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विधान

32. आचार्य श्री शान्ति सागर शतक पूजन विधान

By मुनि श्री निराकुल सागर जी महाराज 

 

पूजन विधान शतक

करते मनमानी क्रीडाएं,
जिनके तन पर विषधर आन ।
सामुद्रिक शास्त्री बतलाते,
है यह महापुरुष पहचान ।।
तदपि न विचलित होते मानो,
हैं पर्वत सुमेरु ही दूज ।
नाग, नरेन्द्र, सुरेन्द्र सभी मिल,
खुश होते है जिनको पूज ।
शान्ति सागरा ! शान्ति सागरा !,
कहे और क्या कोयल कूॅंज ।।१।। स्थापना ।।

सर्व प्रथम पढ़ भक्तामर जी,
गाढ़ा कर सम्यक् श्रद्धान ।
चले भावना बारह भाने,
यानि चढ़े क्रमशः सोपान ।।
तभी खड़े है सबसे आगे,
बन दूल्हा हित दुल्हन मोख ।
क्यूॅं ना जोहे बाट ठाठ-दिव,
सभा समशरण वृक्ष अशोक ।
शान्ति सागरा ! शान्ति सागरा !,
तुम्हें त्रिकाल कोटि-नव ढोक ।।२।। जलं ।।

देव बने होंगे लौकान्तिक,
आँखों से जो निकले प्राण ।
चूंकि निकट अब अन्त लोक का,
भावी तीर्थंकर भगवान् ।।
कल्याणक तप-त्याग मना के,
आकर बैठ सम-शरण बीच ।
धका धका पाछी पवना-से,
ले चालेंगे सबको खींच ।
शान्ति सागरा ! शान्ति सागरा !,
अक्षय तेजोमय मण कीच ।।३।। चन्दनं ।।

छुई आपने जो ऊंचाई,
छु न सका वह कोई आज ।
जैन अजैन सभी के दिल में,
तभी आप, करते हैं राज ।।
टूटी कभी न शान्ति धार वह,
अखर शान्ति धारा अभिलेख ।
टूटे कभी न शान्ति धार यह,
और न सिर्फ विनय सिर टेक ।
शान्ति सागरा ! शान्ति सागरा !,
दृग् सावन ! पावन गज रेख ।।४।। अक्षतं ।।

एक बजे उठ, सात बजे तक,
नित्य आप करते थे जाप ।
दुपहर घण्टे तीन साँझ भी,
नित्य जाप करते थे आप ।।
मंत्र अठारह करोड़ यूँ ही,
हो न चले साधो ! स्वयमेव ।
तरंग मन बैठाई होगी,
उठती रहती चूंकि सदैव ।
शान्ति सागरा ! शान्ति सागरा !,
रत आतम परमातम सेव ।।५।। पुष्पं ।।

बन्द हुआ क्या दाना-पानी,
मनमानी मन क्रमशः ह्रास ।
बे-लगाम इन्द्रिय मन घोड़े,
दें न गिरा, साधो ! उपवास ।।
आप बर्ष पैंतीस श्रमण तब,
नौ हजार नौ सौ अड़तीस ।
किये उपास बर्ष-अट्ठावन,
रह ताउम्र सजग निशि-दीस ।
शान्ति सागरा ! शान्ति सागरा !,
मनोकामना पूर्ण अशीष ।।६।। नैवेद्यं ।।

जब से पैर रखा जमीन पर,
रखा न कहा किसी को गैर ।
चिन्ह ध्वजा का, चिन्ह चक्र का,
करे सुशोभित इनका पैर ।।
धर्म ध्वजा ले चले अगारे,
पाँव-पाँव ली पृथ्वी नाप ।
कलिजुग आज किसी को तो बस,
कह सकते इनको निष्पाप ।
शान्ति सागरा ! शान्ति सागरा !,
मॉं जैसे लेते दुख भाँप ।।७।। दीपं ।।

शान्त बनो भो ! शान्त बनो ओ !
करना हो यदि कर्म विघात ।
करो आतमा का चिन्तन भो,
सिद्धों से कर सकने बात ।।
घबड़ा के सब कर्म झरेंगे,
प्रकटेंगे गुण-नन्त अमोल ।
अक्षर-ज्ञान शरीर मिलेगा,
भ्रमना हाथ, बदलते खोल ।।
शान्ति सागरा ! शान्ति सागरा !,
अमरित-से मीठे तुम बोल ।।८।। धूपं ।।

बुला-बुला उद्धार किया है,
यह सबके वश की ना बात ।
यूँ ही संघ न बनता गुरुकुल,
की निस्पृह करुणा बरसात ।।
बहते बहते डाल पकड़ते,
उखड़ गिरे सिर वृक्ष किनार ।
देना पड़ता हाथ किसी को,
सागर जन्म कराने पार ।
शान्ति सागरा ! शान्ति सागरा !,
अनुकम्पा हृद ! हृदय उदार ! ।।९।। फलं ।।

सूरि शान्ति सागर का होना,
नहीं चाहता त्रिभुवन कौन ।
आज घोर इस कलयुग में भी,
चारित सोला वानी सोन ।।
गुरु बन शिष्य माँगते दीक्षा,
भिक्षा अब तक रही सदोष ।
दुष्कृत सब चाहूँ अब खोना,
अन्तिम चाह समाध सहोश ।
शान्ति सागरा ! शान्ति सागरा !,
अपने जैसे इक गुण-कोश ।।१०।। अर्घ्यं ।।

जयमाला
संगम दो सरिताओं का है,
गंगा-वेद व गंगा-दूध ।
जनमे वहीं, बड़े हो चाले,
शिक्षा दे जो रहीं अनूठ ।।
गंगा वेद-चार पढ़ने की,
गंगा दूध वत्स गो प्यार ।
तट वैतरणी हेत त्रिवेणी,
बहे ’के लिया संयम धार ।
शान्ति सागरा ! शान्ति सागरा !,
आँख तीसरी भीतर न्यार ।।११।।

कमल मॅंगा दो दल सहस्र शत,
हुआ दोहेला माँ इक रोज ।
पूजूॅंगी जा मन्दिर सुबहो,
आदि-आदि प्रभु चरण सरोज ।‌।
खुश थे बड़े पिता ‘के बालक,
जग जल भिन्न कमल ! मन-बाल ! ।
होगा पूज्यनीय जग जन-जन,
साध समाध स्वर्ग-शिव काल ।
शान्ति सागरा ! शान्ति सागरा !,
फल-गुण भार विनत तरु डाल ।।१२।।

चार मील बस दूर भोज से,
ग्राम येल-गुळ मातुल धाम ।
बेल-गाव है जिला यहीं पर,
जन्म सात-गौंडा शिशु नाम ।।
पिता भीम-गौड़ा पुण्योदय,
मुखड़ा चन्दा टुकड़ा देख ।
कहते सभी बलाएँ लेते,
धन्य ! सत्य-वति माँ तुम एक ।
शान्ति सागरा ! शान्ति सागरा !,
आप गर्भ से ही दिल नेक ।।१३।।

रोज हिदायत देती थी माँ,
खेती थी नैय्या शिव ओर ।
कभी किसी का दिल न दुखाना,
कहना झूठ न बनना चोर ।।
डोर डालते नैन भले ना,
नामुमकिन ना ब्रह्म विलास ।
ग्रह लगते लग कतार पीछे,
तिल-तुष परिग्रह जिसके पास ।
शान्ति सागरा ! शान्ति सागरा !,
अन्तर् माँ संस्कारित खास ।।१४।।

रत प्रतिक्रमण पाठ नित संध्या,
पूज्य पिता ले डबडब नैन ।
सामायिक करने से पहले,
कहते थे तुम भाई-बैन ।
खोटा करो न समय सुनो ओ !,
साधो बैठ मंत्र नवकार ।
पद्मावती, धरणेन्द्र नाग जुग,
मन्तर सुन मुख पार्श्व कुमार ।
शान्ति सागरा ! शान्ति सागरा !,
अक्षर हृदय पिता संस्कार ।।१५।।

कर्म खिलाते खेल नादि से,
कृष्णा बहिना ! कुम ओ ! भ्रात ।
रेत पेलते रहे सभी हम,
लेकर उनको आड़े हाथ ।।
नहिं हथियार उठाना अबकी,
एक नहीं थामो छह ढाल ।
उत्तर, दक्षिण, पूरब, पश्चिम,
छुप अध, उर्ध्व जपो नवकार ।
शान्ति सागरा ! शान्ति सागरा !,
अपनों से जाते थे हार ।।१६।।

माता रही पुकार कहाँ हो ?
आओ ! मुनि का हुआ अहार ।
लेकर तुम्हें कमण्डलु उनका,
जाना है बेटा उस पार ।।
सुनो, सिर्फ आड़े आता कल,
जोड़ा पुण्य आज बेजोड़ ।
धोकर हाथ पड़ा पीछे जो,
कृत भव पूर्व पाप बलजोर ।
शान्ति सागरा ! शान्ति सागरा !,
बढ़ मण पारस ! तापस घोर ! ।।१७।।

सेवा में यह जुट जाते थे,
जब आते थे सन्त-महन्त ।
जाते जाते दे जाते थे,
सब इनको आशीष अनन्त ।।
झिरा नैन जल, ले गन्धोदक,
आप चढ़ाते अपने माथ ।
बनूँ आप जैसा धन-पैसा,
छूटे यहीं न जाता साथ ।।
शान्ति सागरा ! शान्ति सागरा !,
सर मेरे रख दो तुम हाथ ।।१८।।

गंगा दूध, वेद गंगा की,
बहती लहर-लहर थी धार ।
कांधे बिठा आदि सागर मुनि,
आप उतरते थे उस पार ।।
क्षमा माँगते आते आते,
भूल-चूक कर देना माँफ ।
मैं नादान-रु मान-दान तुम,
डरता हूँ न बटोरूॅं पाप ।
शान्ति सागरा ! शान्ति सागरा !,
जन-जन मन अक्षर छव आप ।।१९।।

सूत कात रक्खा है माँ ने,
वस्त्र लिया बुन अपने हाथ ।
पहिन जिसे फबते थे ऐसे,
देव दिखें जैसे निज भाँत ।।
होगा ही मन कोरा गोरा,
और अहिंसक होगा मित्र ।
लगा हाथ हिंसक वस्त्रों को,
रह न सकेगा मनस् पवित्र ।
शान्ति सागरा ! शान्ति सागरा !,
मुझ मतिमन्द अगम्य चरित्र ।।२०।।

चिड़िया आन बैठती कांधे,
कोयल मधुर सुनाती गीत ।
दाना खिला, पिलाते पानी,
गायों से रखते थे प्रीत ।।
भाग किसी का छीन न सकते,
दाने लिख वो भेजे नाम ।
उसकी चीज भिजा हो उस तक,
क्यूँ खराब करना परिणाम ।
शान्ति सागरा ! शान्ति सागरा !,
राम पक्षियन ! गैरयन श्याम ।।२१।।

वृक्ष नारियल लगे तीन बस,
उसे गिराना था जो बीच ।
कोई गिरा न सका देर तब,
ली बन्दूक हाथ सख ! खींच ।।
साध निशाना चले तुरत यह,
गिरा नारियल आकर भूम ।
फिर न हुई बन्दूक इन्होंने,
दरद-मन्द यह दिल मासूम ।।
शान्ति सागरा ! शान्ति सागरा !,
कौन ? न किस-किस को मालूम ।।२२।।

पूर्वज रहे जमीनदार हैं,
क्यों न रहेगा शाही रौब ।
पर न किसी पर झाड़ा इनने,
पढ़ राखी थी कक्षा और ।।
सक्षम उसे कहे जिन-शासन,
है जो उत्तम क्षमा समेत ।
संबल सम-समता बल वाला,
यूँ न बहे रग रक्त-सफेद ।
शान्ति सागरा ! शान्ति सागरा !,
बचपन से ही रहे सचेत ।।२३।।

भैसे वा बकरे कटने से,
लिये बचा तुमने इस बार ।
क्यूँ न अहिंसा वीर नाम से,
जगत् लगाये जय जय कार ।
आये तुम क्या इस दुनिया में,
छाया धरा-गगन सुख चैन ।
आया राम कहानी सुन के,
झिर लग तुम्हें झिराना नैन ।
शान्ति सागरा ! शान्ति सागरा !,
गुरु आराध्य एक ! हर-जैन ।।२४।।

कभी नकल करना ना आई,
चले प्रथम थामे तुम केत ।
गन्ध तम्बाखु करने फीकी,
साथ लवंग लगाई खेत ।।
था वैराग्य आप नैसर्गिक,
भावन भव भा रहे अनेक ।
मूलाचार पढ़ा न फिर भी,
श्रुत सम्मत वृत लगता देख ।
शान्ति सागरा ! शान्ति सागरा !,
साधक ! नाहक लक्ष्मण रेख ।।२५।।

बैल आपके दिखते हाथी,
तुम्हें आ चला लिखना भाग ।
लिखा नाम दाने-दाने पर,
सार्थ खिला समझा सौभाग ।।
तभी न दुखा कभी भी माथा,
गाढ़ा पुण्य रखा था जोड़ ।
कर्म न आते थे ऐसा कब ?,
जाते थे शिल माया फोड़ ।
शान्ति सागरा ! शान्ति सागरा !,
भारत-गौरव ! छव चितचोर ! ।।२६।।

किया धरा सब हहा ! हवा का,
गिरा घोंसले अण्डा एक ।
दौड़े लाने आप नसैनी,
वीर ! पीर-पर सकें न देख ।।
आने से पहले माँ चिड़िया,
जहाँ का तहाँ अण्डा राख ।
ची, ची सुनकर माँ चिड़िया की,
अश्रु खुशी ढुलकाती आँख ।।
शान्ति सागरा ! शान्ति सागरा !,
सिमरण मात्र पार-भव लाख ।।२७।।

खूटा गाढ़ बढ़ई दादा ने,
कहा वीर दे इसे निकाल ।
बारी बारी आये सारे,
किन्तु न उसको सके उखाड़ ।
आप सोचते ठोकर खाकर,
गिर न पड़े कोई नादान ।
चुटकी में देते उखाड़ वह,
धरा गगन गूॅंजा गुणगान ।
शान्ति सागरा ! शान्ति सागरा !,
थे अपने जैसे बलवान ।।२८।।

किया नहीं तुमने यह अच्छा,
है न कुलीनों का यह काम ।
आज कड़ा कड़वा यह थोड़ा,
निकल चला तुम मुख निष्काम ! ।।
खास किसी अपने ने कुचला,
फण जब बेगुनाह इक साँप ।
यानि घोलते पहले मिसरी,
बाद बोलते थे कुछ आप ।
शान्ति सागरा ! शान्ति सागरा !,
जाप आप हरती भव ताप ।।२९।।

टोंक न केवल प्रभ चन्दा ही,
टोंक न केवल पारस नाथ ।
गिर सम्मेद वन्दना पूरी,
काँधे बिठा करा दी भ्रात ! ।।
थी न जान-पहचान देख बस,
माँ वृद्धा थी पड़ी निढ़ाल ।
असली कहाँ ? आँख वह नकली,
देख पीर-पर लगे न धार ।
शान्ति सागरा ! शान्ति सागरा !,
नहीं किसके सुमरण आधार ।।३०।।

घण्टे भर सुन माँ जिनवाणी,
लूॅंगा कुछ मुख में फिर बाद ।
आप एक दिन साध चले हैं ,
मन ही मन ऐसी मर्याद ।।
खूब जानते तुम, मन वानर,
श्रुतस्‌-कंध बिन कब वशभूत ।
काम जरूरी यदि न कोई,
आलस हावी जग अनुभूत ।
शान्ति सागरा ! शान्ति सागरा !,
रत्नत्रय समीचीन विभूत ।।३१।।

फेर न फिर के ब्याह रचाया,
बाल ब्रह्म-चारी-व्रत पाल ।
आप लगे थे नवे बर्ष में,
लगी वर्ष छटवे वधु-बाल ।।
आधा भी बीता न बर्ष है,
कर्मों ने खेला है खेल ।
तन कन्या का धड़कन रीता,
उड़ा परिंदा आप अकेल ।
शान्ति सागरा ! शान्ति सागरा !,
रेत पेल, न निकाला तेल ।।३२।।

नाम पिता का लिया कह गया,
अनेकान्त भी.. मात हमार ।
सत्यव्रती बनना कह जाता,
नाम मात क्या ? लिया उचार ।।
यानि माँ पिता ने दिखलाया,
बचपन से ही मारग मोख ।
विषय-भोग यूँ ही विषधर-फण,
कब तक रख सकते थे रोक ।
शान्ति सागरा ! शान्ति सागरा !,
विरहित वेग हास, रति, शोक ।।३३।।

निर्णय एक दिवस ले चाले,
जा वन वय जौवन लूँ साध ।
पिता समीप गये, वह बोले,
जाना करा हमार समाध ।।
मन न रहा घर, घर जंगल सा,
घर मन लहरा जंगल गेह ।
सार्थ कहानी सुन क्या हानी ?,
शान्ति सागरा ! शान्ति सागरा !,
गंग-जमुन दृग निस्संदेह ।।३४।।

पार्श्व टोंक क्या चढ़े सीढ़ियाँ,
मन ही मन करते प्रण एक ।
त्याग तेल घी का करता हूँ,
खेद ! न अब तक जगा विवेक ।।
और शिखर जी से क्या लौटे,
उठा चले हैं प्रण इक और ।
कभी दिवस में बार दूसरी,
अब न रखूँगा मुख में कौर ।
शान्ति सागरा ! शान्ति सागरा !,
संघ चतुर्विध इक सिर-मौर ।।३५।।

‘है खोटा संसार’ कहे तू,
फिर क्यूँ कहती कर ले ब्याह ।
रहट घड़े सी इक पूरी क्या ?,
दूजी खड़ी अधूरी चाह ।।
माँ इस बारी चाह दाह का,
वर दो करूॅं दाह-संस्कार ।
माँ आगे इक और रुला के,
पार दिखूॅं सागर संसार ।
शान्ति सागरा ! शान्ति सागरा !,
लहरे ध्वज-कीरत दिश् चार ।।३६।।
।। जयमाला पूर्णाघ्यं ।।

विधान प्रारंभ
प्रथम वलय
दासी रही पुण्य की लक्ष्मी,
श्रमण सिद्ध-सागर उपदेश ।
सुनते ही व्रत बह्मचर्य ले,
आप बढ़ चले पन्थ स्वदेश ।।
उम्र रही तब बर्ष अठारह,
जाकर बाद ग्राम उत्तूर,
दीक्षा क्षुल्लक माँग चले हैं,
कर्म क्रूर करने चकचूर ।
शान्ति सागरा ! शान्ति सागरा !,
मिथ्या-तिमिर विहरने सूर ।।३७।।

आप स्वयंभू वर्तमान के,
क्या आये तीरथ गिरनार ।
लघु नन्दन प्रभु वर्धमान के,
बोझा काँधे दिया उतार ।।
बन ऐलक उतरे गिरनारी,
नर-नारी कर दर्शन धन्य ! ।
तेजोमयी समुन्नत माथा,
देख बना जग भक्त अनन्य ।
शान्ति सागरा ! शान्ति सागरा !,
आप सरीखा कोई न अन्य ।।३८।।

वहाँ प्रवज्या आदि नाथ की,
था यरनाळ पंच-कल्याण ।
यहाँ प्रवज्या आदि साध की,
मन्त्रोच्चारण एक समान ।।
दीक्षार्थी फिर, जनता पहले,
करे निवेदन ‘स्वामि’ समीप ।
तीन तीन दे रत्न इन्हें अब,
शीघ्र बना लो वजनी सीप ।।
शान्ति सागरा ! शान्ति सागरा !,
जन-जन मन तुम भक्ति प्रदीप ।।३९।।

फटी रह गई आँख ज्योतिषी,
हाथ देख श्री गुरु इक रोज ।
नहीं जगत में कहीं और वह,
रेख दिव्य-दर्शन कर खोज ।।
हो जाना आभास पूर्व ही,
शतावधानी लब्ध कतार ।
धीमन् क्या श्रीमन् नत मस्तक,
पार, और बेड़ा कर पार ।।
शान्ति सागरा ! शान्ति सागरा !,
नहिं किसके जीवन आधार ।।४०।।

आँगन में था चन्दन विरछा,
क्यूँ न लिपटते आकर साँप ।
कुछ ना कुछ तो असर रहेगा,
संयम महक छोड़ते आप ।।
बड़े कीमती आप तभी तो,
इर्द-गिर्द रहते थे सेठ ।
देते थे खुशबू बन वंशी,
पा सन्निधि-तुम वंशा ठेठ ।
शान्ति सागरा ! शान्ति सागरा !,
केत अहिंसा ! ऊरध-रेत ! ।।४१।।

लुपा छिपा रहता था तुमसे,
मान, गुमान, अहम्, ममकार ।
रफा-दफा होता था झट-से,
हुई आँख क्या तुमसे चार ।।
बड़े-बड़े कर काम, कह चले,
कुछ न और, किरपा प्रभु वीर ।
हुआ वही जो देखा उनने,
सुनते वही लिखें तकदीर ।
शान्ति सागरा ! शान्ति सागरा !,
हृदय सिन्धु से बढ़ गम्भीर ।।४२।।

दूध लिया चावल ले आये,
शुरु-शुरु में दश-बारह साल ।
पर न व्रतों में दोष लगाया,
पाँच मिनिट में किये अहार ।।
पिसे मसाले कब के ? कैसे ?
कब का आटा ऐसा सोच ।
रहे सहज, रख ध्यान शुद्धि का,
सिर न उठाया विकल्प बोझ ।
शान्ति सागरा ! शान्ति सागरा !,
जल संसार विभिन्न सरोज ।।४३।।

पाँव-पाँव चल गाँव तुम्हारे,
तभी करूँगा चातुर्मास ।
शपथ उठाओ भक्त बनोगे,
तुम जिनेन्द्र भगवन् के खास ।।
धर्म अहिंसा, देव विरागी,
सदा भजोगे गुरु निर्ग्रन्थ ।
चिन्तन आत्म करोगे नित् ही,
स्वर्ग-मोक्ष साधोगे पन्थ ।
शान्ति सागरा ! शान्ति सागरा !,
सदी बीसवीं आध्य महन्त ।।४४।।
।। पूर्णाघ्यं ।।

द्वितीय वलय
आज जैन बाड़ी सी लगती,
गाड़ी भर-भर देवी-देव ।
चले सिराने जैन सभी जब,
देव विरागी करने सेव ।।
पर्व समाप्त हुआ अब इनका,
गुरु से लगा पता है आज ।
सदा सर्वदा होगी अब से,
पूजन एक मात्र जिनराज ।।
शान्ति सागरा ! शान्ति सागरा !,
भव जल तारण तरण जहाज ।।४५।।

कदम न रुके सभी ने रोका,
ठहरे जाकर दूजे ग्राम ।
पार हुये क्या आप दूसरे,
बहकी धार मचा कुहराम ।।
तैर चले घर, पंख लगे छत,
पानी बरसा मूसलधार ।
देवों से था जो संरक्षित,
संघ सुरक्षित कृपा तुम्हार ।
शान्ति सागरा ! शान्ति सागरा !,
वन्दित सुर, नर, नाग कुमार ।।४६।।

अपराधी रो पड़ा फबक कर,
थम न रहा अशुअन सैलाब ।
हा ! मिलना था मुझे सबक पर,
सहज मिल चला क्षमा खिताब ।।
उठा रखी सौगन्द आपने न,
बैठूॅंगा मैं अनशन साध ।
तब तक, जब तक अपराधी का,
क्षमा न होगा कृत अपराध ।
शान्ति सागरा ! शान्ति सागरा !,
भाये किसे न जयतु निनाद ।।४७।।

लकड़ी कील गढ़ी पैनी सी,
लिये खड़ा पागल इक आन ।
आप गुफा में बैठ कर रहे,
एक साँझ जब आतम ध्यान ।।
माँग चला है रोटी तुमसे,
जब न मिली तब किया प्रहार ।
सहन किया उपसर्ग आपने,
क्यूँ न गगन गूॅंजे जयकार ।
शान्ति सागरा ! शान्ति सागरा !,
दया, क्षमा, करुणा अवतार ।।४८।।

श्री फल बड़ा घड़ा माटी का,
मार गया है बाजी आज ।
मानो कहे, न पुण्य अकेला,
धन-दौलत का ही मुँहताज ।।
चरण धुला जल अश्रु गरीबा,
दिखा चला, थीं रोटी चार ।
केवल-’कवल’, दूध, चावल ले,
किया आपने पूर्ण अहार ।।
शान्ति सागरा ! शान्ति सागरा !,
निभा चले माँ का किरदार ।।४९।।

भंग न जिन आज्ञा हो जाये,
डरने की बस इतनी बात ।
शेर, सर्प से क्या डरना ‘रे,
वैर बिना ये करें न का घात ।।
इक भावी भगवान् आतमा,
घट-घट में कर रही निवास ।
प्रेम करो, क्या जबाब दोगे,
जाना भी कल उसके पास ।।
शान्ति सागरा ! शान्ति सागरा !,
थे भू पर ईश्वर अहसास ।।५०।।

दिखा भीमसा भले दूर से,
छा जाती चेहरे मुस्कान ।
कुछ हट क्रियावान यह श्रावक,
हंस विवेकी, श्रद्धावान ।।
कांधे यही उठा लाया था,
गाँव कराने चातुर्मास ।
पौ फटते ही श्री गुरु चेहरे,
छाया एक मंद-सा हास ।
शान्ति सागरा ! शान्ति सागरा !,
रचा आपने नव इतिहास ।।५१।।

वस्तु ले चले वह अहार में,
था जिसका जीवन भर त्याग ।
क्षमा माँगते दाता-परिजन,
कोस चले अपना दुर्भाग ।।
कहते आप न दोष तुम्हारा,
तप निमित्त सो तुम मम मीत ।
और ले चले प्रायश्चित हैं,
पाँच उपास भव्य ! भव-भीत ।
शान्ति सागरा ! शान्ति सागरा !,
व्रत पुनीत ! वृत मेरु ! विनीत ।।५२।।

पात्र पकड़ कपड़े से सहसा,
दूध दे चला इक नादान ।
बड़े बड़े पड़ गये फफोले,
तप्त-लोह-वत् पातरि-पाण ।।
अटल विधान मान कर्मों का,
सहन कर गये दृग-जल रोक ।
दे आशीष बढ़ गये नत-पथ,
यूँ हि न वन्दनीय तिहुँ लोक ।
शान्ति सागरा ! शान्ति सागरा !,
स्वर्ग पालकी ! शिविका मोख ! ।।५३।।

भीतर कुछ गहरे जा पैठे,
बैठे तप निद्रा जय साध ।
ले घृत गंध चीटियाँ आई,
कर उपसर्ग हारकर प्रात ।।
करी प्रशंसा भूरी-भूरी,
आप परीक्षा में उत्तीर्ण ।
कलियुग सूरि न और दूसरा,
चलीं लगा परिकम्मा तीन ।
शान्ति सागरा ! शान्ति सागरा !,
पतितोद्धारक ! दाता-दीन ! ।।५४।।

चावल देता गया दूध भी,
पर भोला ! भूला है नीर ।
एक न दो बीते है नौ दिन,
रह-रह बढ़े पिपासा-पीर ।।
परिषह सहा, किया न इशारा,
आप सरीखी वृत्तिक-सींह ।
धन ! निर्भीक ! श्रमण निर्मोही !,
शान्त ! निराकुल ! दान्त ! निरीह ! ।
शान्ति सागरा ! शान्ति सागरा !,
निरुपम ! निश्छल ! क्षान्त ! नृसींह ! ।।५५।।

दोष अवश्य-मेव लगते हैं,
विरचित तब प्रायश्चित ग्रन्थ ।
आभूषण तैयार कहाँ जब,
रहता स्वर्ण शुद्ध सौ टंच ।।
डरो न संयम साधो भाई,
‘चलो भूल’ कहती है भूल ।
कान पकड़ बस क्षमा माँगनी,
गलती ‘गलती आप’ समूल ।।
शान्ति सागरा ! शान्ति सागरा !,
चन्दन तुम चरणों की धूल ।।५६।।

जो चौके मिलनी न आखरी,
ली आखड़ी आज वह ठान ।‌
चाँदी थाली मुक्तक वाली,
श्रावक लिये करे पड़गान ।
रहते वक्त बात बन चाली,
सेठ खड़े रहते थे ढ़ेर ।
चीज कीमती गुम न चले सो,
ली न आखड़ी ऐसी फेर ।
शान्ति सागरा ! शान्ति सागरा !,
महा-मनीषी पाँत अकेल ।।५७।।

ये न सिर्फ नागा बाबा हैं,
पहुॅंचे हुये परम मति-हंस ।
दर्शन इनका चरणस्-पर्शन,
करता दुक्खों का विध्वंस ।।
ग्राम आगमन धन्य ! गली-घर,
कृत भव पूरब पुण्य प्रमाण ।
कहते थे घर-घर में जाकर,
बूढ़े बड़े बुजुर्ग सुजान ।
शान्ति सागरा ! शान्ति सागरा !,
सत्य अहिंसा जिन्हें प्रधान ।।५८।।

कोई कहे कमण्डल दे दो,
मैनें किया मना कब भ्रात ! ।
कहते आप पीछि भी ले लो,
दोनों शोभा देते साथ ।।
हाथों में बातों बातों में,
व्रत, तप देते थमा तुरन्त ।
कड़वी दवा खिलानी कैसे ?,
खूब जानते माँ-भगवन्त ।
शान्ति सागरा ! शान्ति सागरा !,
मन-भावन पूरण इक मंत्र ।।५९।।

बाहुबली कुम्भोज बिठा लो,
श्रवण बेल गोला है दूर ।
सम्यक् दर्श किरण प्रकटाने,
मिथ्यातम कर सकने चूर ।।
भगवन् के दर्शन करने से,
कर्म निधत्ती और निकाच ।
पीले पत्तों-से झर चलते,
रही मात जिनवाणी वाँच ।
शान्ति सागरा ! शान्ति सागरा !,
चलते फिरते आगम साँच ।।६०।।
।। पूर्णाघ्यं ।।

तृतीय वलय
यथा संयमी म्हार दृष्टि में,
तथा न चक्रवर्ति सम्राट ।
गुणस्थान ही क्या असंयमी ?,
राजेश्वर नरकेश्वर पाठ ।।
दिखा न भ्रात ? कलंक आदि-जुग,
थू ! थू !! करें आज तक लोग ।
क्या थी कमी, तभी तीर्थंकर,
छोड़ चले वन जौवन भोग ।।
शान्ति सागरा ! शान्ति सागरा !,
आप जन्म जग पुण्य संयोग ।।६१।।

श्रावक जो दर्शन को आते,
पाते संयम नियम प्रसाद ।
धन्य ! आपके दर्श-मात्र से,
जड़ से मिट जाती है व्याध ।।
कोई मना न कर पाता है,
सम्मोहित होता स्वयमेव ।
मन ही मन खुश होता… कहता,
यूँ ही बरसे कृपा सदैव ।
शान्ति सागरा ! शान्ति सागरा !,
पुण्य सातिशय खनखन जेब ।।६२।।

देख रखी फोटो थी घर में,
बोला शिशु इक दे मुस्कान ।
सर्प लपेटे रखते थे तुम,
कहाँ गया बोलो भगवान् ।।
प्रभु भोले बोले, ओ भोले ! ।
चला गया अपनी माँ पास ।
दुनिया भले बहुत कुछ लेकिन,
माँ होती बच्चे की श्वास ।
शान्ति सागरा ! शान्ति सागरा !,
आश प्रथम ! अंतिम विश्वास ।।६३।।

भीतर आना सम्यक् दर्शन,
लिंगायत गुरु सिद्धारुढ ! ।
बाहर जाना मिथ्या दर्शन,
विनत स्वयं सुन चर्चा गूढ़ ।‌।
फिर बोले शिष्यों से अपने,
आज खुल गये अपने भाग ।
खड़े सामने श्री गुरु साँचे,
अश्रु पखाऊँ-पद सौभाग ! ।
शान्ति सागरा ! शान्ति सागरा !,
सन्त शिरोमण ! रत्न-चिराग ! ।।६४।।

धारा रूप सार्थ विकराला,
गहराई छूती पाताल ।
दर्शन को थी आई महिला,
डूब चला पानी में लाल ।।
बाल न बाँका हुआ बाल का,
झलते अश्रु खुशी माँ नैन ।
रोम-रोम पुलकित, नत मस्तक,
धन्य ! धन्य ! मुख निसरे बैन ।
शान्ति सागरा ! शान्ति सागरा !,
रत जप महा-मंत्र दिन रैन ।।६५।।

तुम्हें मान चन्दन लिपटा है,
आन काल दूजा ही नाग ।
आप वीर नन्दन जो ठहरे,
उतर चले गहरे रख जाग ।।
नहीं किसी से वैर हमारा,
सब जीवों से मैत्री भाव ।
कहा आप ने, सुना साँप ने,
आ बैठा गुरु चरणन छाँव ।
शान्ति सागरा ! शान्ति सागरा !,
कलि न और का यथा प्रभाव ।।६६।।

बाबा एक मिले रस्ते में,
बोले सुनो-सुनो महाराज ! ।
मन चंगा कर लो, क्या दे दूॅं ?
भक्त दे गया गांजा आज ।।
करते हुये मना तुम बोले,
ना ! ना !! महामना ओ ! सन्त ।
मन मेरा चंगा ही रहता,
सिर पे गांठ न, हूॅं निर्ग्रन्थ ।
शान्ति सागरा ! शान्ति सागरा !,
विद् लौकिक व्यवहार समन्त ।।६७।।

सुना एक माँ वृद्ध आ रहीं,
रख अँखियन तुम दर्शन प्यास ।
थे आसार भले वर्षा के,
रस्ता देख चले सोल्लास ।।
करना था विहार आगे पर,
भक्तों के वश में भगवान् ।
श्रद्धा सुमन चढ़ा दृग जल ले,
चरण पखार चली वह आन ।
शान्ति सागरा ! शान्ति सागरा !,
आज राम भक्तन हनुमान ।।६८।।

मंत्र णमो अरिहंताणं यह,
बोलो चलो सधा चिर मौन ।
और बोल पड़ता है गूँगा,
सत् जयकार गूॅंज तिहुँ भौन ।।
वचन-सिद्धि थी, रिद्धि मोहनी,
हित, मित, आगम सम्मत भाष ।
बात कट चले क्यूँ मुहँ निकली,
देवी-देव रहें बन दास ।
शान्ति सागरा ! शान्ति सागरा !,
उत्पथ जिन्हें न आया रास ।।६९।।

मिथ्या-दृष्टि दृष्टि या सम्यक्,
मुझे मानते हैं क्या आप ? ।
गुरु श्वेताम्बर पूछ चले हैं,
अपने मन में रखकर पाप ।।
कहा आपने आप हमारे,
छोटे भ्रात, मात जिन-वाण ।
सजल नेत्र सम्मान कर चले,
गुरु श्वेताम्बर पा सम्मान ।।
शान्ति सागरा ! शान्ति सागरा !,
स्वाभिमान जिन-शासन शान ।।७०।।

मुझे उठे मिरगी का दौड़ा,
कहता इक बालक नत माथ ।
‘रे अफ़सोस न कर धर-धीरज,
है प्रभु अर जी अपने साथ ।।
देता लगा आज ही अरजी,
पर तुम करना पूजन रोज ।
कर अभिषेक शुद्ध वस्त्रों में,
छूना भगवत् चरण पयोज ।
शान्ति सागरा ! शान्ति सागरा !,
चेहरे एक अलौकिक ओज ।।७१।।

आया इक अंग्रेज भागता,
लेता झट हाथों को जोड़ ।
ईश्वर का ही दर्शन पाया,
मुख उसके फूटे यह बोल ।।
जूते खोले, हैट उतारा,
और दे चला फरसी धोक ।
मनु बिछड़े शिशु मात मिली हो,
बहते अश्रु न पाया रोक ।
शान्ति सागरा ! शान्ति सागरा !,
यूँ हि न चर्चित हैं तिहुँ‌ लोक ।।७२।।

भर आँखों में जल कहते हैं,
एक ब्रह्मचारी जिनदास ।
कोढ़ फूट चाला है तन में,
आया बड़ी लगा के आश ।।
कहा आपने तीनों संध्या,
साधो संस्तुति एकी-भाव ।
नाम निशान न रहा कुष्ठ का,
अचिंत्य-नीय प्रभु भक्ति प्रभाव ।
शान्ति सागरा ! शान्ति सागरा !,
स्वर्ग न और छांव तुम पॉंव ।।७३।।

चलते चलते पड़ा राह में,
काँटा उठा चले तुम हाथ ।
ले जा अपने हाथ रख दिया,
और उसे माँ झाड़ी साथ ।।
फिर बोले दृग सजल चुन रहा,
आज लोक मारग यम शूल ।
आप कृपा करके चुन देना,
काल मोख मारग मम शूल ।
शान्ति सागरा ! शान्ति सागरा !,
लहरे ध्वज मंदिर व्रत चूल ।।७४।।

कोई देव सिद्ध कर लो ना,
होना उत्तर ओर विहार ।
सिद्ध देव हैं ना क्यूँ जाना,
रोना रोने दूजे द्वार ।।
यदि उपसर्ग हुआ भी कोई,
सहन करूॅंगा मैं धर धीर ।
पर असंयमी को न भजूँगा,
मरण करूॅंगा मैं बन वीर ।
शान्ति सागरा ! शान्ति सागरा !,
बहने वाला कल रग क्षीर ।।७५।।

पूँछ चले कहान जी स्वामी,
पुण्य हेय क्या जैसे पाप ।
देता हूँ इक उदा-हरण में,
समाधान हित कहते आप ।।
फल आते ही झिरे स्वयं ही,
पड़े न कभी झिराना फूल,
फूल झिरा फल कहाँ लगेगा,
हो न किसी से प्रभु यह भूल ।
शान्ति सागरा ! शान्ति सागरा !,
प्रवचन तुम आगम अनुकूल ।।७६।।

सिंह निष्कीड़ित व्रत कर चाले,
इक रखवाले सन्त-समाज ।
नगर ललितपुर चतुर्मास में,
धूम मची व्रत पूरण आज ।।
एक उपास अहार एक फिर,
दो उपवास एक आहार ।
तलक पक्ष फिर पलटा धारा,
आना सोत्साह इस पार ।
शान्ति सागरा ! शान्ति सागरा !,
त्याग-तपस्या श्रृंग हिमाल ! ।।७७।।

सिंह दहाड़ता हुआ आ खड़ा,
नाम द्रोणागिरि तीरथ-धाम ।
देख सामने नृसिंह आपको,
सविनय करता बैठ प्रणाम ।।
देर देखता रहा शेर फिर,
चला गया मुड़-मुड़ के देख ।।
देर हुई आहार कराने,
राह देखते भक्त अनेक ।
शान्ति सागरा ! शान्ति सागरा !,
चारित चक्रवर्ति अभिलेख ।।७८।।

भेष बदल आ खड़ा लुटेरा,
बता राम सिंह अपना नाम ।
क्षमा करो मैंने जीवन भर,
भगवन् ! किये पाप के काम ।।
आँख पनीली आप सामने,
डाल चला अपने हथियार ।
करुणा बरसी, धन ! धन ! तुमने,
उसको दिया मंत्र नवकार ।
शान्ति सागरा ! शान्ति सागरा !,
किया न किस-किस का उद्धार ।।७९।।

पानी डाल किसे देना है,
किसको मार मलाई दूध ।
खूब जानती है बखूब मॉं,
पढ़ी लिखी जो कक्षा दूज ।।
पाप भीरु को नियम दिलाया,
संयम उन्हें जिन्हें-वैराग ।
यथा-शक्ति तप-त्याग बताया,
कहा रखो श्रद्धा बड़भाग ।
शान्ति सागरा ! शान्ति सागरा !,
भ्रमर भक्त तुम पाद सराग ।।८०।।

कुछ भक्ता आये अजैन हैं,
पग पखारने ले दृग नीर ।
ढोल बजाते, गीत सुनाते,
झूम रहे हैं उड़ा अबीर ।।
प्रवचन दिया भक्ति गीतों से,
चुनकर विषय लोक हितकार ।
क्या संगत ? क्या प्रासंगिक है,
खूब जानते ऋषि-अनगार ।
शान्ति सागरा ! शान्ति सागरा !,
विद्या, ज्ञान, शान्ति भण्डार ।‌।८१।।

ऊपर इक सौ और पाँच दिन,
कब केवल बस एक हजार ।
लिया ही नहीं भगवन् तुमने,
सपने भी अनाज आहार ।।
भले देर से, किन्तु झुक चली,
चली न मनमानी सरकार ।
जैन भले हिन्दी भाषी हम,
किन्तु हिन्दु ना किसी प्रकार ।।
शान्ति सागरा ! शान्ति सागरा !,
हाथ ध्वजा जिन-धर्म प्रचार ।।८२।।

बात आपकी राख चली है,
भारत कोल्हापुर सरकार ।
बाल विवाह न होगा अब से,
दिया शीघ्र फ़रमान निकाल ।।
फिर क्या फिर तो लहर चल पड़ी,
गली-गली हर नगरी-ग्राम ।
प्रण भारत सरकार ले चली,
करना दूर कुरीति तमाम ।।
शान्ति सागरा ! शान्ति सागरा !,
आये, लाये शान्ति पयाम ।।८३।।

सत्य अहिंसा है प्यारा क्यों ?,
नारा है क्यों यही हमार ।
आन किसी ने है पूछा जब,
कहते तुम ले श्रुत आधार ।।
छुपा सत्य में सम्यक् दर्शन,
तथा अहिंसा संयम रूप ।
दोनों के मिलते ही चेतन !,
बाहर दिखे मोह-दृग कूप ।
शान्ति सागरा ! शान्ति सागरा !,
मति अनूप निरखे चिद्रूप ।।८४।।

मुझे चाहिये हैं कुछ साथी,
क्यूँ ? क्या दोगे मेरा साथ ।
सिखला भी आया कब माँ को,
थाम छोड़ना शिशु का हाथ ।।
मुझे स्वर्ग में पुनः मिलोगे,
यदि साधोगे व्रत, तप, त्याग ।
क्षितिज-छोर विष-विषय न आता,
आता दिखे, भले लो भाग ।
शान्ति सागरा ! शान्ति सागरा !,
बना रहे तुम पद अनुराग ।‌।८५।।

सगा न कोई अपना जग में,
भाँत रात सपना दिन झूठ ।
जोड़ा टूट जायगा साधो !
यही जायगा, जोड़ा छूट ।।
आता जाता हंस अकेला,
नियम प्रकृति यह नादि अनन्त ।
फेर बदल ना होता इसमें,
वचन अकाट्य प्रभो अरिहन्त ।
शान्ति सागरा ! शान्ति सागरा !,
प्रवचन पारिजात बासन्त ।।८६।।

आगम सम्मत चर्चा जिसकी,
साथ सबूरी श्रद्धा साँच ।
धर्म करेगा रक्षा उसकी,
आ न सकेगी कोई आंच ।।
देवों को भी काम चाहिये,
कर-उपकार बने अब देव ।
आगे भी उपकार करेंगे,
तभी लगेगी तट उस खेव ।
शान्ति सागरा ! शान्ति सागरा !,
निरत स्वपर उपकार सदैव ।।८७।।

काफी है कल्याण के लिये,
शब्द अकेला बस ओंकार ।
सभा देव कहती काँपी है,
नींव दुखद भव कारागार ।।
‘असि आ उसा’ समाये पाँचों,
द्वादशांग का अक्षर-बीज ।
सारी दुनिया घूमी मिली न,
और सत्य, शिव, सुन्दर चीज ।
शान्ति सागरा ! शान्ति सागरा !,
नित्य वन्द्य ! त्यौहार न तीज ।।८८।।

यह न मात्र ग्रन्थों के पन्ने,
हैं हम सब लोगों के प्राण ।
कभी भूल से भी इन सबका,
हो न चले देखो अपमान ।।
फैला जाल ढ़ेर-राहों का,
ऊपर से कलजुग है आज ।
नक्शे यह क्या गुमे, गुमेगा,
ईषत्-प्राग्-भार साम्राज ।
शान्ति सागरा ! शान्ति सागरा !,
जैन न किसको तुम पर नाज ।।८९।।

था मुँह खोला ही मैना ने,
कैद हुई पिंजरे में आन ।
बाण न उतना चुभता अन्दर,
चुभती जितनी तिरछी वान ।
“अंधो के अंधे होते हैं”,
हेत महाभारत संग्राम ।
सबसे भली एक बस चुप है,
साधो ! मौन सुबह क्या शाम ।
शान्ति सागरा ! शान्ति सागरा !,
सिमरन मानस चपल विराम ।।९०।।

रोग दूर करने के खातिर,
कभी न दी सपने भी जाप ।
कर्म चूर करने के खातिर,
जाप दिया करते थे आप ।।
एक बजे उठ रात बैठ के,
जपते ले साँसों की माल ।
‘नमः सिद्ध अर्हत् साधुभ्यो’,
काया, वाणी, मनस् सँमाल ।
शान्ति सागरा ! शान्ति सागरा !,
जप कलि काल अमंगल-हार ।।९१।।

देख चले सपना निशि पिछली,
भट्टारक स्वामी जिन सेन ।
आँख खुली मुख प्रसाद छाया,
छलके भीतर बाहर नैन ।
अहा ! तीसरे भव में होंगे,
सूरि शान्ति सागर तीर्थेश ।
पार लगा हम सब भक्तों को,
पहुंचेंगे स्वयमेव स्वदेश ।
शान्ति सागरा ! शान्ति सागरा !,
राग विनिर्गत ! विगलित द्वेष ।।९२।।
।। पूर्णाघ्यं ।।

जयमाला
मेरी जीवन रूप घड़ी में,
ऊपर अंक ने फिर-फिर शून ।
थोड़ा सा ही बचा समय है,
बारह घण्टे होंगे पूर्ण ।।
‘खाई’ ख्याती रक्खा ही क्या,
क्यों लिखना अभिनन्दन ग्रन्थ ।
अभी दूर मंजिल है काफी,
लोकेषण तेली-पशु पन्थ ।
शान्ति सागरा ! शान्ति सागरा !,
कलि चतुर्थ कालिक निर्ग्रन्थ ।।९३।।

सल्लेखना वर्ष-बारह जो,
वो गज पंथा में ली धार ।
लेटे लेटे निकले घर से,
बैठ निकलना प्रण इसबार ।
छोड़ी खूब काँचली अबकी,
करना विष का काम तमाम ।
साक्षात्‌कार मृत्यु से करना,
ध्येय यही तज दूजे काम ।।
शान्ति सागरा ! शान्ति सागरा !,
पहुॅंच मुकाम रुचा विश्राम ।।९४।।

हुआ काँचिया-बिन्द आँख में,
दिखलाया कर्मों ने रंग ।
किन्तु ऑपरेशन न कराया,
वत ग्रहीत आमरण अभंग ।।
मृत्यु भिजाया सन्देशा है,
यह कह सजग रहे दिन रात ।
छुये थान-असमाधि न हरगिज,
लगे समाधि न क्यूँ ‘कर हाथ ।
शान्ति सागरा ! शान्ति सागरा !,
इक-मत वन्दनीय मुनिनाथ ।।‌९५।।

“ना आई ची, ना बाबा ची,
मी माझी” आई है बोल ।
दे चाली उपदेश बालिका,
चली भीतरी आँखें खोल ।।
मानो देवी सरस्वती ही,
दिखा चलीं आ मार्ग स्वदेश ।
नगन बने मन, काम बने तब,
कब विमुक्ति बस नागन भेष ।‌।
शान्ति सागरा ! शान्ति सागरा !,
पहुँचे हुये महन्त विशेष ।।९६।।

जिन शासन देवी कहती है,
आ सपने में पिछली रात ।
छोड़ो भी लेना अनाज अब,
क्या न साधना अन्त समाध ।।
आदि नाथ मंदिर आ प्रातः,
आप उठा लेते संकल्प ।
अब मैं जीवन भर न रखूँगा,
कभी अन्न सम्बन्धि विकल्प ।।
शान्ति सागरा ! शान्ति सागरा !,
दूर अलस, निश-निद्रा स्वल्प ।।९७।।

श्रद्धा और सुदृढ़ होती है,
सुनकर, समय अखीर समाध ।
चुनकर करवट एक अकेली,
बीते तीन-तीन दिन-रात ।
कुछ ना कहना, सब कुछ सहना,
चर्चित दिश्-दश साधु स्वभाव ।
विधि धारा में बहते रहना,
आता दिख पड़ता शिव गाँव ।
शान्ति सागरा ! शान्ति सागरा !,
दुनिया धूप कृपा तुम छाँव ।।९८।।

गिरि कुन्थल गिरि चढ़े पहाड़ा,
दिया बैठ शिल आशीर्वाद ।
बढ़ी आ रही भीड़ अपारा,
देर उठाये रक्खा हाथ ।।
कम न समशरण दिव्य नजारा,
आ बैठे सब चारों ओर ।
“संयम धारण करा भिउ नका”,
दिव्य देशना नम दृग कोर ।
शान्ति सागरा ! शान्ति सागरा !,
‘सहज निराकुल’ मण अनमोल ।।९९।।

कृपा देश भूषण कुल भूषण,
शान्ति न म्हार पुण्य की देन ।
धन-धन ! कभी न अहम् छू सका,
अंतिम समय सजग दिन रैन ।।
प्रात मिनिट कम पांच सात में,
देह त्याग दिव-लोक प्रयाण ।
दिन छत्तीस उपास सहित धन !,
यम सल्लेखन किया विधान ।
शान्ति सागरा ! शान्ति सागरा !,
आन स्वर्ग निश्चित निर्वाण ।।१००।।
।। जयमाला पूर्णाघ्यं ।।
।। पुष्पांजलि क्षिपामि ।।

 

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