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तीर्थक्षेत्र पूजन

सुस-गाँव के नेमि नाथ भगवान् की पूजन

By मुनि श्री निराकुल सागर जी महाराज 

 

सुस-गाव के श्री शान्ति नाथ कुन्थु नाथ
अरनाथ भगवान् का अर्घ्य

देवाधिदेव ! ।
दृग गंग-रेव ! ।
तुम तीर्थंकर, तुम चक्रवर्ती, तुम कामदेव ।
श्री शान्ति, कुन्थु, अर-नाथा ।
चरणों में शीश नवाता ।।
बलि बलि जाऊॅं, भव-भव पाऊॅं, तुम चरण सेव ।
तुम तीर्थंकर, तुम चक्रवर्ती, तुम कामदेव ।।
सुस-गाव धन्य, तुम छांव-नन्य, तट भक्त खेव ।
तुम तीर्थंकर, तुम चक्रवर्ती, तुम कामदेव ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री शान्ति नाथ, श्री कुन्थु नाथ
श्री अरनाथ जिनेन्द्राय नमः
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

सुस-गाव के वासु पूज्य पार्श्वनाथ
महावीर भगवान् का अर्घ्य

धन ! चीर चीर ।
भव-नीर तीर ।
जय वासु पूज्य ! जय पार्श्वनाथ ! जय महावीर ! ।
तुम भाँत बालयति बन पाऊँ ।
तुम चरणन शरण चला आऊॅं ।।
तुम मात भाँत, इक फूॅंक मात्र, शिशु हरत पीर ।
जय वासु पूज्य ! जय पार्श्वनाथ ! जय महावीर ! ।।
धन ! सुस-गावा, पा तुम छांवा, हटके अमीर ।
जय वासु पूज्य ! जय पार्श्वनाथ ! जय महावीर ! ।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री वासु पूज्य, श्री पार्श्वनाथ,
श्री महावीर जिनेन्द्राय नमः
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

सुस-गाव के
नेमि नाथ भगवान् की पूजन

धूप जगत्, किरपा तुम छांवा ।
नेमि नाथ स्वामी सुसगावा ।।
हृदय वेदिका आन पधारो ।
तारे लाख मुझे भी तारो ।
भार न ज्यादा मुझे बिठा लो ।
सुनते बड़ी आप शिव नावा ।।
धूप जगत्, किरपा तुम छांवा ।
नेमि नाथ स्वामी सुसगावा ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री नेमि नाथ जिनेन्द्र !
अत्र अवतर अवतर संवौषट्
(इति आह्वानन)
अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ:
(इति स्थापनम्)
अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट्
(इति सन्निधिकरणम्) ।

आ जिनने जल अर्पण कीना ।
मुनि मन सा मन दर्पण कीना ।।
आओ श्रद्धा-सुमन चढ़ाओ ।
प्रभु सुसगाव नेमि गुण गाओ ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री नेमि नाथ जिनेन्द्राय नमः
जलं निर्वपामीति स्वाहा ।।

जिनने चन्दन चरण चढ़ाया ।
छिन में भव आताप मिटाया ।।
आओ श्रद्धा-सुमन चढ़ाओ ।
प्रभु सुसगाव नेमि गुण गाओ ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री नेमि नाथ जिनेन्द्राय नमः
चंदनं निर्वपामीति स्वाहा ।।

किये समर्पित अक्षत दाने ।
भाने लगे निजात्म तराने ।।
आओ श्रद्धा-सुमन चढ़ाओ ।
प्रभु सुसगाव नेमि गुण गाओ ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री नेमि नाथ जिनेन्द्राय नमः
अक्षतं निर्वपामीति स्वाहा ।।

चरणन पुष्प परात चढ़ाया ।
पुष्प बाण छू एक न पाया ।।
आओ श्रद्धा-सुमन चढ़ाओ ।
प्रभु सुसगाव नेमि गुण गाओ ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री नेमि नाथ जिनेन्द्राय नमः
पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा ।।

घृत नैवेध चढ़ाया जिनने ।
क्षुधा रोग विहँसाया उनने ।।
आओ श्रद्धा-सुमन चढ़ाओ ।
प्रभु सुसगाव नेमि गुण गाओ ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री नेमि नाथ जिनेन्द्राय नमः
नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

जिनने ज्योत अखण्ड जगाई ।
कृपा दृष्टि माँ सरसुति पाई ।।
आओ श्रद्धा-सुमन चढ़ाओ ।
प्रभु सुसगाव नेमि गुण गाओ ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री नेमि नाथ जिनेन्द्राय नमः
दीपं निर्वपामीति स्वाहा ।।

धूप सुगंधित ला-जो खेता ।
धूम उड़ा कर्मों की लेता ।।
आओ श्रद्धा-सुमन चढ़ाओ ।
प्रभु सुसगाव नेमि गुण गाओ ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री नेमि नाथ जिनेन्द्राय नमः
धूपं निर्वपामीति स्वाहा ।।

श्री फल जो रखता ला अपना ।
हो मंजिल पर सहज पहुँचना ।।
आओ श्रद्धा-सुमन चढ़ाओ ।
प्रभु सुसगाव नेमि गुण गाओ ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री नेमि नाथ जिनेन्द्राय नमः
फलं निर्वपामीति स्वाहा ।।
भर श्रद्धा से अर्घ चढ़ाया ।
पद अनर्घ झोली में आया ।।
आओ श्रद्धा-सुमन चढ़ाओ ।
प्रभु सुसगाव नेमि गुण गाओ ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री नेमि नाथ जिनेन्द्राय नमः
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

कल्याण अर्घ्य

बाकी अभी गर्भ छह महिना ।
झिर लग झिरे गगन से रतना ।।
आओ श्रद्धा-सुमन चढ़ाओ ।
प्रभु सुसगाव नेमि गुण गाओ ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
कार्तिक-शुक्ल-षष्ठ्यां
गर्भ कल्याणक प्राप्ताय
श्री नेमि-नाथ जिनेन्द्राय नमः
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

शौरीपुर अवतार लिया है ।
न्हवन मेरु सौधर्म किया है ।।
आओ श्रद्धा-सुमन चढ़ाओ ।
प्रभु सुसगाव नेमि गुण गाओ ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्रावण-शुक्ल-षष्ठ्यां
जन्म कल्याणक प्राप्ताय
श्री नेमि-नाथ जिनेन्द्राय नमः
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

राज-पाट तज पहुँचे वन में ।
पट छोड़े, लट तोड़े छिन में ।।
आओ श्रद्धा-सुमन चढ़ाओ ।
प्रभु सुसगाव नेमि गुण गाओ ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्रावण शुक्ल-षष्ठ्यां
दीक्षा कल्याणक प्राप्ताय
श्री नेमि-नाथ जिनेन्द्राय नमः
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

अरि चतुष्क लख दृढ़ता भागा ।
केवल ज्ञान सम-शरण लागा ।।
आओ श्रद्धा-सुमन चढ़ाओ ।
प्रभु सुसगाव नेमि गुण गाओ ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
अश्विन-शुक्ल-प्रतिपदायां
ज्ञान कल्याणक प्राप्ताय
श्री नेमि-नाथ जिनेन्द्राय नमः
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

सहज शुक्ल ध्यानाग्नि जला के ।
कर्म खपा ठहरे शिव जा के ।।
आओ श्रद्धा-सुमन चढ़ाओ ।
प्रभु सुसगाव नेमि गुण गाओ ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
आषाढ़-शुक्ल-सप्तम्यां
मोक्ष कल्याणक प्राप्ताय
श्री नेमि-नाथ जिनेन्द्राय नमः
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

जयमाला

नेमि नाथ सुसगावा पूना ।
सुख तुम चरण सिवाय कहूँ ना ।।

और देवता सुमणि-परस से ।
देते बना सुवर्ण, अयस् से ।
किया आपने आप सरीखा,
रखी न शर्त पड़ेगा छूना ।।
नेमि नाथ सुसगावा पूना ।
सुख तुम चरण सिवाय कहूँ ना ।।१।।

और देवता चिन्ता मण से ।
दया फाड़ कर छप्पर बरसे ।
बना लिया अक्षत निधि खुद सा,
बेंत भाँत न नवाया दूना ।।
नेमि नाथ सुसगावा पूना ।
सुख तुम चरण सिवाय कहूँ ना ।।२।।

और देवता काम-धेन से ।
खुशी अश्रु झिर चलें नैन से ।
तुम भरते दृग् इतनी लाजा,
उतर न सके आंख फिर खूना ।
नेमि नाथ सुसगावा पूना ।
सुख तुम चरण सिवाय कहूँ ना ।।३।।

और देवता कल्पद्‌-द्रुम से ।
लें निकाल तम, मातम, गम से ।
आप भीतरी पैठ पठाते,
है जो तम, मातम, गम शूना ।।
नेमि नाथ सुसगावा पूना ।
सुख तुम चरण सिवाय कहूँ ना ।।४।।

दे अर्द्धासन जोड़ा जोड़ा ।
भॉंत भॉंत का ओढ़ा चोला ।
सिर्फ न राग-मयी, द्वेषी भी,
राखैं अस्त्र-शस्त्र सम्पूना ।।
नेमि नाथ सुसगावा पूना ।
सुख तुम चरण सिवाय कहूँ ना ।।५।।

आन विराजे कोई कण्ठा ।
कोई ले चाले बैकुण्ठा ।
शिव पन्था बस देखा तुमने,
लग चालूॅं पीछे मैं क्यूँ ना ।।
नेमि नाथ सुसगावा पूना ।
सुख तुम चरण सिवाय कहूँ ना ।।६।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री नेमि-नाथ जिनेन्द्राय नमः
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

।। दोहा ।।
चेहरा पढ़ना जानते,
बाबा माँ के भाँत ।
मनमाना रखते रहें,
ला-ला लाला-हाथ ।।
।। पुष्पांजलि क्षिपामि ।।

विधान प्रारंभ

अष्ट दलकमल पूजा
विधान की जय

एक मेक हो चाले ।
कर्म आत्म दो न्यारे ।।
दो प्रकटा मति-हंसी ।
वंश बना लो वंशी ।।१।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो जिणाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री नेमि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

तुम संज्योति स्वरूपा ।
चिदानन्द चिद्रूपा ।।
हृदय विराजे मेरे ।
कैसे ? रहें अंधेरे ।।२।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो ओहि जिणाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री नेमि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

ले रोमांचित काया ।
मंत्र नाम तुम ध्याया ।।
तन वामी चिर थाई ।
लें अहि रोग विदाई ।।३।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो परमोहि जिणाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री नेमि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

तुम उतरे क्या ? धरती ।
स्वर्ण मयी हो चलती ।।
ध्यान द्वार मन सदना ।
क्या ? विचित्र तन स्वर्णा ।।४।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो सव्वोहि जिणाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री नेमि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

बन्धु अकारण तुम हो ।
माँ माथे कुमकुम हो ।।
मम मन आप रहोगे ।
कैसे ? क्लेश सहोगे ।।५।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो अणंतोहि जिणाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री नेमि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

भटक जन्म अटवी में ।
अमृत नदी नय ई में ।।
नख शिख जीव नहावे ।
क्यूॅं ? दुख दाव सतावे ।।६।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो कोट्ठ-बुद्धीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री नेमि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

पल विहार जग देखे ।
कमल हुये सोने के ।।
छु‌ओ आप मन कोना ।
क्या अचरज तन सोना ।।७।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो बीय-बुद्धीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री नेमि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

पात्र भक्ति ले पीता ।
अमृत वचन जिन गीता ।।
कण्टक रोग हमारे ।
लगें न क्यों यम द्वारे ।।८।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो पदाणु-सारीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री नेमि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

जल, मनहारी चन्दन झारी ।
अक्षत शाली, नन्दन क्यारी ।।
स्वीकारो, मम आराध्य-देव,
चरु, दीप, धूप, श्री-फल थाली ।।01।।
ॐ ह्रां ह्रीं ह्रूं ह्रौं ह्र:
अ-सि-आ-उ-सा नमः
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
अष्टदल कमल हृदयस्-थिताय
श्री नेमि-नाथ जिनेन्द्राय
पूर्णार्घं निर्वपामीति स्वाहा ।।

षोडश दलकमल पूजा
विधान की जय

रत्नमूर्ति जिन बिम्बा ।
सार्थक मानस्-थम्भा ।।
किरपा दृष्टि रखोगे ।
मान रोग हर लोगे ।।९।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो सं-भिण्ण-सोदा-राणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री नेमि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

बहे वायु पर्वत से ।
झड़े धूल रुज सिर से ।।
हृदय कमल पद थापूॅं ।
क्यों न अरुज पथ नापूॅं ।।१०।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो सयं-बुद्धाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री नेमि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

हो जो अन्तर्यामी ।
तुम्हें पता ही स्वामी ।।
दुख क्या ? मैंने पाये ।
शरण तुम्हारी आये ।।११।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो पत्तेय-बुद्धाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री नेमि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

णमोकार सुन श्वाना ।
जन्मा स्वर्ग विमाना ।।
क्या विस्मय शिव पाऊॅं ।
तुम्हें जाप ले ध्याऊॅं ।।१२।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो बोहिय-बुद्धाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री नेमि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

बिना भक्ति श्रद्धाना ।
भले चरित संज्ञाना ।।
मुद्रा मोह प्रगाढा ।
खुला न विमुक्ति द्वारा ।।१३।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो उजु-मदीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री नेमि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

ढका पाप तम हन्ता ! ।
क्लेश गर्त शिव पन्था ।।
रत्नदीप तुम वाणी ।
बढ़े सहज तब प्राणी ।।१४।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो विउल-मदीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री नेमि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

आत्म ज्योति निधि न्यारी ।
प्रदानन्द बलिहारी ।।
कर्म पटल ढक जाती ।
भक्ति खनित्र दिखाती ।।१५।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो दस-पुव्वीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री नेमि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

झिर नय हिमगिर निकसी ।
तुम पद पंकज विलसी ।।
भक्ति गंग अवगाहीं ।
कब तक मानस स्याही ।।१६।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो चउ-दस-पुव्वीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री नेमि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

इक तुम हम कह ध्याया ।
निर्विकल्प, गुम माया ।।
यदपि झूठ यह कोरा ।
स्यात् शब्द बेजोड़ा ।।१७।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो अट्ठंग-महा-णिमित्त कु-सलाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री नेमि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

मल मिथ्या मत विहरें ।
सप्त भंग चल लहरें ।।
वाग् सिन्ध मथ मनतः ।
सेवत सुधा महन्ता ।।१८।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो वि-उव्वण-इड्ढि-पत्ताणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री नेमि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

शत्रु शस्त्र रखवाते ।
तुम जग-मित्र बताते ।।
सत् भी शिव, सुन्दर भी ।
व्यर्थ वस्त्र अर सुरभी ।।१९।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो विज्जा-हराणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री नेमि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

सेवक इन्द्र न श्लाघा ।
सार्थ ‘भविक’ बड़-भागा ।।
जन्म जलध निस्तारी ।
वधु शिव राधा थारी ।।२०।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो चा-रणाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री नेमि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

अचिंत्य तुम धुनि धारा ।
फीके मम उद्-गारा ।।
तुम जो सुर तरु भांती ।
आश पूर्ण हो जाती ।।२१।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो पण्ण-समणाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री नेमि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

तुम न रुष्ट अपकारी ।
न संतुष्ट उपकारी ।।
तदपि भक्त तिर जाता ।
निंदक मुंह की खाता ।।२२।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो आयास-गामीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री नेमि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

ज्ञान मूर्ति इक दूजी ! ।
कीर्ति स्वर्ग तक गूॅंजी ।।
भक्त तत्त्व विद् थारे ।
कल भव जलध किनारे ।।२३।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो आसी-विसाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री नेमि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

दर्श, वीर्य, सुख, ज्ञाना ! ।
पर्श कीर्त तुम ठाना ।।
कल अवश्य निर्वाणा ।
साध पंच कल्याणा ।।२४।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो दिट्ठि-वि-साणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री नेमि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

भक्ति आप कब पूरी ।
घटे क्षितिज कब दूरी ।।
आदर थवन बहाने‌ ।
सौख्य निराकुल पाने ।।02।।
ॐ क्षां क्षीं क्षूं क्षें क्षैं क्षों क्षौं क्षं क्षः
नमोर्-ऽहते सर्वं रक्ष रक्ष हूं फट् नमः
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
षोडशदल-कमल हृदयस्-थिताय
श्री नेमि-नाथ जिनेन्द्राय
पूर्णार्घं निर्वपामीति स्वाहा ।।

चतुर्विंशतिदल कमल पूजा
विधान की जय

सुबह सुबह भगवान् के,
जो उठ छूता पाँव ।
स्वर्गों के सुख भोग के,
जा लगता शिव गॉंव ।।२५।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो उग्ग-तवाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री नेमि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

मरुथल यह संसार है,
छाँव दार तरु आप ।।
कौन ना भागा आ रहा,
तप्त पाप संताप ।।२६।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो दित्त-तवाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री नेमि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

गर्भ कूप माँ नीसरा,
सफल जन्म मम आज ।
नेत्र पा गया तीसरा,
कर दर्शन जिनराज ।।२७।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो तत्त-तवाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री नेमि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

महिमा अगम्य आपकी,
सर्व-दर्शी बड़भाग ।
विभव समव-शरणी कहाँ,
कहाँ आप नीराग ।।२८।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो महा-तवाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री नेमि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

तृणवत् छोड़ा राज्य है,
मोह मल्ल को जीत ।
दर्पन-वत् झलका सभी,
और न ऐसी रीत ।।२९।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो घोर-तवाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री नेमि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

श्रद्धा से देखा तुम्हें,
अधिक न क्षण एकाध ।
दान दिया, तप भी किया,
समेत पूजा-पाठ ।।३०।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो घोर गुण-परक्-कमाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री नेमि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

गुण तुम सुन के कान से,
किया हृदय श्रृंगार ।
गुण-मण भूषण धन्य वे,
जल स्कंध-श्रुत पार ।।३१।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो घोर-गुणाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री नेमि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

देव ढ़ोरते हैं जिन्हें,
किरण चन्द्रमा भाँत ।
मण्डित चॅंवर जिनन्द वे,
जयवन्ते दिन-रात ।।३२।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो ऽघोर-गुण-बंभ-यारीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री नेमि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

छत्र, चॅंवर, धुन, वृत्त-भा,
सुर-तरु, दुन्दुभि-देव ।
पीठ, पुष्प, झिर पुन-धरा,
रक्षा करें सदैव ।।३३।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो आमो-सहि-पत्ताणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री नेमि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

निरत नृत्य दिव देवियाँ,
वन कमलन गज दन्त ।
बाज देव बाजे रहे,
देवागम जयवन्त ।।३४।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो खेल्लो-सहि-पत्ताणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री नेमि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

आँख अमृत झिर, शश प्रभा,
निरुपम मुख तुम देख ।
दृग् कृतार्थ मैंने किये,
दृग्-धर मैं ही एक ।।३५।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो जल्लो-सहि-पत्ताणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री नेमि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

मोहन मोहित हो चले,
बस भोला शिव नाम ।
आप रहे जागृत सदा,
लागा दाव न काम ।।३६।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो विट्ठो-सहि-पत्ताणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री नेमि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

तुम दर्शन अभिलाष से,
पल्लव पुन विरवान ।
फुल्ल पाय नजदीकता,
मुख देखत फलवान ।।३७।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो सव्वो-सहि-पत्ताणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री नेमि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

कामानल ‘के बुझ चले,
प्रवचन तुम जल धार ।
इन्द्र मोर लख झूमते,
धन ! जिनन्द जयकार ।।३८।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो मण-बलीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री नेमि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

भक्त भ्रमर तरु चैत्य की,
दे प्रदक्षिणा तीन ।
हाथ जोड़ चरणन खड़ा,
मनु ‘शिव’ दाता-दीन ।।३९।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो वचि-बलीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री नेमि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

नख दर्पण में आपके,
मुख देखा चिरकाल ।
पाय, कान्ति, धृति, जश, रमा,
उसका उन्नत भाल ।।४०।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो काय-बलीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री नेमि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

निर्झर अमि नृप-इन्द्र श्री,
पर्वत, लक्ष्मी गेह ।
केत धर्म तरु जयत जै,
गृह-जिन देह विदेह ।।४१।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो खीर-सवीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री नेमि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

कर्म शत्रु क्षण-मात्र में,
किये चित्त चउ-कोन ।
जयतु जयतु जिन-देव जै,
अर्चनीय तिहु भौन ।।४२।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो सप्पि-सवीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री नेमि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

दर्शनीय हैं वस्तु जे,
सुबहो मंगलकार ।
अथ-इति शशि मुख आपका,
अंगुलि अनाम कतार ।।४३।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो महुर-सवीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री नेमि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

शुक तप-वन सद्धर्म-भो,
पिक वन नन्दन छन्द ।
हंस पद्य सरवर कथा,
गुण-मण मौल जयन्त ।।४४।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो अमइ-सवीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री नेमि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

और दाह तन दे चलें,
स्वर्ग-मोक्ष रख चाह ।
भक्त आप जा शिव लगे,
ले धुन दिव्य पनाह ।।४५।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो अक्खीण-महा-णसाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री नेमि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

न्हवन इन्द्र, गन्धर्व जै,
मंगल तिय-सुर अन्य ।
किं कर्तव्य विमूढ़ मैं,
साध बनूँ क्या ? धन्य ।।४६।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो वड्ढमाण-बुद्धि-रिसस्स
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री नेमि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

नृत्य नाम ताण्डव किया,
सुरपति पल अभिषेक ।
झण-झण धुन वीणा शची,
वचन अगम अभिलेख ।।४७।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो सव्व-सिद्धा-यद-णाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री नेमि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

रख प्रतिमा दृग् आपकी,
इतना जब आनन्द ।
अपलक देव निहारते,
सुख वर्णन कब सन्ध ।।४८।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो भयवदो महदि
महावीर वड्ढमाण बुद्धिरिसीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री नेमि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

पूर्णार्घ
आज देख जिन धाम को,
देखा गृह रस-सिद्ध ।
देखा घर चिन्ता-मणी,
गेह रसायन रिद्ध ।।03।।
श्री वृषभादि वर्धमान पर्यंत
परम-देव भगवन् तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
चतुर्विंशति दल कमल
हृदयस्-थिताय
श्री नेमि-नाथ जिनेन्द्राय
पूर्णार्घं निर्वपामीति स्वाहा ।।

महा-अर्घं
तव थव सरित् निमग्न मैं,
मेंटूॅं तापज खेद ।
चित्त लगाता आपमें
‘दर्शन पुनः’ समेत ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
नव देव भगवन् तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
अष्ट-चत्वारिंशद्-दलकमल
हृदयस्-थिताय
श्री नेमि-नाथ जिनेन्द्राय नमः
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

:: जाप्य ::
।। ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री नेमि-नाथ तीर्थंकराय नमः ।।

जयमाला
नेमि सुसगाव हमारे हैं ।
हमें प्राणों से प्यारे हैं ।
क्यूँ न मैं याद रखूॅं पल-पल,
वक्त बेवक्त सहारे हैं ।।

बाद आँखें खोलूॅं सुबहो ।
नेमि बोलूॅं, क्यूँ न शुभ हो ।
सुमरनी साँसों की लेकर,
जपूॅं जय नेमी, क्यूँ दुख हो ।।
एक जग तारण-हारे हैं ।
नेमि सुसगाव हमारे हैं ।
हमें प्राणों से प्यारे हैं ।
क्यूँ न मैं याद रखूॅं पल-पल,
वक्त बेवक्त सहारे हैं ।।१।।

ग्रास मैं मुख में लूॅं पीछे ।
भजूॅं जय नेमि आँख मींचे ।
स्वर्ग जाऊँगा निश्चित ही,
जनमना अब न मुझे नीचे ।।
अकेले पालन-हारे हैं ।
नेमि सुसगाव हमारे हैं ।
हमें प्राणों से प्यारे हैं ।
क्यूँ न मैं याद रखूॅं पल-पल,
वक्त बेवक्त सहारे हैं ।।२।।

निकलता फिर बाहर घर से ।
सुमरता वीर नाम उर से ।।
फाड़ कर छप्पर सुख बरसा,
कभी सपने न कहर बरसे ।।
हाथ आकाश सॅंभाले हैं ।
नेमि सुसगाव हमारे हैं ।
हमें प्राणों से प्यारे हैं ।
क्यूँ न मैं याद रखूॅं पल-पल,
वक्त बेवक्त सहारे हैं ।।३।।

गोद मॉं निन्द्रा फिर लेटूॅं ।
नेमि सिमरूॅं, भीतर पैठूॅं ।
नेमि लोरी सुन, सपने में,
सुमरने नेमी उठ बैठूॅं ।।
निराकुल करने वाले हैं ।
नेमि सुसगाव हमारे हैं ।
हमें प्राणों से प्यारे हैं ।
क्यूँ न मैं याद रखूॅं पल-पल,
वक्त बेवक्त सहारे हैं ।।४।।
दोहा
राखी रख लेना सदा,
बाबा मेरी लाज ।
रोज बुला लेना मुझे,
पाँव पखारन काज ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री नेमि-नाथ जिनेन्द्राय नमः
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

श्री सरसुति-मंत्र*
ॐ ह्रीम्
अर्हन् मुख कमल-वासिनि
पा-पात्म क्षयंकरि
श्रुत-ज्ञान
ज्वाला सहस्र प्रज्ज्वलिते
सरस्वति !
मत् पापम् हन हन दह दह
क्षाम् क्षीम् क्षूम् क्षौम् क्षः
क्षीरवर-धवले
अ-मृत संभवे
वम् वम् हूम् फट् स्वाहा
मम सन्-निधि-करणे
मम सन्-निधि-करणे
मम सन्-निधि-करणे ।
ॐ ह्रीं जिन मुखोद्-भूत्यै
श्री सरस्वति-देव्यै
अर्घं निर्वपामीति स्वाहा

शांति पाठ
अथ पौर्वाह-निक (अप-राह-निक)
देव-शास्त्र-गुरु-वन्दना-क्रियायाम्
पूर्वाचार्या-नुक्-क्रमेण,
सकल-कर्मक्-क्षयार्-थम्,
भाव-पूजा-वन्दना-स्तव समेतम्
श्री शांति-भक्ति कायोत्सर्गम् करोम्यहम्
(९ बार णमोकार )

*चौपाई*
दर्शन मात्र मेंटता दुखड़ा ।
भाँत चन्द्रमा सुन्दर मुखड़ा ।।
नासा टिके नैन मनहारी ।
करें वन्दना नाथ ! तुम्हारी ।।१।।

आप चक्रधर-पञ्चम नामी ।
वन्द्य इन्द्र शत, अन्तर्-यामी ।।
प्रभो शान्ति-जिन करके करुणा ।
करो शान्ति ! जश निरखो अपना ।।२।।

छत्र, सिंहासन, वृक्ष-अशोका ।
धुनि, दुन्दुभि, दल-चँवर अनोखा ।।
भा-मण्डल झिर-पुष्प-अनूठी ।
प्रातिहार्य-वसु आप विभूती ।।३।।

अर्चित-जगत् ! शान्ति करतारी ।
ढ़ोक करो स्वीकार हमारी ।।
प्राण-भूत, सत्, जीव समस्ता ।
पायें परिणति शान्त प्रशस्ता ।।४।।

देवों में जो देव बड़े हैं ।
चरणों में हित सेव खड़े हैं ।।
हंस-वंश वे जग उजियारे ।
करें शान्ति मण्डित जग सारे ।।५।।
(निम्न श्लोक को पढ़कर
जल छोड़ना चाहिए)

शान्ति कीजिये गाँव-गाँव में ।
विश्व लीजिये पाँव-छाँव में ।।
डूब ‘साध-जन’ उतरें गहरे ।
लहर लहर-पचरंगा लहरे ।।६।।

नृप धार्मिक बलशाली होवे ।
विकृत-प्रकृत मनमानी खोवे ।।
धर्म-चक्र-जिन सौख्य प्रदाता ।
रहे प्रवाहित यूँ हि विधाता ।।७।।

द्रव्य सुमंगल-कारी होवे ।
क्षेत्र अमंगल-हारी होवे ।।
होवे काल सुमंगल-कारी ।
होवें भाव अमंगल-हारी ।।८।।

कर्मन-घात घात मद सारा ।
सहजो सिद्ध रिद्ध परिवारा ।।
आदि आदि अर्हन् चौबीसा ।
शान्ति प्रदान करें निशि दीसा ।।९।।

*दोहा*
किया शान्ति जिन भक्ति का,
भगवन् कायोत्सर्ग ।।
करूँ दोष आलोचना,
जो प्रद-स्वर्ग-पवर्ग ।।१०।।

*चौपाई*
पाँच सभी कल्याणक धारी ।
आठ प्राति-हारज मन-हारी ।।
अतिशय तीस चार मण्डित हैं ।
अर बत्तीस इन्द्र वन्दित हैं ।।११।।

चौ-विध संघ नखत मानिन्दा ।
राम श्याम चक्री, प्रभु ! चन्दा ।।
‘निलय-विनय’ अन-गिनत गभीरा ।
आद-आद जिन अंतिम वीरा ।।१२।।

अर्चन-पूजन-वन्दन करता ।
उनका मैं अभिनन्दन करता ।।
पीड़ा-दुक्ख-दरद-भय खोवे ।
मेरे कर्मों का क्षय होवे ।।१३।।

रत्नत्रय का मुझे लाभ हो ।
मेरी ‘गति-पंचम-उपाध’ हो ।।
मृत्यु-महोत्सव मना सकूँ मैं ।
जिन-गुण-सम्पद् कमा सकूँ मैं ।।१४।।
अथ पौर्वाह-निक (अप-राह-निक)
देव-शास्त्र-गुरु-वन्दना-क्रियायाम्
पूर्वाचार्या-नुक्-क्रमेण,
सकल-कर्मक्-क्षयार्-थम्,
भाव-पूजा-वन्दना-स्तव समेतम्
श्री समाधि-भक्ति कायोत्सर्गम्
करोम्यहम्
(९बार णमोकार )

*चौपाई*
सदा शास्त्र अभ्यास करूँ मैं ।
सन्त समीप निवास करूँ मैं ।।
मौन धरूँ क्यूँ, गुणी दिखाये ।
गौण करूँ, यूँ दोष-पराये ।।१५।।

भावन-आत्म तत्व, नम-नयना ।
हित-मित रखूँ मधुरतम वयना ।।
जब तक राधा-मुक्ति रिझाऊँ ।
इन्हें जन्म जन्मान्तर पाऊँ ।।१६।।

तारण हारे…शरण सहारे ।
हृदय हमारे…चरण तुम्हारे ।।
चरण तुम्हारे…हृदय हमारा ।
रहे, तलक जब भव-जल-धारा ।।१७।।

स्वर-अक्षर पद मात्रा गलती ।
हुईं, चाहते बिन अनगिनती ।।
हो अपराध क्षमा यह मेरा ।
‘जैसा भी’ मैं अपना तेरा ।।१८।।

*दोहा*
किया समाधी, भक्ति का,
भगवन् कायोत्सर्ग ।।
करूँ दोष आलोचना,
जो प्रद-स्वर्ग-पवर्ग ।।१९।।

*चौपाई*
सम्यक्-दर्शन, सम्यक्-ज्ञाना ।
सम्यक्-चारित, ताना-बाना ।।
रूप अनूप ध्यान परमातम ।
बुद्ध-विशुद्ध ज्ञान धर आतम ।।२०।।

पूजन नित वन्दन करता हूँ ।
अर्चन अभिनन्दन करता हूँ ।।
क्षय होवें दुख संकट सारे ।
क्षय हो जावें कर्म हमारे ।।२१।।

मुझे लाभ रत्नत्रय होवे ।
सुगति गमन, भय-सप्तक खोवे ।।
पाऊँ मरण-समाधी स्वामी ।
बनूँ रतन जिन-गुण आसामी ।।२२।।
‘पुष्पाञ्जलिं क्षिपेत्’
( यहाँ पर नौ बार णमोकार मंत्र
पढ़ना चाहिए )

विसर्जन पाठ
अञ्जन को पार किया ।
चन्दन को तार दिया ।।
नहिं तोर दया का पार ।
नागों का हार किया ।।१।।

धूली-चन्दन-बावन ।
की शूली सिंहासन ।।
धरणेन्द्र देवी-पद्मा ।
मामूली अहि-नागिन ।।२।।

अगनी ‘सर’ नीर किया ।
भगिनी ‘सर’ चीर किया ।।
नहिं तोर दया का पार ।
केशर महावीर किया ।।३।।

बन पड़ीं भूल से भूल ।
कृपया कर दो निर्मूल ।।
बिन कारण तारण हार ।
नहिं तोर दया का पार ।।४।।
दोहा
बस आता, अब धारता,
ईश आशिका सीस ।
कृपा निराकुल आपकी,
बनी रहे निशि-दीस ।।
(पुष्पांजलि क्षिपामि)

आरती
आरती नेमि ब्रह्म-बाला ।
उतारो लिये दीप माला ।।
बाजे झाँझ ।
सुबहो साँझ ।
बाती भाँझ ।
डाल घृत शान्ति दुग्ध धारा ।।
आरती नेमि ब्रह्म-बाला ।
उतारो लिये दीप माला ।।

आरती प्रथम गरभ न्यारी ।
रतनमय सौरी पुरि सारी ।।
भींगे नयन ।
पिछली रयन ।
सोलह सुपन ।
गये देखे माँ शिव द्वारा ।।
आरती नेमि ब्रह्म-बाला ।
उतारो लिये दीप माला ।।१।।

आरती दुतिय जनम न्यारी ।
सँजाई सौरी पुरि प्यारी ।।
फेर निरसन ।
मेर नह्वन ।
देर दर्शन ।
बना दृग सहस इन्द्र द्वारा ।।
आरती नेमि ब्रह्म-बाला ।
उतारो लिये दीप माला ।।२।।

आरती तृतिय त्याग न्यारी ।
चीख पशुअन सुन उर भारी ।।
अजी यदुकुल ।
सजी मंजुल ।
तजी राजुल ।
चढ़े गिरनारी मन मारा ।
आरती नेमि ब्रह्म-बाला ।
उतारो लिये दीप माला ।।३।।

आरती तुरिय ज्ञान न्यारी ।
रखी दृग नासा बलिहारी ! ।।
धन ! सम-शरण ।
केशर हिरण ।
प्रवचन श्रवण ।
प्रकट गुण, विघट करम चारा ।
आरती नेमि ब्रह्म-बाला ।
उतारो लिये दीप माला ।।४।।

आरती और मोक्ष न्यारी ।
जरे अरि ध्यान अग्नि जारी ।।
सुमरण वीर ।
नख-शिख क्षीर ।
समयिक तीर ।
‘निराकुल’ सुख अपरम्पारा ।
बाजे झाँझ ।
सुबहो साँझ ।
बाती भाँझ ।
डाल घृत शान्ति दुग्ध धारा ।।
आरती नेमि ब्रह्म-बाला ।
उतारो लिये दीप माला ।।५।।

 

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