदर्श धीरज ।।
सेवक रहूॅंगा तब तक,
जब तक उगेगा सूरज ।।
जब तक टिकेगी श्वासा ।
प्रथम विश्वासा ।
आखरी आशा ।
चन्दा बाबा विद्-वासा ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय नमः
चंदनं निर्वपामीति स्वाहा ।।

दया परिपाटी ।
फेंक दी लाठी ।
सेवक रहूॅंगा तब तक,
जब तक सहेगी माटी ।।
जब तक टिकेगी श्वासा ।
प्रथम विश्वासा ।
आखरी आशा ।
चन्दा बाबा विद्-वासा ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय नमः
अक्षतं निर्वपामीति स्वाहा ।।

जल ही रवानी ।
किमिच्छिक दानी ।
सेवक रहूॅंगा तब तक,
जब तक झिरेगा पानी ।।
जब तक टिकेगी श्वासा ।
प्रथम विश्वासा ।
आखरी आशा ।
चन्दा बाबा विद्-वासा ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय नमः
पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा ।।

अभिजेय अक्षा ! ।
दूसरी कक्षा ।
सेवक रहूॅंगा तब तक,
जब तक फलेंगे वृक्षा ।।
जब तक टिकेगी श्वासा ।
प्रथम विश्वासा ।
आखरी आशा ।
चन्दा बाबा विद्-वासा ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय नमः
नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

अनक्षर मेधा ।
अखर संवेगा ।।
सेवक रहूॅंगा तब तक,
जब तक बजेंगे मेघा ।।
जब तक टिकेगी श्वासा ।
प्रथम विश्वासा ।
आखरी आशा ।
चन्दा बाबा विद्-वासा ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय नमः
दीपं निर्वपामीति स्वाहा ।।

राग न सोना ।
जाग न खोना ।।
सेवक रहूॅंगा तब तक,
जब तक चलेगी पौना ।।
जब तक टिकेगी श्वासा ।
प्रथम विश्वासा ।
आखरी आशा ।
चन्दा बाबा विद्-वासा ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय नमः
धूपं निर्वपामीति स्वाहा ।।

मुक्ति वधु कंता ।
सिद्ध अरिहंता ।।
सेवक रहूॅंगा तब तक,
जब तक जगेगा चन्दा ।।
जब तक टिकेगी श्वासा ।
प्रथम विश्वासा ।
आखरी आशा ।
चन्दा बाबा विद्-वासा ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय नमः
फलं निर्वपामीति स्वाहा ।।

दीप, चरु, जल, धूप, गुल, फल, गन्ध, अक्षत ।
लिये द्वारे चन्द्र-प्रभ विद्-वास दस्तक ।
सुख ‘निराकुल’ हाथ में मेरे लगेगा,
आश रख विश्वास चरणन रखा मस्तक ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय नमः
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

कल्याण अर्घ्य

चन्द्र प्रभ विद्-वास वाले ।
जग अंधेरा तुम उजाले ।
टूट ना विश्वास पाये ।
आंख में भर नीर लाये ।
हम तुम्हारे, तुम हमारे ।।
है मुझे पूरा भरोसा,
रहेगी झोरी न खाली ।
मनेगी हो ‘री ! दिवाली ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
चैत्र कृृष्ण पंचम्यां
गर्भ कल्याणक प्राप्ताय
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय नमः
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

चन्द्र प्रभ विद्‌वास नामी ।
अकेले जग तीन स्वामी ।
पाँत भक्ता नाम लिख लो ।
भले सबके बाद रख लो ।
बना लो पुर मुक्ति धामी ।।
लोरियों में कहा माँ ने,
रहेगी झोरी न खाली ।
मनेगी हो ‘री ! दिवाली ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
पौष कृष्ण एकादश्यां
जन्म कल्याणक प्राप्ताय
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय नमः
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

चन्द्र प्रभ विद्‌वास गाँवा ।
सिन्धु भव शिव-स्वर्ग नावा ।
ले चलो, नहिं भार ज्यादा ।
उतर भागूंगा न, वादा ।
धूप जग, तुम कृपा छांवा ।।
है मुझे विश्वास पूरा,
रहेगी झोरी न खाली ।
मनेगी हो ‘री ! दिवाली ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
पौष-कृष्ण-एकादश्यां
दीक्षा कल्याणक प्राप्ताय
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय नमः
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

चन्द्र प्रभ विद्‌वास मेरे ।
अब न दूंगा जगत् फेरे ।।
जगत् रहना जगत आया ।
भगत बहना सरित आया ।।
विनत घेरे चरण तेरे ।।
है मुझे आशा ‘कि मेरी,
रहेगी झोरी न खाली ।
मनेगी हो ‘री ! दिवाली ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
फाल्गुुन-कृष्ण-सप्तम्यां
ज्ञान कल्याणक प्राप्ताय
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय नमः
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

चन्द्र प्रभ विद्‌वास दूजे ।
दिश् विदिश् जयकार गूॅंजे ।
दूर पीछे स्वर्ग छूटा ।
रहा कब सिरपुर अछूता ।
चक्रधर धर फक्र पूजे ।।
कह रहा, दे जोर मनुआ,
रहेगी झोरी न खाली ।
मनेगी हो ‘री ! दिवाली ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
फाल्गुन-शुक्ल-सप्तम्यां
मोक्ष कल्याणक प्राप्ताय
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय नमः
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

दोहा
सिद्ध-तीर्थ विद्वास के,
चन्दा प्रभु भगवान्,
लाज भक्त की राखते,
आ करते गुण गान ।।

जयमाला
भव सागर तारण तरणा ।
चन्दा बाबा सम-शरणा ।।
बाबा कमल विराजे हैं ।
नत राजे महराजे हैं ।।१।।

चमके सूरज सा माथा ।
धनुष भ्रू सहोदर नाता ।।
कर-तलियाँ, पग-तलियाँ भी ।
भाँत सरोज न अँखियाँ ही ।।२।।

कर्ण लागते काँधे से ।
अधर बिम्ब फल के जैसे ।।
चम्पक सी नासा प्यारी ।
अंग-अंग छव मनहारी ।।३।।

बैठे तर अशोक तर आ ।
धन ! अशोक-तर पा किरपा ।।
आसन काँधे लागे हैं ।
भाग सिंहों के जागे हैं ।।४।।

सात सात भव आईना ।
अर भा-मण्डल घाँई न ।।
झालर मणि-माणिक झूमें ।
सिर पर अधर छतर घूमें ।।५।।

गन्धोदक बरसा कम ना ।
मन्द-मन्द बहती पवना ।।
बरसा पहुपन लासानी ।
दुन्दुभि देव दिव्य वाणी ।।६।।

चौसठ चँवर अमर ढ़ोरें ।
कर्म कलंक अमिट घोरें ।।
सभा भरीं बारा-बारा ।
त्रिभुवन इक साँचा द्वारा ।।७।।

कान लगा सुनते दुखड़ा ।
सुनते, बने काम बिगड़ा ।।
श्री फल एक चढ़ाना है ।
पग निर्बाध बढ़ाना है ।।८।।

मोहन-धूल न पड़े गले ।
काल-सर्प इक योग टले ।।
सुबहो साँझ दिया बाती ।
छू-मन्तर साढ़े साती ।।९।।

प्रीत लगाई की सेवा ।
रोग विदाई जाँ लेवा ।।
कौन सितारे गिन पाया ।
मौन हमारे मन भाया ।।१०।।

दोहा
देर हमारी ओर से,
प्रभु तो दया निधान ।
बिन मांगे इतना दिया,
कह दे जो अरमान ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय नमः
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

(पुष्पांजलि क्षिपामि)

विधान प्रारंभ
दोहा
सुमरण श्री भगवान् का,
शरण एक कलि-काल ।
आ कुछ समय निकाल के,
नर-भव करें निहाल ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्र !
अत्र अवतर अवतर संवौषट्
(इति आह्वानन)
अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ:
(इति स्थापनम्)
अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट्
(इति सन्निधिकरणम्) ।

अष्ट दलकमल पूजा
विधान की जय

चौपाई
प्रभ चन्दा सुरखी विद्वासा ।
संकट-चूर, पूर-अभिलाषा ।।
प्रभ चन्दा मूरत मनहारी ।
विहर-अमंगल, मंगल-कारी ।।१।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो जिणाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

प्रतिमा वर्ण सफेद निराला ।
दर्श मात्र दृग् भरे उजाला ।।
ताताँ लगा न रहता यों ही ।
प्रभु चन्दा सुनते दुखियों की ।।२।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो ओहि जिणाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

प्रभु चन्दा हैं माँ के जैसे ।
कब माँ को प्यारे हैं पैसे ।।
क्या गरीब क्या पैसे वाला ।
बाबा को हर बच्चा प्यारा ।।३।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो परमोहि जिणाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

रिश्तों में रिश्ता माँ बेटा ।
रहे मास-नव पूरे जेठा ।।
सिर्फ समझती माँ बच्चे को ।
लगा लगन बाबा से देखो ।।४।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो सव्वोहि जिणाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

बिन बिचौलिये पण्डा, काजी ।
बाबा जनन्त देने राजी ।।
मनन्त रखने की बस देरी ।
दिश्-दिश् गूँज उठे जय-भेरी ।।५।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो अणंतोहि जिणाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

काले-काले बादल छाये ।
दुख बरसात न होने पाये ।।
बाबा कृपा हवा बन आती ।
दुख के मेघ उड़ा ले जाती ।।६।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो कोट्ठ-बुद्धीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

देख बिछे राहों में काँटे ।
बाबा अपनी गोद उठाते ।।
तिनके तोड़ें और बलाएँ ।
सिर अपने ले ही लें माएँ ।।७।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो बीय-बुद्धीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

ताप पाप संताप सताते ।
बाबा बन बदली आ जाते ।।
छा लेते तरुवर सा छाता ।
शत्रु देखता-मुँह, रह जाता ।।८।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो पदाणु-सारीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

जल, मनहारी चन्दन झारी ।
अक्षत शाली, नन्दन क्यारी ।।
स्वीकारो, मम आराध्य-देव,
चरु, दीप, धूप, श्री-फल थाली ।।01।।
ॐ ह्रां ह्रीं ह्रूं ह्रौं ह्र:
अ-सि-आ-उ-सा नमः
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
अष्टदल कमल हृदयस्-थिताय
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय
पूर्णार्घं निर्वपामीति स्वाहा ।।

षोडश दलकमल पूजा
विधान की जय

लगती ठोकर, गिर नहिं पाते ।
बाबा थामें-बीच, बताते ।।
सिर्फ न दीप थमा जाते हैं ।
साथ-साथ चलते आते है ।।९।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो सं-भिण्ण-सोदा-राणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

बाबा हाथ लगे क्या माटी ।
बन मटकी सर-माथ सुहाती ।।
पानी कीच बनाती कल थी ।
प्यास बुझाती किस्मत पलटी ।।१०।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो सयं-बुद्धाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

कात कपास भाँज के पोनी ।
अनहोनी को कर दें होनी ।।
जा नभ से बतयाती डोरी ।
बाबा कृपा न थोड़ी-मोड़ी ।।११।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो पत्तेय-बुद्धाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

काँच आईना करना आता ।
बाँस मुरलिया जुड़ता नाता ।।
बाबा ना ऐसे वैसे हैं ।
कैसे ? बस अपने जैसे हैं ।।१२।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो बोहिय-बुद्धाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

ढ़ेर पाप पर्वत का लागा ।
कर्म सतायें वगैर नाँगा ।।
बाबा कृपा वज्र बन आये ।
पर्वत पाप समूह मिटाये ।।१३।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो उजु-मदीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

आँख तरेरे साढ़े साती ।
राह दूर तक नजर न आती ।।
बाबा दृष्टि उठा दें थोड़ी ।
मंजिल आती दौड़ी-दौड़ी ।।१४।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो विउल-मदीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

काल सर्प इक योग सताये ।
रह रह ढ़ाये-कहर, रुलाये ।।
बाबा सिर क्या ढ़ारी धारा ।
गम हो जाता, यम को प्यारा ।।१५।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो दस-पुव्वीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

ढ़ाये अत्त ऊपरी बाधा ।
मन्तर-मूठ निशाना साधा ।।
रज प्रभु-पाद-माथ क्या लागी ।
दुष्ट शक्ति पग-उल्टे भागी ।।१६।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो चउ-दस-पुव्वीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

चैन न रैन, करार न दिन में ।
दाह वेदना ऐसी तन में ।।
ज्योत अखण्ड बालनी घी की ।
छवि रोगों की पड़ती फीकी ।।१७।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो अट्ठंग-महा-णिमित्त कु-सलाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

रिश्ते तो आते अनगिनती ।
बनते बनते बात बिगड़ती ।।
बस आना है नैना सीले ।
दिखें हाथ बच्चों के पीले ।।१८।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो वि-उव्वण-इड्ढि-पत्ताणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

दुकाँ धकेले भी ना चलती ।
जाने ली पाँसे कब पलटी ।।
जय बाबा विद्वास जपा बस ।
मनी दीवाली, मिटी अमावस ।।१९।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो विज्जा-हराणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

करके एक रात दिन बच्चे ।
अंक नहीं ला पाते अच्छे ।।
‘प्रभु विद्वास जयतु’ जप मंत्रा ।
सरसुति आप विराजें कण्ठा ।।२०।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो चा-रणाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

करें भलाई, मिले बुराई ।
और न कोई दुश्मन भाई ।।
निरखा क्या बाबा का द्वारा ।
हो आपस में भाई-चारा ।।२१।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो पण्ण-समणाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

जाने चीज कहाँ पे खोई ।
अश्रु न आते बस, मन रोई ।।
आना, इक नारियल चढ़ाना ।
रहे खुशी का नहीं ठिकाना ।।२२।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो आयास-गामीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

अब-तक गुजरी भली, न जाने ।
अब क्या होगा वृद्ध-कहाने ।।
चिंता ऐसी और फितूरी ।
बना रखे भक्तों से दूरी ।।२३।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो आसी-विसाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

करूँ न कुछ, बस बैठा खाऊँ ।
क्यूँ न खुदकुशी कर मर जाऊँ ।।
बस बाबा से मिल क्या आयें ।
ऐसे पाप विचार पलायें ।।२४।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो दिट्ठि-वि-साणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

जल, मनहारी चन्दन झारी ।
अक्षत शाली, नन्दन क्यारी ।।
स्वीकारो, मम आराध्य-देव,
चरु, दीप, धूप, श्री-फल थाली ।।02।।
ॐ क्षां क्षीं क्षूं क्षें क्षैं क्षों क्षौं क्षं क्षः
नमोर्-ऽहते सर्वं रक्ष रक्ष हूं फट् नमः
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
षोडशदल-कमल हृदयस्-थिताय
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय
पूर्णार्घं निर्वपामीति स्वाहा ।।

चतुर्विंशतिदल कमल पूजा
विधान की जय

जाँ लेवा दुर्घटना विघटी ।
जीवन चलती फिरती मिट्टी ।।
बस आ जाना पता पूछते ।
बाबा मुर्दे जान फूँकते ।।२५।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो उग्ग-तवाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

मन प्रश्नों में प्रश्न उठाये ।
उत्तर समय मूक बन जाये ।।
नग्न दिगम्बर देखें मुद्रा ।
आप लगें तट प्रश्न समुद्रा ।।२६।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो दित्त-तवाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

आय अठन्नी, खर्च रुपैय्या ।
डग-मग डोले जीवन नैय्या ।।
केवल श्रद्धा-सुन चढ़ावा ।
जेब छलकती भर दें बाबा ।।२७।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो तत्त-तवाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

तलवे घिसे लगाते फेरी ।
न्याय मिला न कोट कचेहरी ।।
मुख अब करना बाबा द्वारे ।
निकलेंगे मुख जय-जय-कारे ।।२८।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो महा-तवाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

करते यहाँ, वहाँ प्रण टूटे ।
नशा छोड़ते, जीवन रूठे ।।
सिर्फ देहरी छूना आके ।
छूटे नशा, फिरें ना आँखें ।।२९।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो घोर-तवाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

धू-धू कर घर-खलिहाँ जलते ।
उड़ आ चिनगारी के लगते ।।
छिड़का मंत्र नाम-तुम पानी ।
अग्नि समानी, हुई न हानी ।।३०।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो घोर गुण-परक्-कमाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

झूठा नाम किसी ने फाँसा ।
दूर-दूर तक दिखे न आशा ।।
बाबा नाम फरते मनका ।
दिखे चोर दाड़ी में तिनका ।।३१।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो घोर-गुणाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

लाठी किसी भक्त का चश्मा ।
दर बाबा का करे करिश्मा ।।
एक बार बस चल-कर आना ।
उठे न फिर विकल्प घर जाना ।।३२।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो ऽघोर-गुण-बंभ-यारीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

छोड़े, विष फुस्कार बहाने ।
घेर मेर फन अपना ताने ।।
ऐसा सर्प सिर्फ प्रभु जपते ।
निरखे वामी कँपते-कँपते ।।३३।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो आमो-सहि-पत्ताणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

ढ़ेर भिनभिनाती मधुमाखी ।
करें दूर से ताकाँ-झाँकी ।।
बाल न कर पायेंगी बाँका ।
नाम जुबाँ पर प्रभु जो राखा ।।३४।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो खेल्लो-सहि-पत्ताणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

रस्ते रस्ते वृक्ष उखाड़े ।
पागल हो हाथी चिंघाड़े ।।
‘बाबा’ लिये नाम के आगे ।
दुम दाबे वन तरफी भागे ।।३५।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो जल्लो-सहि-पत्ताणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

हवा हिमानी ओला पानी ।
नाव बीच मँझधार पुरानी ।।
प्रभु विद्वास सहाय जपा ज्यों ।
बेड़ा पार, हुई किरपा त्यों ।।३६।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो विट्ठो-सहि-पत्ताणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

दूर दूर तक अटवी सूनी ।
झपटे सिंह ले पञ्चे खूनी ।।
होता तेरा नाम सहाई ।
सिंह देता जा माँद दिखाई ।।३७।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो सव्वो-सहि-पत्ताणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

हुआ बादलों का फट पड़ना ।
छुआ जवां भी, ज़ुबां पलटना ।।
जपा जाप जय प्रभु विद्वासा ।
भरने लगे गाँव फिर श्वासा ।।३८।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो मण-बलीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

स्याह अँधेरा साहस तोड़े ।
सूना-पन खाने को दौड़े ।।
जय बाबा विद्वास सुमरना ।
कदम कदम बढ़ना मत डरना ।।३९।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो वचि-बलीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

ऐसा मेरा बाबा वैसा ।
सूरज दीप दिखाने जैसा ।।
लूँ विराम सो शीष झुका के ।
आता हूँ बाबा अब जा के ।।४०।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो काय-बलीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

दर्शन देव जिनेन्द्र का,
करे पाप का अवसान ।
अर्चन देव जिनेन्द्र का,
स्वर्ग, मोक्ष सोपान ।।४१।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो खीर-सवीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

दर्शन से जिनदेव के,
पाप मेर भी ढ़ेर ।
सछिद्र अंजुल जल टिके,
जग ज़ाहिर कब देर ।।४२।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो सप्पि-सवीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

दर्शन जिनवर सूर का,
भव तम करे विनाश ।
मन पंकज खिल खुल उठे,
जगमग तत्त्व प्रकाश ।।४३।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो महुर-सवीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

वीतराग मुख देख के,
पद्मराग मण कान्त ।
भवनान्तर इस भाव सभी,
आतप पाप प्रशान्त ।।४४।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो अमइ-सवीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

शरण अलावा आपके,
और नाहिं तिहुलोक ।
रक्षा मेरी कीजिए,
करके स्वीकृत ढ़ोक ।।४५।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो अक्खीण-महा-णसाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

रक्षक केवल आप हैं,
वीतराग अरिहन्त ।
भूत, भविष्यत, वर्तमां,
रक्षक तुम्हीं जिनन्द ।।४६।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो वड्ढमाण-बुद्धि-रिसस्स
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

लाभ मुझे जिन भक्ति का,
हो भव-भव जिन देव ।
मुझे भक्ति जिनराज की,
मिलती रहे सदैव ।।४७।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो सव्व-सिद्धा-यद-णाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

जन्म जनम कृत पाप जे,
संचित जन्म करोड़ ।
मिटें रोग भव यम जरा ।
जिन समक्ष कर जोड़ ।।४८।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो भयवदो महदि
महावीर वड्ढमाण बुद्धिरिसीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

पूर्णार्घ
जल, मनहारी चन्दन झारी ।
अक्षत शाली, नन्दन क्यारी ।।
स्वीकारो, मम आराध्य-देव,
चरु, दीप, धूप, श्री-फल थाली ।।03।।
श्री वृषभादि वर्धमान पर्यंत
परम-देव भगवन् तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
चतुर्विंशति दल कमल
हृदयस्-थिताय
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय
पूर्णार्घं निर्वपामीति स्वाहा ।।

महा-अर्घं
दोहा
आप सिवा कोई नहीं,
मेरा तीनहिं लोक ।
जाते जाते दे रहा,
बाबा फिर के ढ़ोक ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
नव देव भगवन् तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
अष्ट-चत्वारिंशद्-दलकमल
हृदयस्-थिताय
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय नमः
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

:: जाप्य ::
।। ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री चन्द्रप्-प्रभ तीर्थंकराय नमः ।।

जयमाला
दोहा
प्रभ चन्दा विद्-वास की,
है आदत इक खास ।
करें में खारिज दास की,
सपने भी अरदास ।।

बाबा चन्दा विद्-वास ।
रहते हैं मेरे पास ।
याद बनके ।
चांद बनके ।
बनने श्वास ।
रहते हैं मेरे पास ।
है मुझको यह विश्वास ।
बाबा चन्दा विद्-वास ।।

राह बनके ।
छांह बनके ।
बनके खास ।
रहते हैं मेरे पास ।
है मुझको यह विश्वास ।
बाबा चन्दा विद्-वास ।।

पंख बनके ।
रंग बनके ।
बनके आश ।
रहते हैं मेरे पास ।
है मुझको यह विश्वास ।
बाबा चन्दा विद्-वास ।।

नींव बनके ।
दीव बनके ।
बनके हास ।
रहते हैं मेरे पास ।
है मुझको यह विश्वास ।
बाबा चन्दा विद्-वास ।।

ढाल बनके ।
ताल बनके ।
बन उल्लास ।
रहते हैं मेरे पास ।
है मुझको यह विश्वास ।
बाबा चन्दा विद्-वास ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय नमः
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

दोहा
आप नीर, मैं मीन हूँ,
प्रभ चन्दा विद्‌वास ।
दाता तुम मैं दीन हूँ,
रखना चरणन दास ।।
(पुष्पांजलि क्षिपामि)

श्री सरसुति-मंत्र*
ॐ ह्रीम्
अर्हन् मुख कमल-वासिनि
पा-पात्म क्षयंकरि
श्रुत-ज्ञान
ज्वाला सहस्र प्रज्ज्वलिते
सरस्वति !
मत् पापम् हन हन दह दह
क्षाम् क्षीम् क्षूम् क्षौम् क्षः
क्षीरवर-धवले
अ-मृत संभवे
वम् वम् हूम् फट् स्वाहा
मम सन्-निधि-करणे
मम सन्-निधि-करणे
मम सन्-निधि-करणे ।
ॐ ह्रीं जिन मुखोद्-भूत्यै
श्री सरस्वति-देव्यै
अर्घं निर्वपामीति स्वाहा

शांति पाठ
अथ पौर्वाह-निक (अप-राह-निक)
देव-शास्त्र-गुरु-वन्दना-क्रियायाम्
पूर्वाचार्या-नुक्-क्रमेण,
सकल-कर्मक्-क्षयार्-थम्,
भाव-पूजा-वन्दना-स्तव समेतम्
श्री शांति-भक्ति कायोत्सर्गम् करोम्यहम्
(९ बार णमोकार )

*चौपाई*
दर्शन मात्र मेंटता दुखड़ा ।
भाँत चन्द्रमा सुन्दर मुखड़ा ।।
नासा टिके नैन मनहारी ।
करें वन्दना नाथ ! तुम्हारी ।।१।।

आप चक्रधर-पञ्चम नामी ।
वन्द्य इन्द्र शत, अन्तर्-यामी ।।
प्रभो शान्ति-जिन करके करुणा ।
करो शान्ति ! जश निरखो अपना ।।२।।

छत्र, सिंहासन, वृक्ष-अशोका ।
धुनि, दुन्दुभि, दल-चँवर अनोखा ।।
भा-मण्डल झिर-पुष्प-अनूठी ।
प्रातिहार्य-वसु आप विभूती ।।३।।

अर्चित-जगत् ! शान्ति करतारी ।
ढ़ोक करो स्वीकार हमारी ।।
प्राण-भूत, सत्, जीव समस्ता ।
पायें परिणति शान्त प्रशस्ता ।।४।।

देवों में जो देव बड़े हैं ।
चरणों में हित सेव खड़े हैं ।।
हंस-वंश वे जग उजियारे ।
करें शान्ति मण्डित जग सारे ।।५।।
(निम्न श्लोक को पढ़कर
जल छोड़ना चाहिए)

शान्ति कीजिये गाँव-गाँव में ।
विश्व लीजिये पाँव-छाँव में ।।
डूब ‘साध-जन’ उतरें गहरे ।
लहर लहर-पचरंगा लहरे ।।६।।

नृप धार्मिक बलशाली होवे ।
विकृत-प्रकृत मनमानी खोवे ।।
धर्म-चक्र-जिन सौख्य प्रदाता ।
रहे प्रवाहित यूँ हि विधाता ।।७।।

द्रव्य सुमंगल-कारी होवे ।
क्षेत्र अमंगल-हारी होवे ।।
होवे काल सुमंगल-कारी ।
होवें भाव अमंगल-हारी ।।८।।

कर्मन-घात घात मद सारा ।
सहजो सिद्ध रिद्ध परिवारा ।।
आदि आदि अर्हन् चौबीसा ।
शान्ति प्रदान करें निशि दीसा ।।९।।

*दोहा*
किया शान्ति जिन भक्ति का,
भगवन् कायोत्सर्ग ।।
करूँ दोष आलोचना,
जो प्रद-स्वर्ग-पवर्ग ।।१०।।

*चौपाई*
पाँच सभी कल्याणक धारी ।
आठ प्राति-हारज मन-हारी ।।
अतिशय तीस चार मण्डित हैं ।
अर बत्तीस इन्द्र वन्दित हैं ।।११।।

चौ-विध संघ नखत मानिन्दा ।
राम श्याम चक्री, प्रभु ! चन्दा ।।
‘निलय-विनय’ अन-गिनत गभीरा ।
आद-आद जिन अंतिम वीरा ।।१२।।

अर्चन-पूजन-वन्दन करता ।
उनका मैं अभिनन्दन करता ।।
पीड़ा-दुक्ख-दरद-भय खोवे ।
मेरे कर्मों का क्षय होवे ।।१३।।

रत्नत्रय का मुझे लाभ हो ।
मेरी ‘गति-पंचम-उपाध’ हो ।।
मृत्यु-महोत्सव मना सकूँ मैं ।
जिन-गुण-सम्पद् कमा सकूँ मैं ।।१४।।
अथ पौर्वाह-निक (अप-राह-निक)
देव-शास्त्र-गुरु-वन्दना-क्रियायाम्
पूर्वाचार्या-नुक्-क्रमेण,
सकल-कर्मक्-क्षयार्-थम्,
भाव-पूजा-वन्दना-स्तव समेतम्
श्री समाधि-भक्ति कायोत्सर्गम्
करोम्यहम्
(९बार णमोकार )

*चौपाई*
सदा शास्त्र अभ्यास करूँ मैं ।
सन्त समीप निवास करूँ मैं ।।
मौन धरूँ क्यूँ, गुणी दिखाये ।
गौण करूँ, यूँ दोष-पराये ।।१५।।

भावन-आत्म तत्व, नम-नयना ।
हित-मित रखूँ मधुरतम वयना ।।
जब तक राधा-मुक्ति रिझाऊँ ।
इन्हें जन्म जन्मान्तर पाऊँ ।।१६।।

तारण हारे…शरण सहारे ।
हृदय हमारे…चरण तुम्हारे ।।
चरण तुम्हारे…हृदय हमारा ।
रहे, तलक जब भव-जल-धारा ।।१७।।

स्वर-अक्षर पद मात्रा गलती ।
हुईं, चाहते बिन अनगिनती ।।
हो अपराध क्षमा यह मेरा ।
‘जैसा भी’ मैं अपना तेरा ।।१८।।

*दोहा*
किया समाधी, भक्ति का,
भगवन् कायोत्सर्ग ।।
करूँ दोष आलोचना,
जो प्रद-स्वर्ग-पवर्ग ।।१९।।

*चौपाई*
सम्यक्-दर्शन, सम्यक्-ज्ञाना ।
सम्यक्-चारित, ताना-बाना ।।
रूप अनूप ध्यान परमातम ।
बुद्ध-विशुद्ध ज्ञान धर आतम ।।२०।।

पूजन नित वन्दन करता हूँ ।
अर्चन अभिनन्दन करता हूँ ।।
क्षय होवें दुख संकट सारे ।
क्षय हो जावें कर्म हमारे ।।२१।।

मुझे लाभ रत्नत्रय होवे ।
सुगति गमन, भय-सप्तक खोवे ।।
पाऊँ मरण-समाधी स्वामी ।
बनूँ रतन जिन-गुण आसामी ।।२२।।
‘पुष्पाञ्जलिं क्षिपेत्’
( यहाँ पर नौ बार णमोकार मंत्र
पढ़ना चाहिए )

विसर्जन पाठ
अञ्जन को पार किया ।
चन्दन को तार दिया ।।
नहिं तोर दया का पार ।
नागों का हार किया ।।१।।

धूली-चन्दन-बावन ।
की शूली सिंहासन ।।
धरणेन्द्र देवी-पद्मा ।
मामूली अहि-नागिन ।।२।।

अगनी ‘सर’ नीर किया ।
भगिनी ‘सर’ चीर किया ।।
नहिं तोर दया का पार ।
केशर महावीर किया ।।३।।

बन पड़ीं भूल से भूल ।
कृपया कर दो निर्मूल ।।
बिन कारण तारण हार ।
नहिं तोर दया का पार ।।४।।
दोहा
बस आता, अब धारता,
ईश आशिका सीस ।
कृपा निराकुल आपकी,
बनी रहे निशि-दीस ।।
(पुष्पांजलि क्षिपामि)

आरती
हम भक्तों के काशी काबा ।
विद्-वासा प्रभु चन्दा बाबा ।।
घी लाये गिर गैय्या माई ।
बाति भाँज कपास बनाई ।।
आरत मिटें, आरती करते ।
ज्योत अखण्ड तभी प्रकटाई ।।
कौन हमारा आप अलावा ।
विद्-वासा प्रभु चन्दा बाबा ।।

पहली आरति गरभ उतारूँ ।
बरसा रतन, गरभ दुख टारूँ ।।
आरत मिटें, आरती करते ।
ज्योत अखण्ड तभी परजारूॅं ।।
कौन हमारा आप अलावा ।
विद्-वासा प्रभु चन्दा बाबा ।।१।।

दूूसरी आरति जनम उताऊँ ।
मेरू न्हवन, जनम दुख टारूँ ।।
आरत मिटें, आरती करते ।
ज्योत अखण्ड तभी परजारूॅं ।।
कौन हमारा आप अलावा ।
विद्-वासा प्रभु चन्दा बाबा ।।२।।

तीसरी आरति त्याग उताऊँ ।
वन आगमन, राग निरवारूँ ।।
आरत मिटें, आरती करते ।
ज्योत अखण्ड तभी परजारूॅं ।।
कौन हमारा आप अलावा ।
विद्-वासा प्रभु चन्दा बाबा ।।३।।

चौथी आरति ज्ञान उताऊँ ।
अर सम शरण, गुमान निवारूँ ।।
आरत मिटें, आरती करते ।
ज्योत अखण्ड तभी परजारूॅं ।।
कौन हमारा आप अलावा ।
विद्-वासा प्रभु चन्दा बाबा ।।४।।

पाँचवीं आरति मोक्ष उताऊँ ।
आप भाँत कल मोक्ष पधारूँ ।।
आरत मिटें, आरती करते ।
ज्योत अखण्ड तभी परजारूॅं ।।
कौन हमारा आप अलावा ।
विद्-वासा प्रभु चन्दा बाबा ।।५।।

 

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