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तीर्थक्षेत्र पूजन

सानोधा के – पार्श्वनाथ भगवान् की पूजन

By मुनि श्री निराकुल सागर जी महाराज 

 

सानोधा के
पार्श्वनाथ भगवान् की पूजन
पार्श्व सानोधा हमारे ।
भक्त हम केवल तुम्हारे ।
भुला मत देना मुझे तुम,
जी रहा तेरे सहारे ।।
मीन हूँ मैं, आप पानी ।
आप मेरी जिंदगानी ।
भुला मत देना मुझे तुम,
भंवर दुनिया, तुम किनारे ।
पार्श्व सानोधा हमारे ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री पार्श्व-नाथ जिनेन्द्र !
अत्र अवतर अवतर संवौषट्
(इति आह्वानन)
अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ:
(इति स्थापनम्)
अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट्
(इति सन्निधिकरणम्) ।

मैं सरोवर, हंस तुम हो ।
बुजदिलों की तुम्हीं दम हो ।
भुला मत देना मुझे तुम,
दिखेंगे दिन मुझे तारे ।।
जी रहा तेरे सहारे ।
पार्श्व सानोधा हमारे ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री पार्श्व-नाथ जिनेन्द्राय नमः
जलं निर्वपामीति स्वाहा ।।

देह मैं, तुम आंख मेरी ।
चन्द्रमा बिन निश अंधेरी ।
भुला मत देना मुझे तुम,
काल रहता खड़ा द्वारे ।।
जी रहा तेरे सहारे ।
पार्श्व सानोधा हमारे ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री पार्श्व-नाथ जिनेन्द्राय नमः
चंदनं निर्वपामीति स्वाहा ।।

मैं सुआ, तुम बोल मिसरी ।
आप हाथ हमार पगड़ी ।
भुला मत देना मुझे तुम,
नजर तुम स्वर्णिम नजारे ।।
जी रहा तेरे सहारे ।
पार्श्व सानोधा हमारे ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री पार्श्व-नाथ जिनेन्द्राय नमः
अक्षतं निर्वपामीति स्वाहा ।।

फूल मैं, तुम महक मेरी ।
चहक छेडूॅं कृपा तेरी ।
भुला मत देना मुझे तुम,
बोझ चुनरी बिन सितारे ।
जी रहा तेरे सहारे ।
पार्श्व सानोधा हमारे ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री पार्श्व-नाथ जिनेन्द्राय नमः
पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा ।।

मैं नदी, तुम रवानी हो ।
सीख देती कहानी हो ।
भुला मत देना मुझे तुम,
उठाऊंगा पीस पारे ।।
जी रहा तेरे सहारे ।
पार्श्व सानोधा हमारे ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री पार्श्व-नाथ जिनेन्द्राय नमः
नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

रंग तुम, मैं रहा तितली ।
मसक डूबी हवा निकली ।
भुला मत देना मुझे तुम,
तुम सिवा मतलबी सारे ।।
जी रहा तेरे सहारे ।
पार्श्व सानोधा हमारे ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री पार्श्व-नाथ जिनेन्द्राय नमः
दीपं निर्वपामीति स्वाहा ।।

पद्य सर मैं, भान तुम हो ।
स्वाभिमान, गुमान तुम हो ।
भुला मत देना मुझे तुम,
फट चलेंगे मेघ काले ।
जी रहा तेरे सहारे ।
पार्श्व सानोधा हमारे ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री पार्श्व-नाथ जिनेन्द्राय नमः
धूपं निर्वपामीति स्वाहा ।।

छांव-फल-गुल आप, तरु मैं ।
आप सरिता नीर, मरु मैं ।
भुला मत देना मुझे तुम,
भर न पाये पांव छाले ।।
जी रहा तेरे सहारे ।
पार्श्व सानोधा हमारे ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री पार्श्व-नाथ जिनेन्द्राय नमः
फलं निर्वपामीति स्वाहा ।।

नीर, चन्दन, अछत, फुलवा ।
चरु, सुदीप, सुधूप, फल वा ।
भुला मत देना मुझे तुम,
चढ़ाता हूॅं द्रव्य न्यारे ।।
पार्श्व सानोधा हमारे ।
भक्त हम केवल तुम्हारे ।
भुला मत देना मुझे तुम,
जी रहा तेरे सहारे ।
पार्श्व सानोधा हमारे ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री पार्श्व-नाथ जिनेन्द्राय नमः
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

कल्याण अर्घ्य

रतन बरसने लागे नभ से,
पूर्व गर्भ नव-मास ।
नहिं इकाध देखे माँ ने,
सपने सोलह सुख-राश ।।
सपरिवार सौधर्म मनाये,
प्रथम गर्भ कल्याण ।
अतिशय-कारी सानौधा के,
पार्श्व-नाथ भगवान ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
वैशाख-कृष्ण-द्वितीयायां
गर्भ कल्याणक प्राप्ताय
श्री पार्श्व-नाथ जिनेन्द्राय नमः
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

जन्म जान द्यु उतर आ चले,
देव बनारस भूम ।
रचा मेर अभिषेक,
नृत्य ताण्डव विरचा झुक-झूम ।।
सपरिवार सौधर्म मनाये,
द्वितिय जन्म कल्याण ।
अतिशय-कारी सानौधा के,
पार्श्व-नाथ भगवान ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
पौष-कृष्ण-एकादश्यां
जन्म कल्याणक-प्राप्ताय
श्री पार्श्व-नाथ जिनेन्द्राय नमः
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

विषय भोग ना लुभा सके,
आ वन बैठे तरु-मूल ।
वस्त्र उतार, उखाड़ लिये कच,
पाने चारित-चूल ।।
सपरिवार सौधर्म मनाये,
तृतिय त्याग कल्याण ।
अतिशय-कारी सानौधा के,
पार्श्व-नाथ भगवान ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
पौष-कृष्ण-एकादश्यां
दीक्षा कल्याणक प्राप्ताय
श्री पार्श्व-नाथ जिनेन्द्राय नमः
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

घात घातिया-कर्म उठ गये,
भू-से अंगुल चार ।
मोर-साँप सम-शरण हिरण-सिंह,
बैठे वैर विडार ।।
सपरिवार सौधर्म मनाये,
तुरिय ज्ञान कल्याण ।।
अतिशय-कारी सानौधा के,
पार्श्व-नाथ भगवान ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
चैत्र-कृष्ण-त्रयोदश्यां
ज्ञान कल्याणक प्राप्ताय
श्री पार्श्व-नाथ जिनेन्द्राय नमः
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

बाद विदग्ध शुक्ल ध्यानानल,
बाकी कर्म अशेष ।
समय-मात्र में ऋजु-गति से जा,
पहुँचे अपने देश ।।
सपरिवार सौधर्म मनाये,
और मोक्ष कल्याण ।
अतिशय-कारी सानौधा के,
पार्श्व-नाथ भगवान ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्रावण-शुक्ल-सप्तम्यां
मोक्ष कल्याणक प्राप्ताय
श्री पार्श्व-नाथ जिनेन्द्राय नमः
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

दोहा
बाबा के दरबार की,
क्या बतलाऊँ बात ।
बिन माँगे सब लग चले,
बात-बात में हाथ ।।

जयमाला
भुवन तीन इक रखवाले ।
बाबा सानौधा वाले ।।

छू पारस, लोहा सोना ।
करते से जादू टोना ।।
दर्श मात्र वारे न्यारे ।
टकते चुनर चाँद-तारे ।।
भुवन तीन इक रखवाले ।
बाबा सानौधा वाले‌ ।।१।।

शूूल सिंहासन में बदली ।
नाग घड़े माला निकली ।।
नाग विषैले थे काले ।
फूँँक मिटाते भव छाले ।।
भुवन तीन इक रखवाले ।
बाबा सानौधा वाले ।।२।।

बदली पानी में अगनी ।
अश्रु खुशी पाई भगनी ।।
धागे आखर बन चाले ।।
चाबी इक अनेक ताले ।।
भुवन तीन इक रखवाले ।
बाबा सानौधा वाले ।।३।।

जश बजरंगी शिशु पल्ले ।
पाँव छुवाया पट खुल्ले ।।
लगे शील सति जयकारे ।
आशुतोष भाले-भाले ।।
भुवन तीन इक रखवाले ।
बाबा सानौधा वाले ।।४।।

इन्द्र नाग, नागन पद्मा ।
कहूँ कहाँ तक जिन महिमा ।।
कौन गिन सका नभ तारे ।
बिच घन बिजुरी उजियारे ।।
भुवन तीन इक रखवाले ।
बाबा सानौधा वाले ।।५।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री पार्श्व-नाथ जिनेन्द्राय नमः
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

दोहा
राखी रख लेना सदा,
बाबा मेरी लाज ।
रोज बुला लेना मुझे,
पाँव पखारन काज ।।
।। पुष्पांजलि क्षिपामि ।।

विधान प्रारंभ

अष्ट दलकमल पूजा
विधान की जय
णमो अरि-हंताय सिद्धा ।
णमो आ-यरिया भदन्ता ।।
सर्व उव-ज्ञाया अराधो ।
णमो निर्ग्रन्थाय साधो ।।१।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो जिणाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री पार्श्व-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

प्रथम मंगल देव-देवा ।
दुतिय सिद्ध किनार खेवा ।
तृतित मंगल नग्न श्रमणा ।
तुरिय मंगल पन्थ करुणा ।।२।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो ओहि जिणाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री पार्श्व-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

प्रथम उत्तम नन्त ज्ञानी ‌‌।
दुतिय कन्त विमुक्ति रानी ।।
तृतिय उत्तम नगन सन्ता ।
तुरिय उत्तम करुण पन्था ।।३।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो परमोहि जिणाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री पार्श्व-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

वीतरागी प्रथम शरणा ।
दुतिय शरणा खतम भ्रमणा ।।
तृतिय यतिवर लगन मोखी ।
मत अहिंसा शरण चौथी ।।४।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो सव्वोहि जिणाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री पार्श्व-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

मन्दिरा कल्याण नामी ।
विघ्नहर ! प्रभु पार्श्व स्वामी ‌।।
सहारा बस मुझे तेरा ।
दो लगा उस पार बेड़ा ।।५।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो अणंतोहि जिणाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री पार्श्व-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

ठान गाथा आप गाना ।
हुआ सुर-गुरु सिर झुकाना ।।
तदपि गाऊं आप गाथा ।
जुड़े अशुअन हर्ष नाता ।।६।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो कोट्ठ-बुद्धीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री पार्श्व-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

बुद्धि साधारण हमारी ।
असाधारण कीर्ति थारी ।।
शिशु उलूक दिवांध कोई ।
कहे कैसा ? भानु हाई ।।७।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो बीय-बुद्धीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री पार्श्व-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

विगत मोह सुमत सहारे ।
गा सकूंगा गुण न थारे ।।
भले सागर बिन्दु जल ना ।
कौन सक्षम रत्न गणना ।।८।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो पदाणु-सारीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री पार्श्व-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

जल, मनहारी चन्दन झारी ।
अक्षत शाली, नन्दन क्यारी ।।
स्वीकारो, मम आराध्य-देव,
चरु, दीप, धूप, श्री-फल थाली ।।01।।
ॐ ह्रां ह्रीं ह्रूं ह्रौं ह्र:
अ-सि-आ-उ-सा नमः
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
अष्टदल कमल हृदयस्-थिताय
श्री पार्श्व-नाथ जिनेन्द्राय
पूर्णार्घं निर्वपामीति स्वाहा ।।

षोडश दलकमल पूजा
विधान की जय

भांत शशि भा गुण नन्ता ।
कहूँगा मैं बुद्धि-मन्दा ।।
सिन्धु कितना ? कहे बाला ।
बांह जुग फैला विशाला ।।९।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो सं-भिण्ण-सोदा-राणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री पार्श्व-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

हार बैठे पूर्व जोगी ।
आप थुति मुझसे न होगी ।।
चहक चिड़िया तान छेड़ी ।
काट पाऊं कर्म बेड़ी ।।१०।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो सयं-बुद्धाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री पार्श्व-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

आप संस्तवन रहे दूरा ।
नाम भी मन काम-पूरा ।।
दूर डूब तडाग पवना ।
मेंट देती गीष्ण तपना ।।११।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो पत्तेय-बुद्धाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री पार्श्व-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

स्वप्न भी सुन नाम थारा ।
कर्म कर जाते किनारा ।
वन सुदूर मयूर बोला ।
नाग चन्दन वृक्ष छोड़ा ।।१२।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो बोहिय-बुद्धाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री पार्श्व-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

मात्र दर्शन आप कीना ।
पाप रस्ता नाप लीना ।।
नैन क्या गोस्वामि लागे ।
छोड़ गायें चोर भागे ।।१३।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो उजु-मदीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री पार्श्व-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

तुम्हें करता पार भक्ता ।
चूंकि अपने हृदय रखता ।।
वायु भीतर जो भरी है ।
मसक बन चाली तरी है ।।१४।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो विउल-मदीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री पार्श्व-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

काम वशि हरिहर अभागे ।
विनत मन्मथ आप आगे ।।
पिये बड़वा सिन्धु पानी ।
अग्नि अरि यूँ बिन्दु पानी ।।१५।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो दस-पुव्वीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री पार्श्व-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

सार्थ गुरु हैं आप वैसे ।
हृदय रख भवि पार कैसे ? ।।
विरद तुम अचरज भरा है ।
नत विनत सुरपति खड़ा है ।।१६।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो चउ-दस-पुव्वीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री पार्श्व-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

पूर्व ही तुम क्रोध रीते ।
कहो किस-विध कर्म जीते ।।
भले शीत तुषार हा ! हा !!
झुलस हरि हरि-भरी स्वाहा ।।१७।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो अट्ठंग-महा-णिमित्त कु-सलाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री पार्श्व-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

बीच अपने हृदय सन्ता ।
तुम्हें खोजें मुक्ति कन्ता ।।
अगर केशर पुष्प पाना ।
कर्णिका केवल ठिकाना ।।१८।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो वि-उव्वण-इड्ढि-पत्ताणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री पार्श्व-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

अवतरे क्या आप मन में ।
देह भाव विनष्ट क्षण में ।।
दे परीक्षा अग्नि ख्याती ।
खड़ा पाहन स्वर्ण पांती ।।१९।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो विज्जा-हराणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री पार्श्व-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

हृदय आश्रय आप लीना ।
देह कीना तुम विलीना ।।
बुध-महान स्वभाव गाया ।
सहन विग्रह कर न पाया ।।२०।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो चा-रणाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री पार्श्व-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

सांझ सोऽहं रट लगाना ।
भक्त भगवन् गुण निधाना ।।
पिया कहके अमृत पानी ।
वेदना विष बस कहानी ।।२१।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो पण्ण-समणाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री पार्श्व-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

रुद्र, शंकर, शम्भू भोला ।
तुम्हें ब्रह्मा, विष्णु बोला ।।
ग्रसित रुज पीलिया आंखें ।
शंख धौरा पीत तांकें ।।२२।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो आयास-गामीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री पार्श्व-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

और छोड़ो तरु अशोका ।
लख तुम्हें दे फर्श ढोका ।।
जगे जग पग भान धरता ।
कमल वन भी जाग भरता ।।२३।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो आसी-विसाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री पार्श्व-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

नन्द वन पांखुरी उध वा ।
अधो डण्ठल झिरें फुलवा ।।
कहें बन्धन कर्म खोते ।
प्रभु निकट क्या सु-मन होते ।।२४।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो दिट्ठि-वि-साणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री पार्श्व-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

जल, मनहारी चन्दन झारी ।
अक्षत शाली, नन्दन क्यारी ।।
स्वीकारो, मम आराध्य-देव,
चरु, दीप, धूप, श्री-फल थाली ।।02।।
ॐ क्षां क्षीं क्षूं क्षें क्षैं क्षों क्षौं क्षं क्षः
नमोर्-ऽहते सर्वं रक्ष रक्ष हूं फट् नमः
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
षोडशदल-कमल हृदयस्-थिताय
श्री पार्श्व-नाथ जिनेन्द्राय
पूर्णार्घं निर्वपामीति स्वाहा ।।

चतुर्विंशतिदल कमल पूजा
विधान की जय

अमृत रूप तुम्हार वाणी ।
जन्म हृदय अथाह पानी ।।
जिसे पी कर जीव भविका ।
पात्र अजरामर सुशिविका ।।२५।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो उग्ग-तवाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री पार्श्व-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

दूर तक झुक ऊर्ध्व जाते ।
आप चांवर यह बताते ।।
नत विनत जगदीश चरणा ।
पात्र गत ऊरध सुमरणा ।।२६।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो दित्त-तवाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री पार्श्व-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

स्वर्ण सिंहासन सलोना ।
श्याम देह सुगंध सोना ।।
स्वर्ण गिर पर्वत अनोखे ।
मनोहर नव मेघ शोभे ।।२७।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो तत्त-तवाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री पार्श्व-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

अग्र तुम भा-वृत्त नीले ।
पड़े पत्र अशोक पीले ।।
सामने छव यदि विरागी ।
सचेतन कब तक सरागी ।।२८।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो महा-तवाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री पार्श्व-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

सामने जग राज खोले ।
देव-दुन्दुभि बाज बोले ।।
चले आओ भक्त सारे ।
यहाँ शिव सारथि पधारे ।।२९।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो घोर-तवाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री पार्श्व-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

रूपसी शश छव अनोखी ।
बना झल्लर सितारों की ।।
छत्र मिष सिर आप छाया ।
मनु पुनः अधिकार पाया ।।३०।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो घोर गुण-परक्-कमाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री पार्श्व-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

शाल तीन विभिन्न वर्णा ।
रतन-माणिक, रजत, स्वर्णा ।।
पिण्ड कान्ति, सुयश, प्रतापा ।
धन्य पुण्य अनन्त छापा ।।३१।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो घोर-गुणाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री पार्श्व-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

पुष्प माल मुकुट सुरेशा ।
आ पड़ीं चरणन जिनेशा ।।
सु-मन कब तक प्रभु चरण से ।
दूर रहते छुपा किन से ।।३२।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो ऽघोर-गुण-बंभ-यारीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री पार्श्व-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

भक्त पीछे लग तुम्हारे ।
लगें भव सागर किनारे ।।
बिन विपाक न घट तिराता ।
अगम तुम चारित विधाता ! ।।३३।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो आमो-सहि-पत्ताणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री पार्श्व-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

नगन तुम श्री मन्त कैसे ? ।
अखर कब लिपि-बद्ध ऐसे ।।
साथ चेतन जड़ दिखानी ।
कहो ? कैसे सिर्फ ज्ञानी ।।३४।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो खेल्लो-सहि-पत्ताणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री पार्श्व-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

कमठ ने नभ धूल फेंकी ।
हा ! रखी रह गई शेखी ।।
आंख पड़ छाया अँधेरा ।
बाल भी बांका न तेरा ।।३५।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो जल्लो-सहि-पत्ताणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री पार्श्व-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

कड़कती बिजुरी गिराई ।
नाद घन, आंधी बुलाई ।।
गिरा दुस्तर वारि अबकी ।
कमठ सिर तलवारि लटकी ।।३६।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो विट्ठो-सहि-पत्ताणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री पार्श्व-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

प्रेत मुख से अग्नि निकले ।
मुण्ड माला बाल बिखरे ।।
कमठ प्रेरित कहर ढाते ।
पाप सामूहिक कमाते ।।३७।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो सव्वो-सहि-पत्ताणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री पार्श्व-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

कर किनारे काम दूजा ।
साधते जे आप पूजा ‌।।
धन्य ! भव मानव उन्हीं का ।
लेख वे मेटें विधी का ।।३८।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो मण-बलीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री पार्श्व-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

स्वप्न भी तुम नाम मंत्रा ।
सुन न पाया है जिनन्दा ।।
तब विपद सर्पिणी काली ।
डसे रात, दिवस, दुपारी ।।३९।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो वचि-बलीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री पार्श्व-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

नौ सलंगर लगा खेने ।
नाहिं पूजा तुम्हें मैंने ।।
पराभव भव इस तभी तो ।
रात पीस परात रीतो ।।४०।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो काय-बलीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री पार्श्व-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

दिवस बीते यूं हि रैना ।
मोह पट से ढके नैना ।।
कब तुम्हें निरखा सॅंवरिया ।
सिर अनर्थ तभी गठरिया ।।४१।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो खीर-सवीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री पार्श्व-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

सुना, पूजा, तुम्हें देखा ।
किन्तु मन चरणन न टेका ।।
कहो क्या ? मनकाम पूना ।
ढ़ेर भी कृत भाव सूना ।। ।।४२।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो सप्पि-सवीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री पार्श्व-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

भक्त वत्सल ! एक शरणा ! ।
निकेतन धन पुण्य करुणा ।।
शिशु अभी भूलें भुला दो ।
दलन दुख अंकुर करा दो ।।४३।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो महुर-सवीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री पार्श्व-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

आपके जुग चरण पाके ।
निपृस्ही तुम शरण आके ।।
रंग केशरिया न लागा ।
पा रहा दुख, हूँ अभागा ।।४४।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो अमइ-सवीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री पार्श्व-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

जनम जल तारक अहो ! हो !! ।
जगत् उद्धारक विभो ! भो !! ।।
दुख जलधि डूबूं संभालो ।
हाथ दे मुझको निकालो ।।४५।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो अक्खीण-महा-णसाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री पार्श्व-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

साथ श्रद्धा भक्ति साधी ।
चाह पल अन्तिम समाधी ।।
रहो स्वामी तुम हमारे ‌।
पहुंचने तक मोक्ष द्वारे ।।४६।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो वड्ढमाण-बुद्धि-रिसस्स
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री पार्श्व-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

भर हृदय में भाव भीने ।
पढ़ी थुति यह जिस किसी ने ।।
साध सुमरण अन्त क्षण में ।
विहरता धन ! नन्द-वन में ।।४७।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो सव्व-सिद्धा-यद-णाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री पार्श्व-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

भाविक नयनन कुमुद चन्द्रा ।
भक्त तुम, पद छोड़ इन्द्रा ।।
सन्त बन अरिहन्त होता ।
सुख ‘निराकुल’ फिर न खोता ।।४८।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो भयवदो महदि
महावीर वड्ढमाण बुद्धिरिसीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री पार्श्व-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

पूर्णार्घ
जल, मनहारी चन्दन झारी ।
अक्षत शाली, नन्दन क्यारी ।।
स्वीकारो, मम आराध्य-देव,
चरु, दीप, धूप, श्री-फल थाली ।।03।।
श्री वृषभादि वर्धमान पर्यंत
परम-देव भगवन् तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
चतुर्विंशति दल कमल
हृदयस्-थिताय
श्री पार्श्व-नाथ जिनेन्द्राय
पूर्णार्घं निर्वपामीति स्वाहा ।।

महा-अर्घं
सानोधा प्रभु पार्श्व-से,
और ना दूजे देव ।
जब तक तन जीवन वसे,
करनी ठानूॅं सेव ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
नव देव भगवन् तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
अष्ट-चत्वारिंशद्-दलकमल
हृदयस्-थिताय
श्री पार्श्व-नाथ जिनेन्द्राय नमः
सर्व शान्तिर्-भवतु
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

:: जाप्य ::
।। ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री पार्श्वनाथ तीर्थंकराय नमः ।।

जयमाला
दोहा
आश किरण इक रोशनी,
करुणा, दया निधान ।
विघ्न-हरण, चिंतामणी,
पार्श्व नाथ भगवान् ।।

खड्ग फेंक दो, ढाल उठा लो हाथ ।
जीते हार कमठ से पारस नाथ ।।

भव न एक, भव दशक लड़ाई ।
और और इक तरफा भाई ।।
पार्श्व जीव ने राखा आपा ।
कमठ जीव ने उत्पथ नापा ।।
कॉंपा भार पड़ा जब कर्मन माथ ।
खड्ग फेंक दो, ढाल उठा लो हाथ ।।

पार्श्व जीव था भाई छोटा ।
कमठ जीव का चारित खोटा ।।
जोड़ चला आँखें वधु-भ्राता ।
भ्रात आज परदेश गया था ।।
छुपे कहॉं ? अंगार ढक रुई-काथ ।
खड्ग फेंक दो, ढाल उठा लो हाथ ।।

गधे बिठा, करके मुँह काला ।
दीना नृप ने देश निकाला ।
जा मिल गया तापसी जन से ।
तपने लगा बाल-तप तन से ।
किन्तु सिद्धि तब, देता जब मन साथ ।
खड्ग फेंक दो, ढाल उठा लो हाथ ।।

छोटा भ्रात आज घर आया ।
खोजा भ्रात, कहीं ना पाया ।।
पता लगा, आया है दौड़ा ।
गंग-जमुन जल अंखियन छोड़ा ।।
खड़ा उठाये भारी शिल प्रिय भ्रात ।
खड्ग फेंक दो, ढाल उठा लो हाथ ।।

पार्श्व जीव आ पार्श्व खड़ा है ।
घर ले चलने भ्रात अड़ा है ।।
माफी राजा से दिलवाने ।
उठ जैसे ही लगता जाने ।।
रची पटक शिल सार्थक स्याही गाथ ।
खड्ग फेंक दो, ढाल उठा लो हाथ ।।

पार्श्व जीव से राजा बोले ।
डर न, हुआ क्या ? कह सच भोले ।।
राजन् दोष न भाई मल्ला ।
पैर छुये कॅंप छूटी शिल्ला ।।
मर हम मरहम बनें भावना साध ।
जीते हार कमठ से पारस नाथ ।
खड्ग फेंक दो, ढाल उठा लो हाथ ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री पार्श्वनाथ जिनेन्द्राय नमः
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

।। दोहा ।।
यही प्रार्थना आप से,
भगवन् पारस-नाथ ।
वस्तु स्वरूप विचार के,
कहूॅं न, सह दिन-रात ।।

श्री सरसुति-मंत्र*
ॐ ह्रीम्
अर्हन् मुख कमल-वासिनि
पा-पात्म क्षयंकरि
श्रुत-ज्ञान
ज्वाला सहस्र प्रज्ज्वलिते
सरस्वति !
मत् पापम् हन हन दह दह
क्षाम् क्षीम् क्षूम् क्षौम् क्षः
क्षीरवर-धवले
अ-मृत संभवे
वम् वम् हूम् फट् स्वाहा
मम सन्-निधि-करणे
मम सन्-निधि-करणे
मम सन्-निधि-करणे ।
ॐ ह्रीं जिन मुखोद्-भूत्यै
श्री सरस्वति-देव्यै
अर्घं निर्वपामीति स्वाहा

शांति पाठ
अथ पौर्वाह-निक (अप-राह-निक)
देव-शास्त्र-गुरु-वन्दना-क्रियायाम्
पूर्वाचार्या-नुक्-क्रमेण,
सकल-कर्मक्-क्षयार्-थम्,
भाव-पूजा-वन्दना-स्तव समेतम्
श्री शांति-भक्ति कायोत्सर्गम् करोम्यहम्
(९ बार णमोकार )

*चौपाई*
दर्शन मात्र मेंटता दुखड़ा ।
भाँत चन्द्रमा सुन्दर मुखड़ा ।।
नासा टिके नैन मनहारी ।
करें वन्दना नाथ ! तुम्हारी ।।१।।

आप चक्रधर-पञ्चम नामी ।
वन्द्य इन्द्र शत, अन्तर्-यामी ।।
प्रभो शान्ति-जिन करके करुणा ।
करो शान्ति ! जश निरखो अपना ।।२।।

छत्र, सिंहासन, वृक्ष-अशोका ।
धुनि, दुन्दुभि, दल-चँवर अनोखा ।।
भा-मण्डल झिर-पुष्प-अनूठी ।
प्रातिहार्य-वसु आप विभूती ।।३।।

अर्चित-जगत् ! शान्ति करतारी ।
ढ़ोक करो स्वीकार हमारी ।।
प्राण-भूत, सत्, जीव समस्ता ।
पायें परिणति शान्त प्रशस्ता ।।४।।

देवों में जो देव बड़े हैं ।
चरणों में हित सेव खड़े हैं ।।
हंस-वंश वे जग उजियारे ।
करें शान्ति मण्डित जग सारे ।।५।।
(निम्न श्लोक को पढ़कर
जल छोड़ना चाहिए)

शान्ति कीजिये गाँव-गाँव में ।
विश्व लीजिये पाँव-छाँव में ।।
डूब ‘साध-जन’ उतरें गहरे ।
लहर लहर-पचरंगा लहरे ।।६।।

नृप धार्मिक बलशाली होवे ।
विकृत-प्रकृत मनमानी खोवे ।।
धर्म-चक्र-जिन सौख्य प्रदाता ।
रहे प्रवाहित यूँ हि विधाता ।।७।।

द्रव्य सुमंगल-कारी होवे ।
क्षेत्र अमंगल-हारी होवे ।।
होवे काल सुमंगल-कारी ।
होवें भाव अमंगल-हारी ।।८।।

कर्मन-घात घात मद सारा ।
सहजो सिद्ध रिद्ध परिवारा ।।
आदि आदि अर्हन् चौबीसा ।
शान्ति प्रदान करें निशि दीसा ।।९।।

*दोहा*
किया शान्ति जिन भक्ति का,
भगवन् कायोत्सर्ग ।।
करूँ दोष आलोचना,
जो प्रद-स्वर्ग-पवर्ग ।।१०।।

*चौपाई*
पाँच सभी कल्याणक धारी ।
आठ प्राति-हारज मन-हारी ।।
अतिशय तीस चार मण्डित हैं ।
अर बत्तीस इन्द्र वन्दित हैं ।।११।।

चौ-विध संघ नखत मानिन्दा ।
राम श्याम चक्री, प्रभु ! चन्दा ।।
‘निलय-विनय’ अन-गिनत गभीरा ।
आद-आद जिन अंतिम वीरा ।।१२।।

अर्चन-पूजन-वन्दन करता ।
उनका मैं अभिनन्दन करता ।।
पीड़ा-दुक्ख-दरद-भय खोवे ।
मेरे कर्मों का क्षय होवे ।।१३।।

रत्नत्रय का मुझे लाभ हो ।
मेरी ‘गति-पंचम-उपाध’ हो ।।
मृत्यु-महोत्सव मना सकूँ मैं ।
जिन-गुण-सम्पद् कमा सकूँ मैं ।।१४।।
अथ पौर्वाह-निक (अप-राह-निक)
देव-शास्त्र-गुरु-वन्दना-क्रियायाम्
पूर्वाचार्या-नुक्-क्रमेण,
सकल-कर्मक्-क्षयार्-थम्,
भाव-पूजा-वन्दना-स्तव समेतम्
श्री समाधि-भक्ति कायोत्सर्गम्
करोम्यहम्
(९बार णमोकार )

*चौपाई*
सदा शास्त्र अभ्यास करूँ मैं ।
सन्त समीप निवास करूँ मैं ।।
मौन धरूँ क्यूँ, गुणी दिखाये ।
गौण करूँ, यूँ दोष-पराये ।।१५।।

भावन-आत्म तत्व, नम-नयना ।
हित-मित रखूँ मधुरतम वयना ।।
जब तक राधा-मुक्ति रिझाऊँ ।
इन्हें जन्म जन्मान्तर पाऊँ ।।१६।।

तारण हारे…शरण सहारे ।
हृदय हमारे…चरण तुम्हारे ।।
चरण तुम्हारे…हृदय हमारा ।
रहे, तलक जब भव-जल-धारा ।।१७।।

स्वर-अक्षर पद मात्रा गलती ।
हुईं, चाहते बिन अनगिनती ।।
हो अपराध क्षमा यह मेरा ।
‘जैसा भी’ मैं अपना तेरा ।।१८।।

*दोहा*
किया समाधी, भक्ति का,
भगवन् कायोत्सर्ग ।।
करूँ दोष आलोचना,
जो प्रद-स्वर्ग-पवर्ग ।।१९।।

*चौपाई*
सम्यक्-दर्शन, सम्यक्-ज्ञाना ।
सम्यक्-चारित, ताना-बाना ।।
रूप अनूप ध्यान परमातम ।
बुद्ध-विशुद्ध ज्ञान धर आतम ।।२०।।

पूजन नित वन्दन करता हूँ ।
अर्चन अभिनन्दन करता हूँ ।।
क्षय होवें दुख संकट सारे ।
क्षय हो जावें कर्म हमारे ।।२१।।

मुझे लाभ रत्नत्रय होवे ।
सुगति गमन, भय-सप्तक खोवे ।।
पाऊँ मरण-समाधी स्वामी ।
बनूँ रतन जिन-गुण आसामी ।।२२।।
‘पुष्पाञ्जलिं क्षिपेत्’
( यहाँ पर नौ बार णमोकार मंत्र
पढ़ना चाहिए )

विसर्जन पाठ
अञ्जन को पार किया ।
चन्दन को तार दिया ।।
नहिं तोर दया का पार ।
नागों का हार किया ।।१।।

धूली-चन्दन-बावन ।
की शूली सिंहासन ।।
धरणेन्द्र देवी-पद्मा ।
मामूली अहि-नागिन ।।२।।

अगनी ‘सर’ नीर किया ।
भगिनी ‘सर’ चीर किया ।।
नहिं तोर दया का पार ।
केशर महावीर किया ।।३।।

बन पड़ीं भूल से भूल ।
कृपया कर दो निर्मूल ।।
बिन कारण तारण हार ।
नहिं तोर दया का पार ।।४।।
दोहा
बस आता, अब धारता,
ईश आशिका सीस ।
कृपा निराकुल आपकी,
बनी रहे निशि-दीस ।।
(पुष्पांजलि क्षिपामि)

आरती
जय पारस, जय पारस बोलो ।
बनता साध मौन जब खोलो ।।

माँ वामा के राज दुलारे ।
अश्वसेन कुल नभ ध्रुवतारे ।।
जन्मे काशी नाम नगरिया ।
बढ़ घी-मिसरी बोल मुरलिया ।।
पुण्य अपूर्व सातिशय बो लो ।
बनता साध मौन जब खोलो ।
जय पारस, जय पारस बोलो ।।१।।

राग रंग सर चढ़ ना पाया ।
बाल उमर वैराग्य समाया ।।
वस्त्र उतारे, केश उखारे ।
चार ज्ञान धर, तारणहारे ! ।।
हर्ष अश्रु से नयन भिंजो लो ।
बनता साध मौन जब खोलो ।
जय पारस, जय पारस बोलो ।।२।।

सार्थक नाम सम-शरण लागा ।
दृग्-नम मृग, सिंह, मेंढ़क, नागा ।।
घात अघात ब्याह शिव राधा ।
हित सुख ‘निराकुलम्’ आराधा ।।
सम दृग्, ज्ञान, चरित मण गो लो ।
बनता साध मौन जब खोलो ।
जय पारस, जय पारस बोलो ।।३।।

 

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