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चौबीस तीर्थंकर विधान  ·  तीर्थक्षेत्र पूजन

खरगोन के बाबा -महा-वीर स्वामी की पूजन

By मुनि श्री निराकुल सागर जी महाराज 

 

खरगोन के बाबा
महा-वीर स्वामी की पूजन

रखते भर आँखों में नीरा ।
बाबा खरगोन महा-वीरा ।
बस झर-झर झिरा दिया फौरन,
सुनते ही औरन दुख-पीड़ा ।
सति द्रोपदि, यही कहे चन्दन,
तड़-तड़ तड़ाट टूटे बन्धन ।
बस कहा सहारा इक थारा,
जा अक्षर पॉंत खड़ा चीरा ।।
बाबा खरगोन महा-वीरा ।
रखते भर आँखों में नीरा ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री महा-वीर जिनेन्द्र !
अत्र अवतर अवतर संवौषट्
(इति आह्वानन)
अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ:
(इति स्थापनम्)
अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट्
(इति सन्निधिकरणम्) ।

भेंटा पानी, सीता रानी ।
आगी खानी, पानी पानी ।।
रॅंग भक्ति सजो, प्रभु-वीर भजो ।
प्रभु-वीर भजो, प्रभु-वीर भजो ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री महा-वीर जिनेन्द्राय नमः
जलं निर्वपामीति स्वाहा ।।

भेंटा चन्दन, त्रिशला नन्दन ।
द्वारे चन्दन, टूटे बन्धन ।।
रॅंग भक्ति सजो, प्रभु-वीर भजो ।
प्रभु-वीर भजो, प्रभु-वीर भजो ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री महा-वीर जिनेन्द्राय नमः
चंदनं निर्वपामीति स्वाहा ।।

भेंटी थाली, अक्षत शाली ।
द्रोपद प्यारी, अक्षत साड़ी ।।
रॅंग भक्ति सजो, प्रभु-वीर भजो ।
प्रभु-वीर भजो, प्रभु-वीर भजो ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री महा-वीर जिनेन्द्राय नमः
अक्षतं निर्वपामीति स्वाहा ।।

गुल प्रभु आगे, रख बढ़ भागे ।
लाखन जागे, दृग् झिर लागे ।।
रॅंग भक्ति सजो, प्रभु-वीर भजो ।
प्रभु-वीर भजो, प्रभु-वीर भजो ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री महा-वीर जिनेन्द्राय नमः
पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा ।।

भेंटा आ…जा, चरु घी ताजा ।
सति नभ गाजा, खुल दरवाजा ॥
रॅंग भक्ति सजो, प्रभु-वीर भजो ।
प्रभु-वीर भजो, प्रभु-वीर भजो ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री महा-वीर जिनेन्द्राय नमः
नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

लौ प्रकटाना, प्रभु रोजाना ।
तिय जय राणा, संकट हाना ।।
रॅंग भक्ति सजो, प्रभु-वीर भजो ।
प्रभु-वीर भजो, प्रभु-वीर भजो ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री महा-वीर जिनेन्द्राय नमः
दीपं निर्वपामीति स्वाहा ।।

भक्ती अंधी, दश-विध-गंधी ।
सुत बजरंगी, ‘तिय-नि:संगी’ ।।
रॅंग भक्ति सजो, प्रभु-वीर भजो ।
प्रभु-वीर भजो, प्रभु-वीर भजो ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री महा-वीर जिनेन्द्राय नमः
धूपं निर्वपामीति स्वाहा ।।

भेंटा भेला, रोहणि, ठेला- ।
सुत अलबेला-, ‘पत’ सुर झेला ।।
रॅंग भक्ति सजो, प्रभु-वीर भजो ।
प्रभु-वीर भजो, प्रभु-वीर भजो ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री महा-वीर जिनेन्द्राय नमः
फलं निर्वपामीति स्वाहा ।।

भेंटी शबरी, सोमा द्रव ‘री ।
अहि घट-गगरी, माला निकरी ।।
रॅंग भक्ति सजो, प्रभु-वीर भजो ।
प्रभु-वीर भजो, प्रभु-वीर भजो ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री महा-वीर जिनेन्द्राय नमः
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

कल्याण अर्घ्य

सोला सपने, माँ के अपने ।
झिर लग लागे रत्न बरसने ।।
जान स्वप्न फल जग हर्षाया ।
उत्सव छाया ।
धन-धन गर्भ महोत्सव आया ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
आषाढ़-शुक्ल-षष्ठ्यां
गर्भ कल्याणक प्राप्ताय
श्री महा-वीर जिनेन्द्राय नमः
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

पुण्य भवान्तर शचि का भारी ।
दर्श मात्र इक भव अवतारी ।।
सार्थ सहस अख मेर न्हवाया ।
उत्सव छाया ।
धन-धन जन्म महोत्सव आया ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
चैत्र-शुक्ल-त्रयोदश्यां
जन्म कल्याणक प्राप्ताय
श्री महा-वीर जिनेन्द्राय नमः
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

पंक्ति बाल-यत ! केतु अहिंसा ।
आ लौकान्तिक निरत प्रशंसा ।।
ओढ़ा अम्बर, छोड़ी माया ।
उत्सव छाया ।
धन-धन त्याग महोत्सव आया ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
मार्ग-शीर्ष-कृष्ण-दशम्यां
दीक्षा कल्याणक प्राप्ताय
श्री महा-वीर जिनेन्द्राय नमः
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

कर्म घातिया चतुष्क घाता ।
जुड़ा चतुष्टय अनंत नाता ।।
सिंह-मृग सार्थ सम-शरण पाया ।
उत्सव छाया ।
धन-धन ज्ञान महोत्सव आया ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
वैशाख-शुक्ल-दशम्यां
ज्ञान कल्याणक प्राप्ताय
श्री महा-वीर जिनेन्द्राय नमः
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

पांच हृस्व अक्षर पढ़ पाना ।
लगा समय-इक हाथ ठिकाना ।।
आज ‘निराकुल’ सुख, चिर भाया ।
उत्सव छाया ।
धन-धन मोक्ष महोत्सव आया ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
कार्तिक-कृष्ण-अमावस्यां
मोक्ष कल्याणक प्राप्ताय
श्री महा-वीर जिनेन्द्राय नमः
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

दोहा
पॉंसे पल्टी दें खिला,
वीर प्रभो खरगोन ।
मिल आते चल पग बढ़ा,
और काम कर गौण ।।

जयमाला
वीर खरगोन हमारे हैं ।
हमें प्राणों से प्यारे हैं ।
क्यूँ न मैं याद रखूॅं पल-पल,
वक्त बेवक्त सहारे हैं ।।

बाद आँखें खोलूॅं सुबहो ।
वीर बोलूॅं, क्यूँ न शुभ हो ।
सुमरनी साँसों की लेकर,
जपूॅं जय वीरा, क्यूँ दुख हो ।।
एक जग तारण-हारे हैं ।
वीर खरगोन हमारे हैं ।
हमें प्राणों से प्यारे हैं ।
क्यूँ न मैं याद रखूॅं पल-पल,
वक्त बेवक्त सहारे हैं ।।१।।

ग्रास मैं मुख में लूॅं पीछे ।
भजूॅं जय वीर आँख मींचे ।
स्वर्ग जाऊँगा निश्चित ही,
जनमना अब न मुझे नीचे ।।
अकेले पालन-हारे हैं ।
वीर खरगोन हमारे हैं ।
हमें प्राणों से प्यारे हैं ।
क्यूँ न मैं याद रखूॅं पल-पल,
वक्त बेवक्त सहारे हैं ।।२।।

निकलता फिर बाहर घर से ।
सुमरता वीर नाम उर से ।।
फाड़ कर छप्पर सुख बरसा,
कभी सपने न कहर बरसे ।।
हाथ आकाश सॅंभाले हैं ।
वीर खरगोन हमारे हैं ।
हमें प्राणों से प्यारे हैं ।
क्यूँ न मैं याद रखूॅं पल-पल,
वक्त बेवक्त सहारे हैं ।।३।।

गोद मॉं निन्द्रा फिर लेटूॅं ।
वीर सिमरूॅं, भीतर पैठूॅं ।
वीर लोरी सुन, सपने में,
सुमरने वीरा उठ बैठूॅं ।।
निराकुल करने वाले हैं ।
वीर खरगोन हमारे हैं ।
हमें प्राणों से प्यारे हैं ।
क्यूँ न मैं याद रखूॅं पल-पल,
वक्त बेवक्त सहारे हैं ।।४।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री महा-वीर जिनेन्द्राय नमः
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

दोहा
महा-वीर खरगोन की,
महिमा बड़ी अपार ।
रखें न चिन्ता कौन की,
अंजन जैसे पार ।।
(पुष्पांजलि क्षिपामि)

विधान प्रारंभ

अष्ट दलकमल पूजा
विधान की जय

श्री णमो णमो अरि-हं-ता-णं ।
सिद्-धा-णं श्री आ-यरि-या-णं ।।
श्री णमो णमो उ-वज्-झा-या-णं ।
लो…ए णमो सव्व सा-हू-णं ।।१।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो जिणाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री महा-वीर जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

बुध मंगल, लोकोत्तम, शरणा ।
सिध मंगल, लोकोत्तम, शरणा ।।
मुनि मंगल, लोकोत्तम, शरणा ।
धुनि मंगल, लोकोत्तम, शरणा ।।२।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो ओहि जिणाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री महा-वीर जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

श्री आदि, अजित, संभव, नन्दन ।
जिन सुमति, पद्म, सुपार्श्व वन्दन ।।
प्रभ-चन्द्र, सुविधि, शीतल स्वामी ।
नुति श्रेय, पूज्य अन्तर्यामी ।।
श्री विमल, अनन्त, धर्म-नाथा ।
नुति शांति, कुन्थ, अर वरदाता ।।
श्री मल्लि, सुव्रत, नम दृग-रेवा ।
नुति नेम, पार्श्व, सन्मत देवा ।।३।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो परमोहि जिणाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री महा-वीर जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

अरिहन्ता, सिद्धा-अगणन्ता ।
आ-यरिया, उवज्ञाया, सन्ता ।।
जिन-धर्म, जिनागम-जगदम्बा ।।
जिन बिम्बालय, जय जिन-बिम्बा ।।४।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो सव्वोहि जिणाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री महा-वीर जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

सिद्धम्-सिद्धम् रटता जाऊँ ।।
जयकारा अरि-हन्त लगाऊँ ।
जो’वन सार्थ बने घर निकले,
मुनि मुख तिन संबोधन पाऊँ ।।
भगवन् और न यह वर चाहूँ ।
अंतिम समय न तुम्हें भुलाऊँ ।।५।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो अणंतोहि जिणाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री महा-वीर जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

‘पाल’ ज्ञान ‘केवल’ बह पाऊँ ।
रोगों की पीड़ा सह पाऊँ ।।
फिर फिर भोगे भोग न फेरूँ,
बन ज्ञाता-दृष्टा रह पाऊँ ।।
भगवन् और न यह वर चाहूँ ।
अंतिम समय न तुम्हें भुलाऊँ ।।६।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो कोट्ठ-बुद्धीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री महा-वीर जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

आपा ना खोऊँ, गम खाऊँ ।
पलटे म-द, द-म ले, थम जाऊँ ।।
सुनूँ ‘कि-रोध’, कपट ना साधूँ,
बन लोभी सुर’भी रम जाऊँ ।।
भगवन् और न यह वर चाहूँ ।
अंतिम समय न तुम्हें भुलाऊँ ।।७।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो बीय-बुद्धीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री महा-वीर जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

सिर पर रखी गांठ सरकाऊँ ।
धागे गांठ न दूँ, कतराऊँ ।
सरक-फूॅंद भी गॉंठ चलाकर,
दृग गीली, ढ़ीली कर पाऊँ ।।
भगवन् और न यह वर चाहूँ ।
अंतिम समय न तुम्हें भुलाऊँ ।।८।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो पदाणु-सारीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री महा-वीर जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

जल, मनहारी चन्दन झारी ।
अक्षत शाली, नन्दन क्यारी ।।
स्वीकारो, मम आराध्य-देव,
चरु, दीप, धूप, श्री-फल थाली ।।01।।
ॐ ह्रां ह्रीं ह्रूं ह्रौं ह्र:
अ-सि-आ-उ-सा नमः
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
अष्टदल कमल हृदयस्-थिताय
श्री महा-वीर जिनेन्द्राय
पूर्णार्घं निर्वपामीति स्वाहा ।।

षोडश दलकमल पूजा
विधान की जय

मनके णमो-कार फेरूँ मैं ।
मन के पाप भाव फेरूँ मैं ।
वन के जोवन दूँ फेरूँ मैं ।
छोड़ छाड़ के नाम चाम से,
जुड़ी हुई पहचान ।
गोद तुम्हारी, सिर हो मेरा,
और नीसरे प्राण ।।९।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो सं-भिण्ण-सोदा-राणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री महा-वीर जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

भोगे भोग न रह रह ध्याऊँ ।
पीड़ा रोग सहन कर जाऊँ ।
दुखद जान संजोग भुलाऊँ ।
दृग न भिजाऊँ जाते जाते,
जागृत करूँ प्रयाण ।
गोद तुम्हारी, सिर हो मेरा,
और नीसरे प्राण ।।१०।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो सयं-बुद्धाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री महा-वीर जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

कर दूँ क्षमा भूल भूलों की ।
करूँ कबूल क्षमा भूलों की ।
संगति और न कर गहलों की ।
धार अनोखी पैठूँ भीतर,
छेड़ स्वानुभव तान ।
गोद तुम्हारी, सिर हो मेरा,
और नीसरे प्राण ।।११।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो पत्तेय-बुद्धाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री महा-वीर जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

बने करूँ कृश भाव कषाया ।
बने करूँ कृश हा ! मन काया ।
बने रहूँ ऋषि सन्तन छाया ।
ग्रन्थन आया करूँ जुगाली,
साध आत्म कल्याण ।
गोद तुम्हारी, सिर हो मेरा,
और नीसरे प्राण ।।१२।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो बोहिय-बुद्धाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री महा-वीर जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

बस अपना चिद्रूप निहारूँ ।
धिया कूप मण्डूक बिसारूँ ।
सदैव वस्तु स्वरूप विचारूँ ।
और लिबास देह मैं बदलूँ,
जन्मूँ स्वर्ग विमान ।
गोद तुम्हारी, सिर हो मेरा,
और नीसरे प्राण ।।१३।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो उजु-मदीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री महा-वीर जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

दया पन्थ पद रखते-रखते ।
महा-मंत्र पद जपते-जपते ।।
करते करते गुम तरंग मन,
हो मेरा सु’मरण ।
यह वर दो भगवन् ।।१४।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो विउल-मदीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री महा-वीर जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

भीतर और उतारता जाऊँ ।
भीतर आ मैं भी-तर आऊँ ।।
ले रटना सोऽम् अवलंबन ।
यह वर दो भगवन् ।
तेरा सुमरण करते-करते,
हो मेरा सु’मरण ।।१५।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो दस-पुव्वीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री महा-वीर जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

कलशा धारें करते-करते ।
कलशा धारे चलते-चलते ।।
करते-करते कल सा जीवन ।
हो मेरा सु’मरण ।
यह वर दो भगवन् ।।१६।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो चउ-दस-पुव्वीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री महा-वीर जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

मागूँ क्षमा कान पकडूँ मैं ।
कर दूँ क्षमा मान बिछडूँ मैं ।
ना अकडूँ लख हस्र दशानन ।
यह वर दो भगवन् ।
तेरा सुमरण करते-करते,
हो मेरा सु’मरण ।।१७।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो अट्ठंग-महा-णिमित्त कु-सलाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री महा-वीर जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

मोती-पन्ने भजते-भजते ।
मोती-पन्ने तजते-तजते ।।
करते-करते मोती अर्पण ।
हो मेरा सु’मरण ।
यह वर दो भगवन् ।।१८।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो वि-उव्वण-इड्ढि-पत्ताणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री महा-वीर जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

‘अर जी’ की मर्जी से रह लूँ ।
पीड़ा, दर्द, वेदना सह लूँ ।।
दहलूँ लेख देख दुख नरकन ।
यह वर दो भगवन् ।
तेरा सुमरण करते-करते,
हो मेरा सु’मरण ।।१९।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो विज्जा-हराणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री महा-वीर जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

पीर पराई हरते-हरते ।
धीर सगाई करते-करते ।।
पढ़ते-पढ़ते वीर संस्-तवन ।
हो मेरा सु’मरण ।
यह वर दो भगवन् ।।२०।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो चा-रणाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री महा-वीर जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

बीज बपे अब डरना क्या है ? ।
कीचड़ स्वर्ण बिगड़ना क्या है ? ।।
करूँ मृत्यु का बढ़ आलिंगन ।
यह वर दो भगवन् ।
तेरा सुमरण करते-करते,
हो मेरा सु’मरण ।।२१।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो पण्ण-समणाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री महा-वीर जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

मुक्त-पुरी का ताज न चाहूँ ।
चक्रवर्ती साम्राज्य न चाहूँ ।।
ना चाहूँ मैं स्वर्ग विमान ।
बस इतना दे दो वरदान ।
हो समाधि पूर्वक अवसान ।।२२।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो आयास-गामीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री महा-वीर जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

चाहूँ अरहन पादमूल हो ।
चाहूँ सन्तन पाद धूल हो ।।
गूॅंजे सद्-ग्रन्थन स्वर कान ।
बस इतना दे दो वरदान ।
हो समाधि पूर्वक अवसान ।।२३।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो आसी-विसाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री महा-वीर जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

नूर आसमानी ना चाहूँ ।
लासानी कुहनूर ना चाहूँ ।।
ना चाहूँ कस्तूर प्रधान ।
बस इतना दे दो वरदान ।
हो समाधि पूर्वक अवसान ।।२४।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो दिट्ठि-वि-साणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री महा-वीर जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

जल, मनहारी चन्दन झारी ।
अक्षत शाली, नन्दन क्यारी ।।
स्वीकारो, मम आराध्य-देव,
चरु, दीप, धूप, श्री-फल थाली ।।02।।
ॐ क्षां क्षीं क्षूं क्षें क्षैं क्षों क्षौं क्षं क्षः
नमोर्-ऽहते सर्वं रक्ष रक्ष हूं फट् नमः
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
षोडशदल-कमल हृदयस्-थिताय
श्री महा-वीर जिनेन्द्राय
पूर्णार्घं निर्वपामीति स्वाहा ।।

चतुर्विंशतिदल कमल पूजा
विधान की जय

चाहूँ नित नवकार सुमरना ।
चाहूँ हो सिर भार उतरना ।।
हो अब सके स्वपर पहचान ।
बस इतना दे दो वरदान ।
हो समाधि पूर्वक अवसान ।।२५।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो उग्ग-तवाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री महा-वीर जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

मैं जा-दुई चिराग ना चाहूँ ।
मैना सुन्दर भाग ना चाहूँ ।।
ना चाहूँ मैं नन्द बगान ।
बस इतना दे दो वरदान ।
हो समाधि पूर्वक अवसान ।।२६।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो दित्त-तवाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री महा-वीर जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

चाहूँ क्षमा माँग पाऊँ मैं ।
गोली गुमां दाग पाऊँ मैं ।।
कर दूँ क्षमा भूल नादान ।
बस इतना दे दो वरदान ।
हो समाधि पूर्वक अवसान ।।२७।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो तत्त-तवाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री महा-वीर जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

चिंता मणी रतन न चाहूँ ।
पारस मणी सुपन ना चाहूँ ।।
ना चाहूँ निधि अछत खदान ।
बस इतना दे दो वरदान ।
हो समाधि पूर्वक अवसान ।।२८।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो महा-तवाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री महा-वीर जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

चाहूँ भोगे भोग न ध्याऊँ ।
पीड़ा रोग सहन कर जाऊँ ।।
हैं संयोग दुखद लूँ जान ।
बस इतना दे दो वरदान ।
हो समाधि पूर्वक अवसान ।।२९।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो घोर-तवाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री महा-वीर जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

विदिश् रु-दिश् हो जश ना चाहूँ ।
मनस् मनस् हो वश ना चाहूँ ।।
ना चाहूँ सिर छत्र वितान ।
बस इतना दे दो वरदान ।
हो समाधि पूर्वक अवसान ।।३०।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो घोर गुण-परक्-कमाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री महा-वीर जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

चाहूँ बनता त्याग अराधूँ ।
बनती कोशिश राग विराधूँ ।।
है सार्थक सु…मरण दूँ ध्यान ।
बस इतना दे दो वरदान ।
हो समाधि पूर्वक अवसान ।।३१।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो घोर-गुणाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री महा-वीर जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

कर दूँ क्षमा सभी को ।
अपने सगे सभी तो ।
मॉंगूँ क्षमा सभी से,
कह किसे गैर आऊँ ।
प्रभु तुमको न भुलाऊँ ।‌।
जब इस जग से जाऊँ ।।३२।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो ऽघोर-गुण-बंभ-यारीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री महा-वीर जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

पीड़ा न कहूँ, सह लूँ ।
जल भिन्न कमल रह लूँ ।।
तन जो मुझे बदलना,
ना डरूँ, न घबराऊँ ।
प्रभु तुमको न भुलाऊँ ।‌।
जब इस जग से जाऊँ ।।३३।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो आमो-सहि-पत्ताणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री महा-वीर जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

तज अन्न, तजूँ पानी ।
छक पीवूॅं जिनवाणी ।‌।
सत्संग करूँ निश दिन,
रट अरिहन्त लगाऊँ ।
प्रभु तुमको न भुलाऊँ ।‌।
जब इस जग से जाऊँ ।।३४।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो खेल्लो-सहि-पत्ताणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री महा-वीर जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

मन की तरंग मारूँ ।
मुनि भेष, जाग धारूँ ।।
तज द्वेष, राग त्यागूँ,
भोगे न भोग ध्याऊँ ।
प्रभु तुमको न भुलाऊँ ।‌।
जब इस जग से जाऊँ ।।३५।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो जल्लो-सहि-पत्ताणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री महा-वीर जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

व्यामोह घटाऊँ घर से ।
व्यामोह मिटाऊँ पर से ।
मैं द्रोह हटाऊँ जड़ से ।
हो उर से दूर अंधेरा ।
बस यही भावना म्हारी,
हो मरण समाधि मेरा ।।३६।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो विट्ठो-सहि-पत्ताणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री महा-वीर जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

खनखन पैसों की भूलूँ ।
अनबन जैसे हो भूलूँ ।
सुमिरन जैसो ना भूलूँ ।
ना भूलूँ, उजड़े मेला ।
बस यही भावना म्हारी,
हो मरण समाधि मेरा ।।३७।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो सव्वो-सहि-पत्ताणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री महा-वीर जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

कुछ कहूँ न, सब कुछ सह लूँ ।
विधि राखे विधि उस रह लूँ ।
तट बीच सिन्धु तक बह लूँ ।
कह लूँ मेरा सो तेरा ।
बस यही भावना म्हारी,
हो मरण समाधि मेरा ।।३८।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो मण-बलीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री महा-वीर जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

चंचलता पास न भटकूँ ।
उत्सुकता दामन झटकूँ ।
अमि झरता माहन गटकूँ ।
हटकूँ मन नव-नव फेरा ।
बस यही भावना म्हारी,
हो मरण समाधि मेरा ।।३९।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो वचि-बलीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री महा-वीर जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

जुड़ पाऊँ मैं शिव मग से ।
जाते जाते इस जग से ।।
भगवान् ! न तुम्हें भुलाऊँ ।
बस यही भावना भाऊँ ।।४०।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो काय-बलीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री महा-वीर जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

बन सके करूँ कृश काया ।
पहले कृश करूँ कषाया ।।
अघ शत्रु कतार बिठाऊँ ।
बस यही भावना भाऊँ ।।४१।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो खीर-सवीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री महा-वीर जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

कर भूल क्षमा भूलों की ।
लूँ माँग क्षमा भूलों की ।।
रट ‘सिद्धम् नमः’ लगाऊँ ।
बस यही भावना भाऊँ ।। ।।४२।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो सप्पि-सवीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री महा-वीर जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

विध रखे, रहूँ उस विधि मैं ।
सुध रखूँ, लखूँ निज निधि मैं ।।
ज्ञायक बस नाम न पाऊँ ।
बस यही भावना भाऊँ ।।४३।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो महुर-सवीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री महा-वीर जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

हट संयोगों से रह लूँ ।
संकट रोगों के सह लूँ ।।
मन भोगे भोग हटाऊँ ।
बस यही भावना भाऊँ ।।४४।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो अमइ-सवीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री महा-वीर जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

कुछ लखने लायक लिख लूँ ।
लिख और न अब कुछ लख लूँ ।।
लिक्खा मन स्लेट मिटाऊँ ।
बस यही भावना भाऊँ ।।४५।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो अक्खीण-महा-णसाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री महा-वीर जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

तन मृणमय मिट्टी गारा ।
मैं चिन्मय चेतन न्यारा ।।
यह दृढ श्रद्धान जमाऊँ ।
बस यही भावना भाऊँ ।।४६।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो वड्ढमाण-बुद्धि-रिसस्स
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री महा-वीर जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

पा प्रणय-पाति गहलों की ।
ओढूँ चूनर पलकों की ।।
परिणत मत हंस रिझाऊँ ।
बस यही भावना भाऊँ ।।४७।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो सव्व-सिद्धा-यद-णाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री महा-वीर जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

‘कल’ छूटे, छोड़ न दूँ क्यों ।
‘गिरि’ कहे, जोड़ रक्खूँ क्यों ।।
सुख सहज ‘निरा-कुल’ पाऊँ ।।
बस यही भावना भाऊँ ।।४८।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो भयवदो महदि
महावीर वड्ढमाण बुद्धिरिसीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री महा-वीर जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

पूर्णार्घ
जल, मनहारी चन्दन झारी ।
अक्षत शाली, नन्दन क्यारी ।।
स्वीकारो, मम आराध्य-देव,
चरु, दीप, धूप, श्री-फल थाली ।।03।।
श्री वृषभादि वर्धमान पर्यंत
परम-देव भगवन् तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
चतुर्विंशति दल कमल
हृदयस्-थिताय
श्री महा-वीर जिनेन्द्राय
पूर्णार्घं निर्वपामीति स्वाहा ।।

महा-अर्घं
दीप, चरु, जल, धूप, गुल, फल, गन्ध, अक्षत ।
ले खड़ा तुम द्वार पर, दे रहा दस्तक ।
सुख ‘निराकुल’ हाथ में मेरे लगेगा,
आश रख विश्वास चरणन रखा मस्तक ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
नव देव भगवन् तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
अष्ट-चत्वारिंशद्-दलकमल
हृदयस्-थिताय
श्री महा-वीर जिनेन्द्राय नमः
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

:: जाप्य ::
।। ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री महावीर तीर्थंकराय नमः ।।

जयमाला चालीसा

दोहा
पाद-मूल में आपके,
छूटे अंतिम श्वास ।
बड़ी और कोई नहीं,
छोटी सी अभिलाष ।।१।।

जिह्वा पर नर्तन करे,
महामंत्र नवकार ।
आ-रोते, रोते गया,
लूँ अब भूल सुधार ।।२।।

गला न पाया जल मुझे,
जला न पाई आग ।
देह बदलना बस मुझे,
मैं शाश्वत बड़भाग ।।३।।

वनिता बनता साथ दे,
बिटिया धन-घर-और ।
लड़के लकड़ी दे चलें,
मरघट तक तन दौड़ ।।४।।

निद्रा ना फुसला चले,
पछताया खरगोश ।
क…छुआ भीतर पूछ ना,
रखूँ जोश, रख होश ।।५।।

मॉंगूँ चलकर खुद क्षमा,
वैर भाव कर गौण ।
करूँ हृदय गदगद क्षमा,
धुला दूध का कौन ? ।।६।।

सुमरूँ भोगे भोग ना,
वमन चाट ले श्वान ।
शब्द विष’य में विष भरा,
चेतूँ बनूँ सुजान ।।७‌।।

भोजन तज, पानी तजूँ,
कर चालूँ कृश काय ।
मन्द मन्दतर कर चलूँ,
पहले सभी कषाय ।।८।।

आधि पहुँच मन तक रही,
व्याधि पहुँच बस देह ।
क्यों न लगा समाधि मैं,
रह लूँ देह विदेह ।।९।।

कायरता कुछ और ना,
काय…रता प्रतिबिम्ब ।
पीर, तीर उस जा लगे,
लिया स्वात्म अवलंब ।।१०।।

विधि धारा में बह चलूँ,
वस्तु स्वरूप विचार ।
पाल बांध भी पनडुबी,
‘सहज निराकुल’ पार ।।११।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री महा-वीर जिनेन्द्राय नमः
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

श्री सरसुति-मंत्र*
ॐ ह्रीम्
अर्हन् मुख कमल-वासिनि
पा-पात्म क्षयंकरि
श्रुत-ज्ञान
ज्वाला सहस्र प्रज्ज्वलिते
सरस्वति !
मत् पापम् हन हन दह दह
क्षाम् क्षीम् क्षूम् क्षौम् क्षः
क्षीरवर-धवले
अ-मृत संभवे
वम् वम् हूम् फट् स्वाहा
मम सन्-निधि-करणे
मम सन्-निधि-करणे
मम सन्-निधि-करणे ।
ॐ ह्रीं जिन मुखोद्-भूत्यै
श्री सरस्वति-देव्यै
अर्घं निर्वपामीति स्वाहा

शांति पाठ
अथ पौर्वाह-निक (अप-राह-निक)
देव-शास्त्र-गुरु-वन्दना-क्रियायाम्
पूर्वाचार्या-नुक्-क्रमेण,
सकल-कर्मक्-क्षयार्-थम्,
भाव-पूजा-वन्दना-स्तव समेतम्
श्री शांति-भक्ति कायोत्सर्गम् करोम्यहम्
(९ बार णमोकार )

*चौपाई*
दर्शन मात्र मेंटता दुखड़ा ।
भाँत चन्द्रमा सुन्दर मुखड़ा ।।
नासा टिके नैन मनहारी ।
करें वन्दना नाथ ! तुम्हारी ।।१।।

आप चक्रधर-पञ्चम नामी ।
वन्द्य इन्द्र शत, अन्तर्-यामी ।।
प्रभो शान्ति-जिन करके करुणा ।
करो शान्ति ! जश निरखो अपना ।।२।।

छत्र, सिंहासन, वृक्ष-अशोका ।
धुनि, दुन्दुभि, दल-चँवर अनोखा ।।
भा-मण्डल झिर-पुष्प-अनूठी ।
प्रातिहार्य-वसु आप विभूती ।।३।।

अर्चित-जगत् ! शान्ति करतारी ।
ढ़ोक करो स्वीकार हमारी ।।
प्राण-भूत, सत्, जीव समस्ता ।
पायें परिणति शान्त प्रशस्ता ।।४।।

देवों में जो देव बड़े हैं ।
चरणों में हित सेव खड़े हैं ।।
हंस-वंश वे जग उजियारे ।
करें शान्ति मण्डित जग सारे ।।५।।
(निम्न श्लोक को पढ़कर
जल छोड़ना चाहिए)

शान्ति कीजिये गाँव-गाँव में ।
विश्व लीजिये पाँव-छाँव में ।।
डूब ‘साध-जन’ उतरें गहरे ।
लहर लहर-पचरंगा लहरे ।।६।।

नृप धार्मिक बलशाली होवे ।
विकृत-प्रकृत मनमानी खोवे ।।
धर्म-चक्र-जिन सौख्य प्रदाता ।
रहे प्रवाहित यूँ हि विधाता ।।७।।

द्रव्य सुमंगल-कारी होवे ।
क्षेत्र अमंगल-हारी होवे ।।
होवे काल सुमंगल-कारी ।
होवें भाव अमंगल-हारी ।।८।।

कर्मन-घात घात मद सारा ।
सहजो सिद्ध रिद्ध परिवारा ।।
आदि आदि अर्हन् चौबीसा ।
शान्ति प्रदान करें निशि दीसा ।।९।।

*दोहा*
किया शान्ति जिन भक्ति का,
भगवन् कायोत्सर्ग ।।
करूँ दोष आलोचना,
जो प्रद-स्वर्ग-पवर्ग ।।१०।।

*चौपाई*
पाँच सभी कल्याणक धारी ।
आठ प्राति-हारज मन-हारी ।।
अतिशय तीस चार मण्डित हैं ।
अर बत्तीस इन्द्र वन्दित हैं ।।११।।

चौ-विध संघ नखत मानिन्दा ।
राम श्याम चक्री, प्रभु ! चन्दा ।।
‘निलय-विनय’ अन-गिनत गभीरा ।
आद-आद जिन अंतिम वीरा ।।१२।।

अर्चन-पूजन-वन्दन करता ।
उनका मैं अभिनन्दन करता ।।
पीड़ा-दुक्ख-दरद-भय खोवे ।
मेरे कर्मों का क्षय होवे ।।१३।।

रत्नत्रय का मुझे लाभ हो ।
मेरी ‘गति-पंचम-उपाध’ हो ।।
मृत्यु-महोत्सव मना सकूँ मैं ।
जिन-गुण-सम्पद् कमा सकूँ मैं ।।१४।।
अथ पौर्वाह-निक (अप-राह-निक)
देव-शास्त्र-गुरु-वन्दना-क्रियायाम्
पूर्वाचार्या-नुक्-क्रमेण,
सकल-कर्मक्-क्षयार्-थम्,
भाव-पूजा-वन्दना-स्तव समेतम्
श्री समाधि-भक्ति कायोत्सर्गम्
करोम्यहम्
(९बार णमोकार )

*चौपाई*
सदा शास्त्र अभ्यास करूँ मैं ।
सन्त समीप निवास करूँ मैं ।।
मौन धरूँ क्यूँ, गुणी दिखाये ।
गौण करूँ, यूँ दोष-पराये ।।१५।।

भावन-आत्म तत्व, नम-नयना ।
हित-मित रखूँ मधुरतम वयना ।।
जब तक राधा-मुक्ति रिझाऊँ ।
इन्हें जन्म जन्मान्तर पाऊँ ।।१६।।

तारण हारे…शरण सहारे ।
हृदय हमारे…चरण तुम्हारे ।।
चरण तुम्हारे…हृदय हमारा ।
रहे, तलक जब भव-जल-धारा ।।१७।।

स्वर-अक्षर पद मात्रा गलती ।
हुईं, चाहते बिन अनगिनती ।।
हो अपराध क्षमा यह मेरा ।
‘जैसा भी’ मैं अपना तेरा ।।१८।।

*दोहा*
किया समाधी, भक्ति का,
भगवन् कायोत्सर्ग ।।
करूँ दोष आलोचना,
जो प्रद-स्वर्ग-पवर्ग ।।१९।।

*चौपाई*
सम्यक्-दर्शन, सम्यक्-ज्ञाना ।
सम्यक्-चारित, ताना-बाना ।।
रूप अनूप ध्यान परमातम ।
बुद्ध-विशुद्ध ज्ञान धर आतम ।।२०।।

पूजन नित वन्दन करता हूँ ।
अर्चन अभिनन्दन करता हूँ ।।
क्षय होवें दुख संकट सारे ।
क्षय हो जावें कर्म हमारे ।।२१।।

मुझे लाभ रत्नत्रय होवे ।
सुगति गमन, भय-सप्तक खोवे ।।
पाऊँ मरण-समाधी स्वामी ।
बनूँ रतन जिन-गुण आसामी ।।२२।।
‘पुष्पाञ्जलिं क्षिपेत्’
( यहाँ पर नौ बार णमोकार मंत्र
पढ़ना चाहिए )

विसर्जन पाठ
अञ्जन को पार किया ।
चन्दन को तार दिया ।।
नहिं तोर दया का पार ।
नागों का हार किया ।।१।।

धूली-चन्दन-बावन ।
की शूली सिंहासन ।।
धरणेन्द्र देवी-पद्मा ।
मामूली अहि-नागिन ।।२।।

अगनी ‘सर’ नीर किया ।
भगिनी ‘सर’ चीर किया ।।
नहिं तोर दया का पार ।
केशर महावीर किया ।।३।।

बन पड़ीं भूल से भूल ।
कृपया कर दो निर्मूल ।।
बिन कारण तारण हार ।
नहिं तोर दया का पार ।।४।।
दोहा
बस आता, अब धारता,
ईश आशिका सीस ।
कृपा निराकुल आपकी,
बनी रहे निशि-दीस ।।
(पुष्पांजलि क्षिपामि)

आरती
जय जिनेन्द्र, जय जिनेन्द्र,
जय जिनेन्द्र देवा ।
जोड़ हाथ, झुका माथ,
इन्द्र करे सेवा ।।१।।

छह महिने गर्भ पूर्व,
रत्नों की बरसा ।
निश पिछली देख स्वप्न,
मात रही हरषा ।।
दर्श मात्र शचि समेत,
तट सुरेन्द्र खेवा ।
जय जिनेन्द्र, जय जिनेन्द्र,
जय जिनेन्द्र देवा ।।१।।

क्षीर-नीर भर कलशा,
शीश इन्द्र ढ़ोरे ।
लख टकेक सहस नेत्र,
पुण्य धन ! बटोरे ।।
वस्त्र भोग ले मनोग,
खड़े सुर सदैवा ।
जय जिनेन्द्र, जय जिनेन्द्र,
जय जिनेन्द्र देवा ।।२।।

राग-आग जान मान,
राज भेष मुंचन ।
नमः सिद्ध बोल दीक्ष,
स्वयं केश लुंचन ।।
ज्ञान चार चार आंख,
आंख गंग-रेवा ।
जय जिनेन्द्र, जय जिनेन्द्र,
जय जिनेन्द्र देवा ।।३।।

सींह हिरण समव-शरण,
दिव्य धुनी गूँजी ।
कर्म दहन, ध्यान अगन,
सुख अपूर्व पूॅंजी ।।
पिंजरे से सर्व काल,
मुक्त इक परेवा ।
जोड़ हाथ, झुका माथ,
इन्द्र करे सेवा ।
जय जिनेन्द्र, जय जिनेन्द्र,
जय जिनेन्द्र देवा ।।४।।

 

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