(१)
नव देव चरण ।
मम लगी लगन ।
अनगिन वन्दन ।
शत अभि-नन्दन ।
हित उपदेशी ।
मत खुद जैसी ।
गत रत द्वैषी ।
अरिहन्त शरण ।
मम लगी लगन ।
अनगिन वन्दन ।।१।।
धन ! स्वयंभुवा ।
इक समय हुआ ।
भू सिद्ध छुआ ।
प्र’सिद्ध अनगण ।
मम लगी लगन ।
अनगिन वन्दन ।।२।।
छैय्या देते ।
नैय्या खेते ।
पैंय्या ‘जै’ ते ।
आचार्य सु-मन ।
मम लगी लगन ।
अनगिन वन्दन ।।३।।
तिहु लोक नमें ।
दुख शोक गुमें ।
नत ढ़ोक तुम्हें ।
उवझाय वचन ।
मम लगी लगन ।
अनगिन वन्दन ।।४।।
‘फिर’ ध्यान किया ।
उर ज्ञान ‘दिया’ ।
अर-मान तिया ।
निर्ग्रन्थ श्रमण ।
मम लगी लगन ।
अनगिन वन्दन ।।५।।
जी, जीने दो ।
माफी दे दो ।
गहरे पैठो ।
जिन धर्म किरण ।
मम लगी लगन ।
अनगिन वन्दन ।।६।।
गुड़ घी मिसरी ।
जिन मुख निसरी ।
दिश् दश बिखरी ।
जिन वाणी धन ! ।
मम लगी लगन ।
अनगिन वन्दन ।।७।।
नासा निरखें ।
अन्तर् मुख हैं ।
दुख ना, हरखें ।
जिन-बिम्ब रतन ।
मम लगी लगन ।
अनगिन वन्दन ।।८।।
हैं नभ चुम्बी ।
हस्ताक्षर ‘भी’ ।
भी’तर सुर’भी ।
जिन-चैत्य सदन ।
मम लगी लगन ।
अनगिन वन्दन ।।९।।
(२)
।। नव-देव वन्दना ।।
गत-राग वन्दना ।
बड़-भाग वन्दना ।
नित् जाग वन्दना ।
शिव खेव वन्दना ।
नव-देव वन्दना ।।१।।
शिव टेक वन्दना ।
इक नेक वन्दना ।
दिव लेख वन्दना ।
तट खेव वन्दना ।
नव-देव वन्दना ।।२।।
प्रद दीक्ष वन्दना ।
संरक्ष वन्दना ।
जित अक्ष वन्दना ।
गुरु देव वन्दना ।
नव-देव वन्दना ।।३।।
चल ग्रन्थ वन्दना ।
माहन्त वन्दना ।
निर्ग्रन्थ वन्दना ।
खुश दैव वन्दना ।
नव-देव वन्दना ।।४।।
संतोष वन्दना ।
नित् होश वन्दना ।
गुण कोश वन्दना ।
बिन ऐव वन्दना ।
नव-देव वन्दना ।।५।।
दश धर्म वन्दना ।
दृग् शर्म वन्दना ।
सद्-कर्म वन्दना ।
जन सेव वन्दना ।
नव-देव वन्दना ।।६।।
श्रुत ज्ञान वन्दना ।
‘कल-यान’ वन्दना ।
गुण गान वन्दना ।
दृग् रेव वन्दना ।
नव-देव वन्दना ।।७।।
चित् चोर वन्दना ।
छत-चौंर वन्दना ।
बुत और वन्दना ।
जिन देव वन्दना ।
नव-देव वन्दना ।।८।।
जिन धाम वन्दना ।
‘अभि’राम वन्दना ।
शुभ शाम वन्दना ।
पुन जेब वन्दना ।
नव-देव वन्दना ।।९।।
(३)
जयतु नव देव जय ।
करुणा क्षमा निलय ।
इक सर्वग ।
दय रग-रग ।
दृग जग जग ।
पुन अक्षय ।
धन ! नन्त चतुष्टय ।
जयतु अरिहन्त जय ।।१।।
अशरीरी ।
तरि तैरी ।
बस फेरी ।
जन्म न तय ।
अरि-अष्ट सभी क्षय ।
सिद्ध अगणन्त जय ।।२।।
बनते पुल ।
निर्-आकुल ।
कब ढुल-मुल ।
गुण आलय ।
चारित्र हिमालय ।
जयतु आचार्य जय ।।३।।
दृग् तीजी ।
मग श्री जी ।
रग ‘भी’ धी ।
प्रमाण नय ।
इक चल विद्यालय ।
जय उपाध्याय जय ।।४।।
निस्संगा ।
विद् भंगा ।
दृग गंगा ।
जित इन्द्रिय ।
मानस तरंग लय ।
जयतु निर्ग्रन्थ जय ।।५।।
दृग रेवा ।
जन सेवा ।
कृत देवा ।
सरल हृदय ।
इक अहिंसा प्रशय ।
जयतु जिनधर्म जय ।।६।।
अनक्षरी ।
अमृत झड़ी ।
कुमत हरी ।
गुण संचय ।
मिथ्या तिमिर विलय ।
जय जिन आगम जय ।।७।।
शत्रु बिना ।
शस्त्र बिना ।
वस्त्र बिना ।
मुद्राभय ।
थिर नासा दृग द्वय ।
जयतु जिन चैत्य जय ।।८।।
थर मोटे ।
दर छोटे ।
स्वर लौटे ।
जय जय जय ।
ध्वज लहरे निर्भय ।
जय जिन चैत्यालय ।
करुणा क्षमा निलय ।
जयतु नव देव जय ।।९।।
(४)
प्राणों से प्यारे हैं ।
इक मात्र सहारे हैं ।।
नव-देव हमारे है ।
प्राणों से प्यारे हैं ।।
युगपत् जग जाना ।
जन-जन हित ठाना ।
अगणित गुणवाना ।
धन पुण्य पिटारे हैं ।
नव-देव हमारे है ।।१।।
सिर लोक विराजे ।
जग ढ़ोक नवाजे ।
‘बाजे’ कृत-काजे ।
भव सिन्धु किनारे हैं ।
नव-देव हमारे है ।।२।।
इक भाग विधाता ।
जिन दीक्ष प्रदाता ।
जागृत दिन राता ।
नभ जैन सितारे हैं ।
नव-देव हमारे है ।।३।।
खोलें दृग तीजा ।
हैं दृग पाकीज़ा ।
सम्यक् दृग बीजा ।
तम जग, उजियारे हैं ।
नव-देव हमारे है ।।४।।
थिर आसन माड़े ।
बरसा-तप जाड़े ।
हित श्रुत नत ठाड़े ।
अपनों से हारे हैं ।
नव-देव हमारे है ।।५।।
दश धर्म क्षमादी ।
तप शील व्रतादी ।
विधि धार समाधी ।
सुख दिव-शिव द्वारे हैं ।
नव-देव हमारे है ।।६।।
कीरत वरदानी ।
तीरथ कल्याणी ।
तीर्थक जिनवाणी ।
नुति वारे न्यारे हैं ।
नव-देव हमारे है ।।७।।
कर पे कर धारा ।
नासिका निहारा ।
विरहित श्रृंगारा ।
नीरव जयकारे हैं ।
नव-देव हमारे है ।।८।।
लहरे पचरॅंगा ।
‘गुल’ श्रावक भंगा ।
पद चिह्न निसंगा ।
भू स्वर्ग नजारे हैं ।
नव-देव हमारे है ।।९।।
(५)
जयवन्तो नव देवा ।
नन्तों नमन सदैवा ।
पड़े कर्म पे भारी ।
सेना मोह पछाड़ी ।
सम शरणा बलहारी ।
नन्त चतुष्टय जेबा ।
जयवन्तो नव देवा ।।१।।
कर्म छोड़ रण भागा ।
एक समय बस लागा ।
भाग मुक्ति वधु जागा ।
मुक्त इकौर परेवा ।
जयवन्तो नव देवा ।।२।।
अपने भांति बनाते ।
संयम नियम निभाते ।
दया ध्वजा फहराते ।
खेवटिया शिव खेवा ।
जयवन्तो नव देवा ।।३।।
हरें मोह अंधियारा ।
भव जल पतित सहारा ।
‘चित’ चित कोने चारा ।
शिशु गुनाह सिर लेवा ।
जयवन्तो नव देवा ।।४।।
ज्ञान ध्यान लवलीना ।
जागृत संध्या तीना ।
सुना, कहे क्या ‘सीना’ ।
लख पर दुख दृग रेवा ।
जयवन्तो नव देवा ।।५।।
क्षमा अहिंसा करुणा ।
मानस हंसा चरणा ।
सेतु प्रशंसा तरणा ।
मातृ भक्ति जन-सेवा ।
जयवन्तो नव देवा ।।६।।
बोधि समाधि निधाना ।
अगणित गणित पुराणा ।
संयम ताना बाना ।
पोथी सुध स्वयमेवा ।
जयवन्तो नव देवा ।।७।।
दृग नासा अनुरागी ।
आडम्बर परित्यागी ।
दैगम्बर बड़-भागी ।
दर्शन विहर फरेवा ।
जयवन्तो नव देवा ।।८।।
ध्वज नभ से जा लागे ।
मंदिर मंदिर आगे ।
भाग ढ़ोक दे जागे ।
चकनाचूर कुटेवा ।
जयवन्तो नव देवा ।।९।।
(६)
देव नव जयन्त जय ।
वीतरागी निरे ।
देव देवी घिरे ।
चतुष्टय अनन्त जय ।
देव अरिहन्त जय ।
देव नव जयन्त जय ।।१।।
बीज भव जल चला ।
जा टिके सिध शिला ।
कर्म क्षय तुरन्त जय ।
मुक्ति वधु कन्त जय ।
देव नव जयन्त जय ।।२।।
मण परस कद बड़े ।
खुद सदृश कर चले ।
उर सदय ! भदन्त जय ।
सूरि भगवन्त जय ।
देव नव जयन्त जय ।।३।।
तम तले दीप ना ।
तम मिटाते घना ।
अख विजय ! विनन्द जय ।
भूरि श्रुत-वन्त जय ।
देव नव जयन्त जय ।।४।।
ध्यान, श्रुत जुड़ चले ।
श्वान वित्ति मुड़ चले ।
मद विलय ! महन्त जय ।
सन्त निर्ग्रन्थ जय ।
देव नव जयन्त जय ।।५।।
हेत पर दृग भरे ।
सेतु परहित खड़े ।
गुण प्रशय ! वसंत जय ।
पोत सद्-पन्थ जय ।
देव नव जयन्त जय ।।६।।
अमृत जिन मुख झिरा ।
कुण्ड गणधर गिरा ।
मान नय समन्त जय ।
गंग सद्-ग्रन्थ जय ।
देव नव जयन्त जय ।।७।।
दृष्टि-नासा निरी ।
मिश्रि मनु मुख घुरी ।
मुद अभय ! सुवृन्द जय ।
चैत्य जिन-चन्द जय ।
देव नव जयन्त जय ।।८।।
द्वार छोटे बने ।
शिखर नभ तक तने ।
रज मलय सुगंध जय ।
निलय जैनेन्द्र जय ।
देव नव जयन्त जय ।।९।।
(७)
नव देवता ।
शिव दें सटा, भव दें हटा ।
दुख दें मिटा, सुख दें भिंटा ।
नव देवता ।।
झिर नन्द सुमन ।
जल गन्ध पवन ।
सिंह वृन्द हिरण ।
सुख नन्त परम ।
अरिहन्ताणम् अरिहन्ताणम् ।।१।।
सिर लोक गमन ।
वधु मोख रमण ।
दुख शोक शमन ।
शिव सौख अगम ।
श्री सिद्धाणम् श्री सिद्धाणम् ।।२।।
प्रद दीक्ष नगन ।
अध्यक्ष श्रमण ।
जित अक्ष यतन ।
संरक्ष धरम ।
आयरियाणम् आयरियाणम् ।।३।।
फिर ध्यान मगन ।
फिर ध्यान लगन ।
निर्-मान यतन ।
सरधान ब्रहम ।
उवझायाणम् उवझायाणम् ।।४।।
चल ग्रन्थ-सदन ।
जप मंत्र शरण ।
निर्ग्रन्थ श्रमण ।
सद्-पन्थ कदम ।
सव साहूणम् सव साहूणम् ।।५।।
अनुयोग चरण ।
अनुयोग करण ।
अनुयोग अनन ।
अनुयोग प्रथम ।
मॉं जिन आगम, मॉं जिन आगम ।।६।।
पर पीर हरण ।
झिर नीर नयन ।
चिर धीर वरण ।
गंभीर विनम ।
माहन्त धरम, माहन्त धरम ।।७।।
बिन इत्र सुमन ।
बिन वस्त्र नगन ।
बिन शस्त्र मदन ।
शश वक्त्र सुरम ।
प्रतिबिम्ब जिनम् प्रतिबिम्ब जिनम् ।।८।।
पचरंग गगन ।
गत संग लखन ।
मिर्-दंग झनन ।
भवि भृंग पदम ।
धन ! जिनालयम् धन ! जिनालयम् ।
शिव दें सटा, भव दें हटा ।
दुख दें मिटा, सुख दें भिंटा ।
नव देवता ।।९।।
(८)
नव-देव जपो-मन ।
नव-देव जपो-मन ।
तट खेव ।
पुन जेब ।
दृग् रेव !
नव-देव जपो-मन ।
नव-देव जपो-मन ।
धन धन्य सम-शरण ।
जल गन्ध, झिर सुमन ।
मृग सींह धुन श्रवण ।
व्रत शील शिरोमण ।
अरिहन्त जपो-मन ।
नव-देव जपो-मन ।।१।।
इक समय शिव सदन ।
अब कर्म सब हनन ।
कब पुनः आगमन ।
दुख विघ्न विमोचन ।
सिध-नन्त जपो-मन ।
नव-देव जपो-मन ।।२।।
प्रद दीक्ष मुनि नगन ।
अध्यक्ष ऋषि-श्रमण ।
जित अक्ष ! तिहु-भुवन ।
परहित नम लोचन ।
गुरु-नन्द जपो-मन ।
नव-देव जपो-मन ।।३।।
चल न्यार श्रुत सदन ।
नवकार जप शरण ।
दृग्-धार भव तरण ।
गर्हण आलोचन ।
श्रुत-वन्त जपो-मन ।
नव-देव जपो-मन ।।४।।
संज्ञान संलगन ।
सद्-ध्यान फिर मगन ।
अख-कान वशि-करण ।
श्रुत सम्मत भोजन ।
निर्ग्रन्थ जपो-मन ।
नव-देव जपो-मन ।।५।।
पर हेत नम नयन ।
जल सेत अमि वचन ।
उध रेत ! सुम-रणन ।
धन सार्थक जो’वन ।
सद्-पन्थ जपो-मन ।
नव-देव जपो-मन ।।६।।
अनुयोग इक चरण ।
अनुयोग वस करण ।
अनुयोग धन अनन ।
समाध अर बोधन ।
सद्-ग्रन्थ जपो-मन ।
नव-देव जपो-मन ।।७।।
पचरंग ध्वज गगन ।
मिर्-दंग झन झनन ।
जिन चन्द छव सदन ।
बढ़ गन्ध गुरोचन ।
जिन बिम्ब जपो-मन ।
नव-देव जपो-मन ।।८।।
बिन वस्त्र तन नगन ।
बिन अस्त्र-शस्त्र धन !
शश वक्त्र ! मन-हरण ।
सम्यक् अव-लोकन ।
जिन-बिम्ब जपो-मन ।
तट खेव ।
पुन जेब ।
दृग् रेव !
नव-देव जपो-मन ।
नव-देव जपो-मन ।।९।।
(९)
नव देवों के वन्दन से ।
हम छूटें भव बन्धन से ।।
धन नन्त चतुष्टय रीझे ।
चउ कर्म घातिया झीजे ।
पा लिये सुलोचन तीजे ।
अरिहन्तों के सुमरण से ।
जुड़ चलें अन्त सु…मरण से ।।१।।
अर कछु…आ भीतर जागे ।
वसु कर्म छोड़ रण भागे ।
जा समय एक शिव लागे ।
सिद्धों के गुण कीर्तन से ।
छूटें पन परिवर्तन से ।।२।।
दीक्षा दैगम्बर देते ।
नौका भक्तों की खेते ।
हाथों का श्रीफल लेते ।
आचार्यों के अर्चन से ।
जुड़ चलें पुण्य अर्जन से ।।३।।
चल ग्रन्थालय कहलाते ।
परहित ठाडे छा छाते ।
जागृति से गहरे नाते ।
श्रुत-वन्तों की पूजन से ।
जुड़ते जश खुशबू धन से ।।४।।
फिर ध्यान ज्ञान रत लागी ।
फिर ज्ञान ध्यान बढ़भागी ।
रत्नत्-त्रय परिणति जागी ।
सन्तन चरणस्-परसन से ।
जुड़ते सम्यक्-दर्शन से ।।५।।
मानव सेवा से जुड़ना ।
छल-छिद्र कुटेव बिछड़ना ।
जलना न किसी से कुढ़ना ।
जिन दया धर्म पालन से ।
बच निकलें दुख दारुण से ।।६।।
इक बोधि समाधि निधाना ।
क्या वस्तु स्वरूप पिछाना ? ।
यम, संयम, नियम विधाना ।
सद्-ग्रन्थ पठन पाठन से ।
जुड़ते तीजी आंखन से ।।७।।
दृग टिका नासिका राखी ।
अंतर्मुख मुद्रा जाकी ।
सत् शिव सुन्दर लट बांकी ।
जिन प्रतिमा के दर्शन से ।
छूटें निकाच कर्मन से ।।८।।
पचरंग लहर लहराये ।
घंटा जयनाद सुहाये ।
रथ मोक्ष दूज जग छाये ।
जिन मंदिर लख नयनन से ।
बचते गति पशु नरकन से ।।९।।
(१०)
करुणा क्षमा भण्डारी ।
जय नव-देवता थारी ।।
कर्मन घात घात अशेष ।
सुख, बल, ज्ञान, दर्श विशेष ।।
जिन अरिहन्त सुख-कारी ।
जय नव-देवता थारी ।।१।।
कर्म अघात घात समूल ।
सहजो नाव भव-जल कूल ।।
सिद्ध अनन्त दुख-हारी ।
जय नव-देवता थारी ।।२।।
चल शिव पथ चलाते और ।
मुनि सिर-मौंर भीतर गौर ।।
सार्थक सूर बलिहारी ।
जय नव-देवता थारी ।।३।।
भावी राधिका शिव-कन्त ।
पड़ते पढ़ाते सद्-ग्रन्थ ।
बहु श्रुत-वन्त गुण-धारी ।
जय नव-देवता थारी ।।४।।
फिर के ज्ञान, फिर के ध्यान ।
खुद से साधु सन्त महान ।।
मनके फिरें नवकारी ।
जय नव-देवता थारी ।।५।।
लख पर पीर दृग झिर नीर ।
बुध भिन म्यान, भिन शमशीर ।।
इक जिन धर्म शरणा’ री ।
जय नव-देवता थारी ।।६।।
जिन मुख विनिर्गत श्रुत-मात ।
ज्योत अखण्ड मण्डित स्यात् ।।
बस यह अमृत अर ना ‘री ।
जय नव-देवता थारी ।।७।।
विरत कलत्र, विरहित शस्त्र ।
अपगत इत्र, विरहित वस्त्र ।।
जिन प्रति बिम्ब मनहारी ।
जय नव-देवता थारी ।।८।।
ध्वज लहरे गगन निर्बाध ।
दश दिश् गूंज घंटा नाद ।।
जश जिन गृह अहिंसा ‘री ।
जय नव-देवता थारी ।।९।।
(११)
नव देवों की शरणा ।।
मॉं की गोदी ।
सीपी मोती
घी की ज्योति ।
मोखी चोखी तरणा ।
नव देवों की शरणा ।।१।।
धन दृग तीजी ।
दुर्गत छीजी ।
रिध-सिध सीझी ।
रीझी सिरपुर ललना ।
नव देवों की शरणा ।।२।।
खुद को ध्याया ।
अद्भुत पाया ।
सुर-पत नाया ।
जाया सुख अनगणना ।
नव देवों की शरणा ।।३।।
वृत्तिक भिक्षा ।
मौलिक शिक्षा ।
माफिक वृक्षा ।
रक्षा सम्यक् रतना ।
नव देवों की शरणा ।।४।।
चल जिनवाणी ।
पातर पाणी ।
अविचल ध्यानी ।
समरस-सानी श्रमणा ।
नव देवों की शरणा ।।५।।
अख-मन जेता ।
संयम केता ।
ऊरध रेता ।
संचेता पर रत ना ।
नव देवों की शरणा ।।६।।
मानव सेवा ।
परिणत देवा ।
परहित खेवा ।
गंगा रेवा नयना ।
नव देवों की शरणा ।।७।।
समाध बोधी ।
सुधात्म नोखी ।
प्रमाद खो धी ।
पोथी अनाद करणा ।
नव देवों की शरणा ।।८।।
नासा दृष्टि ।
मुद्रा मिष्टी ।
श्रद्धा सृष्टि ।
झिर लग वृष्टि करुणा ।
नव देवों की शरणा ।।९।।
पाथर मोटे ।
जा धुन लौटे ।
द्वारे छोटे ।
भावा खोटे फिर ना ।
नव देवों की शरणा ।।१०।।
(१२)
तट भव खेवा ।
रट नव देवा ।
हट पुन जेबा ।
जयतु जयतु नव-देव सदैवा ।।
हित उपदेशा ।
गत रत-द्वेषा ।
विदित अशेषा ।
जयतु जयतु अरिहन्त जिनेशा ।।१।।
कर्म निकन्दा ।
शिव वधु कन्ता ।
गुण अगणन्ता ।
जयतु जयतु जय सिद्ध अनन्ता ।।२।।
जाग प्रदाता ।
राग विधाता ।
दाग न नाता ।
जयतु सूर जय भाग विधाता ।।३।।
चल विद्यालै ।
चरित हिमालै ।
नन्त गुणालै ।
जयतु जयतु आचार्य सदा जै ।।४।।
पाणन पात्री ।
पांवन यात्री ।
दामन मात्री ।
जयतु सन्त दृग श्रावण भाद्री ।।५।।
विवेक हंसा ।
और प्रशंसा ।
विवाद ध्वंसा ।
जयतु जयतु जिन धर्म अहिंसा ।।६।।
ज्योत समाना ।
गोद प्रधाना ।
बोध निधाना ।
जयतु जयतु जिन वेद पुराणा ।।७।।
विरत कलत्रा ।
विरहित वस्त्रा ।
अस्त्र न शस्त्रा ।
जयतु चैत्य जिन भाव प्रशस्ता ।।८।।
जश निकलंका ।
सम धनि रंका ।
सुदृग निशंका ।
जय जयतु जिन धाम असंखा ।।९।।
(१३)
दोहा
सिद्ध, स्वर्ग-शिव सारथी,
सूरि, पाठि, निर्ग्रन्थ ।
जैन धर्म, जिन-भारती,
जिन-गृह, चैत्य-जिनन्द ।।
कर्म घातिया घात जे,
नन्त चतुष्टय वन्त ।
हितु शिशु दीनानाथ वे,
जयतु जयतु अरिहन्त ।।१।।
कर्म अघात विनाश जे,
मण्डित गुण अगणन्त ।
स्वर्णाक्षर इति…हास वे,
जय जय सिद्ध अनन्त ।।२।।
मण्डित गुण छत्तीस जे,
प्रद दीक्षा निर्ग्रन्थ ।
सजल-सजग निश-दीस वे,
सार्थ सूर जयवन्त ।।३।।
मण्डित गुण पच्चीस जे,
चल श्रुत-निलय भदन्त ।
सजल-सजग निश-दीस वे,
उपाध्याय जयवन्त ।।४।।
मण्डित गुण अठ-बीस जे,
आत्म ध्यान रत गन्थ ।
सजल-सजग निश-दीस वे,
जयतु दिगम्बर सन्त ।।५।।
वीर हिमाचल झिर चली,
पड़ गणि गौतम कुण्ड ।
ज्ञान गंग मॉं सरसुती,
जय जय जयतु जयन्त ।।६।।
सम-दृष्टि, दृष्टि निरी,
परहित करुणा-वन्त ।
तरणी वैतरणी तिरी,
जय जिन-धर्म जयन्त ।।७।।
लहरे पचरंगी ध्वजा,
शिव-रथ भद्र-समन्त ।
शिखर छुये आकाश जा,
जिन मन्दिर जयवन्त ।।८।।
अस्त्र-शस्त्र बिन वस्त्र वे,
मूरत स्वर्ण सुगन्ध ।
छव सुन्दर शश वक्त्र वे,
धन ! जिन-बिम्ब जयन्त ।।९।।
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