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चौबीस तीर्थंकर विधान  ·  तीर्थक्षेत्र पूजन

बड़वाह के नेमि नाथ की पूजन-विधान

By मुनि श्री निराकुल सागर जी महाराज 

 

बड़वाह के नेमि नाथ की पूजन

धन ! बड़वाह बढ़-चढ़ पुण्य ।
प्रतिमा लगी हाथ अनन्य ।।
करुणा दया अवतारी ।
‘रे महिमा नेमि प्रभु न्यारी ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री नेमि-नाथ जिनेन्द्र !
अत्र अवतर अवतर संवौषट्
(इति आह्वानन)
अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ:
(इति स्थापनम्)
अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट्
(इति सन्निधिकरणम्) ।

दर्शन मात्र इक आनन्द ।
खोले रखो या दृग बन्द ।।
भेंटूॅं क्यूँ न जल झारी ।
मनहर ! छव नयन-हारी ।।
करुणा दया अवतारी ।
‘रे महिमा नेमि प्रभु न्यारी ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री नेमि-नाथ जिनेन्द्राय नमः
जलं निर्वपामीति स्वाहा ।।

छूते पाँव, बनते काम ।
मुहुरत शुभ शगुन निर्दाम ।।
भेंटूॅं क्यूँ न गंधा ‘री ।
किरपा सातिशय-कारी ।।
करुणा दया अवतारी ।
‘रे महिमा नेमि प्रभु न्यारी ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री नेमि-नाथ जिनेन्द्राय नमः
चंदनं निर्वपामीति स्वाहा ।।

सिमरण देव गुरु जिनवाण ।
पुष्पित पुण्य तरु फलवान ।।
भेंटूॅं क्यूँ न कण शाली ।
समकित दृढ़ निमित्ता ‘री ।।
करुणा दया अवतारी ।
‘रे महिमा नेमि प्रभु न्यारी ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री नेमि-नाथ जिनेन्द्राय नमः
अक्षतं निर्वपामीति स्वाहा ।।

राह अनेक, काँटे देख ।
गोदी लें उठा अभिलेख ।।
भेंटूॅं क्यूँ न फुल्वा ‘री ।
समता, क्षमा भण्डारी ।।
करुणा दया अवतारी ।
‘रे महिमा नेमि प्रभु न्यारी ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री नेमि-नाथ जिनेन्द्राय नमः
पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा ।।

सिर्फ पुकारने की देर‌ ।
छाँटें कहाँ अपना गैर ।।
भेंटूॅं क्यूँ न चरु थाली ।
अद्‌भुत सोच वैशाली ।।
करुणा दया अवतारी ।
‘रे महिमा नेमि प्रभु न्यारी ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री नेमि-नाथ जिनेन्द्राय नमः
नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

पर-हित खड़े बाँह पसार ।
इस उस जिता, जाते हार ।।
भेंटूॅं क्यूँ न दीवाली ।
शरणा एक बलिहारी ।।
करुणा दया अवतारी ।
‘रे महिमा नेमि प्रभु न्यारी ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री नेमि-नाथ जिनेन्द्राय नमः
दीपं निर्वपामीति स्वाहा ।।

पीड़ा और अश्रु तुम्हार ।
सबसे एक सा व्यवहार ।।
भेंटूॅं क्यूँ न धूपाली ।
तुम ‘छू’ सार्थ दृग काली ।।
करुणा दया अवतारी ।
‘रे महिमा नेमि प्रभु न्यारी ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री नेमि-नाथ जिनेन्द्राय नमः
धूपं निर्वपामीति स्वाहा ।।

केवल थमाते न प्रदीव ।
ला रखते मुकाम करीब ।।
भेंटूॅं क्यूँ न फल डाली ।
दी तुम जिन्दगी म्हारी ।।
करुणा दया अवतारी ।
‘रे महिमा नेमि प्रभु न्यारी ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री नेमि-नाथ जिनेन्द्राय नमः
फलं निर्वपामीति स्वाहा ।।

दृग जल, गंध, अक्षत, फूल ।
चरु घृत दीप, धूप, अमूल ।।
भेंटूॅं सफल द्रव सारी ।
पूजन पुण्य प्रद भारी ।।
करुणा दया अवतारी ।
‘रे महिमा नेमि प्रभु न्यारी ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री नेमि-नाथ जिनेन्द्राय नमः
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

कल्याण अर्घ्य
माँ ने देखे रात सुपन ।
बरसे पनदश मास रतन ।
डफली ढोल बजाओ ‘रे ।
उत्सव गर्भ मनाओ ‘रे ।
अपना आग जगाओ ‘रे ।
आओ भक्ता आओ ‘रे ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
कार्तिक-शुक्ल-षष्ठ्यां
गर्भ कल्याणक प्राप्ताय
श्री नेमि-नाथ जिनेन्द्राय नमः
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

मेर बाल तीर्थेश न्हवन ।
देर दर्श रच सहस नयन ।
झूमो नाचो गाओ ‘रे ।
उत्सव जन्म मनाओ ‘रे ।
अपना आग जगाओ ‘रे ।
आओ भक्ता आओ ‘रे ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्रावण-शुक्ल-षष्ठ्यां
जन्म कल्याणक प्राप्ताय
श्री नेमि-नाथ जिनेन्द्राय नमः
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

नम लोचन सुन पशु क्रन्दन ।
लुंचन, तोड़ ब्याह कंकण ।।
गीत विराग उठाओ ‘रे ।
उत्सव त्याग मनाओ ‘रे ।
अपना आग जगाओ ‘रे ।
आओ भक्ता आओ ‘रे ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्रावण शुक्ल-षष्ठ्यां
दीक्षा कल्याणक प्राप्ताय
श्री नेमि-नाथ जिनेन्द्राय नमः
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

सूरज केवल ज्ञान किरण ।
धन्य सम-शरण सींह हिरण ।।
श्रृद्धा सुमन चढ़ाओ ‘रे ।
उत्सव ज्ञान मनाओ ‘रे ।
अपना आग जगाओ ‘रे ।
आओ भक्ता आओ ‘रे ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
अश्विन-शुक्ल-प्रतिपदायां
ज्ञान कल्याणक प्राप्ताय
श्री नेमि-नाथ जिनेन्द्राय नमः
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

ध्यान अगन सब कर्म दहन ।
लगा समय शिव धाम गमन ।।
नैनन जल भर लाओ ‘रे ।
उत्सव मोक्ष मनाओ ‘रे ।
अपना आग जगाओ ‘रे ।
आओ भक्ता आओ ‘रे ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
आषाढ़-शुक्ल-सप्तम्यां
मोक्ष कल्याणक प्राप्ताय
श्री नेमि-नाथ जिनेन्द्राय नमः
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

जयमाला

सुन पशुओं की चीख चढ़े गिरनार ।
राजुल पीछे, आगे नेमि कुमार ।।

देखे माँ ने सोलह सपने ।
दिव्य रत्न नभ लगे बरसने ।।
पूरी शौरी-पुरी सॅंजाई ।
नेमि जन्म की बजी बधाई ।।
देवी शचि कर दर्श भविक-अवतार ।
छ्व लख लख दृग सहस हर्ष अपार ।।१।।

दूज चाँद जैसे बढ़ चाले ।
गुरु बिन ग्रन्थ सभी पढ़ डाले ।।
भ्रात चचेरे बलभद, कृष्णा ।
बलशाली जिन सा दश दिश् ना ।।
अर्ध-चक्रि कृत पुण्य पूर्व भण्डार ।
सरिता ती सरके जीवन जल धार ।।२।।

एक बार जल क्रीड़ा ठानी ।
नेमि कुँवर सब चक्री-रानी ।।
देर बचा जब कपड़ा ओढ़ा ।
भींजा, देवर भाभी बोला ।।
जरा सुखा दो, धो यह वस्त्र हमार ।
कर चाली मजाक सतभामा नार ।।३।।

मेरे पति त्रिखण्ड अधिशासी ।
मुझे समझ क्या ? रक्खा दासी ।।
नाम सुदर्शन चक्र घुमाते ।
पाञ्च-जान्य इक शंख बजाते ।।
शेषनाग संरक्षित शयनागार ।
सिहं मद गले, भर चले नेमि दहाड़ ।।४।।

पैर अँगूठे चक्र चलाया ।
फूॅंक नाक से शंख बजाया ।‌।
कीनी क्रीड़ांगन अहि-शैय्या ।
आये भागे कृष्ण कन्हैया ।।
मचा तीन लोकों में हाहाकार ।
मांग क्षमा, सतभामा चाली हार ।।५।।

चिंता कृष्ण रात-दिन शाले ।
नेमि कहीं न राज हथिया ले ।।
काम कूट-नीती से लीना ।
ब्याह नेम राजुल रच दीना ।।
उठ बरात, ठहरी जूनागढ़ द्वार ।
बॅंधे मूक पशु रत क्रंदन लाचार ।।६।।

नेमि कुॅंवर ने पूछा भाई ।
किस हित बॉंधे पशु यह लाई ।।
सेवक कहे टिका दृग धरणी ।
यह बरात का भोजन अपनी ।।
कुछ म्लेच्छ नृप करते मांसाहार ।
खड़े देव लौकांतिक बाँध कतार ।।७।।

रस्ता रोक नेमि ठाड़ी है ।
राजुल सिसक रही भारी है ।।
पर न नेमि जब माने पीछे ।
पीछे हुई किये दृग नीचे ।।
पट मुंचन, लट लुंचन, पद्म-विहार ।
माँ गणिनी राजुल कल, प्रभु भव पार ।।
सुन पशुओं की चीख चढ़े गिरनार ।
राजुल पीछे, आगे नेमि कुमार ।।८।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री नेमि-नाथ जिनेन्द्राय नमः
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

।। दोहा ।।
लगा पता, लागे पते,
तुम तो भगवन् नेम ।
कमल भिन्न जल रह सकूॅं,
चोखा बनूँ ‘कि हेम ।।
।। पुष्पांजलि क्षिपामि ।।

विधान प्रारंभ

अष्ट दलकमल पूजा
विधान की जय

नमो जिणवर अरि-हंताणं ।
णमो सिद्धम् आ-यरि-याणं ।।
उवज्झायाणं णमो णमो ।
सव्व साहूणं णमो णमो ।।१।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो जिणाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री नेमि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

बुध मंगल, लोकोत्तम, शरणा ।
सिध मंगल, लोकोत्तम, शरणा ।।
मुनि मंगल, लोकोत्तम, शरणा ।
धुनि मंगल, लोकोत्तम, शरणा ।।२।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो ओहि जिणाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री नेमि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

श्री आदि, अजित, संभव, नन्दन ।
जिन सुमति, पद्म, सुपार्श्व वन्दन ।।
प्रभ-चन्द्र, सुविधि, शीतल स्वामी ।
नुति श्रेय, पूज्य अन्तर्यामी ।।
श्री विमल, अनन्त, धर्म-नाथा ।
नुति शांति, कुन्थ, अर वरदाता ।।
श्री मल्लि, सुव्रत, नम दृग-रेवा ।
नुति नेम, पार्श्व, सन्मत देवा ।।३।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो परमोहि जिणाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री नेमि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

अरिहन्ता, सिद्धा-अगणन्ता ।
आ-यरिया, उवज्ञाया, सन्ता ।।
जिन-धर्म, जिनागम-जगदम्बा ।।
जिन बिम्बालय, जय जिन-बिम्बा ।।४।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो सव्वोहि जिणाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री नेमि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

दोहा
राज तजा, राजुल तजी,
सुन पशुअन आवाज ।
धन आदर्श हमार वो,
नेम-नाथ जिनराज ।।५।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो अणंतोहि जिणाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री नेमि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

जम्बूद्वीप भरत इक देशा ।
हस्तिनाग-पुर अंग प्रदेशा ।।
भव यह पिछला तीजा जानो ।
नाम वहाँ सुप्रतिष्ठ पिछानो ।।६।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो कोट्ठ-बुद्धीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री नेमि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

वर्ण, स्वर्ण के जैसा दीखे ।
ग्यारह-अंग इन्होंने सीखे ।।
थे मांडलिक यहाँ पर राजा ।
बाद श्रमण भव-जलधि-जहाजा ।।७।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो बीय-बुद्धीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री नेमि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

शगुन नेक सद्‌-गुण आभरणा ।
व्रत सिंह निष्क्रीड़ित आचरणा ।।
धन ! प्रायोपगमन सन्यासी ।
नाम-जयन्त-स्वर्ग अधिशासी ।।८।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो पदाणु-सारीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री नेमि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

जल, मनहारी चन्दन झारी ।
अक्षत शाली, नन्दन क्यारी ।।
स्वीकारो, मम आराध्य-देव,
चरु, दीप, धूप, श्री-फल थाली ।।01।।
ॐ ह्रां ह्रीं ह्रूं ह्रौं ह्र:
अ-सि-आ-उ-सा नमः
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
अष्टदल कमल हृदयस्-थिताय
श्री नेमि-नाथ जिनेन्द्राय
पूर्णार्घं निर्वपामीति स्वाहा ।।

षोडश दलकमल पूजा
विधान की जय

‘गर्भ पर्व’ छह महीने पहले ।
रत्न बरसने लगे रुपहले ।।
लिये हाथ में भेंट अनोखी ।
माँ सेविका देवि-देवों की ।।९।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो सं-भिण्ण-सोदा-राणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री नेमि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

सार्थ नाम धर, ऊरध-रेता ।
समुद-विजय-नृप, विश्व-विजेता ।।
शौरी-पुर नगरी रजधानी ।
देवी शिव-देवी पटरानी ।।१०।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो सयं-बुद्धाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री नेमि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

सपने लगे हुये से अपने ।
देखे माँ ने सोलह सपने ।।
मानो कोई बाल पुकारे ।
जागो माँ हम आये द्वारे ।।११।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो पत्तेय-बुद्धाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री नेमि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

रिख-उत्तराषाढ़ बतलाई ।
‘गर्भ’ शुक्ल कार्तिक षट् भाई ।।
देश-समुद्र स्वर्ग से आये ।
कुल-यदु-वंश-प्रदीप कहाये ।।१२।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो बोहिय-बुद्धाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री नेमि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

श्रावण सुदि षष्टी दिन जन्मे ।
स्वर्ग उतर आया भू छिन में ।।
जन्म योग शुभ ‘ब्रह्म’ विधाता ।
जुड़ा राशि कन्या से नाता ।।१३।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो उजु-मदीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री नेमि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

न्यार नखत चित्रा अवतारी ।
प्रभा मयूर-कण्ठ मन-हारी ।।
शचि आई, बालक को लाई ।
अवतारी भव-एक कहाई ।।१४।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो विउल-मदीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री नेमि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

हिवरा फूला नहीं समाया ।
बाल गोद सौधर्म थमाया ।।
पार रुप कब नेत्र सफीने ।
नेत्र हजार इन्द्र ने कोने ।।१५।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो दस-पुव्वीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री नेमि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

ऐरावत की किस्मत जागी ।
सेवा हाथ भागवत लागी ।।
रच सुमेर अभिषेक अनोखा ।
सुर-गण पुण्य कमाया चोखा ।।१६।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो चउ-दस-पुव्वीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री नेमि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

पैर उखड़ते दीखे यम के ।
नृत्य किया ताण्डव फिर जमके ।।
यादगार ये दृश्य अनूठे ।
शंख सुशोभित पाँव अँगूठे ।।१७।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो अट्ठंग-महा-णिमित्त कु-सलाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री नेमि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

बढ़ने लगे दूज चन्दा से ।
निष्कलंक शशि पूनम भासे ।।
दर्श मात्र अपहारक-पीडा ।
तुंग धनुष-दश दिव्य शरीरा ।।१८।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो वि-उव्वण-इड्ढि-पत्ताणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री नेमि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

तृतिय बालयति तीर्थंकर में ।
शत-तिय वर्ष हेम जल घर में ।।
निमित्त ‘पशु-बध-बन्ध’ बनाया ।
यह संसार जान के माया ।।१९।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो विज्जा-हराणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री नेमि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

बारह सभी भावना भाये ।
देव तभी लौकान्तिक आये ।।
”विरला थामे केतु-अहिंसा” ।
लगे बाँधने सेतु-प्रशंसा ।।२०।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो चा-रणाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री नेमि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

बिन ओढ़े दैगम्बर-बाना ।
भ्रम व्रत-मन्दिर कलश चढ़ाना ।।
देव-शास्त्र-गुरु का कहना है ।
संयम भव-मानव गहना है ।।२१।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो पण्ण-समणाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री नेमि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

केवल नयन न, मन-मन भाई ।
नाम ‘देव-कुरु’ शिविका आई ।।
नेमि-कुमार पधारे आ के ।
हर्षाये सुर-असुर उठा के ।।२२।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो आयास-गामीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री नेमि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

पुर परिजन ने दूर तलक आ ।
किया विदा निज-नैन-उदक ला ।।
पुर-गिरनारी जाना माना ।
भवि ! ‘सेसा-वन’ तप-उद्याना ।।२३।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो आसी-विसाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री नेमि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

मुँह लग वृक्ष गगन बतियाई ।
शत अर बीस-धनुष ऊँचाई ।।
इक हजार राजे महराजे ।
‘मेघ-श्रृंग’ तर आन विराजे ।।२४।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो दिट्ठि-वि-साणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री नेमि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

जल, मनहारी चन्दन झारी ।
अक्षत शाली, नन्दन क्यारी ।।
स्वीकारो, मम आराध्य-देव,
चरु, दीप, धूप, श्री-फल थाली ।।02।।
ॐ क्षां क्षीं क्षूं क्षें क्षैं क्षों क्षौं क्षं क्षः
नमोर्-ऽहते सर्वं रक्ष रक्ष हूं फट् नमः
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
षोडशदल-कमल हृदयस्-थिताय
श्री नेमि-नाथ जिनेन्द्राय
पूर्णार्घं निर्वपामीति स्वाहा ।।

चतुर्विंशतिदल कमल पूजा
विधान की जय

‘णमो सव्व सिद्धाणं’ बोला ।
दिया उतार राजसी चोला ।।
पंच मुष्टी लुंचन अपना के ।
खड़े हो गये ध्यान लगा के ।।२५।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो उग्ग-तवाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री नेमि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

दीक्षा तिथि सुदि श्रावण षष्टी ।
पौर्वाह्निक रवि अपहर दृष्टी ।।
रिख-चित्रा जिन-दीक्षा न्यारा ।
षष्टम-भक्त नियम उर-धारा ।।२६।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो दित्त-तवाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री नेमि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

विसर पूर्व-भव-तापस शेखी ।
लगा टक-टकी नासा देखी ।।
कर अफसोश दोष-कृत पिछले ।
हरकत बिना तीन दिन निकले ।।२७।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो तत्त-तवाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री नेमि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

रखे दर्श-मुनि हित बेशबरी ।
नाम द्वारिका मनहर नगरी ।।
हेत पारणा आये स्वामी ।
‘नृप वर-दत्त’ भक्त जिन नामी ।।२८।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो महा-तवाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री नेमि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

नवधा भक्ति से पड़गाया ।
गो-क्षीरान्न अहार कराया ।।
पुण्य सातिशय अबकि बोने ।
पञ्चाश्चर्य किये देवों ने ।।२९।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो घोर-तवाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री नेमि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

चुके चार दिन कम दो मासा ।
गले उतार ध्यान परिभाषा ।।
बस अन्तर्मुहूर्त इक लागा ।
सुप्त चतुष्टय-अनन्त जागा ।।३०।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो घोर गुण-परक्-कमाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री नेमि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

एकम् कृष्ण अश्विनी न्यारी ।
पौर्वाह्निक बेला मनहारी ।।
नियम धारणा धारी तेला ।
रिख इक चित्रा वाली बेला ।।३१।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो घोर-गुणाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री नेमि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

धन ! सेसावन अमर निशानी ।
मेष-श्रृंग तर केवल-ज्ञानी ।।
ऊँचाई धनु मानस्तंभा ।
शतरु बीस धुनि माँ जगदम्बा ।।३२।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो ऽघोर-गुण-बंभ-यारीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री नेमि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

कोट उँचाई यही बताई ।
चैत्य ‘वृक्ष’ सिद्धार्थ गुसाईं ।।
गिरि-तोरण भी इतने ऊँचे ।
इतने ऊँचे ध्वज नभ गूँजे ।।३३।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो आमो-सहि-पत्ताणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री नेमि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

वेदिस्-तूप न इससे ज्यादा ।
विस्तृत इतने ही प्रासादा ।।
कोट वेदि सम-शरणा साँची ।
चौड़े तीस धनुष श्रुति वाँची ।।३४।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो खेल्लो-सहि-पत्ताणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री नेमि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

गिरि पर्वत धनु अस्सी चौड़े ।
तूप धनुष दश ऊपर थोड़े ।।
योजन डेढ़ प्रमाण सभा का ।
छह कोसिक अर-‘मान’ सभा का ।।३५।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो जल्लो-सहि-पत्ताणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री नेमि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

सिंहासन पद्मासन माड़े ।
चौषठ चँवर लिये सुर ठाड़े ।।
छतर तीन सिर-ऊपर डोलें ।
देव-दुन्दुभि मिसरी घोलें ।।३६।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो विट्ठो-सहि-पत्ताणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री नेमि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

भामण्डल भव-भव दर्पण है ।
झिर लग गंधोदक बर्सण है ।।
मन्द-मन्द चाले पवमाना ।
पुष्प-वृष्टि नन्दन बागाना ।।३७।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो सव्वो-सहि-पत्ताणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री नेमि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

तर अशोक तर छटा निराली ।
ध्वनि शिव-स्वर्ग भिंटाने वाली ।।
गुण अनुरूप नाम सम शरणा ।
वैर छोड़ बैठे सिंह-हिरणा ।।३८।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो मण-बलीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री नेमि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

डेढ़-हजार निजातम ज्ञानी ।
शतक चार धर-पूरब ध्यानी ।।
शिक्षक ‘वसु-शत’ सहस्र ग्यारा ।
शतक आठ वादिन् विस्तारा ।।३९।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो वचि-बलीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री नेमि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

धर-मति-विपुल नवक-शत भासा ।
गणि दश-एक रसिक दृग् नासा ।।
शतर सहस विक्रिय अधिकारी ।
ऋषि पन्द्रह सौ अवधि प्रभारी ।।४०।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो काय-बलीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री नेमि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

‘मुनि वर दत्त’ गणेश प्रधाना ।
‘राजुल’ बाद आर्यिका नाना ।।
मिल गणनी चालीस-हज्जारा ।
उग्र-सेन मुख-श्रोतृ पुकारा ।।४१।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो खीर-सवीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री नेमि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

एक लाख सुधि श्रावक शोभें ।
तीन-लाख श्राविका सुशोभें ।।
‘पार्श्व नाम इक यक्ष’ सुनो जी ।
‘कुष्माण्ड़ी’ यक्षिणी चुनो जी ।।४२।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो सप्पि-सवीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री नेमि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

निस्पृह सिखला आखर-ढ़ाई ।
मास पूर्व ली सभा विदाई ।।
शिव सातें आषाढ़ी श्यामा ।
पल प्रदोष रिख चित्रा नामा ।।४३।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो महुर-सवीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री नेमि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

गिर गिरनार वरी शिव-राधा ।
आसन पद्मासन आराधा ।।
जा पहुँचे शिव समय मात्र में ।
यति शत-पन छत्तीस साथ में ।।४४।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो अमइ-सवीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री नेमि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

चार केवली जिन अनबद्धा ।
सहस्र अष्टक तीर्थ प्रसिद्धा ।।
कहूँ कहाँ तक पार न आता ।
‘सहज-निराकुल’ मौन सुहाता ।।४५।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो अक्खीण-महा-णसाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री नेमि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

दोहा
जाते जाते आखरी,
मेरी यही मुराद ।
आगे भी सुन लीजिये,
लाऊँगा फरियाद ।।४६।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो वड्ढमाण-बुद्धि-रिसस्स
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री नेमि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

दोहा
और नहीं कोई मिरा,
सिर्फ़ एक अरमान ।
कृपा दृष्टि रखिये बना,
जब-तक घट में प्राण ।।४७।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो सव्व-सिद्धा-यद-णाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री नेमि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

दोहा
बड़ी और कोई नहीं,
यही अखीर मुराद ।
जिह्वा पर नर्तन करें,
नाम आप दिन-रात ।।४८।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो भयवदो महदि
महावीर वड्ढमाण बुद्धिरिसीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री नेमि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

पूर्णार्घ
जल, मनहारी चन्दन झारी ।
अक्षत शाली, नन्दन क्यारी ।।
स्वीकारो, मम आराध्य-देव,
चरु, दीप, धूप, श्री-फल थाली ।।03।।
श्री वृषभादि वर्धमान पर्यंत
परम-देव भगवन् तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
चतुर्विंशति दल कमल
हृदयस्-थिताय
श्री नेमि-नाथ जिनेन्द्राय
पूर्णार्घं निर्वपामीति स्वाहा ।।

महा-अर्घं
दीप, चरु, जल, धूप, गुल, फल, गन्ध, अक्षत ।
ले खड़ा तुम द्वार पर, दे रहा दस्तक ।
सुख ‘निराकुल’ हाथ में मेरे लगेगा,
आश रख विश्वास चरणन रखा मस्तक ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
नव देव भगवन् तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
अष्ट-चत्वारिंशद्-दलकमल
हृदयस्-थिताय
श्री नेमि-नाथ जिनेन्द्राय नमः
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

:: जाप्य ::
।। ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री नेमि-नाथ तीर्थंकराय नमः ।।

जयमाला

नेमी-नाथ पूर्व भव
धन ! मर्याद रखी मरने तक याद ।
चिन्ता-गति भव पूरब नेमी-नाथ ।।

देव, शास्त्र, श्री गुरु श्रद्धानी ।
नृप प्रभ-सूर्य, धारिणी रानी ।।
पुत्र तीन चिन्ता-गति पहला ।
दुतिय मनो-गति, फिर गति-चपला ।।
सभी बढ़ चले दूज चाँद के भाँत ।
धन ! मर्याद रखी मरने तक याद ।।१।।

नृप अरविन्द प्रीति-मति छोरी ।
दे प्रदक्षिणा सुमेरु बोली ।।
दौड़ निकल जो मुझसे आगे ।
उठा रत्न-माला यह भागे ।।
उसे मान लूॅंगी साथी भव सात ।
धन ! मर्याद रखी मरने तक याद ।।२।।

चले कुँवर ले विवाह आशा ।
हार प्रीति-मति, हाथ निराशा ।।
भूमि मनो-गति आँख गड़ाये ।
खड़ा चपल-गति माथ झुकाये ।।
चिन्ता-गति तत्पर मेंटन दुख भ्रात ।
धन ! मर्याद रखी मरने तक याद ।।३।।

तुरत प्रीति-मति चित् चौ खाने ।
बढ़ी ज्यों हि वर-माल पिंनाने ।।
बोले चिन्ता-गति ओ ! बाला ।
छोटे भ्रात पिंनाओ माला ।।
वही मुझे लाये हैं अपने साथ ।
धन ! मर्याद रखी मरने तक याद ।।४।।

विनय अमृत वचनों में घोली ।
सार्थक नाम प्रीति-मति बोली ।।
आप एक हो स्वामी म्हारे ।
पिता, भ्रात, सुत पर नर सारे ।।
सिवा आप न थामने दूॅंगीं हाथ ।
धन ! मर्याद रखी मरने तक याद ।।५।।

चिन्ता-गति ने कहा कुमारी ! ।
दृष्टि भ्रात-बहु जाय न डाली ।।
तुम ऊपर मोहित लघु-भ्राता ।
जेठ, भ्रात-बहु हम तुम नाता ।।
वर लो ‘भाई’ सार्थ मान लो बात ।
धन ! मर्याद रखी मरने तक याद ।।६।।

सुन चिन्ता-गति शपथ उठाई ।
कदम प्रीति-मति मोक्ष बढ़ाई ।।
पास आर्यिका निर्वृत्ता के ।
दीक्षित अन्तर्बोध जगा के ।।
लख साहस ‘तिय’ भ्रात दिगम्बर साध ।
धन ! मर्याद रखी मरने तक याद ।।७।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री नेमि-नाथ जिनेन्द्राय नमः
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

दोहा
दूर निराकुल सुख नहीं,
रखनी बस मर्याद ।
रख पाऊॅं मर्याद मैं,
और न बस फरियाद ।।

श्री सरसुति-मंत्र*
ॐ ह्रीम्
अर्हन् मुख कमल-वासिनि
पा-पात्म क्षयंकरि
श्रुत-ज्ञान
ज्वाला सहस्र प्रज्ज्वलिते
सरस्वति !
मत् पापम् हन हन दह दह
क्षाम् क्षीम् क्षूम् क्षौम् क्षः
क्षीरवर-धवले
अ-मृत संभवे
वम् वम् हूम् फट् स्वाहा
मम सन्-निधि-करणे
मम सन्-निधि-करणे
मम सन्-निधि-करणे ।
ॐ ह्रीं जिन मुखोद्-भूत्यै
श्री सरस्वति-देव्यै
अर्घं निर्वपामीति स्वाहा

शांति पाठ
अथ पौर्वाह-निक (अप-राह-निक)
देव-शास्त्र-गुरु-वन्दना-क्रियायाम्
पूर्वाचार्या-नुक्-क्रमेण,
सकल-कर्मक्-क्षयार्-थम्,
भाव-पूजा-वन्दना-स्तव समेतम्
श्री शांति-भक्ति कायोत्सर्गम् करोम्यहम्
(९ बार णमोकार )

*चौपाई*
दर्शन मात्र मेंटता दुखड़ा ।
भाँत चन्द्रमा सुन्दर मुखड़ा ।।
नासा टिके नैन मनहारी ।
करें वन्दना नाथ ! तुम्हारी ।।१।।

आप चक्रधर-पञ्चम नामी ।
वन्द्य इन्द्र शत, अन्तर्-यामी ।।
प्रभो शान्ति-जिन करके करुणा ।
करो शान्ति ! जश निरखो अपना ।।२।।

छत्र, सिंहासन, वृक्ष-अशोका ।
धुनि, दुन्दुभि, दल-चँवर अनोखा ।।
भा-मण्डल झिर-पुष्प-अनूठी ।
प्रातिहार्य-वसु आप विभूती ।।३।।

अर्चित-जगत् ! शान्ति करतारी ।
ढ़ोक करो स्वीकार हमारी ।।
प्राण-भूत, सत्, जीव समस्ता ।
पायें परिणति शान्त प्रशस्ता ।।४।।

देवों में जो देव बड़े हैं ।
चरणों में हित सेव खड़े हैं ।।
हंस-वंश वे जग उजियारे ।
करें शान्ति मण्डित जग सारे ।।५।।
(निम्न श्लोक को पढ़कर
जल छोड़ना चाहिए)

शान्ति कीजिये गाँव-गाँव में ।
विश्व लीजिये पाँव-छाँव में ।।
डूब ‘साध-जन’ उतरें गहरे ।
लहर लहर-पचरंगा लहरे ।।६।।

नृप धार्मिक बलशाली होवे ।
विकृत-प्रकृत मनमानी खोवे ।।
धर्म-चक्र-जिन सौख्य प्रदाता ।
रहे प्रवाहित यूँ हि विधाता ।।७।।

द्रव्य सुमंगल-कारी होवे ।
क्षेत्र अमंगल-हारी होवे ।।
होवे काल सुमंगल-कारी ।
होवें भाव अमंगल-हारी ।।८।।

कर्मन-घात घात मद सारा ।
सहजो सिद्ध रिद्ध परिवारा ।।
आदि आदि अर्हन् चौबीसा ।
शान्ति प्रदान करें निशि दीसा ।।९।।

*दोहा*
किया शान्ति जिन भक्ति का,
भगवन् कायोत्सर्ग ।।
करूँ दोष आलोचना,
जो प्रद-स्वर्ग-पवर्ग ।।१०।।

*चौपाई*
पाँच सभी कल्याणक धारी ।
आठ प्राति-हारज मन-हारी ।।
अतिशय तीस चार मण्डित हैं ।
अर बत्तीस इन्द्र वन्दित हैं ।।११।।

चौ-विध संघ नखत मानिन्दा ।
राम श्याम चक्री, प्रभु ! चन्दा ।।
‘निलय-विनय’ अन-गिनत गभीरा ।
आद-आद जिन अंतिम वीरा ।।१२।।

अर्चन-पूजन-वन्दन करता ।
उनका मैं अभिनन्दन करता ।।
पीड़ा-दुक्ख-दरद-भय खोवे ।
मेरे कर्मों का क्षय होवे ।।१३।।

रत्नत्रय का मुझे लाभ हो ।
मेरी ‘गति-पंचम-उपाध’ हो ।।
मृत्यु-महोत्सव मना सकूँ मैं ।
जिन-गुण-सम्पद् कमा सकूँ मैं ।।१४।।
अथ पौर्वाह-निक (अप-राह-निक)
देव-शास्त्र-गुरु-वन्दना-क्रियायाम्
पूर्वाचार्या-नुक्-क्रमेण,
सकल-कर्मक्-क्षयार्-थम्,
भाव-पूजा-वन्दना-स्तव समेतम्
श्री समाधि-भक्ति कायोत्सर्गम्
करोम्यहम्
(९बार णमोकार )

*चौपाई*
सदा शास्त्र अभ्यास करूँ मैं ।
सन्त समीप निवास करूँ मैं ।।
मौन धरूँ क्यूँ, गुणी दिखाये ।
गौण करूँ, यूँ दोष-पराये ।।१५।।

भावन-आत्म तत्व, नम-नयना ।
हित-मित रखूँ मधुरतम वयना ।।
जब तक राधा-मुक्ति रिझाऊँ ।
इन्हें जन्म जन्मान्तर पाऊँ ।।१६।।

तारण हारे…शरण सहारे ।
हृदय हमारे…चरण तुम्हारे ।।
चरण तुम्हारे…हृदय हमारा ।
रहे, तलक जब भव-जल-धारा ।।१७।।

स्वर-अक्षर पद मात्रा गलती ।
हुईं, चाहते बिन अनगिनती ।।
हो अपराध क्षमा यह मेरा ।
‘जैसा भी’ मैं अपना तेरा ।।१८।।

*दोहा*
किया समाधी, भक्ति का,
भगवन् कायोत्सर्ग ।।
करूँ दोष आलोचना,
जो प्रद-स्वर्ग-पवर्ग ।।१९।।

*चौपाई*
सम्यक्-दर्शन, सम्यक्-ज्ञाना ।
सम्यक्-चारित, ताना-बाना ।।
रूप अनूप ध्यान परमातम ।
बुद्ध-विशुद्ध ज्ञान धर आतम ।।२०।।

पूजन नित वन्दन करता हूँ ।
अर्चन अभिनन्दन करता हूँ ।।
क्षय होवें दुख संकट सारे ।
क्षय हो जावें कर्म हमारे ।।२१।।

मुझे लाभ रत्नत्रय होवे ।
सुगति गमन, भय-सप्तक खोवे ।।
पाऊँ मरण-समाधी स्वामी ।
बनूँ रतन जिन-गुण आसामी ।।२२।।
‘पुष्पाञ्जलिं क्षिपेत्’
( यहाँ पर नौ बार णमोकार मंत्र
पढ़ना चाहिए )

विसर्जन पाठ
अञ्जन को पार किया ।
चन्दन को तार दिया ।।
नहिं तोर दया का पार ।
नागों का हार किया ।।१।।

धूली-चन्दन-बावन ।
की शूली सिंहासन ।।
धरणेन्द्र देवी-पद्मा ।
मामूली अहि-नागिन ।।२।।

अगनी ‘सर’ नीर किया ।
भगिनी ‘सर’ चीर किया ।।
नहिं तोर दया का पार ।
केशर महावीर किया ।।३।।

बन पड़ीं भूल से भूल ।
कृपया कर दो निर्मूल ।।
बिन कारण तारण हार ।
नहिं तोर दया का पार ।।४।।
दोहा
बस आता, अब धारता,
ईश आशिका सीस ।
कृपा निराकुल आपकी,
बनी रहे निशि-दीस ।।
(पुष्पांजलि क्षिपामि)

आरती
आरती नेमि ब्रह्म-बाला ।
उतारो लिये दीप माला ।।
बाजे झाँझ ।
सुबहो साँझ ।
बाती भाँझ ।
डाल घृत शान्ति दुग्ध धारा ।।
आरती नेमि ब्रह्म-बाला ।
उतारो लिये दीप माला ।।

आरती प्रथम गरभ न्यारी ।
रतनमय सौरी पुरि सारी ।।
भींगे नयन ।
पिछली रयन ।
सोलह सुपन ।
गये देखे माँ शिव द्वारा ।।
आरती नेमि ब्रह्म-बाला ।
उतारो लिये दीप माला ।।१।।

आरती दुतिय जनम न्यारी ।
सँजाई सौरी पुरि प्यारी ।।
फेर निरसन ।
मेर नह्वन ।
देर दर्शन ।
बना दृग सहस इन्द्र द्वारा ।।
आरती नेमि ब्रह्म-बाला ।
उतारो लिये दीप माला ।।२।।

आरती तृतिय त्याग न्यारी ।
चीख पशुअन सुन उर भारी ।।
अजी यदुकुल ।
सजी मंजुल ।
तजी राजुल ।
चढ़े गिरनारी मन मारा ।
आरती नेमि ब्रह्म-बाला ।
उतारो लिये दीप माला ।।३।।

आरती तुरिय ज्ञान न्यारी ।
रखी दृग नासा बलिहारी ! ।।
धन ! सम-शरण ।
केशर हिरण ।
प्रवचन श्रवण ।
प्रकट गुण, विघट करम चारा ।
आरती नेमि ब्रह्म-बाला ।
उतारो लिये दीप माला ।।४।।

आरती और मोक्ष न्यारी ।
जरे अरि ध्यान अग्नि जारी ।।
सुमरण वीर ।
नख-शिख क्षीर ।
समयिक तीर ।
‘निराकुल’ सुख अपरम्पारा ।
बाजे झाँझ ।
सुबहो साँझ ।
बाती भाँझ ।
डाल घृत शान्ति दुग्ध धारा ।।
आरती नेमि ब्रह्म-बाला ।
उतारो लिये दीप माला ।।५।।

 

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