जिन गुण सम्पत्ति विधान
पूजन
रख परिणति अपनी धौरी ।
इक सुमति नाम की छोरी ।
नृप श्रेयांश हो गई ।
पाल जिन गुण संपत्ती व्रत ।
आ खड़ी आगे पंक्ती सत ।
स्त्री पर्याय खो गई ।
नृप श्रेयांश हो गई ।
ओ ‘री, सुन ‘री सखि मोरी ! ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री जिन गुण सम्पत्ति सहित जिनेन्द्र !
अत्र अवतर अवतर संवौषट्
(इति आह्वानन)
अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ:
(इति स्थापनम्)
अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट्
(इति सन्निधिकरणम्) ।
भाव जिन दर्शन करते ही,
पुण्य का बिरछा लग जाता ।
किये दर्शन उस बिरछे में,
फूल क्या ? फल भी दिख जाता ।।
‘मुख-तक’ जेब भर गई ।
कोई बात ना नई ।
नृप श्रेयांश हो गई ।
पाल जिन गुण संपत्ती व्रत ।
आ खड़ी आगे पंक्ती सत ।
स्त्री पर्याय खो गई ।
नृप श्रेयांश हो गई ।
इक सुमति नाम की छोरी ।
ओ ‘री, सुन ‘री सखि मोरी ! ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री जिन गुण सम्पत्ति सहित जिनेन्द्र नमः
जलं निर्वपामीति स्वाहा ।।
रूप दिखता है दर्पण में,
किया जिन दर्श स्वरूप दिखे ।
क्षीर सागर, जल पी कर के,
कौन जल सागर क्षार चखे ।।
बिगड़ी बात बन गई ।
कोई बात ना नई ।
नृप श्रेयांश हो गई ।
पाल जिन गुण संपत्ती व्रत ।
आ खड़ी आगे पंक्ती सत ।
स्त्री पर्याय खो गई ।
नृप श्रेयांश हो गई ।
इक सुमति नाम की छोरी ।
ओ ‘री, सुन ‘री सखि मोरी ! ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री जिन गुण सम्पत्ति सहित जिनेन्द्र नमः
चंदनं निर्वपामीति स्वाहा ।।
इन्द्र ले आँखों के मोती,
पखारे जिनवर के चरणा ।
धार विधि धारा में बह के,
वैतरण तर ले, बन श्रमणा ।।
कागज नाव तर गई ।
कोई बात ना नई ।
नृप श्रेयांश हो गई ।
पाल जिन गुण संपत्ती व्रत ।
आ खड़ी आगे पंक्ती सत ।
स्त्री पर्याय खो गई ।
नृप श्रेयांश हो गई ।
इक सुमति नाम की छोरी ।
ओ ‘री, सुन ‘री सखि मोरी ! ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री जिन गुण सम्पत्ति सहित जिनेन्द्र नमः
अक्षतं निर्वपामीति स्वाहा ।।
हाथ पर हाथ रखे बैठे,
हाथ क्या ? दे लेंगे न कहो ।
पर्वतों से निकलीं नदियाँ,
न दी सागर इक नदी अहो ।।
जल से ज्योत जग गई ।
कोई बात ना नई ।
नृप श्रेयांश हो गई ।
पाल जिन गुण संपत्ती व्रत ।
आ खड़ी आगे पंक्ती सत ।
स्त्री पर्याय खो गई ।
नृप श्रेयांश हो गई ।
इक सुमति नाम की छोरी ।
ओ ‘री, सुन ‘री सखि मोरी ! ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री जिन गुण सम्पत्ति सहित जिनेन्द्र नमः
पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा ।।
अकेली बार फरे केली,
आम माँगे ऋत फल देता ।
भक्ति कल्पद्-द्रुम क्यूं न फरे,
भक्त आँखों का जल देता ।।
सीपी गोद भर गई ।
कोई बात ना नई ।
नृप श्रेयांश हो गई ।
पाल जिन गुण संपत्ती व्रत ।
आ खड़ी आगे पंक्ती सत ।
स्त्री पर्याय खो गई ।
नृप श्रेयांश हो गई ।
इक सुमति नाम की छोरी ।
ओ ‘री, सुन ‘री सखि मोरी ! ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री जिन गुण सम्पत्ति सहित जिनेन्द्र नमः
नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।
मनाते वीतराग देवा,
रीझती लक्ष्मी सुनते हैं ।
सीझती देवी सरस्वती,
बने जिन सेवा चुनते हैं ।।
चौंसठ धार लग गई ।
कोई बात ना नई ।
नृप श्रेयांश हो गई ।
पाल जिन गुण संपत्ती व्रत ।
आ खड़ी आगे पंक्ती सत ।
स्त्री पर्याय खो गई ।
नृप श्रेयांश हो गई ।
इक सुमति नाम की छोरी ।
ओ ‘री, सुन ‘री सखि मोरी ! ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री जिन गुण सम्पत्ति सहित जिनेन्द्र नमः
दीपं निर्वपामीति स्वाहा ।।
सुहागा डाला ताव दिये,
किट्ट कण बिन देरी हटते ।
निकाचित विधि न किसी टलते,
कर्म वे सिमरण से कटते ।।
खोई चीज मिल गई ।
कोई बात ना नई ।
नृप श्रेयांश हो गई ।
पाल जिन गुण संपत्ती व्रत ।
आ खड़ी आगे पंक्ती सत ।
स्त्री पर्याय खो गई ।
नृप श्रेयांश हो गई ।
इक सुमति नाम की छोरी ।
ओ ‘री, सुन ‘री सखि मोरी ! ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री जिन गुण सम्पत्ति सहित जिनेन्द्र नमः
धूपं निर्वपामीति स्वाहा ।।
अंधेरे में जो रहें उन्हें,
सिवा जिन और न देख सकें ।
नाम-धारी प्रकाश वाले,
भाँति निज करें न, कपट रखें ।।
बदली स्वार्थ छट गई ।
कोई बात ना नई ।
नृप श्रेयांश हो गई ।
पाल जिन गुण संपत्ती व्रत ।
आ खड़ी आगे पंक्ती सत ।
स्त्री पर्याय खो गई ।
नृप श्रेयांश हो गई ।
इक सुमति नाम की छोरी ।
ओ ‘री, सुन ‘री सखि मोरी ! ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री जिन गुण सम्पत्ति सहित जिनेन्द्र नमः
फलं निर्वपामीति स्वाहा ।।
आँख हो चलें चार निधि से,
और हित चार-बार बोले ।
बहा दी ज्ञान रूप गंगा,
हाथ जो चाहे वो धो ले ।।
पीड़ा मात खा गई ।
कोई बात ना नई ।
नृप श्रेयांश हो गई ।
पाल जिन गुण संपत्ती व्रत ।
आ खड़ी आगे पंक्ती सत ।
स्त्री पर्याय खो गई ।
नृप श्रेयांश हो गई ।
इक सुमति नाम की छोरी ।
ओ ‘री, सुन ‘री सखि मोरी ! ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री जिन गुण सम्पत्ति सहित जिनेन्द्र नमः
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।
जयमाला व्रत कथा
देश गांधिल आप भाँता ।
नगर पाटलि-पुत्र ख्याता ।।
नागदत्त सुनाम सेठी ।
भरी ‘मुख-तक’ सार्थ पेटी ।।१।।
किन्तु ज्यों ही ब्याह कीना सुमति से ।
विमुख लक्ष्मी, जुड़ा नाता विपति से ।।
क्या करे वह बीन लकड़ी बेचता ।
धार दृग जल भाग रेखा खेंचता ।।२।।
किन्तु खिंचती नहीं रेखा ।
अटल सुनते भाग लेखा ।।
एक दिन देखा उन्होंने ।
नगर खाली लगा होने ।।३।।
पूछते हैं बात क्या है कहो तो ।
कहाँ भागे जा रहे हो अहो ओ ! ।।
पता लगता केवलि पिहितास्रवा ।
साध गिर अम्बर-तिलक बैठे सभा ।।४।।
सुमत सेठानी चली है ।
नींव पाप महल हिली है ।।
ले चली घट आँसुओं के ।
दिखे प्रभु क्यों ? अश्रु रोके ।।५।।
बिन कहे ही कह चली है पीर को ।
फबक चाली दृग मिला प्रभु धीर खो ।।
खिर चली धुन पूर्व भव प्रभु कह चले ।
पाप फल बिन कान पकड़े कब टले ।।६।।
नगर नाम पलाश-कूटा ।
आश पल निधिधर अनूठा ।।
नाम दिविलह ग्राम-पत की ।
बालिका तुम धनी मद की ।।७।।
नाम तुम धनश्री इक दिन आन वन ।
जहाँ गुप्त-समाधि रत सद्ध्यान मुन ।।
मान उनको अपशकुन तू खीजती ।
छोड़ कुत्ते माथ श्रम-कण भींजती ।।८।।
सह चले उपसर्ग साधो ।
तीर्थ चल ! सविनय अराधो ।।
पुण्य बर्फ गला पलक में ।
हुई निन्दा सभ-सुरग में ।।९।।
जिये जीने को दशा दयनी हुई ।
मरी धनश्री पाप फल सिंहनी हुई ।।
पटा कुछ कर्जा अभी भी कुछ बचा ।
भेंट दारिद जो रहा तुझको नचा ।।१०।।
सिर झुका निज कथा सुनती ।
खेद-पश्चाताप चुनती ।।
पूछती है तोड़ घेरा ।
कह सहारा एक तेरा ।।११।।
साध व्रत जिन गुणन सम्पद भाव से ।
पास शिरपुर भक्ति जिनवर नाव से ।।
सुमति सेठानी सविधि व्रत पालती ।
साध सुमरण उठी दिवपुर पालकी ।।१२।।
आन चक्री सुता पीछे ।
दान फल भू-भोग खींसे ।।
आर्यिका बन जम्बु-दीपा ।
राख पानी मोति सीपा ।।१३।।
स्त्री लिंग छिद स्वर्ग दूजे सुर हुआ ।
बाद मुनि बन स्वर्ग-सोलहवाँ छुआ ।।
चक्री भण्डारी बना जौवन मुनी ।
सिद्धि सरवारथ पुरी-हस्तिन चुनी ।।१४।।
दान-वीर श्रियांस राया ।
दीक्ष पद गणि-आदि पाया ।।
ध्यान केवल ज्ञान मोखा ।
सुख-‘निराकुल’ हेत ढोका ।।१५।।
दोहा
बढ़ो, बढ़ो, आगे बढ़ो,
लक्ष्य बना के मीत ! ।
चरणों में झुक-झूम के,
नाच उठेगी जीत ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री जिन गुण सम्पत्ति सहित जिनेन्द्र नमः
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।
(पुष्पांजलि क्षिपामि)
विधान प्रारंभ
प्रतिपदा के १६ अर्घ्य
प्रशम-मन्द कषाय कर लो ।
धर्म धर्मा-यतन वर लो ।।
रखो सब पर भाव करुणा ।
सत्य मारग से न डिगना ।।
भा चलो दर्शन विशुद्धि भावना ।
पुण्य तीर्थंकर प्रकृति यदि बाँधना ।।
‘भावना भव नाशनी’ क्या ना सुना ।
भावना भा चलो सोलह कारणा ।।१।।
ॐ ह्रां ह्रीं ह्रूं ह्रौं ह्रः अ-सि आ-उ-सा
दर्शन-विशुद्धि भावनायै जिन-गुण-संपदे
मुक्ति-पद-कारण-स्वरूपायै नमः ।
विनय दर्शन, ज्ञान साधो ।
विनय तप, चारित अराधो ।।
रख विनय उपचार पंचा ।
विरंचा संशय न रंचा ।।
भा विनय सम्पन्नता सत ! भावना ।
पुण्य तीर्थंकर प्रकृति यदि बाँधना ।।
‘भावना भव नाशनी’ क्या ना सुना ।
भावना भा चलो सोलह कारणा ।।२।।
ॐ ह्रां ह्रीं ह्रूं ह्रौं ह्रः अ-सि आ-उ-सा
विनय-सम्पन्नता भावनायै जिन-गुण-संपदे
मुक्ति-पद-कारण-स्वरूपायै नमः ।
अहिंसादिक व्रत संभालो ।
साथ गुन गुण व्रत दिखा दो ।।
चार शिक्षा व्रत अनूठे ।
पाल भीतर स्रोत फूटे ।।
शील गत-अतिचार व्रत भा भावना ।
पुण्य तीर्थंकर प्रकृति यदि बाँधना ।।
‘भावना भव नाशनी’ क्या ना सुना ।
भावना भा चलो सोलह कारणा ।।३।।
ॐ ह्रां ह्रीं ह्रूं ह्रौं ह्रः अ-सि आ-उ-सा
शील-वतेष्व-नतिचार भावनायै जिन-गुण-संपदे
मुक्ति-पद-कारण-स्वरूपायै नमः ।
ज्ञान घन मैं, ज्ञान घन मैं ।
रटो, लाओ अनुभवन में ।।
जीव जानन, सार्थ जड़-धी ।
हुई देरी करो जल्दी ।।
भा अभीक्ष् ज्ञानोपयोग सुभावना ।
पुण्य तीर्थंकर प्रकृति यदि बाँधना ।।
‘भावना भव नाशनी’ क्या ना सुना ।
भावना भा चलो सोलह कारणा ।।४।।
ॐ ह्रां ह्रीं ह्रूं ह्रौं ह्रः अ-सि आ-उ-सा
अभीक्ष्ण ज्ञानोपयोग भावनायै जिन-गुण-संपदे
मुक्ति-पद-कारण-स्वरूपायै नमः ।
विश्व भोगें चाह मन की ।
किन्तु होवे पूर्ण किन की ।।
पदारथ मुट्टी भरे हैं ।
जीव ठस सृष्टि भरे हैं ।।
अभीक्षण संवेग भाओ भावना ।
पुण्य तीर्थंकर प्रकृति यदि बाँधना ।।
‘भावना भव नाशनी’ क्या ना सुना ।
भावना भा चलो सोलह कारणा ।।५।।
ॐ ह्रां ह्रीं ह्रूं ह्रौं ह्रः अ-सि आ-उ-सा
अभीक्ष्ण संवेग भावनायै जिन-गुण-संपदे
मुक्ति-पद-कारण-स्वरूपायै नमः ।
पदारथ ये मुझे छोड़ें ।
छोड़ दूँ, न इन्हें क्यों मैं ।।
आयेगा अवसर न दुख का ।
जायेगा उत्सव न सुख का ।।
शक्तिश: परि-त्याग भाओ भावना ।
तीर्थंकर प्रकृति यदि बाँधना ।।
‘भावना भव नाशनी’ क्या ना सुना ।
भावना भा चलो सोलह कारणा ।।६।।
ॐ ह्रां ह्रीं ह्रूं ह्रौं ह्रः अ-सि आ-उ-सा
शक्तिश: त्याग भावनायै जिन-गुण-संपदे
मुक्ति-पद-कारण-स्वरूपायै नमः ।
पोसते क्यों गात अपना ।
क्षीण होना ख्यात लखना ।।
बने तन से साध तप लो ।
डरो मत संयम शपथ लो ।।
चलो भाते शक्तिश: तप भावना ।
तीर्थंकर प्रकृति यदि बाँधना ।।
‘भावना भव नाशनी’ क्या ना सुना ।
भावना भा चलो सोलह कारणा ।।७।।
ॐ ह्रां ह्रीं ह्रूं ह्रौं ह्रः अ-सि आ-उ-सा
शक्तिश: तप भावनायै जिन-गुण-संपदे
मुक्ति-पद-कारण-स्वरूपायै नमः ।
तैरना स्वाध्याय करना ।
डूब साधो थमो हिरणा ।।
उतर गहरे मिलें मोती ।
क़ीमती अध्यात्म ज्योती ।।
बने साधु-समाधि भाओ भावना ।
पुण्य तीर्थंकर प्रकृति यदि बाँधना ।।
‘भावना भव नाशनी’ क्या ना सुना ।
भावना भा चलो सोलह कारणा ।।८।।
ॐ ह्रां ह्रीं ह्रूं ह्रौं ह्रः अ-सि आ-उ-सा
साधु समाधि भावनायै जिन-गुण-संपदे
मुक्ति-पद-कारण-स्वरूपायै नमः ।
‘गिर’ चढ़ाई मोक्ष रस्ता ।
गिरेगा ही शब्द कहता ।।
हाथ दे उसको संभालो ।
धर्म गिरने से बचा लो ।।
साध वैय्यावृत्त करणी भावना ।
पुण्य तीर्थंकर प्रकृति यदि बाँधना ।।
‘भावना भव नाशनी’ क्या ना सुना ।
भावना भा चलो सोलह कारणा ।।९।।
ॐ ह्रां ह्रीं ह्रूं ह्रौं ह्रः अ-सि आ-उ-सा
वैय्यावृत्त करण भावनायै जिन-गुण-संपदे
मुक्ति-पद-कारण-स्वरूपायै नमः ।
बीज बिखराये जिनन्दा ।
लहर खाये श्रुतस्-कंधा ।।
कृपा, अरिहन्ता न कमती ।
यही सुनते एक विनती ।।
बने अर्हत भक्ति भाओ भावना ।
पुण्य तीर्थंकर प्रकृति यदि बाँधना ।।
‘भावना भव नाशनी’ क्या ना सुना ।
भावना भा चलो सोलह कारणा ।।१०।।
ॐ ह्रां ह्रीं ह्रूं ह्रौं ह्रः अ-सि आ-उ-सा
अर्हत भक्ति भावनायै जिन-गुण-संपदे
मुक्ति-पद-कारण-स्वरूपायै नमः ।
संभलते भी पैर फिसले ।
सँभालें गुरुदेव विरले ।।
माँग प्रायश्चित्त चालो ।
मन तरंग उठी बिठा लो ।।
भा चलो आचार्य भक्ति भावना ।
पुण्य तीर्थंकर प्रकृति यदि बाँधना ।।
‘भावना भव नाशनी’ क्या ना सुना ।
भावना भा चलो सोलह कारणा ।।११।।
ॐ ह्रां ह्रीं ह्रूं ह्रौं ह्रः अ-सि आ-उ-सा
आचार्य भक्ति भावनायै जिन-गुण-संपदे
मुक्ति-पद-कारण-स्वरूपायै नमः ।
समय कम, जिन श्रुत अथाहा ।
पाठि श्रुत नख-शिख ऽवगाहा ।।
सार ले लो शरण पा के ।
पार हो लो चरण पा के ।।
बने बहु-श्रुत भक्ति भाओ भावना ।
पुण्य तीर्थंकर प्रकृति यदि बाँधना ।।
‘भावना भव नाशनी’ क्या ना सुना ।
भावना भा चलो सोलह कारणा ।।१२।।
ॐ ह्रां ह्रीं ह्रूं ह्रौं ह्रः अ-सि आ-उ-सा
बहु-श्रुत भक्ति भावनायै जिन-गुण-संपदे
मुक्ति-पद-कारण-स्वरूपायै नमः ।
सार्थ पन्ने मोक्ष नक़्शे ।
गुम गये यदि कभी हम से ।।
गुमेगा साम्राज्य शिव का ।
स्वप्न होगा ताज दिव का ।।
बने प्रवचन भक्ति भाओ भावना ।
पुण्य तीर्थंकर प्रकृति यदि बाँधना ।।
‘भावना भव नाशनी’ क्या ना सुना ।
भावना भा चलो सोलह कारणा ।।१३।।
ॐ ह्रां ह्रीं ह्रूं ह्रौं ह्रः अ-सि आ-उ-सा
प्रवचन भक्ति भावनायै जिन-गुण-संपदे
मुक्ति-पद-कारण-स्वरूपायै नमः ।
कृषक चूके यदि अषाढ़ा ।
पीसता निशि, भरे पारा ।।
षड़ावश्यक सब अराधो ।
रख समय का ध्यान साधो ।।
भा अवश्यक अपरिहाणी भावना ।
पुण्य तीर्थंकर प्रकृति यदि बाँधना ।।
‘भावना भव नाशनी’ क्या ना सुना ।
भावना भा चलो सोलह कारणा ।।१४।।
ॐ ह्रां ह्रीं ह्रूं ह्रौं ह्रः अ-सि आ-उ-सा
आवश्यक अपरिहाणि भावनायै जिन-गुण-संपदे
मुक्ति-पद-कारण-स्वरूपायै नमः ।
नये रस्ते मत निकालो ।
कदम पगडंडी बढ़ा लो ।।
अप्-प्रभावन बच, बचाओ ।
प्रभावन इति-वृत रचाओ ।।
भा चलो मार्गप्-प्रभावन भावना ।
पुण्य तीर्थंकर प्रकृति यदि बाँधना ।।
‘भावना भव नाशनी’ क्या ना सुना ।
भावना भा चलो सोलह कारणा ।।१५।।
ॐ ह्रां ह्रीं ह्रूं ह्रौं ह्रः अ-सि आ-उ-सा
मार्गप्-प्रभावना भावनायै जिन-गुण-संपदे
मुक्ति-पद-कारण-स्वरूपायै नमः ।
नहीं कोई भी पराया ।
शत्रु कर्मों का भिजाया ।।
सभी जन हैं सिद्ध कल के ।
क्या मिलेगा द्वेष रख के ।।
भा चलो वात्सल्य प्रवचन भावना ।
पुण्य तीर्थंकर प्रकृति यदि बाँधना ।।
‘भावना भव नाशनी’ क्या ना सुना ।
भावना भा चलो सोलह कारणा ।।१६।।
ॐ ह्रां ह्रीं ह्रूं ह्रौं ह्रः अ-सि आ-उ-सा
प्रवचन वात्सल्य भावनायै जिन-गुण-संपदे
मुक्ति-पद-कारण-स्वरूपायै नमः ।
पंचमी के पाँच अर्घ्य
रतन नभ से बरसे ।
पुण्य धन ! अनमोला ।
जगत् माता हरषे ।
दिखे सपने सोला ।
झिरे मोती दृग से ।
रतन नभ से बरसे ।।
ॐ ह्रां ह्रीं ह्रूं ह्रौं ह्रः अ-सि आ-उ-सा
स्वर्गावतरण-गर्भ-कल्याणक जिन-गुण-संपदे
मुक्ति-पद-कारण-स्वरूपायै नमः ।
मेरु गिर अभिषेका ।
किया सौधर्मा ने ।
देव देवी देखा ।
स्वकीय धर्म पाने ।
माथ चरणन टेका ।
मेरु गिर अभिषेका ।।
ॐ ह्रां ह्रीं ह्रूं ह्रौं ह्रः अ-सि आ-उ-सा
जन्माभिषेक-कल्याणक जिन-गुण-संपदे
मुक्ति-पद-कारण-स्वरूपायै नमः ।
इन्द्र जाला तोड़ा ।
आन लौकान्त खड़े ।
पुल प्रशंसा जोड़ा ।
स्वयं-भू आप निरे ।
दीक्ष परिग्रह छोड़ा ।
इन्द्र जाला तोड़ा ।।
ॐ ह्रां ह्रीं ह्रूं ह्रौं ह्रः अ-सि आ-उ-सा
परिनिष्क्रमण-कल्याणक जिन-गुण-संपदे
मुक्ति-पद-कारण-स्वरूपायै नमः ।
लग चला समशरणा ।
ज्ञान, दर्शन नन्ता ।
सुख अनंता झरना ।
नन्त वीरज वन्ता ।
एक तारण-तरणा ।
लग चला समशरणा ।।
ॐ ह्रां ह्रीं ह्रूं ह्रौं ह्रः अ-सि आ-उ-सा
केवल ज्ञान-कल्याणक जिन-गुण-संपदे
मुक्ति-पद-कारण-स्वरूपायै नमः ।
ध्यान शुक्ला आगी ।
नष्ट अष्टक कर्मा ।
समय नव शिव लागी ।
इष्ट अष्टक धर्मा ।
मुक्ति वधु बड़-भागी ।
ध्यान शुक्ला आगी ।।
ॐ ह्रां ह्रीं ह्रूं ह्रौं ह्रः अ-सि आ-उ-सा
निर्वाण-कल्याणक जिन-गुण-संपदे
मुक्ति-पद-कारण-स्वरूपायै नमः ।
अष्टमी के ८ अर्घ्य
वृक्ष अशोका ।
पा के मौका ।
साख बहाने दे झुक ढोका ।।
ॐ ह्रां ह्रीं ह्रूं ह्रौं ह्रः अ-सि आ-उ-सा
अशोक वृक्ष महा-प्रातिहार्य जिन-गुण-संपदे
मुक्ति-पद-कारण-स्वरूपायै नमः ।
पुष्प नन्दना ।
वृष्टि सुर-गणा ।
करें अंजली बद्ध वन्दना ।।
ॐ ह्रां ह्रीं ह्रूं ह्रौं ह्रः अ-सि आ-उ-सा
सुर पुष्प वृष्टि महा-प्रातिहार्य जिन-गुण-संपदे
मुक्ति-पद-कारण-स्वरूपायै नमः ।
ध्वनि ओंकारा ।
चारिक बारा ।
खिरे, झिरे कर्मों की कारा ।।
ॐ ह्रां ह्रीं ह्रूं ह्रौं ह्रः अ-सि आ-उ-सा
दिव्य-ध्वनि महा-प्रातिहार्य जिन-गुण-संपदे
मुक्ति-पद-कारण-स्वरूपायै नमः ।
लग के पांती ।
सुर छव चांदी ।
चँवर ढुराते अपने भांती ।।
ॐ ह्रां ह्रीं ह्रूं ह्रौं ह्रः अ-सि आ-उ-सा
चतुष्-षष्टि-चामर महा-प्रातिहार्य जिन-गुण-संपदे
मुक्ति-पद-कारण-स्वरूपायै नमः ।
पीठ अनोखी ।
मणि-रत्नों की ।
किस्मत जाग चली सिंहों की ।।
ॐ ह्रां ह्रीं ह्रूं ह्रौं ह्रः अ-सि आ-उ-सा
सिंहासन महा-प्रातिहार्य जिन-गुण-संपदे
मुक्ति-पद-कारण-स्वरूपायै नमः ।
भा-वृत न्यारा ।
शशि-वत् प्यारा ।
तेजोमय कोटिक दिनतारा ।।
ॐ ह्रां ह्रीं ह्रूं ह्रौं ह्रः अ-सि आ-उ-सा
भामण्डल महा-प्रातिहार्य जिन-गुण-संपदे
मुक्ति-पद-कारण-स्वरूपायै नमः ।
दुन्दुभि गाजे ।
यहाँ विराजे ।
बढ़ राजे महाराजे बाजे ।।
ॐ ह्रां ह्रीं ह्रूं ह्रौं ह्रः अ-सि आ-उ-सा
देव-दुन्दुभि महा-प्रातिहार्य जिन-गुण-संपदे
मुक्ति-पद-कारण-स्वरूपायै नमः ।
चंदा आया ।
तारे लाया ।
छतर बहाने अतपर छाया ।।
ॐ ह्रां ह्रीं ह्रूं ह्रौं ह्रः अ-सि आ-उ-सा
छत्रत्रय महा-प्रातिहार्य जिन-गुण-संपदे
मुक्ति-पद-कारण-स्वरूपायै नमः ।
दशमी के २० अर्घ्य
नहिं पसीजते जो उन्हें,
लगे पसीने धार ।
दूर दौड़, ना होड़ की,
नि-स्वेदत्व उपहार ।।
ॐ ह्रां ह्रीं ह्रूं ह्रौं ह्रः अ-सि आ-उ-सा
निःस्वेदत्व-सहजातिशय जिन-गुण-संपदे
मुक्ति-पद-कारण-स्वरूपायै नमः ।
छोड़ा मलमल पहिनना,
मल-मल नाहिंस्-नान ।
दिव उतरी थाली लगी,
निर्मलत्व गुणवान ।।
ॐ ह्रां ह्रीं ह्रूं ह्रौं ह्रः अ-सि आ-उ-सा
निर्मलत्व-सहजातिशय जिन-गुण-संपदे
मुक्ति-पद-कारण-स्वरूपायै नमः ।
काली परिणति छोड़ के,
धारी परिणति गौर ।
क्षीर गौर रुधिरत्व पा,
बने आज सिरमौर ।।
ॐ ह्रां ह्रीं ह्रूं ह्रौं ह्रः अ-सि आ-उ-सा
क्षीर-गौर-रुधिरत्व-सहजातिशय
जिन-गुण-संपदे मुक्ति-पद-कारण-स्वरूपायै नमः ।
उड़ा न चाले हो हँसी,
कूबड़ देख कुरूप ।
सम-चतु-रस-संस्थान पा,
जँचते लख चिद्रूप ।।
ॐ ह्रां ह्रीं ह्रूं ह्रौं ह्रः अ-सि आ-उ-सा
समचतुरस्र-संस्थान-सहजातिशय
जिन-गुण-संपदे मुक्ति-पद-कारण-स्वरूपायै नमः ।
बना शक्तिशः तप तपा,
भले सं-हनन काँच ।
आज पुण्य फल संहनना,
वज्र वृषभ नाराच ।।
ॐ ह्रां ह्रीं ह्रूं ह्रौं ह्रः अ-सि आ-उ-सा
वज्रवृषभ-नाराच-संहनन-सहजातिशय
जिन-गुण-संपदे मुक्ति-पद-कारण-स्वरूपायै नमः ।
राग शान्त हो भावना,
भाते आये पूर्व ।
लाभ सत्य, शिव, सुन्दरा,
गुण सौरूप्य अपूर्व ।।
ॐ ह्रां ह्रीं ह्रूं ह्रौं ह्रः अ-सि आ-उ-सा
सौरूप्य-सहजातिशय जिन-गुण-संपदे
मुक्ति-पद-कारण-स्वरूपायै नमः ।
भाँत हवा काँधे उठा,
ठेली और सुगंध ।
अनन्य गुण सौगंध्य से,
जुड़ा तभी संबंध ।।
ॐ ह्रां ह्रीं ह्रूं ह्रौं ह्रः अ-सि आ-उ-सा
सौगंध्य-सहजातिशय जिन-गुण-संपदे
मुक्ति-पद-कारण-स्वरूपायै नमः ।
लक्ष न लक्ष्य बना चले,
साध चले इक लक्ष ।
सीझ चली लो भावना,
गुण सौलक्षण्य प्रतक्ष ।।
ॐ ह्रां ह्रीं ह्रूं ह्रौं ह्रः अ-सि आ-उ-सा
सौलक्षण्य-सहजातिशय जिन-गुण-संपदे
मुक्ति-पद-कारण-स्वरूपायै नमः ।
बलवा न मचाया कभी,
न दिखाया बल रौब ।
गुण अप्रमित वीरज तभी,
त्रिभुवन रहा सुशोभ ।।
ॐ ह्रां ह्रीं ह्रूं ह्रौं ह्रः अ-सि आ-उ-सा
अप्रमित वीर्य-सहजातिशय जिन-गुण-संपदे
मुक्ति-पद-कारण-स्वरूपायै नमः ।
बोला कटुक, कठोर ना,
नपे-तुले से बोल ।
गुण प्रिय-हित-वादित्य पा,
खड़े कतार अमोल ।।
ॐ ह्रां ह्रीं ह्रूं ह्रौं ह्रः अ-सि आ-उ-सा
प्रिय-हित-वादित्व-सहजातिशय जिन-गुण-संपदे
मुक्ति-पद-कारण-स्वरूपायै नमः ।
‘सुखी रहे सब’ भावना,
भा, रख व्रत निर्दोष ।
पुण्य फला अरिहन्त लो,
सुभिख चार सौ कोश ।
ॐ ह्रां ह्रीं ह्रूं ह्रौं ह्रः अ-सि आ-उ-सा
गव्यूति-शत-चतुष्टय-सुभिक्षत्व-घातिक्षय-जातिशय जिन-गुण-संपदे मुक्ति-पद-कारण-स्वरूपायै नमः ।
बढ़ा चले हैं और को,
रोक-टोक प्रतिबंध ।
बढ़े जा रहे व्योम में,
पद-विक्षेप न संध ।।
ॐ ह्रां ह्रीं ह्रूं ह्रौं ह्रः अ-सि आ-उ-सा
गगन-गमनत्व-घातिक्षय-जातिशय
जिन-गुण-संपदे मुक्ति-पद-कारण-स्वरूपायै नमः ।
दाना चुगते देख के,
उड़ा न चले विहंग ।
लगा समशरण वैर खो,
बैठे भेक-भुजंग ।।
ॐ ह्रां ह्रीं ह्रूं ह्रौं ह्रः अ-सि आ-उ-सा
अप्राणि-वधत्व-घातिक्षय-जातिशय
जिन-गुण-संपदे मुक्ति-पद-कारण-स्वरूपायै नमः ।
मन को दिया न भोजना,
तन को सार्थक नाम ।
भुक्ति-अभाविक गुण धनी,
कोटिक कोटि प्रणाम ।।
ॐ ह्रां ह्रीं ह्रूं ह्रौं ह्रः अ-सि आ-उ-सा
भुक्त्यभाव-घातिक्षय-जातिशय
जिन-गुण-संपदे मुक्ति-पद-कारण-स्वरूपायै नमः ।
रोड़े बन ठाडे नहीं,
बढ़े बरक सम नीर ।
गुण उपसर्ग-अभाव सो,
आज धीर-गंभीर ।।
ॐ ह्रां ह्रीं ह्रूं ह्रौं ह्रः अ-सि आ-उ-सा
उपसर्गाभाव-घातिक्षय-जातिशय
जिन-गुण-संपदे मुक्ति-पद-कारण-स्वरूपायै नमः ।
लगा रखे न गर्भ से,
और मुखौट-मुखौट ।
चार ओर मुख दिख चले,
जन-जन देखे लौट ।।
ॐ ह्रां ह्रीं ह्रूं ह्रौं ह्रः अ-सि आ-उ-सा
चतुर्मुखत्व-घातिक्षय-जातिशय
जिन-गुण-संपदे मुक्ति-पद-कारण-स्वरूपायै नमः ।
ज्ञान रहा जितना सभी,
बांटा गैर घमण्ड ।
गुण विद्यालय मण्डिता,
आमद ज्ञान अखण्ड ।।
ॐ ह्रां ह्रीं ह्रूं ह्रौं ह्रः अ-सि आ-उ-सा
सर्व-विद्येश्वर-घातिक्षय-जातिशय
जिन-गुण-संपदे मुक्ति-पद-कारण-स्वरूपायै नमः ।
नीचा दिखा न बढ़ चले,
चाले नीचे देख ।
देह न पड़ती छाहरी,
पत्र-पत्र अभिलेख ।।
ॐ ह्रां ह्रीं ह्रूं ह्रौं ह्रः अ-सि आ-उ-सा
अच्छायत्व-घातिक्षय-जातिशय
जिन-गुण-संपदे मुक्ति-पद-कारण-स्वरूपायै नमः ।
घण्टे-घण्टे बैठ के,
त्राटक चाले साध ।
पलक झपकने क्यों लगें,
छुये न पल असमाध ।।
ॐ ह्रां ह्रीं ह्रूं ह्रौं ह्रः अ-सि आ-उ-सा
अपक्ष्म-स्पंदत्व-घातिक्षय-जातिशय
जिन-गुण-संपदे मुक्ति-पद-कारण-स्वरूपायै नमः ।
हिरणा मन चाले थमा,
शिल-वत् आसन माँड़ ।
केशरु नख क्यों बढ़ चलें,
मंजिल आँखें चार ।।
ॐ ह्रां ह्रीं ह्रूं ह्रौं ह्रः अ-सि आ-उ-सा
समान-नख-केशत्व-घातिक्षय-जातिशय
जिन-गुण-संपदे मुक्ति-पद-कारण-स्वरूपायै नमः ।
चतुर्दशी के १४ अर्घ्य ।
जैसे जो समझे समझा आती ।
हर भाषा में पलटी खा जाती ।।
देवों ने कर्त्तव्य निभाया है ।
पुण्य सातिशय हिस्से आया है ।।
ॐ ह्रां ह्रीं ह्रूं ह्रौं ह्रः अ-सि आ-उ-सा
सर्वार्ध-मागधीय-भाषा-देवोपनी-तातिशय
जिन-गुण-संपदे मुक्ति-पद-कारण-स्वरूपायै नमः ।
एक मित्रता भाव ले रहा श्वास ।
बहिन चमरी गैय्या ।
शेर ने बन भैय्या ।
बाल दिये हैं सुलझा आकर पास ।
एक मित्रता भाव ले रहा श्वास ।।
ॐ ह्रां ह्रीं ह्रूं ह्रौं ह्रः अ-सि आ-उ-सा
सर्वजन-मैत्रीभाव-देवोपनी-तातिशय
जिन-गुण-संपदे मुक्ति-पद-कारण-स्वरूपायै नमः ।
डाल डाल झुक चाली ।
मरु-थल माटी काली ।
समदर्शन बोने की, लगी होड़ बलिहारी ! ।।
ॐ ह्रां ह्रीं ह्रूं ह्रौं ह्रः अ-सि आ-उ-सा
सर्वर्तुफलादि-शोभिततरु-परिणाम-देवोपनी-तातिशय
जिन-गुण-संपदे मुक्ति-पद-कारण-स्वरूपायै नमः ।
आदर्शवत् मही ।
आदर्श पथ यही ।।
कहते से लगते ।
रंग भक्ति रॅंगते ।।
ॐ ह्रां ह्रीं ह्रूं ह्रौं ह्रः अ-सि आ-उ-सा
आदर्शतल-प्रतिमा-रत्नमयी-मही-देवोपनी-तातिशय
जिन-गुण-संपदे मुक्ति-पद-कारण-स्वरूपायै नमः ।
मन्द मन्द पवमाना ।
करती आना जाना ।।
आना जाना खोवे ।
आश ‘कि भक्त सॅंजोवे ।।
ॐ ह्रां ह्रीं ह्रूं ह्रौं ह्रः अ-सि आ-उ-सा
विहरण-मनुगत-वायुत्व-देवोपनी-तातिशय
जिन-गुण-संपदे मुक्ति-पद-कारण-स्वरूपायै नमः ।
देवों की अचिन्त्य माया ।
मन परमानन्द समाया ।।
मन करे न कर लो पाप ।
फूटी झिर भीतर आप ।।
ॐ ह्रां ह्रीं ह्रूं ह्रौं ह्रः अ-सि आ-उ-सा
सर्वजन-परमानन्दत्व-देवोपनी-तातिशय
जिन-गुण-संपदे मुक्ति-पद-कारण-स्वरूपायै नमः ।
कंकर न धूल, काँटे ।
पथ अलकापुर नाते ।।
अलकापुर छोड़ा है ।
हट पुण्य बटोरा है ।।
ॐ ह्रां ह्रीं ह्रूं ह्रौं ह्रः अ-सि आ-उ-सा
वायुकुमा-रोपशमित-धूलि-कंटकादि-देवोपनी-तातिशय
जिन-गुण-संपदे मुक्ति-पद-कारण-स्वरूपायै नमः ।
बुंदिया पानी छोटी-छोटी ।
लहर खुशी की मोटी-मोटी ।।
थोड़ी-मोड़ी मैं भी पाऊँ ।
यही आश ले अर्घ्य चढ़ाऊँ ।।
ॐ ह्रां ह्रीं ह्रूं ह्रौं ह्रः अ-सि आ-उ-सा
मेघकुमारकृत-गन्धोदकवृष्टि-देवोपनी-तातिशय
जिन-गुण-संपदे मुक्ति-पद-कारण-स्वरूपायै नमः ।
बिछी बिछाई जैसी है ।
कहीं न वैसी, ऐसी है ।।
मिल दो सौ पच्चील कमल ।
दृश्य देखते सभी सजल ।।
ॐ ह्रां ह्रीं ह्रूं ह्रौं ह्रः अ-सि आ-उ-सा
पादन्यासे-कृत-पद्मानि-देवोपनी-तातिशय
जिन-गुण-संपदे मुक्ति-पद-कारण-स्वरूपायै नमः ।
ना उगला सोना-चाँदी ही ।
उगले हैं हीरे-मोती भी ।।
धरती धरती सब धान्य आज ।
मनु उन्मूलन किल्विषक राज ।।
ॐ ह्रां ह्रीं ह्रूं ह्रौं ह्रः अ-सि आ-उ-सा
फलभार-नम्रशालि-देवोपनी-तातिशय
जिन-गुण-संपदे मुक्ति-पद-कारण-स्वरूपायै नमः ।
आकाश शरद जैसा ।
वैभव न और ऐसा ।।
शारदा कृपा बरसे ।
उतरे सुर अम्बर से ।।
ॐ ह्रां ह्रीं ह्रूं ह्रौं ह्रः अ-सि आ-उ-सा
शरत्काल-वन्-निर्मल-गगनत्व-देवोपनी-तातिशय
जिन-गुण-संपदे मुक्ति-पद-कारण-स्वरूपायै नमः ।
दिशा दिशा दे चली ।
धूम्र-धुंध यम गली ।।
डूब भीतरी निरी ।
डूब-‘भी’ तरी तिरी ।।
ॐ ह्रां ह्रीं ह्रूं ह्रौं ह्रः अ-सि आ-उ-सा
शरन्मेघवन्-निर्मल-दिग्-भावत्व-देवोपनी-तातिशय
जिन-गुण-संपदे मुक्ति-पद-कारण-स्वरूपायै नमः ।
कहीं न जाओ और ।
आओ आओ दौड़ ।।
अवसर चूको नाहिं ।
सौख्य न अप्सर माहिं ।।
ॐ ह्रां ह्रीं ह्रूं ह्रौं ह्रः अ-सि आ-उ-सा
एतैतेति-चतुर्निकायामर-परास्-पराह्वान-देवोपनी-तातिशय
जिन-गुण-संपदे मुक्ति-पद-कारण-स्वरूपायै नमः ।
धर्म चक्र चलता आगे ।
स्वर्ग-देवता रखवाले ।।
कोटि कोटि सूरज नाता ।
छव चन्दा जन-मन भाता ।।
ॐ ह्रां ह्रीं ह्रूं ह्रौं ह्रः अ-सि आ-उ-सा
धर्मचक्र-वैभव-देवोपनी-तातिशय
जिन-गुण-संपदे मुक्ति-पद-कारण-स्वरूपायै नमः ।
जयमाला
चौबीस तीर्थंकर स्तोत्र
दे जन-कुछ आजीविका,
दे जन कुछ शिवपंथ ।
ठगनी माया को ठगा,
जयन्त आदि-जिनन्द ! ।।१।।
किया इन्द्र ने मेरु पे,
क्षीर नीर अभिषेक ।
अजित नाथ ! जित मन्मथा,
तिन्हें नमन सिर टेक ।।२।।
माता ने पाया जिन्हें,
जोड़ पुण्य भव कोट ।
सार्थ शमित भव संभवा !,
जन्म जलधि शिव पोत ।।३।।
सोलह सपने देख के,
आनंदित जग-मात ।
कर अभिनन्दन ! सद्-गुणा,
मुकत जयतु जिन-नाथ ।।४।।
प्रथम अहिंसा को जिया,
दिया बाद उपदेश ।
विमत सुमत ! से जीत के,
तट नत जगत् अशेष ।।५।।
धन कुबेर ने झिर लगा,
की रतनन बरसात ।
पद्म ! पद्म पद-लोचना,
नमन जोड़ जुग हाथ ।।६।।
देख कहीं से लो भले,
हों दर्शन दिश् चार ।
सुपार्श्व बढ़ पारसमणी,
भवि ! भगवन्त कतार ।।७।।
तीन रूप धर चन्द्रमा,
करे छत्र मिष सेव ।
बढ़ प्रभ चन्दा पूर्णिमा,
हित शिव नमन सदैव ।।८।।
दन्त न राखे शूल के,
व्रत सचित्त परित्याग ।
उत्पथ बढ़े न भूल के,
पक्ष सुविधि बड़भाग ।।९।।
बढ़ मण, चन्दन शीतला,
धर्म संभाल क्षमाद ।
तट तुमड़ी माटी गला,
वन्दन हेत समाध ।।१०।।
श्रेय स्वयं का साध के,
साध चले पर श्रेय ।
वे श्रेयांस इतना करें,
बना न विसरूं ध्येय ।।११।।
रत्नत्रय चूडामणी,
विरचा हित वधु मोख ।
धन्य ! प्राप्त कर शिव रमा,
वासु-पूज्य प्रभु धोक ।।१२।।
अरि, रज, रहस न टिक सके,
रखे विमल परिणाम ।
विमल जिनेश्वर नित तुम्हें,
बारम्बार प्रणाम ।।१३।।
अनन्त मोहन घात के,
हाथ चतुष्टय नन्त ।
जिन अनंत भगवान् वे,
वन्दन तिन्हें अनन्त ।।१४।।
धर्म दया, करुणा, क्षमा,
आप दिव्य ध्वनि सार ।
वस्तु स्वरूप पिछान के,
भक्त आप भव पार ।।१५।।
चक्रवर्ति जे पांचवे,
सोलहवे तीर्थेश ।
कामदेव वे बारबे,
जयंत शान्ति जिनेश ।।१६।।
चार हाथ भू लख चले,
बचा जीव कुन्थ्वाद ।
बात जगज्जन रख चले,
आप हमारे नाथ ।।१७।।
‘अर-हम’ तो यह सोच के,
रट ले सिद्धम् सिद्ध ।
सांझ पूर्व घर पहुंच के,
पंक्ति न भूले-मुग्ध ।।१८।।
‘मार’ मल्ल को मारने,
नासा टेकी आँख ।
सभ साधी जग तारने,
नुति, पाऊँ पत राख ।।१९।।
व्रत प्रभाव गृह श्रावका,
रत्न-वृष्टि अनमोल ।
क्यूं न झुलाये जग तुम्हें,
आँखें बना हिडोल ।।२०।।
इस बारी यूँ नम गये,
नम: नमः नभ गूँज ।
क्यूं नहिं पूजूँ मैं उन्हें,
है ही भगवन् दूज ।।२१।।
राजी मति विधि सौंप के,
चूर किया विधि-बंध ।
सु-वर्ण पा मैं झुक चलूँ,
पाने अंत सुगंध ।।२२।।
पारस पा रस भीतरी,
सह चाले उपसर्ग ।
धन्य ! पार्श्व कर स्वर्ग को,
जा पहुंचे अपवर्ग ।।२३।।
मान-ज्ञान वर्धित हुआ,
छू वर्धमान वृत्त ।
बने रहें महावीर वे,
ममाराध्य प्रभु नित्य ।।२४।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री जिन गुण सम्पत्ति सहित जिनेन्द्र नमः
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।
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