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तीर्थक्षेत्र पूजन

अजनास के आदिनाथ भगवान् का -पूजन-विधान

By मुनि श्री निराकुल सागर जी महाराज 

 

पुरु-देव संस्तवन

वर्षण रतन ।
दर्शन सुपन ।।
माँ देवि मरु पुन सातिशय ।
पुरु-देव जय, पुरु-देव जय ।।१।।

जलसा न्हवन ।
कलसा नयन ।।
सौधर्म-शचि पुन सातिशय ।
पुरु-देव जय, पुरु-देव जय ।।२।।

वन आगमन ।
कच-लोंच धन ।।
भवि ! क्षीर-जल पुन सातिशय ।
पुरु-देव जय, पुरु-देव जय ।।३।।

निध समशरण ।
ढ़िग सिंह हिरण ।।
सभ द्वादशन पुन सातिशय ।
पुरु-देव जय, पुरु-देव जय ।।४।।

ध्यानन अगन ।
कर्मन दहन ।।
शिव-राधिका पुन सातिशय ।
पुरु-देव जय, पुरु-देव जय ।।५।।

मम आराध्य
अजनास के आदिनाथ भगवान् का
पूजन-विधान
नैनन जल भर लाओ ‘री ।
श्रद्धा सुमन चढ़ाओ ‘री ।
हृदयासन पधराओ ‘री ।
सजल सुलोचन आठ याम की ।
निस्पृह पूरण-मनो-काम की ।
आदिनाथ अजनास-ग्राम की ।
मिलकर पूज रचाओ ‘री ।
आओ ‘री सखि ! आओ ‘री ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्र !
अत्र अवतर अवतर संवौषट्
(इति आह्वानन)
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
(इति स्थापनम्)
अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट्
(इति सन्निधिकरणम्) ।

छवि प्यारी मनहारी है ।
मूरत अतिशय-कारी है ।।
है ग्राम बड़ा छोटा सा ।
कई बार हुआ चौमासा ।।
पांसा पल्टा, ले पल्टी ।
जल भेंटूं समेत भक्ति ।।
इक आश अखीर हितंकर ।
अजनास आद तीर्थंकर ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय नमः
जलं निर्वपामीति स्वाहा ।।

भाग अजनास जागे ।
हाथ प्रभु आदि लागे ।।
आदि मरु मात नंदन ।
कह रही बाल चंदन ।
वीर घर, टूक बंधन ।
सिर्फ चंदन रख आगे ।।
जोड़ प्रभु प्रीत धागे ।
भाग अजनास जागे ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय नमः
चंदनं निर्वपामीति स्वाहा ।।

सबसे इक सा प्यार दुलार ।
करते सबकी नैय्या पार ।
क्यूॅं न चढ़ाऊँ अक्षत न्यार ।
टकते चूनर चाँद सितारे ।।
बाबा मेरे भोले भाले ।
जग से न्यारे, सबसे प्यारे ।
आदिम प्रभो अजनास वाले ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय नमः
अक्षतं निर्वपामीति स्वाहा ।।

पानी लेकर आँखों का ।
लेकर श्रीफल हाथों का ।
साधें कारज लाखों का ।
श्रद्धा सुमन चढ़ाओ ‘रे ।।
अपना भाग जगाओ ‘रे ।
आओ भक्ता आओ ‘रे ।
आदिनाथ अजनास प्रभो के,
मिलकर के गुण गाओ ‘रे ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय नमः
पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा ।।

शांति छवि, मूर्ति मनोहर ।
क्यूॅं न भेंटूॅं चरु कोपर ।।
ख्यात बाबा क्षेमंकर ।
आदि ब्रह्मा तीर्थंकर ।।
बढ़ सुगंधी गुलमोहर ।
ग्राम अजनास धरोहर ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय नमः
नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

आप दृग जुग कुछ हट तीता ।
मैं तुम्हें देख-देख जीता ।।
दुखी लख झिरा दिया दरिया ।
न बस मैं कहूँ, कहे सीता ।।
तभी लाया घृत भरा दिया ।
हेत दिव छाँवा, शिव नावा ।।
हमारा कौन तुम अलावा ।
ग्राम अजनास बड़े बाबा ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय नमः
दीपं निर्वपामीति स्वाहा ।।

दीप भक्त, ज्योति तुम ।
सीप भक्त, मोति तुम ।।
तुम पतंग, डोर मैं ।
चाँद तुम, चकोर मैं ।।
भेंट कर धूप घट ।
सार्थ शिव-भूत भट ।।
जपत तुष-मास भिन ।
जयत अजनास जिन ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय नमः
धूपं निर्वपामीति स्वाहा ।।

गिरते ही लेते हाथ थाम ।
शिव ग्राम दें लगा शाम शाम ।।
लाऊँ न भेंट क्यूँ फल-बदाम ।
दें बना सुना ! निर्दाम काम ।।
अजनास ग्राम, प्रभु आदि स्वाम ।
नित सुबह शाम, लख लख प्रणाम ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय नमः
फलं निर्वपामीति स्वाहा ।।

दुनिया धूप, तरु छाँव ।
बाबा अजनास गाँव ।।
मेरे रखवाले हैं ।
डर मुझको न किसी का,
ले कोई लगा दांव ।
दृग जल धुलाऊँ पाँव ।।
दुख हरने वाले हैं ।
बाबा अजनास गाँव ।
मेरे रखवाले हैं ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय नमः
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

कल्याण अर्घ्य
माता मरु आँख सितारे ।
पित नरपत नाभि दुलारे ।
गारभ छह मास अगारे ।
रतनार माँ पिता द्वारे ।
दुख दर्द बता दे सारे ।।
निस्पृह इक शरण सहारे ।
तारेंगे, लाखों तारे ।
बाबा अजनास हमारे ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
आषाढ़-कृष्ण-द्वितीयायां
गर्भ कल्याणक प्राप्ताय
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय नमः
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

शिखर दिखाया ।
ध्वज लहराया ।
क्षण अजनास पुण्य फल आया ।।
मेर बिठाया ।
न्हवन कराया ।
सहस नयन सौधरम बनाया ।।
उत्सव छाया ।
आदि दर्श सम दर्शन पाया ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
चैत्र-कृष्ण-नवम्यां
जन्म कल्याणक प्राप्ताय
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय नमः
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

लट उखाड़, वन आन जै ।
पट उतार संधान जै ।।
दूर न केवलज्ञान जै ।
सार्थ त्याग कल…यान जै ।।
उतरत देव विमान जै ।
करुणा, दया निधान जै ।।
जन अजनास गुमान जै ।
आदिनाथ भगवान जै ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
चैत्र-कृष्ण-नवम्यां
दीक्षा कल्याणक प्राप्ताय
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय नमः
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

कलिकाल स्वर्ग शिव नावा की ।
जन जैनन काशी काबा की ।
अजनास ग्राम पुरु बाबा की ।
बोलो बोलो जय बोलो ।
मौन साधकर जब खोलो ।
धुनि गंगा कल्मष धो लो ।
सम-शरण सार्थ तरु छाँवा की ।
बोलो बोलो जय बोलो ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
फागुन-कृष्ण-एकादश्यां
ज्ञान कल्याणक प्राप्ताय
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय नमः
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

ग्राम अजनास छूये अम्बर ।
जिनालय आदिम तीर्थंकर ।।
हृश्व स्वर पाँच वाँच पाते ।
समय बस भूम-वस दिखाते ।।
मोक्ष कल्याण झूम व्यंतर ।
भवन, वैमान, सूर, चंदर ।।
विगत आडम्बर, दैगंबर ।
जयत जय आदिम तीर्थंकर ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
माघ-कृष्ण-चतुर्दश्यां
मोक्ष कल्याणक प्राप्ताय
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय नमः
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

जयमाला

धन ! अजनास बारे न्यार ।
दृढ़ समकित निमित दृग चार ।।
करुणा क्षमा भंडारी ।
महिमा आदि बलिहारी ।।१।।

आगी धधकते अंगार ।
सीता ने जपा नवकार ।।
बदले सर कमल क्यारी ।
महिमा आदि बलिहारी ।।२।।

काले नाग घट विकराल ।
सोमा ने जपा नवकार ।।
निकले हार मनहारी ।
महिमा आदि बलिहारी ।।३।।

कीलित देव माया द्वार ।
नीली ने जपा नवकार ।।
दर लग पाँव खुल्ला ‘री ।
महिमा आदि बलिहारी ।।४।।

सार्थक चीर, हाहाकार ।
द्रोपद ने जपा नवकार ।।
अक्षत पाँत सत सारी ।
महिमा आदि बलिहारी ।।५।।

उछला गिरा पर्वत लाल ।
अंजन ने जपा नवकार ।।
गिर गिर वज्र बाला ‘री ।
महिमा आदि बलिहारी ।।६।।

मुण्डित मुण्ड, कारागार ।
चंदन ने जपा नवकार ।।
पंचाश्चर्य आहा’री ।
महिमा आदि बलिहारी ।।७।।

मैं भी नाथ ! इक दुखियार ।
तुम बिन और कौन हमार ।।
रखना लाज-पत म्हारी ।
महिमा आदि बलिहारी ।।८।।

दोहा
मुनि दुर्लभ पा आप सा,
धन्य ! ग्राम अजनास ।
बनी रहे यूँ ही कृपा,
जब तक घट में श्वास ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय नमः
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

(पुष्पांजलि क्षिपामि)

विधान प्रारंभ
अष्ट दलकमल पूजा
विधान की जय

इन्द्र शतक आभरणों में ।
खड़ा मुकुट रख चरणों में ।।
एक आदि जुग अवलम्बन ।
टेक माथ तिन जुग चरणन ।।१।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो जिणाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

पार सार श्रुत अधिकारी ।
रचे इन्द्र थुति मनहारी ।।
जग आराध्य प्रथम भगवन् ।
करूँ उन्हीं का मैं सुमरण ।।२।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो ओहि जिणाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

बुध-नुत पाद-पीठ थारी ।
नाहक थुति तुम तैयारी ।।
शशि प्रतिबिम्ब पकड़ने जल ।
कौन, छोड़ शिशु देता चल ।।३।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो परमोहि जिणाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

शशि भा-से तुम गुण सागर ।
थके देव-गुरु भी गाकर ।।
मगर सिन्धु वह जल धारा ।
पार कौन भुजबल द्वारा ।।४।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो सव्वोहि जिणाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

चढ़ा रंग तुम भक्ति घना ।
करुँ थवन तुम शक्ति बिना ।।
भिड़ी जा मृगी पंचानन ।
कारण निज शिशु परिपालन ।।५।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो अणंतोहि जिणाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

चल देंगे हँस धी-धारी ।
भक्ति धकाये पर थारी ।।
बोल हुये मिसरी कोयल ।
हेत आम्र-उपवन कोंपल ।।६।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो कोट्ठ-बुद्धीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

तुम्हें बिठाते ही उर में ।
पाप पलायें पल भर में ।।
भँवरे सा निशि अंधियारा ।
किरण एक सूरज हारा ।।७।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो बीय-बुद्धीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

थुति यह पा थारी करुणा ।
होगी मन जन-जन हरणा ।।
पड़ीं दल-कमल बूँदें जल ।
भाँत चमकतीं मुक्ताफल ।।८।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो पदाणु-सारीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

जल ले के, चन्दन ले के मैं ।
अक्षत लिये, सुमन ले के मैं ।।
चरु ले, दीप, धूप, फल न्यारे ।
करूँ यजन, दो लगा किनारे ।।01।।
ॐ ह्रां ह्रीं ह्रूं ह्रौं ह्र:
अ-सि-आ-उ-सा नमः
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
अष्टदल कमल हृदयस्-थिताय
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय
पूर्णार्घं निर्वपामीति स्वाहा ।।

षोडश दलकमल पूजा
विधान की जय

थुति सुदूर तुम अविकारी ।
पुण्य-कथा भी दुखहारी ।।
दूर दिवाकर अम्बर में ।
कमल खिल उठें सरवर में ।।९।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो सं-भिण्ण-सोदा-राणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

करते-करते तुम सुमरण ।
तुम सा पा लेते गुण-धन ।।
सेवक करे धनी ना जो ।
हो कुछ भले धनी ना वो ।।१०।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो सयं-बुद्धाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

देख तुम्हें जो जाता है ।
और न उसे लुभाता है ।।
पी कर मीठा प्याला जल ।
कौन चाहता खारा जल ।।११।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो पत्तेय-बुद्धाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

भुवि परमाणु दिव्य उतने ।
देह रचे तुम, बस इतने ।।
तभी रूप जैसा थारा ।
और न जग वैसा प्यारा ।।१२।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो बोहिय-बुद्धाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

कहाँ आपका मुख सुन्दर ।
सुर, नर, नाग नयन मनहर ।।
माथे शश कंलक टीका ।
दिन पलाश जैसा फीका ।।१३।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो उजु-मदीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

शुभ्र चाँदनी गुण थारे ।
जग लाँघे जितने सारे ।।
कौन रोकने वाला है ।
सर पे हाथ तुम्हारा है ।।१४।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो विउल-मदीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

ललनाएँ छलने आईं ।
रंच न तुम्हें ड़िगा पाईं ।।
प्रलय-पवन ले जोर चले ।
मेरु न विचलित और भले ।।१५।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो दस-पुव्वीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

तेल, वर्तिका, धुआँ नहीं ।
ज्योत कौन जग छुआ नहीं ।।
झोंका बुझा न सके पवन ।
दीप अनोखे तुम भगवन् ।।१६।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो चउ-दस-पुव्वीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

अस्त न कभी मेघ छाता ।
राहु न ग्रास बना पाता ।।
किया अँधेरा त्रिभुवन गुम ।
दिव्य दिवाकर भगवन् तुम ।।१७।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो अट्ठंग-महा-णिमित्त कु-सलाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

सदा उदित, तम मोह दले ।
मेघ ढ़के न राहु निगले ।।
रोशन करे विश्व सारा ।
मुख सरोज शशि तुम न्यारा ।।१८।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो वि-उव्वण-इड्ढि-पत्ताणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

रवि-शशि क्यों नाहक आते ।
नयना तुम तम विघटाते ।।
खेत पके लहलहा रहे ।
शोर मेघ क्यों मचा रहे ? ।।१९।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो विज्जा-हराणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

‘भी’ तर आप ज्ञान जैसा ।
और न भेद ज्ञान वैसा ।।
जैसा पास प्रकाश रतन ।
कहाँ काँच आकुलित-किरण ।।२०।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो चा-रणाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

समुचित ही दर-दर भटका ।
मनवा आ’दर तुम अटका ।।
देख तुम्हें न लाभ निकला ।
पंछी पोत खिताब मिला ।।२१।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो पण्ण-समणाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

माँ शिशु लिखा भाल लायें ।
तुम सा कहॉं लाल पायें ।।
दिश्-दिश् तारे अनगिनती ।
सूरज इक पूरब जनती ।।२२।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो आयास-गामीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

और कौन पुरुषोत्तम तुम ।
भाँत भान करते तम गुम ।।
तुम मृत्युंजय कर देते ।
मोक्ष उठा तुम धर देते ।।२३।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो आसी-विसाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

अव्यय तुम विभु ! अचिन्त्य तुम ।
असंख्य तुम पुरु ! अनन्त तुम ।।
हरि, हर, ब्रह्मा, योगीश्वर ।
एक, नेक, ज्ञानी, ईश्वर ।।२४।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो दिट्ठि-वि-साणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

भर लाया जल-चन्दन झारी ।
धान-शालि-सित, पुष्प पिटारी ।।
चरु ले, दीप, धूप, फल न्यारे ।
करुँ यजन, दुख मैंटो सारे ।।02।।
ॐ क्षां क्षीं क्षूं क्षें क्षैं क्षों क्षौं क्षं क्षः
नमोर्-ऽहते सर्वं रक्ष रक्ष हूं फट् नमः
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
षोडशदल-कमल हृदयस्-थिताय
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय
पूर्णार्घं निर्वपामीति स्वाहा ।।

चतुर्विंशतिदल कमल पूजा
विधान की जय

शंकर सौख्य प्रदाता तुम ।
प्रद शिव-पन्थ विधाता तुम ।।
विबुध समर्पित बुद्ध तुम्हीं ।
नरसिंह एक प्रसिद्ध तुम्हीं ।।२५।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो उग्ग-तवाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

नमो नमः आपदा-हरण ।
नमो नमः क्षिति तला-भरण ।।
नमो नमः कलयुग शरणा ।
नमो नमः भव-जल तरणा ।।२६।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो दित्त-तवाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

आदर और न पाये गुण ।
आ निवसे उर आप शगुन ।।
दोष और छोड़ें तो पल ।
स्वप्न आप आये तब चल ।।२७।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो तत्त-तवाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

ऊँचे तरु अशोक नीचे ।
खोले दृग् कुछ-कुछ मींचे ।।
भासे तुम जैसे दिनकर ।
प्रकटा निकट मेघ तमहर ।।२८।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो महा-तवाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

खचित रतन मणि सिंहासन ।
अधर आपका तन कंचन ।।
भासे उदयाचल निकला ।
हर अन्धर सूरज विरला ।।२९।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो घोर-तवाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

कुन्द-पुष्प से चारु चँवर ।
देह समान सुवर्ण अवर ।।
गिर सुमेर निर्झर झरता ।
तट शशि भा उछले लगता ।।३०।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो घोर गुण-परक्-कमाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

तीन छत्र झालर वाले ।
और पून शशि उजियारे ।।
रवि प्रतापहर, थित ऊपर ।
कहें आप इक परमेश्वर ।।३१।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो घोर-गुणाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

रव दश-दिश् गभीर फैला ।
शुभ संगम विभूति मेला ।।
जय सद् धर्मराज जय-जय ।
बाजे जश भेरी अक्षय ।।३२।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो ऽघोर-गुण-बंभ-यारीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

नमेर, सन्तानक, सुन्दर ।
अविरल झिरें पुष्प अम्बर ।।
झिर गन्धोदक मन्द-पवन ।
खिरते आप अमन्द-वचन ।।३३।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो आमो-सहि-पत्ताणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

भामण्डल अतिशय कारी ।
मद द्युति उपमावन-हारी ।।
तेज कोटि सूरज जामें ।
शशि हतप्रभ शीतलता में ।।३४।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो खेल्लो-सहि-पत्ताणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

नैय्या स्वर्ग-मोक्ष खेती ।
खोल नेत्र तीजा देती ।।
कल्याणी ऐसी वाणी ।
सहजो समझें सब प्राणी ।।३५।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो जल्लो-सहि-पत्ताणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

स्वर्ण नवल पंकज दमके ।
चाँद, बहाने नख चमके ।।
आप जहाँ पग रखते हैं ।
स्वर्ण कमल सुर रचते हैं ।।३६।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो विट्ठो-सहि-पत्ताणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

समवशरण वैभव न्यारा ।
और न जग छाना सारा ।।
जिमि प्रकाश रवि तिमिर-हरण ।
विकसित पास न तारक गण ।।३७।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो सव्वो-सहि-पत्ताणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

मूल कपोल बने निर्झर ।
कोप बढ़ायें मत्त भ्रमर ।।
हाथी बढ़ा कदम आये ।
नाम लिया तुम थम जाये ।।३८।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो मण-बलीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

नख विदार गज कुम्भस्थल ।
श्रृंगारा मोती भू-तल ।।
मृग-पति बढ़ा कदम आये ।
नाम लिया तुम थम जाये ।।३९।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो वचि-बलीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

छुये गगन बढ़ प्रलय पवन ।
चाह निगलना रख त्रिभुवन ।।
दावा बढ़ा कदम आये ।
नाम लिया तुम थम जाये ।।४०।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो काय-बलीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

रक्त नयन कोकिला बदन ।
उठा फणा उगले विष कण ।।
मणिधर बढ़ा कदम आये ।
नाम लिया तुम थम जाये ।।४१।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो खीर-सवीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

सैन्य अश्व गज आवाजें ।
दूजे प्रलय मेघ गाजें ।।
अरि-कुल बढ़ा कदम आये ।
नाम लिया तुम थम जाये ।।४२।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो सप्पि-सवीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

गज-तन बना लहू झरना ।
रुधिर नदी चाहे तरना ।।
जोधा बढ़ा कदम आये ।
नाम लिया तुम थम जाये ।।४३।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो महुर-सवीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

जल-किरात, अजगर, कर्कट ।
गोधा, माही, जल-मर्कट ।।
जल-चर बढ़ा कदम आये ।
नाम लिया तुम थम जाये ।।४४।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो अमइ-सवीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

पाण्डु, जलोदर, हृदयामय ।
पित्त-शूल-कफ आमय-क्षय ।।
गद-कुल बढ़ा कदम आये ।
नाम लिया तुम थम जाये ।।४५।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो अक्खीण-महा-णसाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

तंत्र-मंत्र कारा-साया ।
मूठ, धूलमोहन माया ।।
बन्धन बढ़ा कदम आये ।
नाम लिया तुम थम जाये ।।४६।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो वड्ढमाण-बुद्धि-रिसस्स
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

गज, भुजंग, सिंह, दावानल ।
रण, बन्धन, गद, वड़वानल।।
भय-कुल बढ़ा कदम आये ।
नाम लिया तुम थम जाये ।।४७।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो सव्व-सिद्धा-यद-णाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

वर्ण सुमन महकाई चुन ।
यह गुणमाल रचाई सुन ।।
सदा कण्ठ जे धारेंगे ।
शिव निष्कण्ट पधारेंगे ।।४८।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो भयवदो महदि
महावीर वड्ढमाण बुद्धिरिसीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

पूर्णार्घ
जल पावन, वावन चन्दन ले ।
अक्षत अछत, सुमन मोहन ले ।।
चरु ले, दीप, धूप, फल न्यारे ।
करूँ यजन, टक दो जश तारे ।।03।।
श्री वृषभादि वर्धमान पर्यंत
परम-देव भगवन् तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
चतुर्विंशति दल कमल
हृदयस्-थिताय
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय
पूर्णार्घं निर्वपामीति स्वाहा ।।

महा-अर्घं
दोहा
जल मीठा लें चन्दन नीका ।
तण्डुल, गुल-कुल आप सरीखा ।।
चरु ले, दीप-धूप, फल न्यारे ।
करूँ यजन, हित शिरपुर द्वारे ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
नव देव भगवन् तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
अष्ट-चत्वारिंशद्-दलकमल
हृदयस्-थिताय
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय नमः
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

:: जाप्य ::
।। ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री आदि-नाथ तीर्थंकराय नमः ।।

जयमाला लघु भक्तामर
व्याधि शरण । आदि चरण ।।१।।
मोर धार । और पार ।।२।।
आप थवन । नाप गगन ।।३।।
आप् थाह । हाँप राह ।।४।।

शक्ति शून । भक्ति पून ।।५।।
दौड़ गीत । तोर प्रीत ।।६।।
आप जपा । पाप दफा ।।७।।
आप नजर । आप् इतर ।।८।।

कथा न कम । व्यथा खतम ।।९।।
तोर सेव । मोड़ दैव ।।१०।।
आप नैन । ताप चैन ।।११।।
गौर मात्र । तोर गात्र ।।१२।।

तोर वदन । और भुवन ।।१३।।
सुगुण तोर । भुवन छोर ।।१४।।
ध्येय, नार । जेय मार ।।१५।।
गौर जिया । और दिया ।।१६।।

ग्रहण दूर । भुवन सूर ।।१७।।
विगत रन्ध्र । जगत चन्द्र ।।१८।।
शूर अपर । दूर तिमर ।।१९।।
तोर ज्ञान । और ज्ञान ।।२०।।

तोर पर्श । और दर्श ।।२१।।
तोर मात । और मात ।।२२।।
आदि-ब्रहम । नादि प्रथम ।।२३।।
सिरी विष्णु । हरी जिष्णु ।।२४।।

एक बुद्ध । नेक रुद्र ।।२५।।
जयतु ग्रन्थ । जयतु सन्त ।।२६।।
रोश और । होश तोर ।।२७।।
विगत शोक । अखत मोख ।।२८।।

रतन पीठ । हरण दीठ ।।२९।।
भव्य अमर । दिव्य चँवर ।।३०।।
दोल छतर । गोल अधर ।।३१।।
सुरम तूर्य । धरम सूर्य ।।३२।।

झड़ी सु…मन । हरी पवन ।।३३।।
प्रभा वलय । सभा सदय ।।३४।।
दिव्य धुनी । भव्य गुणी ।।३५।।
धरा कदम । धरा पदम ।।३६।।

न औ सुरन । समो शरण ।।३७।।
सिरी जपत । करी भगत ।।३८।।
भक्ति सखी । मुक्ति नखी ।।३९।।
आप छाँव । आप् दाव ।।४०।।

साँप भगत । आप जपत ।।४१।।
तोर नजर । मोड़ समर ।।४२।।
तोर प्रीत । और मीत ।।४३।।
तोर छाँव । छोर नाव ।।४४।।

दुवा योग । हवा रोग ।।४५।।
तोर मंत्र । तोड़ तंत्र ।।४६।।
विघन तोड़ । भजन तोर ।।४७।।
माल एय । काल जेय ।।४८।।

दोहा
लोग बड़े, रख लें भले,
बड़े-बड़े अरमान ।
मरण-समाधी का मुझे,
दे दो बस वरदान ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय नमः
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

श्री सरसुति-मंत्र*
ॐ ह्रीम्
अर्हन् मुख कमल-वासिनि
पा-पात्म क्षयंकरि
श्रुत-ज्ञान
ज्वाला सहस्र प्रज्ज्वलिते
सरस्वति !
मत् पापम् हन हन दह दह
क्षाम् क्षीम् क्षूम् क्षौम् क्षः
क्षीरवर-धवले
अ-मृत संभवे
वम् वम् हूम् फट् स्वाहा
मम सन्-निधि-करणे
मम सन्-निधि-करणे
मम सन्-निधि-करणे ।
ॐ ह्रीं जिन मुखोद्-भूत्यै
श्री सरस्वति-देव्यै
अर्घं निर्वपामीति स्वाहा

शांति पाठ
अथ पौर्वाह-निक (अप-राह-निक)
देव-शास्त्र-गुरु-वन्दना-क्रियायाम्
पूर्वाचार्या-नुक्-क्रमेण,
सकल-कर्मक्-क्षयार्-थम्,
भाव-पूजा-वन्दना-स्तव समेतम्
श्री शांति-भक्ति कायोत्सर्गम् करोम्यहम्
(९ बार णमोकार )

*चौपाई*
दर्शन मात्र मेंटता दुखड़ा ।
भाँत चन्द्रमा सुन्दर मुखड़ा ।।
नासा टिके नैन मनहारी ।
करें वन्दना नाथ ! तुम्हारी ।।१।।

आप चक्रधर-पञ्चम नामी ।
वन्द्य इन्द्र शत, अन्तर्-यामी ।।
प्रभो शान्ति-जिन करके करुणा ।
करो शान्ति ! जश निरखो अपना ।।२।।

छत्र, सिंहासन, वृक्ष-अशोका ।
धुनि, दुन्दुभि, दल-चँवर अनोखा ।।
भा-मण्डल झिर-पुष्प-अनूठी ।
प्रातिहार्य-वसु आप विभूती ।।३।।

अर्चित-जगत् ! शान्ति करतारी ।
ढ़ोक करो स्वीकार हमारी ।।
प्राण-भूत, सत्, जीव समस्ता ।
पायें परिणति शान्त प्रशस्ता ।।४।।

देवों में जो देव बड़े हैं ।
चरणों में हित सेव खड़े हैं ।।
हंस-वंश वे जग उजियारे ।
करें शान्ति मण्डित जग सारे ।।५।।
(निम्न श्लोक को पढ़कर
जल छोड़ना चाहिए)

शान्ति कीजिये गाँव-गाँव में ।
विश्व लीजिये पाँव-छाँव में ।।
डूब ‘साध-जन’ उतरें गहरे ।
लहर लहर-पचरंगा लहरे ।।६।।

नृप धार्मिक बलशाली होवे ।
विकृत-प्रकृत मनमानी खोवे ।।
धर्म-चक्र-जिन सौख्य प्रदाता ।
रहे प्रवाहित यूँ हि विधाता ।।७।।

द्रव्य सुमंगल-कारी होवे ।
क्षेत्र अमंगल-हारी होवे ।।
होवे काल सुमंगल-कारी ।
होवें भाव अमंगल-हारी ।।८।।

कर्मन-घात घात मद सारा ।
सहजो सिद्ध रिद्ध परिवारा ।।
आदि आदि अर्हन् चौबीसा ।
शान्ति प्रदान करें निशि दीसा ।।९।।

*दोहा*
किया शान्ति जिन भक्ति का,
भगवन् कायोत्सर्ग ।।
करूँ दोष आलोचना,
जो प्रद-स्वर्ग-पवर्ग ।।१०।।

*चौपाई*
पाँच सभी कल्याणक धारी ।
आठ प्राति-हारज मन-हारी ।।
अतिशय तीस चार मण्डित हैं ।
अर बत्तीस इन्द्र वन्दित हैं ।।११।।

चौ-विध संघ नखत मानिन्दा ।
राम श्याम चक्री, प्रभु ! चन्दा ।।
‘निलय-विनय’ अन-गिनत गभीरा ।
आद-आद जिन अंतिम वीरा ।।१२।।

अर्चन-पूजन-वन्दन करता ।
उनका मैं अभिनन्दन करता ।।
पीड़ा-दुक्ख-दरद-भय खोवे ।
मेरे कर्मों का क्षय होवे ।।१३।।

रत्नत्रय का मुझे लाभ हो ।
मेरी ‘गति-पंचम-उपाध’ हो ।।
मृत्यु-महोत्सव मना सकूँ मैं ।
जिन-गुण-सम्पद् कमा सकूँ मैं ।।१४।।
अथ पौर्वाह-निक (अप-राह-निक)
देव-शास्त्र-गुरु-वन्दना-क्रियायाम्
पूर्वाचार्या-नुक्-क्रमेण,
सकल-कर्मक्-क्षयार्-थम्,
भाव-पूजा-वन्दना-स्तव समेतम्
श्री समाधि-भक्ति कायोत्सर्गम्
करोम्यहम्
(९बार णमोकार )

*चौपाई*
सदा शास्त्र अभ्यास करूँ मैं ।
सन्त समीप निवास करूँ मैं ।।
मौन धरूँ क्यूँ, गुणी दिखाये ।
गौण करूँ, यूँ दोष-पराये ।।१५।।

भावन-आत्म तत्व, नम-नयना ।
हित-मित रखूँ मधुरतम वयना ।।
जब तक राधा-मुक्ति रिझाऊँ ।
इन्हें जन्म जन्मान्तर पाऊँ ।।१६।।

तारण हारे…शरण सहारे ।
हृदय हमारे…चरण तुम्हारे ।।
चरण तुम्हारे…हृदय हमारा ।
रहे, तलक जब भव-जल-धारा ।।१७।।

स्वर-अक्षर पद मात्रा गलती ।
हुईं, चाहते बिन अनगिनती ।।
हो अपराध क्षमा यह मेरा ।
‘जैसा भी’ मैं अपना तेरा ।।१८।।

*दोहा*
किया समाधी, भक्ति का,
भगवन् कायोत्सर्ग ।।
करूँ दोष आलोचना,
जो प्रद-स्वर्ग-पवर्ग ।।१९।।

*चौपाई*
सम्यक्-दर्शन, सम्यक्-ज्ञाना ।
सम्यक्-चारित, ताना-बाना ।।
रूप अनूप ध्यान परमातम ।
बुद्ध-विशुद्ध ज्ञान धर आतम ।।२०।।

पूजन नित वन्दन करता हूँ ।
अर्चन अभिनन्दन करता हूँ ।।
क्षय होवें दुख संकट सारे ।
क्षय हो जावें कर्म हमारे ।।२१।।

मुझे लाभ रत्नत्रय होवे ।
सुगति गमन, भय-सप्तक खोवे ।।
पाऊँ मरण-समाधी स्वामी ।
बनूँ रतन जिन-गुण आसामी ।।२२।।
‘पुष्पाञ्जलिं क्षिपेत्’
( यहाँ पर नौ बार णमोकार मंत्र
पढ़ना चाहिए )

विसर्जन पाठ
अञ्जन को पार किया ।
चन्दन को तार दिया ।।
नहिं तोर दया का पार ।
नागों का हार किया ।।१।।

धूली-चन्दन-बावन ।
की शूली सिंहासन ।।
धरणेन्द्र देवी-पद्मा ।
मामूली अहि-नागिन ।।२।।

अगनी ‘सर’ नीर किया ।
भगिनी ‘सर’ चीर किया ।।
नहिं तोर दया का पार ।
केशर महावीर किया ।।३।।

बन पड़ीं भूल से भूल ।
कृपया कर दो निर्मूल ।।
बिन कारण तारण हार ।
नहिं तोर दया का पार ।।४।।
दोहा
बस आता, अब धारता,
ईश आशिका सीस ।
कृपा निराकुल आपकी,
बनी रहे निशि-दीस ।।
(पुष्पांजलि क्षिपामि)

आरती

थाल सजाओ ।
ज्योत जगाओ ।।
आदि ब्रह्म की आरती,
उतारें आओ ॥
सपना नाता ।
अपना माता ।।
बरसे रतन, रतन बरसाओ ।
आदि ब्रह्म की आरती,
उतारें आओ ।।१।।

गिरि मरु-नन्दा ।
स्वर्ण सुगन्धा ।।
सहस नयन से नयन बनाओ ।
आदि ब्रह्म की आरती,
उतारें आओ ।।२।।

सागर क्षीरम् ।
कच मण नीलम ।।
नाद आद-जय गगन पठाओ ।।
आदि ब्रह्म की आरती,
उतारें आओ ।।३।।

अर समशरण ।
केशर हिरणा ।।
दृग्-नम श्रद्धा सुमन चढ़‌ाओ ।
आदि ब्रह्म की आरती,
उतारें आओ ।।४।।

दिव से आगे ।
जा शिव लागे ।।
‘सहज-निराकुल शीश नवाओ ।
आदि ब्रह्म की आरती,
उतारें आओ ।।५।।

 

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