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विधान

03. चौसठ ऋद्धिधारी विधान

By मुनि श्री निराकुल सागर जी महाराज 

 

‘वर्धमान मंत्र’

ॐ
णमो भयवदो
वड्ढ-माणस्स
रिसहस्स
जस्स चक्कम् जलन्तम्‌ गच्छइ
आयासम् पायालम् लोयाणम् भूयाणम्
जूये वा, विवाये वा
रणंगणे वा, रायंगणे वा
थम्भणे वा, मोहणे वा
सव्व पाण, भूद, जीव, सत्ताणम्
अवराजिदो भवदु
मे रक्ख-रक्ख स्वाहा
ते रक्ख-रक्ख स्वाहा
ते मे रक्ख-रक्ख स्वाहा ।।
ॐ ह्रीं वर्तमान शासन नायक
श्री वर्धमान जिनेन्द्राय नमः
अर्घं निर्वपामीति स्वाहा ।।

*समर्पण भावना*
‘धन्य घड़ी, धन्य भाग’
‘धन्य घड़ी, धन्य भाग’

टूट चली चिर निद्रा,
जुड़ चली अपूर्व जाग ।
चीर घना अंधकार,
एक जग उठा चिराग ।
‘धन्य घड़ी, धन्य भाग’
‘धन्य घड़ी, धन्य भाग’

हाथ लगी कस्तूरी,
दूर दिखी दौड़-भाग ।
यादें अवशेष द्वेष,
चित् खाने चार राग ।
‘धन्य घड़ी, धन्य भाग’
‘धन्य घड़ी, धन्य भाग’

भँवरे-सा पहर-पहर,
पिऊँ स्वानुभव पराग ।
अहा ! साँझ से पहले,
प्रकट हो चला विराग ।
‘धन्य घड़ी, धन्य भाग’
‘धन्य घड़ी, धन्य भाग’

*विनय-पाठ*
बिन तेरे कौन हमारा ।
इक तेरा सिर्फ सहारा ।।

अरिहन्त, सिद्ध, आचारज ।
उवझाय, साधु चरणा-रज ।।
दैगम्बर-प्रतिमा अ-प्रतिम ।
जिन भवन किर-तिमा किर-तिम ।।
नभ-चुम्बी, शिखर-जिनालय ।
पच-रंगी, ध्वज, ग्रन्थालय ।।
समशरण, जिनागम-धारा ।
जिन-धर्म-अहिंसा न्यारा ।।
कल्याण-धरा-रत्नत्रय ।
जिन-सिद्ध-क्षेत्र-‘धर’-अतिशय ।।
बिन तेरे कौन हमारा ।
इक तेरा सिर्फ सहारा ।।

जिन-वृषभ, अजित, सम्भव-जिन ।
अभि-नन्दन सम्बल दुर्दिन ।।
जिन-सुमति, पदम-प्रभ पाँवन ।
जिन-सुपार्श्व प्रभ-शशि आनन ।।
जिन-पुष्प-दन्त ‘मत’ शीतल ।
जिन-श्रेय-पूज्य बल-निर्बल ।।
जिन-विमल, नन्त-जिन वन्दन ।
जिन-धर्म, शान्ति सुर-नन्दन ।।
जिन-अरह, मल्ल, मुनि-सुव्रत ।
नमि, नेम, पार्श्व, प्रद-सन्मत ।।
बिन तेरे कौन हमारा ।
इक तेरा सिर्फ सहारा ।।

गुरु गौतम अपूर्व गणधर ।
धर-सेन अंग-पूरब-धर ।।
युग आद-पुराण-प्रणेता ।
पाहुड अध्यात्म रचेता ।।
मत अनेकांत संपोषक ।
सिद्धान्त जैन उद्‌घोषक ।।
व्यवहार लोक व्याख्याता ।
अनुशासन शब्द विधाता ।।
जित-प्रवाद, ऊरध-रेता ।
पाहुड़-वैद्यिक, अध्येता ।।
कर्तार गणित जैनागम ।
कर्त्ता अगणित जैनागम ।।
बिन तेरे कौन हमारा ।
इक तेरा सिर्फ सहारा ।।

“पुष्पांजलिं क्षिपामि”

अथ अर्हत् पूजा-प्रतिज्ञायां
पूर्वा-चार्या नुक्रमेण
सकल-कर्म-क्षयार्थं
भावपूजा वन्दनास्तव-समेतं
पंच-महागुरु भक्ति
कायोत्सर्ग करोम्यहम् ।।

ॐ
जय-जय-जय
नमोऽतु-नमोऽतु-नमोऽतु

सब अरिहन्तों को नमस्कार ।
सारे सिद्धों को नमस्कार ।।
आचार्य-वन्दना-उपाध्याय ।
नुति-साध-‘साध’ मन वचन काय ।।
ॐ ह्रीं अनादि-मूल-मंत्रेभ्यो नमः
पुष्पांजलिं क्षिपेत् ।।
( पुष्पांजलि क्षेपण करें )

मंगल जग चार, प्रथम अरिहन ।
मंगल शशि-दूज सिद्ध-भगवन् ।।
दैगम्बर-साध-सन्त मंगल ।
इक दया प्रधान पन्थ मंगल ।।

उत्तम जग चार, प्रथम अरिहन ।
उत्तम शशि-दूज सिद्ध-भगवन् ।।
दैगम्बर-साध-सन्त उत्तम ।
इक दया प्रधान पन्थ उत्तम ।।

शरणा जग चार, प्रथम अरिहन ।
शरणा शशि-दूज सिद्ध-भगवन् ।।
दैगम्बर साध-सन्त शरणा ।
इक दया प्रधान पन्थ शरणा ।।
ॐ नमोऽर्हते स्वाहा
पुष्पांजलिं क्षिपेत् ।।
( पुष्पांजलि क्षेपण करें )

थिर-अथिर अपावन पावन भी ।
कारण वशि-भूत अकारण ही ।।
नवकार मंत्र जो ध्याता है ।
कालिख चिर पाप मिटाता है ।।

‘रे खो क्रन्दन, भीतर आया ।
देखो अंजन भी’तर’ आया ।।
भा-परमातम सुमरण करता ।
आखिर आतम सु-मरण करता ।।

नवकार मन्त्र यह नमस्कार ।
करता पापों को छार-छार ।।
अपराजित मंत्र यही विरला ।
सब मंगल में मंगल पहला ।।

आ-रती प्रथम अरिहन्तों की ।
आ-रती दूसरी सिद्धों की ।।
आचार्य आ-रती उपाध्याय ।
आ-रती पाँचवी सन्तों की ।।

बीजाक्षर ‘अ’ अरिहन्तों का ।
बीजाक्षर ‘सि’ श्री सिद्धों का ।।
आचारज ‘आ’-‘उ’ उपाध्याय ।
नुति बीजाक्षर ‘सा’ सन्तों का ।।

प्रकटाये आठ शगुन विराट ।
जिनने विघटाये कर्म-आठ ।।
इक वर्तमान वधु-मुक्ति कन्त ।
वे सिद्ध तिन्हें वन्दन अनन्त ।।
*दोहा*
करते ही जिन अर्चना,
भक्ति-भाव भरपूर ।
भीति शाकिनी-डाकिनी,
सर्पादिक विष दूर ।।
‘पुष्पांजलिं क्षिपामि’
( पुष्पांजलि क्षेपण करें )

*पंचकल्याणक अर्घ्य*
जल, चन्दन, अछत, पुष्प व्यंजन ।
फल, दीप, धूप, भेंटूँ चरणन ।।
भगवज्-जिनेन्द्र कल्याण पञ्च ।
नहिं रहें दूर कल्याण रञ्च ।।
ॐ ह्रीं श्री भगवतो
गर्भ-जन्म-तप-ज्ञान-निर्वाण पंच-कल्याण-केभ्यो
अर्घ्यं निर्व-पामीति स्वाहा ।।

*पंच परमेष्ठी का अर्घ्य*
जल, चन्दन, अछत, पुष्प व्यंजन ।
फल, दीप, धूप, भेंटूँ चरणन ।।
परमेष्ठि पञ्च गुरु पाद-मूल ।
करने अब तक के पाप धूल ।।
ॐ ह्रीं श्री अर्हत-सिद्धा-चार्यो
पाध्याय सर्व-साधुभ्यो
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

*श्री जिन-सहस्र-नाम का अर्घ्य*
जल, चन्दन, अछत, पुष्प व्यंजन ।
फल, दीप, धूप, भेंटूँ चरणन ।।
जिनवर इक हजार आठ नाम ।
रत ‘सु-मरण’ गुजरें तीन शाम ।।
ॐ ह्रीं श्री भगवज्जिन-
अष्टकाधिक सहस्र नामेभ्यो
अर्घ्यं निर्व-पामीति स्वाहा ।।

*जिनवाणी का अर्घ्य*
जल, चन्दन, अछत, पुष्प व्यंजन ।
फल, दीप, धूप, भेंटूँ चरणन ।।
जिन-देव मुखोद्-भूत माता ।
दो जोड़ ज्ञान-केवल नाता ।।
ॐ ह्रीं सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्राणि तत्त्वार्थ-सूत्र-दशाध्याय
अर्घ्यं निर्व-पामीति स्वाहा ।।

*आचार्य श्री जी का अर्घ्य*
जल, चन्दन, अछत, पुष्प व्यंजन ।
फल, दीप, धूप, भेंटूँ चरणन ।।
निर्ग्रन्थ तीन कम नव करोड़ ।
दो सुख अबाध से डोर जोड़ ।।
ॐ ह्रीं त्रिन्यून-नव-कोटी मुनि-वरेभ्यो
अर्घ्यं निर्व-पामीति स्वाहा ।।

*पूजा-प्रतिज्ञा-पाठ*
अभ्यर्चित मूल संघ जैसी ।
विधि पूजन अपनाऊँ वैसी ।।
अरिहन्त सिद्ध आचार-वन्त ।
करके वन्दन उवझाय सन्त ।।

नित करें जगत् गुरुवर मंगल ।
नित करें जगत पल-पल मंगल ।।
नित करें चतुष्क-नन्त मंगल ।
नित करें चतुष्क-वन्त मंगल ।।

नित करें वंश-मति-हर मंगल ।
नित करें हंस-मति-धर मंगल ।।
नित करें विपद्-मोचन मंगल ।
नित करें जगत्-लोचन मंगल ।।

इक आप जितेन्द्रिय मैं दूजा ।
हो सकूँ, आप ठानूँ पूजा ।।
आठों द्रव्यों को लिये हाथ ।
भावों की शुचिता लिये साथ ।।

संचित अब-तलक पुण्य अपना ।
तुम केवल-ज्ञान रूप अगना ।।
जो, उसमें करता आज होम ।
बन साध, साध लूँ जाप ओम् ।।
ॐ ह्रीं विधि-यज्ञ-प्रतिज्ञानाय
जिन-प्रतिमाग्रे पुष्पांजलिं क्षिपामि ।।

*स्वस्ति-मंगल-पाठ*
वृषभ स्वस्ति ।
अजित स्वस्ति ।
स्वस्ति-स्वस्ति सम्भव जिन ।
स्वस्ति-स्वस्ति अभिनन्दन ।
सुमत स्वस्ति ।
पदम स्वस्ति ।
स्वस्ति-स्वस्ति सुपार्श्व धन ।
स्वस्ति-स्वस्ति चन्द्र-लखन ।
सुविध स्वस्ति ।
शीतल स्वस्ति ।
स्वस्ति-स्वस्ति श्रेयस् दूज ।
स्वस्ति-स्वस्ति वासव-पूज ।
विमल स्वस्ति ।
अनन्त स्वस्ति ।
स्वस्ति-स्वस्ति नाथ-धरम ।
स्वस्ति-स्वस्ति शान्त-परम ।
कुन्थ स्वस्ति ।
अरह स्वस्ति ।
स्वस्ति-स्वस्ति मल्ल-जगत ।
स्वस्ति-स्वस्ति मुनि-सुव्रत ।
नमि स्वस्ति ।
नेम स्वस्ति ।
स्वस्ति-स्वस्ति पार्श्व-गभीर ।
स्वस्ति-स्वस्ति सन्मत-वीर ।
इति श्री-चतु-र्विंशति-तीर्थंकर
स्वस्ति मंगल-विधानं
पुष्पांजलिं क्षिपामि ।।

*परमर्षि-स्वस्ति-पाठ*
धन ! केवल-ज्ञान ऋद्धि-धारी ।
मन-पर्यय-ज्ञान ऋद्धि-धारी ।।
धर-अवधि-ज्ञान जागृत पल-पल ।
ऋषि करें हमारा नित मंगल ।।

धर ऋद्धि एक कोष्-ठस्थ नाम ।
इक बीज पदनु-सारिणि प्रणाम ।।
धर सम्-भिन्-नन, सन्-श्रोतृ, सकल ।
ऋषि करें हमारा नित मंगल ।।

संस्-पर्श, श्रवण, दूरास्वादन ।
धर-ऋद्धि दूरतः अवलोकन ।।
धर-दूर-घ्राण जल-भिन्न-कमल ।
ऋषि करें हमारा नित मंगल ।।

दश-चार ‘पूर्व’ दश बुध-प्रतेक ।
बुध-महा-निमित-अष्टांग एक ।।
धर-प्रज्ञा-श्रमण प्रवादि अचल ।
ऋषि करें हमारा नित मंगल।।

धर-जंघा-चारण, तन्तु, अगन ।
बीजांकुर-चारण, पुष्प-गगन ।।
पर्वत, श्रेणी ‘चारण’ जल-फल ।
ऋषि करें हमारा नित मंगल ।।

धर-अणिमा, महिमा ऋद्धि एक ।
धर-गरिमा, लघिमा ऋद्धि नेक ।।
धर-ऋद्धि वचन, काया, मन, बल ।
ऋषि करें हमारा नित मंगल ।।

वशि अन्तर्-धानिक काम-रूप ।
अप्-प्रती-घात आप्तिक अनूप ।।
प्राकाम्य-ऋद्धि-धर, नैन-सजल ।
ऋषि करें हमारा नित मंगल ।।

धर-दीप्त, तप्त, ब्रम-चर्य-घोर ।
मह-दुग्र, घोर, धर-वर्य-घोर ।।
थित-घोर-पराक्रम बल-निर्बल ।
ऋषि करें हमारा नित मंगल ।।

आमर्ष सर्व-विष आशि-अविष ।
औषध-क्ष्वेल, विष-दृष्टि-अविष ।।
विड्-औषध, औषध-जल्लरु-मल ।
ऋषि करें हमारा नित मंगल ।।

अक्षीण-महानस, घृत-स्रावी ।
अक्षीण-संवास, अमृत-स्रावी ।।
इक ‘सहज-निराकुल’ हृदय-सरल ।
ऋषि करें हमारा नित मंगल ।।
इति परमर्षि स्वस्ति-मंगल-विधान
पुष्पांजलि

*पूजन*
एक सहारा हमें तिहारा ।
जय जय ऋषि, मुनि, यति, अनगारा ॥
साँचा इक निर्ग्रन्थ दुवारा ।
जय जय कारा, जय जय कारा ॥
ॐ ह्रीं श्री ऋद्धिधारी सर्वऋषिभ्यो: नम:
अत्र अवतर अवतर संवौषट् इति आह्वानम् ।
अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ: स्थापनम् ।
अत्र मम सन्निहतो भव भव वषट् सन्निधिकरणम्

कलशी लाकर ।
जल की सादर ॥
भेंट हेत रत्नत्रय धारा ।
एक सहारा ।
हमें तिहारा ।
जय जय ऋषि, मुनि, यति, अनगारा ॥
ॐ ह्रीं श्री ऋद्धिधारी सर्वऋषिभ्यो: नम:
जन्म जरा मृत्यु विनाशनाथ
जलं निर्वाणमीति स्वाहा ।

चन्दन गागर ।
चन्द न ‘भा’ कर ॥
भेंट हेत भव जलधि किनारा ।
एक सहारा ।
हमें तिहारा ।
जय जय ऋषि, मुनि, यति, अनगारा ॥
ॐ ह्रीं श्री ऋद्धिधारी सर्वऋषिभ्यो: नम:
संसार ताप विनाशनाथ
चंदनम् निर्वाणमीति स्वाहा ।

अक्षत पातर ।
अपर क्षपाकर ॥
भेंट हेत सिध रिध परिवारा ।
एक सहारा ।
हमें तिहारा ।
जय जय ऋषि, मुनि, यति, अनगारा ॥
ॐ ह्रीं श्री ऋद्धिधारी सर्वऋषिभ्यो: नम:
अक्षयपद प्राप्ताय
अक्षतान् निर्वाणमीति स्वाहा।

भा रतनारी ।
पुष्प पिटारी ॥
भेंट हेत दिव कुंज विहारा ।
एक सहारा ।
हमें तिहारा ।
जय जय ऋषि, मुनि, यति, अनगारा ॥
ॐ ह्रीं श्री ऋद्धिधारी सर्वऋषिभ्यो: नम:
कामबाण विध्वंशनाय
पुष्पम् निर्वाणमीति स्वाहा ।

अमृत, निराली ।
चरु घृत वाली ॥
भेंट हेत क्षुद-बाध निवारा ।
एक सहारा ।
हमें तिहारा ।
जय जय ऋषि, मुनि, यति, अनगारा ॥
ॐ ह्रीं श्री ऋद्धिधारी सर्वऋषिभ्यो: नम:
क्षुधा रोग विनाशनाथ
नैवेद्यम् निर्वाणमीति स्वाहा ।

गो घी वाली ।
नव दीवाली ॥
भेंट हेत भीतर उजियारा ।
एक सहारा ।
हमें तिहारा ।
जय जय ऋषि, मुनि, यति, अनगारा ॥
ॐ ह्रीं श्री ऋद्धिधारी सर्वऋषिभ्यो: नम:
मोहान्धकार विनाशनाय
दीपम् निर्वाणमीति स्वाहा ।

दश विध गन्धा ।
स्वर्ण सुगन्धा ॥
भेंट हेत निरसन भव-कारा ।
एक सहारा ।
हमें तिहारा ।
जय जय ऋषि, मुनि, यति, अनगारा ॥
ॐ ह्रीं श्री ऋद्धिधारी सर्वऋषिभ्यो: नम:
अष्टकर्म दहनाय
धूपम् निर्वाणमीति स्वाहा ।

दिव्य नवेले ।
श्रीफल भेले ॥
भेंट हेत दिव-शिव अवतारा ।
एक सहारा ।
हमें तिहारा ।
जय जय ऋषि, मुनि, यति, अनगारा ॥
ॐ ह्रीं श्री ऋद्धिधारी सर्वऋषिभ्यो: नम:
मोक्ष फल प्राप्ताय
फलं निर्वाणमीति स्वाहा ।

दिव पुर नाता ।
द्रव्य पराता ॥
भेंट हेत पल अन्त सहारा ।
एक सहारा ।
हमें तिहारा ।
जय जय ऋषि, मुनि, यति, अनगारा ॥
ॐ ह्रीं श्री ऋद्धिधारी सर्वऋषिभ्यो: नम:
अनर्घ्य पद प्राप्ताय
अर्घ्यं निर्वाणमीति स्वाहा ।।

*विधान प्रारंभ*

करुणा, क्षमा भण्डारी ।
ऋषि, मुनि, यती, अनगारी ।।

करके महर्षि का ध्यान ।
मनचाहा मिला वरदान ॥
महिमा महर्षि न्यारी ।
करुणा, क्षमा भण्डारी ॥
ॐ ह्रीं श्री ऋद्धिधारी सर्वऋषिभ्यो: नम:
अत्र अवतर अवतर संवौषट् इति आह्वानम् ।
अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ: स्थापनम् ।
अत्र मम सन्निहतो भव भव वषट् सन्निधिकरणम्

*बुद्धि ऋद्धि*

वैसा काम, जैसा नाम ।
औ’-धी धारते, निष्काम॥
वाणी स्वर्ग-शिव-कारी ।
करुणा, क्षमा भण्डारी॥1॥
ॐ ह्रीं अवधिज्ञान बुद्धि ऋद्धिधारी सर्वऋषिभ्यो नमः

मन की जान लेते बात ।
मन ना मान देते भ्रात॥
‘मनके’ फिरें णवकारी ।
करुणा, क्षमा भण्डारी॥2॥
ॐ ह्रीं मन:पर्ययज्ञान बुद्धि ऋद्धिधारी सर्वऋषिभ्यो नमः ।

जानें जगत् सब इक-साथ ।
‘जीवन मुक्त’ हाथ उपाध॥
केवल ज्ञान रिध धारी ।
करुणा, क्षमा भण्डारी॥3॥
ॐ ह्रीं केवलज्ञान बुद्धि ऋद्धिधारी सर्वऋषिभ्यो नमः ।

छोटा बीज, वृक्ष महान ।
रखते बीज-पद का ज्ञान॥
बुद्धी बीज भव हारी ।
करुणा, क्षमा भण्डारी॥4॥
ॐ ह्रीं बीजबुद्धि ऋद्धिधारी सर्वऋषिभ्यो नमः ।

भवि ! धानाद कोष्ठ अधार ।
धारण रूप ज्ञान अपार॥
बुद्धी कोष्ठ शिव कारी।
करुणा, क्षमा भण्डारी॥5॥
ॐ ह्रीं कोष्टबुद्धि ऋद्धिधारी सर्वऋषिभ्यो नमः ।

पद अनुशरण कार अशेष ।
ईहा-वाय ज्ञान विशेष॥
रिध पद-अनुशरण न्यारी ।
करुणा, क्षमा भण्डारी॥6॥
ॐ ह्रीं पादानुसारिणी बुद्धि ऋद्धिधारी सर्वऋषिभ्यो नमः।

युगपत् सुनें भाष-विभिन्न ।
‘बहु’-विध क्षिप्र ज्ञाँ सम्पन्न॥
धन ! संभिन्न श्रोता ‘री ।
करुणा, क्षमा भण्डारी॥7॥
ॐ ह्रीं संभिन्न श्रोतृत्व बुद्धि ऋद्धिधारी सर्वऋषिभ्यो नमः ।

चाखें दूर योजन संख ।
जे जे स्वाद भूम, निकंख॥
धन ! रिध दूर स्वादा ‘री।
करुणा, क्षमा भण्डारी॥8॥
ॐ ह्रीं दूरस्वादित्व बुद्धि ऋद्धिधारी सर्वऋषिभ्यो नम:।

पर्सें दूर योजन संख ।
जे जे पर्श भूम, निकंख॥
धन ! रिध दूर-पर्शा ‘री।
करुणा, क्षमा भण्डारी॥9॥
ॐ ह्रीं दूरस्पर्शत्व बुद्धि ऋद्धिधारी सर्वऋषिभ्यो नमः ।

सूँघें दूर योजन संख।
जे जे गन्ध भूम, निकंख ॥
धन ! रिध दूर-धाणा ‘री।
करुणा, क्षमा भण्डारी॥10॥
ॐ ह्रीं दूरघ्राणत्व बुद्धि ऋद्धिधारी सर्वऋषिभ्यो नमः ।

सुन लें दूर योजन संख ।
जे जे शब्द भूम, निकंख॥
धन ! रिध दूर-श्रवणा ‘री।
करुणा, क्षमा भण्डारी॥11॥
ॐ ह्रीं दूरश्रवणत्व बुद्धि ऋद्धिधारी सर्वऋषिभ्यो नमः ।

देखें दूर योजन संख ।
जे जे वर्ण भूम, निकंख॥
धन ! रिध दूर-दर्शा ‘री।
करुणा, क्षमा भण्डारी॥12॥
ॐ ह्रीं दूरदर्शित्व बुद्धि ऋद्धिधारी सर्वऋषिभ्यो नमः ।

पढ़ कर अंग-ग्यारह सर्व ।
पढ़ लें पूर्व दश, गतगर्व॥
धन ! रिध पूर्व दश धारी ।
करुणा, क्षमा भण्डारी॥13॥
ॐ ह्रीं दश पूर्वित्व बुद्धि ऋद्धिधारी सर्वऋषिभ्यो नमः ।

पाठी सर्व चौदह पूर्व ।
अर्चा-महा देव अपूर्व॥
धन ! रिध पूर्व चौदा ‘री ।
करुणा, क्षमा भण्डारी॥14॥
ॐ ह्रीं चतुर्दश पूर्वित्व बुद्धि ऋद्धिधारी सर्वऋषिभ्यो नमः ।

जानें फल शुभाशुभ लोक ।
आठ निमित्त द्वारा, ढ़ोक॥
अंगठ निमित महतारी ।
करुणा, क्षमा भण्डारी॥15॥
ॐ ह्रीं अष्टांग निमित्त बुद्धि ऋद्धिधारी सर्वऋषिभ्यो नमः

कर्मज, वैनयिक, परिणाम ।
उत्पत, चार प्रज्ञा नाम॥
प्रज्ञा श्रमण दृग्-धारी ।
करुणा, क्षमा भण्डारी॥16॥
ॐ ह्रीं प्रज्ञाश्रमणत्व बुद्धि ऋद्धिधारी सर्वऋषिभ्यो नमः ।

बिन उपदेश ही वैराग ।
बुद्ध निमित्त इक, बड़-भाग॥
बुध प्रत्येक जय थारी ।
करुणा, क्षमा भण्डारी॥17॥
ॐ ह्रीं प्रत्येक बुद्धि ऋद्धिधारी सर्वऋषिभ्यो नमः ।

परमत-वादि अभिजित एक ।
‘भी’तर डूब, हंस विवेक॥
बुध वादित्व जय थारी ।
करुणा, क्षमा भण्डारी॥18॥
ॐ ह्रीं वादित्व बुद्धि ऋद्धिधारी सर्वऋषिभ्यो नमः।

*विक्रिया ऋद्धि*

अणु से अणू कर लें देह ।
रहते भले देह, विदेह॥
अणिमा विक्रिया न्यारी ।
करुणा, क्षमा भण्डारी॥19॥
ॐ ह्रीं अणिमा विक्रिया ऋद्धिधारी सर्वऋषिभ्यो नमः।

मह से महत् कर लें देह ।
रहते भले देह, विदेह॥
महिमा विक्रिया न्यारी ।
करुणा, क्षमा भण्डारी॥20॥
ॐ ह्रीं महिमा विक्रिया ऋद्धिधारी सर्वऋषिभ्यो नमः।

लघु से लघू कर लें देह ।
रहते भले देह, विदेह॥
लघिमा विक्रिया न्यारी ।
करुणा, क्षमा भण्डारी॥21॥
ॐ ह्रीं लघिमा विक्रिया ऋद्धिधारी सर्वऋषिभ्यो नमः।

गुरु से गुरू कर लें देह ।
रहते ‘भले देह विदेह॥
गरिमा विक्रिया न्यारी ।
करुणा, क्षमा भण्डारी॥22॥
ॐ ह्रीं गरिमा विक्रिया ऋद्धिधारी सर्वऋषिभ्यो नमः ।

बैठे धरा अम्बर पार ।
जपते अनवरत णवकार॥
प्रापति विक्रिया धारी ।
करुणा, क्षमा भण्डारी॥23॥
ॐ ह्रीं प्राप्ति विक्रिया ऋद्धिधारी सर्वऋषिभ्यो नमः ।

तैरें भूम, नीर विहार ।
जपते अनवरत णवकार॥
धन ! प्राकाम्य रिध धारी ।
करुणा, क्षमा भण्डारी॥24॥
ॐ ह्रीं प्राकाम्य विक्रिया ऋद्धिधारी सर्वऋषिभ्यो नमः ।

आज्ञा मानता संसार ।
जपते अनवरत णवकार॥
धन ! ईशत्व रिध धारी ।
करुणा, क्षमा भण्डारी॥25॥
ॐ ह्रीं ईशत्व विक्रिया ऋद्धिधारी सर्वऋषिभ्यो नमः ।

वश में नाग, नर, सुर-चार ।
जपते अनवरत णवकार॥
रिध वशि-विक्रिया धारी ।
करुणा, क्षमा भण्डारी॥26॥
ॐ ह्रीं वशित्व विक्रिया ऋद्धिधारी सर्वऋषिभ्यो नमः ।

सहज प्रवेश वृक्ष-पहाड़ ।
जपते अनवरत णवकार॥
अप्-प्रति घात रिध धारी ।
करुणा, क्षमा भण्डारी॥27॥
ॐ ह्रीं अप्रतिघात विक्रिया ऋद्धिधारी सर्वऋषिभ्यो नमः ।

लेते आप सब को देख ।
देते दिखाई कब, लेख॥
अन्तर्धान रिध धारी ।
करुणा, क्षमा भण्डारी॥28॥
ॐ ह्रीं अंतर्धान विक्रिया ऋद्धिधारी सर्वऋषिभ्यो नमः ।

मन चाहा बना लें रूप ।
लखते अनवरत चिद्रूप॥
सिध-रिध कामरूपा ‘री ।
करुणा, क्षमा भण्डारी॥29॥
ॐ ह्रीं कामरूपित्व विक्रिया ऋद्धिधारी सर्वऋषिभ्यो नमः।

चारण क्रिया ऋद्धिधारी

हिंसा हेत रञ्च न सन्ध ।
सहजो गमन नभ निष्पन्द॥
चारण क्रिया नभ धारी ।
करुणा, क्षमा भण्डारी॥30॥
ॐ ह्रीं नभस्तल गामित्वचारण क्रिया ऋद्धिधारी सर्वऋषिभ्यो नमः।

हिंसा हेत रञ्च न सन्ध ।
सहजो गमन जल निष्पन्द॥
चारण क्रिया जल धारी ।
करुणा, क्षमा भण्डारी॥31॥
ॐ ह्रीं जल चारण क्रिया ऋद्धिधारी सर्वऋषिभ्यो नमः ।

हिंसा हेत रञ्च न सन्ध ।
करते गमन अविचल जंघ॥
चारण क्रिया जंघा ‘री ।
करुणा, क्षमा भण्डारी॥32॥
ॐ ह्रीं जंघा चारण क्रिया ऋद्धिधारी सर्वऋषिभ्यो नमः ।

हिंसा हेत रञ्च न सन्ध ।
फल पुष्परु गमन निष्पन्द॥
धन गुल-पत्र-फल चारी ।
करुणा, क्षमा भण्डारी॥33॥
ॐ ह्रीं फल पुष्प पत्र चारण क्रिया ऋद्धिधारी सर्वऋषिभ्यो नमः ।

हिंसा हेत रञ्च न सन्ध ।
सहजो गमन घन निष्पन्द॥
चारण क्रिया घन धारी ।
करुणा, क्षमा भण्डारी॥34॥
ॐ ह्रीं मेघ चारण क्रिया ऋद्धिधारी सर्वऋषिभ्यो नमः ।

हिंसा हेत रञ्च न सन्ध ।
सहजो गमन मकड़ी-तन्त॥
चारण तन्तु रिध धारी ।
करुणा, क्षमा भण्डारी॥35॥
ॐ ह्रीं तन्तु चारण क्रिया ऋद्धिधारी सर्वऋषिभ्यो नमः ।

हिंसा हेत रञ्च न सन्ध ।
धूमानल गमन निष्पन्द॥
चारण अगनी धूमा ‘री ।
करुणा, क्षमा भण्डारी॥36॥
ॐ ह्रीं अग्निधूम चारण क्रिया ऋद्धिधारी सर्वऋषिभ्यो नमः ।

हिंसा हेतु रञ्च न सन्ध ।
सहजो गमन रवि रिख चन्द॥
चारण ज्योति रिध धारी ।
करुणा, क्षमा भण्डारी॥37॥
ॐ ह्रीं ज्योतिश्चारण क्रिया ऋद्धिधारी सर्वऋषिभ्यो नमः ।

हिंसा हेत रञ्च न सन्ध ।
मारुत गमन धन ! निष्पन्द॥
चारण मरुत् रिध धारी ।
करुणा, क्षमा भण्डारी॥38॥
ॐ ह्रीं मरुच्चारण क्रिया ऋद्धिधारी सर्वऋषिभ्यो नमः ।

तप ऋद्धिधारी

घट में जब तलक है श्वास ।
क्रमश: बढ़ा एक उपास॥
धन ! धन ! उग्र तप धारी ।
करुणा, क्षमा भण्डारी॥39॥
ॐ ह्रीं उग्र तप ऋद्धिधारी सर्वऋषिभ्यो नमः ।

जब-तब साधना उपवास ।
देह प्रदीप्त शशि उपहास॥
धन ! धन ! दीप्त तप धारी ।
करुणा, क्षमा भण्डारी॥40॥
ॐ ह्री दीप्त तपः ऋद्धिधारी सर्वऋषिभ्यो नमः ।

भोजन कम नहीं, पर्याप्त ।
कब नीहार आप समाप्त॥
धन ! धन ! तप्त तप धारी ।
करुणा, क्षमा भण्डारी॥41॥
ॐ ह्री तप्त तप ऋद्धिधारी सर्वऋषिभ्यो नमः ।

केवल ज्ञान छोड़ समस्त ।
रिध सिध तप महत्त्व विशिष्ट॥
धन ! धन ! महातप धारी ।
करुणा, क्षमा भण्डारी॥42॥
ॐ ह्रीं महातप ऋद्धिधारी सर्वऋषिभ्यो नमः ।

द्वादश तप तपें दिन-रात ।
साधें योग मूल-तराद॥
धन ! धन ! घोरतप धारी ।
करुणा, क्षमा भण्डारी॥43॥
ॐ ह्री घोरतप ऋद्धिधारी सर्वऋषिभ्यो नमः ।

सार्थक नाम ‘गिर’ निश्वास ।
छवि-रवि, दें सुखा जल-राश॥
ना-मनु-रूप तप धारी ।
करुणा, क्षमा भण्डारी॥44॥
ॐ ह्रीं घोर पराक्रम तप ऋद्धिधारी सर्वऋषिभ्यो नमः ।

अक्षर ब्रह्म आप प्रभाव ।
ईत्यादिक लगें यम गाँव॥
ब्रह्मा-घोर तप धारी ।
करुणा, क्षमा भण्डारी॥45॥
ॐ ह्रीं अघोर ब्रह्मचारित्व तप ऋद्धिधारी सर्वऋषिभ्यो नमः ।

बल ऋद्धिधारी

लागा बस मुहूरत एक ।
चिन्तन सकल-श्रुत, अभिलेख॥
धन ! बल-रिद्ध मन धारी।
करुणा, क्षमा भण्डारी॥46॥
ॐ ह्रीं मनोबल ऋद्धिधारी सर्वऋषिभ्यो नमः ।

बार अनेक श्रुत संपाठ ।
माथे-शल न खेद, विषाद॥
धन ! रिध वचन बल धारी ।
करुणा, क्षमा भण्डारी॥47॥
ॐ ह्रीं वचन बल ऋद्धिधारी सर्वऋषिभ्यो नमः ।

पशु लख शिल खुजावत खाज ।
चिर-गिर खड़े, मोख-जहाज॥
धन ! रिध-काय बल धारी ।
करुणा, क्षमा भण्डारी॥48॥
ॐ ह्रीं काय बल ऋद्धिधारी सर्वऋषिभ्यो नमः ।

औषधि ऋद्धिधारी

‘बल’ आता-पनादिक ‘योग’ ।
पद रज-पर्श, अपहर-रोग॥
औषध रिध अमर्शा ‘री ।
करुणा, क्षमा भण्डारी॥49॥
ॐ ह्रीं आमर्शौषधि ऋद्धिधारी सर्वऋषिभ्यो नमः ।

‘बल’ आता-पनादिक ‘योग’ ।
पर्श कफाद, अपहर रोग॥
औषध खेल्ल रिध धारी ।
करुणा, क्षमा भण्डारी॥50॥
ॐ ह्रीं खेल्लौषधि ऋद्धिधारी सर्वऋषिभ्यो नमः ।

‘बल’ आता-पनादिक ‘योग’ ।
पर्श-पसेव अपहर रोग॥
औषध जल्ल रिध धारी ।
करुणा, क्षमा भण्डारी॥51॥
ॐ ह्रीं जल्लौषधि ऋद्धिधारी सर्वऋषिभ्यो नमः ।

‘बल’ आता-पनादिक ‘योग’।
तन-मल पर्श अपहर रोग॥
धन ! रिध मलौषध धारी ।
करुणा, क्षमा भण्डारी॥52॥
ॐ ह्रीं मल्लौषधि ऋद्धिधारी सर्वऋषिभ्यो नमः ।

‘बल’ आता-पनादिक ‘योग’ ।
‘विष्ठा-पर्श, अपहर रोग॥
औषध-विष्ठ रिध धारी ।
करुणा, क्षमा भण्डारी॥53॥
ॐ ह्रीं विप्रौषधि ऋद्धिधारी सर्वऋषिभ्यो नमः।

‘बल’ आता-पनादिक ‘योग’ ।
सर्वस्-पर्श, अपहर रोग॥
औषध सर्व रिध धारी ।
करुणा, क्षमा भण्डारी॥54॥
ॐ ह्रीं सर्वौषधि ऋद्धिधारी सर्वऋषिभ्यो नमः।

‘बल आता-पनादिक ‘योग’ ।
निर्विष श्रवण-वच संजोग॥
रिध निर्-विषौ-षध धारी ।
करुणा, क्षमा भण्डारी॥55॥
ॐ ह्रीं मुख निर्-विषौ-षधि ऋद्धिधारी सर्वऋषिभ्यो नमः।

‘बल’ आता-पनादिक ‘योग’ ।
निर्विष पात-दृग संजोग॥
दृग् निर्-विषौ-षध धारी ।
करुणा, क्षमा भण्डारी॥56॥
ॐ ह्रीं दृष्टि निर्-विषौ-षधि ऋद्धिधारी सर्वऋषिभ्यो नमः ।

रस ऋद्धिधारी

मुँह से निकलते ही बात ।
प्रतिफल आ लगे झट हाथ॥
रस रिध आशि-विष धारी ।
करुणा, क्षमा भण्डारी॥57॥
ॐ ह्रीं आशीर्विष रस ऋद्धिधारी सर्वऋषिभ्यो नमः ।

ले, जे भाव दृष्टी पात ।
प्रतिफल आ लगे झट हाथ॥
रस रिध दृष्टि विष धारी ।
करुणा, क्षमा भण्डारी॥58॥
ॐ ह्रीं दृष्टिविष रस ऋद्धिधारी सर्वऋषिभ्यो नमः

भो ! जन-पाण, भोजन पान ।
‘लागे हाथ’ दुग्ध समान॥
क्षीरस्-स्रावि रिध धारी ।
करुणा, क्षमा भण्डारी॥59॥
ॐ ह्रीं क्षीरस्रावी रस ऋद्धिधारी सर्वऋषिभ्यो नमः ।

भो ! जन पाण, भोजन पान ।
‘लागे हाथ’ मधुः समान॥
रस मधु-स्रावि रिध धारी ।
करुणा, क्षमा भण्डारी॥60॥
ॐ ह्रीं मधुस्रावी रस ऋद्धिधारी सर्वऋषिभ्यो नमः ।

भो ! जन पाण, भोजन पान ।
‘लागे हाथ’ अमृत समान॥
अमृरस् स्रावि रिध धारी ।
करुणा, क्षमा भण्डारी॥61॥
ॐ ह्रीं अमृतस्रावी रस ऋद्धिधारी सर्वऋषिभ्यो नमः

भो ! जन पाण, भोजन-पान ।
‘लागे हाथ’ घिरत समान॥
सर्पिस् स्रावि रिध धारी ।
करुणा, क्षमा भण्डारी॥62॥
ॐ ह्रीं सर्पिस्रावी रस ऋद्धिधारी सर्वऋषिभ्यो नमः

अक्षीण ऋद्धिधारी

घर जिस महर्षिन् आहार ।
जीमे सैन्य चक्रि अपार॥
अक्षत महानस धारी ।
करुणा, क्षमा भण्डारी॥63॥
ॐ ह्रीं अक्षीण महानस ऋद्धिधारी सर्वऋषिभ्यो नमः ।

कुटि जिस, थमें ‘पाणी पात्र’ ।
बैठें ‘सहज’ प्राणी मात्र॥
अक्षत महालय धारी ।
करुणा, क्षमा भण्डारी॥64॥
ॐ ह्रीं अक्षीण महालय ऋद्धिधारी सर्वऋषिभ्यो नमः

जाप्य-मंत्र
‘ॐ ह्र: श्री ऋद्धिधारी
सर्वऋषिभ्यो: नमो नमः’

जयमाला
==दोहा==
देह नगन दे देशना,
जग विरागता सार ।
जे धरती के देवता,
वन्दन बारम्बार ।।

सद्गुरु अपने जैसे एक

नरक दुख डर जो’वन चाले,
जगा अन्तर्मन हंस विवेक ।
सद्गुरु अपने जैसे एक

आन तरु तल आसन माड़ा,
देख बिजुरी नभ काले मेघ ।।
सद्गुरु अपने जैसे एक

दोपहर गीषम चढ़ पर्वत,
सूर सन्मुख ठाड़े अनिमेष ।
सद्गुरु अपने जैसे एक

तुषारी ठण्ड निश गुजारी,
ओढ़ धृति कम्बल चतुपथ बैठ ।
सद्गुरु अपने जैसे एक

-दोहा-
दुनिया स्वारथ साधती,
इक साँचे गुरुदेव ।
करने मिले, न छोड़िये,
पल भी गुरु की सेव ।।

‘सरसुति-मंत्र’

ॐ ह्रीं अर्हन्
मुख कमल-वासिनी
पापात्-म(क्) क्षयं-करी
श्रुत(ज्)-ज्-ञानज्-ज्वाला
सह(स्)-स्र(प्) प्रज्-ज्वलिते
सरस्वति-मत्
पापम् हन हन
दह दह
क्षां क्षीं क्षूं क्षौं क्षः
क्षीरवर-धवले
अमृत-संभवे
वं वं हूं फट् स्वाहा
मम सन्-निधि-करणे
मम सन्-निधि-करणे
मम सन्-निधि-करणे ।
ॐ ह्रीं जिन मुखोद्-भूत्यै
श्री सरस्वति-देव्यै
अर्घं निर्वपामीति स्वाहा ।।

*शांति पाठ*
अथ पौर्वाह-निक (अप-राह-निक)
देव-शास्त्र-गुरु-वन्दना-क्रियायाम्
पूर्वाचार्या-नुक्-क्रमेण,
सकल-कर्मक्-क्षयार्-थम्,
भाव-पूजा-वन्दना-स्तव समेतम् श्री शांति-भक्ति कायोत्सर्गम् ,
करोम्यहम्
(९ बार णमोकार )

*चौपाई*
दर्शन मात्र मेंटता दुखड़ा ।
भाँत चन्द्रमा सुन्दर मुखड़ा ।।
नासा टिके नैन मनहारी ।
करें वन्दना नाथ ! तुम्हारी ।।

आप चक्रधर-पञ्चम नामी ।
वन्द्य इन्द्र शत, अन्तर्-यामी ।।
प्रभो शान्ति-जिन करके करुणा ।
करो शान्ति ! जश निरखो अपना ।।

छत्र, सिंहासन, वृक्ष-अशोका ।
धुनि, दुन्दुभि, दल-चँवर अनोखा ।।
भा-मण्डल झिर-पुष्प-अनूठी ।
प्रातिहार्य-वसु आप विभूती ।।

अर्चित-जगत् ! शान्ति करतारी ।
ढ़ोक करो स्वीकार हमारी ।।
प्राण-भूत, सत्, जीव समस्ता ।
पायें परिणति शान्त प्रशस्ता ।।

देवों में जो देव बड़े हैं ।
चरणों में हित सेव खड़े हैं ।।
हंस-वंश वे जग उजियारे ।
करें शान्ति मण्डित जग सारे ।।
(निम्न श्लोक को पढ़कर
जल छोड़ना चाहिए)

शान्ति कीजिये गाँव-गाँव में ।
विश्व लीजिये पाँव-छाँव में ।।
डूब ‘साध-जन’ उतरें गहरे ।
लहर लहर-पचरंगा लहरे ।।

नृप धार्मिक बलशाली होवे ।
विकृत-प्रकृत मनमानी खोवे ।।
धर्म-चक्र-जिन सौख्य प्रदाता ।
रहे प्रवाहित यूँ हि विधाता ।।

द्रव्य सुमंगल-कारी होवे ।
क्षेत्र अमंगल-हारी होवे ।।
होवे काल सुमंगल-कारी ।
होवें भाव अमंगल-हारी ।।

कर्मन-घात घात मद सारा ।
सहजो सिद्ध रिद्ध परिवारा ।।
आदि आदि अर्हन् चौबीसा ।
शान्ति प्रदान करें निशि दीसा ।।
*दोहा*
किया शान्ति जिन भक्ति का,
भगवन् कायोत्सर्ग ।।
करूँ दोष आलोचना,
जो प्रद-स्वर्ग-पवर्ग ।।

*चौपाई*
पाँच सभी कल्याणक धारी ।
आठ प्राति-हारज मन-हारी ।।
अतिशय तीस चार मण्डित हैं ।
अर बत्तीस इन्द्र वन्दित हैं ।।

चौ-विध संघ नखत मानिन्दा ।
राम श्याम चक्री, प्रभु ! चन्दा ।।
‘निलय-विनय’ अन-गिनत गभीरा ।
आद-आद जिन अंतिम वीरा ।।

अर्चन-पूजन-वन्दन करता ।
उनका मैं अभिनन्दन करता ।।
पीड़ा-दुक्ख-दरद-भय खोवे ।
मेरे कर्मों का क्षय होवे ।।

रत्नत्रय का मुझे लाभ हो ।
मेरी ‘गति-पंचम-उपाध’ हो ।।
मृत्यु-महोत्सव मना सकूँ मैं ।
जिन-गुण-सम्पद् कमा सकूँ मैं ।।
अथ पौर्वाह-निक (अप-राह-निक)
देव-शास्त्र-गुरु-वन्दना-क्रियायाम्
पूर्वाचार्या-नुक्-क्रमेण,
सकल-कर्मक्-क्षयार्-थम्,
भाव-पूजा-वन्दना-स्तव समेतम्
श्री समाधि-भक्ति कायोत्सर्गम्
करोम्यहम्
(९बार णमोकार )

*चौपाई*
सदा शास्त्र अभ्यास करूँ मैं ।
सन्त समीप निवास करूँ मैं ।।
मौन धरूँ क्यूँ, गुणी दिखाये ।
गौण करूँ, यूँ दोष-पराये ।।

भावन-आत्म तत्व, नम-नयना ।
हित-मित रखूँ मधुरतम वयना ।।
जब तक राधा-मुक्ति रिझाऊँ ।
इन्हें जन्म जन्मान्तर पाऊँ ।।

तारण हारे……शरण सहारे ।
हृदय हमारे….चरण तुम्हारे ।।
चरण तुम्हारे….हृदय हमारा ।
रहे, तलक जब भव-जल-धारा ।।

स्वर-अक्षर पद मात्रा गलती ।
हुईं, चाहते बिन अनगिनती ।।
हो अपराध क्षमा यह मेरा ।
‘जैसा भी’ मैं अपना तेरा ।।
*दोहा*
किया समाधी, भक्ति का,
भगवन् कायोत्सर्ग ।।
करूँ दोष आलोचना,
जो प्रद-स्वर्ग-पवर्ग ।।

*चौपाई*
सम्यक्-दर्शन, सम्यक्-ज्ञाना ।
सम्यक्-चारित, ताना-बाना ।।
रूप अनूप ध्यान परमातम ।
बुद्ध-विशुद्ध ज्ञान धर आतम ।।

पूजन नित वन्दन करता हूँ ।
अर्चन अभिनन्दन करता हूँ ।।
क्षय होवें दुख संकट सारे ।
क्षय हो जावें कर्म हमारे ।।

मुझे लाभ रत्नत्रय होवे ।
सुगति गमन, भय-सप्तक खोवे ।।
पाऊँ मरण-समाधी स्वामी ।
बनूँ रतन जिन-गुण आसामी ।।
‘पुष्पाञ्जलिं क्षिपेत्’
( यहाँ पर नौ बार णमोकार मंत्र
पढ़ना चाहिए )

*विसर्जन पाठ*
अंजन को पार किया ।
चंदन को तार दिया ।।
नहिं तोर दया का पार ।
नागों का हार किया ।।

धूली-चन्दन-बावन ।
की शूली सिंहासन ।।
धरणेन्द्र देवी-पद्मा ।
मामूली अहि-नागिन ।।

अगनी ‘सर’ नीर किया ।
भगिनी ‘सर’ चीर किया ।।
नहिं तोर दया का पार ।
केशर महावीर किया ।।

बन पड़ीं भूल से भूल ।
कृपया कर दो निर्मूल ।।
बिन कारण तारण हार ।
नहिं तोर दया का पार ।।
( निम्न श्लोक पढ़कर
विसर्जन करना चाहिये )

*दोहा*
बस आता, अब धारता,
ईश आशिका शीश ।
कृपा ‘निराकुल’ आपकी,
बनी रहे निशि-दीस ।।
( यहाँ पर नौ बार णमोकार मंत्र जपना चाहिये)

==आरती==

जय-जयकारा, जय-जयकारा ।
लिये स्वर्ण दीपक घृत वाला ।।
करूँ आरती जय गुरुदेवा ।
दुख निवारती श्री गुरु सेवा ।।

पहली आरति ग्रीष्म दुपारी ।
सूर्य आग बरसाता भारी ।।
चढ़ पहाड़ शिल तप्त निहारा ।
जय-जयकारा, जय-जयकारा ।
लिये स्वर्ण दीपक घृत वाला ।।
करूँ आरती जय गुरुदेवा ।
दुख निवारती श्री गुरु सेवा ।।

दूजी आरति वरषा वासा ।
बिजली देख मेघ काला सा ।।
वृक्ष तले आ आसन माड़ा ।
जय-जयकारा, जय-जयकारा ।
लिये स्वर्ण दीपक घृत वाला ।।
करूँ आरती जय गुरुदेवा ।
दुख निवारती श्री गुरु सेवा ।।

तीजी, आरति ठण्ड करारी ।
सायं साँय कर मारुत चाली ।।
लुभा रहा तब जिन्हें चुराहा ।
जय-जयकारा, जय-जयकारा ।
लिये स्वर्ण दीपक घृत वाला ।।
करूँ आरती जय गुरुदेवा ।
दुख निवारती श्री गुरु सेवा ।।

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