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तीर्थक्षेत्र पूजन

खातेगाँव के मुनिसुव्रत-नाथ भगवान्-पूजन विधान

By मुनि श्री निराकुल सागर जी महाराज 

 

खातेगाँव के मुनिसुव्रत-नाथ भगवान्
पूजन विधान

बिगड़े काम बनाते हैं ।
बनता साथ निभाते हैं ।
बस अपनों में आते हैं ।
बाबा मुनिसुव्रत ।।

आओ भक्ता आओ ‘रे ।
अपना भाग जगाओ ‘रे ।
नैनन जल भर लाओ ‘रे ।
बनने भव्य निकट ।
पूजो मुनिसुव्रत ।।
दुनिया धूप, बाबा छाँव ।
मेरे बाबा खाते-गाँव ।।
प्रकटे रेवा तट ।
जय हो मुनिसुव्रत ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री मुनि-सुव्रत-नाथ जिनेन्द्र !
अत्र अवतर अवतर संवौषट्
(इति आह्वानन)
अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ:
(इति स्थापनम्)
अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट्
(इति सन्निधिकरणम्) ।

आओ भक्ता आओ ‘रे ।
आओ, जल भर लाओ ‘रे ।।
चरणन आन चढ़ाओ ‘रे ।
पाने भव जल तट ।।
पूजो मुनिसुव्रत ।
दुनिया धूप, बाबा छाँव ।।
मेरे बाबा खाते-गाँव ।
प्रकटे रेवा तट ।।
जय हो मुनिसुव्रत ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री मुनि-सुव्रत-नाथ जिनेन्द्राय नमः
जलं निर्वपामीति स्वाहा ।।

आओ भक्ता आओ ‘रे ।
आओ, चन्दन लाओ ‘रे ।।
चरणन आन चढ़ाओ ‘रे ।
हित मेंटन संकट ।।
पूजो मुनिसुव्रत ।
दुनिया धूप, बाबा छाँव ।।
मेरे बाबा खाते-गाँव ।
प्रकटे रेवा तट ।।
जय हो मुनिसुव्रत ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री मुनि-सुव्रत-नाथ जिनेन्द्राय नमः
चंदनं निर्वपामीति स्वाहा ।।

आओ भक्ता आओ ‘रे ।
आओ, अक्षत लाओ ‘रे ।।
चरणन आन चढ़ाओ ‘रे ।
पाने पद अक्षत ।।
पूजो मुनिसुव्रत ।
दुनिया धूप, बाबा छाँव ।।
मेरे बाबा खाते-गाँव ।
प्रकटे रेवा तट ।।
जय हो मुनिसुव्रत ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री मुनि-सुव्रत-नाथ जिनेन्द्राय नमः
अक्षतं निर्वपामीति स्वाहा ।।

आओ भक्ता आओ ‘रे ।
आओ, फुल्वा लाओ ‘रे ।।
चरणन आन चढ़ाओ ‘रे ।
हरने भाव कपट ।।
पूजो मुनिसुव्रत ।
दुनिया धूप, बाबा छाँव ।।
मेरे बाबा खाते-गाँव ।
प्रकटे रेवा तट ।।
जय हो मुनिसुव्रत ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री मुनि-सुव्रत-नाथ जिनेन्द्राय नमः
पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा ।।

आओ भक्ता आओ ‘रे ।
आओ, नेवज लाओ ‘रे ।।
चरणन आन चढ़ाओ ‘रे ।
हित मेंटन क्षुध्-गद ।।
पूजो मुनिसुव्रत ।
दुनिया धूप, बाबा छाँव ।।
मेरे बाबा खाते-गाँव ।
प्रकटे रेवा तट ।।
जय हो मुनिसुव्रत ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री मुनि-सुव्रत-नाथ जिनेन्द्राय नमः
नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

आओ भक्ता आओ ‘रे ।
आओ, दीवा लाओ ‘रे ।।
चरणन आन चढ़ाओ ‘रे ।
हरने मोह-विकट ।।
पूजो मुनिसुव्रत ।
दुनिया धूप, बाबा छाँव ।।
मेरे बाबा खाते-गाँव ।
प्रकटे रेवा तट ।।
जय हो मुनिसुव्रत ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री मुनि-सुव्रत-नाथ जिनेन्द्राय नमः
दीपं निर्वपामीति स्वाहा ।।

आओ भक्ता आओ ‘रे ।
आओ, सुरभी लाओ ‘रे ।।
चरणन आन चढ़ाओ ‘रे ।
मेंटन कर्मन अठ ।।
पूजो मुनिसुव्रत ।
दुनिया धूप, बाबा छाँव ।।
मेरे बाबा खाते-गाँव ।
प्रकटे रेवा तट ।।
जय हो मुनिसुव्रत ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री मुनि-सुव्रत-नाथ जिनेन्द्राय नमः
धूपं निर्वपामीति स्वाहा ।।

आओ भक्ता आओ ‘रे ।
आओ, श्री फल लाओ ‘रे ।।
चरणन आन चढ़ाओ ‘रे ।
पाने शिव संपत ।।
पूजो मुनिसुव्रत ।
दुनिया धूप, बाबा छाँव ।।
मेरे बाबा खाते-गाँव ।
प्रकटे रेवा तट ।।
जय हो मुनिसुव्रत ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री मुनि-सुव्रत-नाथ जिनेन्द्राय नमः
फलं निर्वपामीति स्वाहा ।।

आओ भक्ता आओ ‘रे ।
आओ, जल-फल लाओ ‘रे ।।
चरणन आन चढ़ाओ ‘रे ।
पाने गुण अर्हत् ।।
पूजो मुनिसुव्रत ।
दुनिया धूप, बाबा छाँव ।।
मेरे बाबा खाते-गाँव ।
प्रकटे रेवा तट ।।
जय हो मुनिसुव्रत ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री मुनि-सुव्रत-नाथ जिनेन्द्राय नमः
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

कल्याण अर्घ्य

आओ ‘री आओ ।
सखि ! आओ ‘री आओ ।
प्रथम गर्भ कल्याण मनाओ ।
आओ ‘री आओ ।।

करे कुबेर रतन की वरषा ।
कहे सुपन माँ हरषा हरषा ।
भाँत कुबेर रतन बरसाओ ।
प्रथम गर्भ कल्याण मनाओ ।
आओ ‘री आओ
सखि ! आओ ‘री आओ ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्रावण-कृष्ण-द्वितीयायां
गर्भ-मंगल-मंडिताय
श्री मुनि-सुव्रत-नाथ जिनेन्द्राय नमः
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

करे सुमेर न्हवन जल क्षीरा ।
ले सौधरम हरष दृग नीरा ।
शच-पत-से दृग सहस बनाओ ।
दुतिय जन्म कल्याण मनाओ ।
आओ ‘री आओ ।
सखि ! आओ ‘री आओ ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
वैशाख-कृष्ण-दशम्यां
जन्म-मंगल-मंडिताय
श्री मुनि-सुव्रत-नाथ जिनेन्द्राय नमः
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

करें देव लौकान्त बढ़ाई ।
स्वर्ण-सुहाग नृभव व्रत भाई ।
सार्थ ‘सु-व्रत’ जय-नाद पठाओ ।
तृतिय त्याग कल्याण मनाओ ।
आओ ‘री आओ ।
सखि ! आओ ‘री आओ ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
वैशाख-कृष्ण-दशम्यां
तपो-मंगल-मंडिताय
श्री मुनि-सुव्रत-नाथ जिनेन्द्राय नमः
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

सुलझा केश केशरी चमरी ।
कहे सजल-दृग चमरी हमरी ।
पर-हित दृग-जल बने झिराओ ।
तुरिय ज्ञान कल्याण मनाओ ।
आओ ‘री आओ ।
सखि ! आओ ‘री आओ ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
वैशाख-कृष्ण-नवम्यां
केवल-ज्ञान-प्राप्ताय
श्री मुनि-सुव्रत-नाथ जिनेन्द्राय नमः
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

अग्नि-देव सेवा में आये ।
पा नख-केश क्षीर हरषाये ।
पद मुनिसुव्रत लगन लगाओ ।
और मोक्ष कल्याण मनाओ ।
आओ ‘री आओ ।
सखि ! आओ ‘री आओ ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
फाल्गुन-कृष्ण-द्वादश्यां
मोक्ष-मंगल-मंडिताय
श्री मुनि-सुव्रत-नाथ जिनेन्द्राय नमः
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

जयमाला
यह शिव, यह सुन्दर, यह सत् ।
लाज बचाते, रखते पत ।
म्हारे बाबा मुनिसुव्रत ।।

वेद पुराण कहे गीता ।
मैं न कहूँ कहती सीता ।
लाल धधकते अंगारे,
नील सरोवर में परिणत ।।
लाज बचाते, रखते पत ।
म्हारे बाबा मुनिसुव्रत ॥०१॥

कहती परिपाटी जैना ।
मैं न कहूँ कहती मैना ।
गलित कुष्ठ पति दुर्गंधित,
काया कंचन बढ़ पत-रत ।।
लाज बचाते, रखते पत ।
म्हारे बाबा मुनिसुव्रत ॥०२॥

कहें भक्त पुलकित रोमा ।
मैं न कहूँ कहती सोमा ।
घड़े नाग नागिन काले,
फूल माल बन चाले झट ।।
लाज बचाते, रखते पत ।
म्हारे बाबा मुनिसुव्रत ॥०३॥

कहे आँख सीली सीली ।
मैं न कहूँ कहती नीली ।
पाँव सुदूर, छाँव छू के,
खुले वज्र से कीलित पट ।।
लाज बचाते, रखते पत ।
म्हारे बाबा मुनिसुव्रत ॥०४॥

बढ़ा चीर गंगा धारा ।
जीता सत्य, असत् हारा ।
कहे सूर्य, शशि, ध्रुव तारा,
मैं न कहूँ कहती द्रोपद ।।
लाज बचाते, रखते पत ।
म्हारे बाबा मुनिसुव्रत ॥०५॥

कहे महकता वन चन्दन ।
मैं न कहूँ कहनी अंजन ।
ख्यात नाम सुत बज रंगी,
चूर चूर अविचल पर्वत ।।
लाज बचाते, रखते पत ।
म्हारे बाबा मुनिसुव्रत ॥०६॥

नभ, पाताल कहे धरती ।
मैं न कहूँ चन्दन कहती ।
टूक टूक दृढ़तर बंधन,
आन खड़े द्वारे सन्मत ।।
लाज बचाते, रखते पत ।
म्हारे बाबा मुनिसुव्रत ॥०७॥

मैं भी इक दुखि-यारा हूँ ।
पूर्व कर्म कृत हारा हूँ ।
करो निराकुल, बना भगत,
म्हारे बाबा मुनिसुव्रत ॥०८॥
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री मुनि-सुव्रत-नाथ जिनेन्द्राय नमः
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

दोहा
भार तनिक मेरा प्रभो !,
बड़ा आप जल-यान ।
शिव वधु गाँव उतार दो,
मुनि-सुव्रत भगवान् ।।
(पुष्पांजलि क्षिपामि)

विधान प्रारंभ

अष्ट दलकमल पूजा
विधान की जय

भवि भक्त अमर ज्यों झुकते ।
मुकुटों के रतन दमकते ।।
कर जाते पाप किनारा ।
मुनिसुव्रत जिनने तारा ।।१।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो जिणाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री मुनि-सुव्रत-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

श्रुत-सुत कतार में आता ।
गाथा वह सुर-पति गाता ।।
मैं भी गा रहा तराने ।
जिन-के भक्तों में आने ।।२।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो ओहि जिणाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री मुनि-सुव्रत-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

नुत पाद पीठ बुध थारी ।
थुति तुम, हट सिर्फ हमारी ।।
जल पड़ी देख शशि छाया ।
बस शिशु ने कदम बढ़ाया ।।३।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो परमोहि जिणाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री मुनि-सुव्रत-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

गुण इतने जितने तारे ।
गा, गुण तुम सुर-गुरु हारे ।।
जल मगर पौन तूफानी ।
तट कौन जोर-भुज प्राणी ।।४।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो सव्वोहि जिणाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री मुनि-सुव्रत-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

पग उलट शक्ति लौटाये ।
तुम भक्ति परन्तु धकाये ।।
हित शिशु रक्षण जा भिड़ती ।
हिरनी सिंह से कब डरती ।।५।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो अणंतोहि जिणाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री मुनि-सुव्रत-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

यूँ तो कुछ मुझे न आये ।
मुखरी तुम भक्ति बनाये ।।
वन आम्र बौर-छा जाती ।
पिक बड़ा सुरीला गाती ।।६।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो कोट्ठ-बुद्धीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री मुनि-सुव्रत-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

पल नाम तिहारा रटते ।
चिर संचित पाप विघटते ।।
इक सूर्य किरण से हारा ।
काला मावस अँधियारा ।।७।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो बीय-बुद्धीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री मुनि-सुव्रत-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

थुति यह होगी मन हारी ।
पा कृपा आप अविकारी ।।
जल-बिन्दु दल कमल पड़ के ।
लगती मोती से बढ़-के ।।८।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो पदाणु-सारीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री मुनि-सुव्रत-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

जल ले के, चन्दन ले के मैं ।
अक्षत लिये, सुमन ले के मैं ।।
चरु ले, दीप, धूप, फल न्यारे ।
करूँ यजन, दो लगा किनारे ।।01।।
ॐ ह्रां ह्रीं ह्रूं ह्रौं ह्र:
अ-सि-आ-उ-सा नमः
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
अष्टदल कमल हृदयस्-थिताय
श्री मुनि-सुव्रत-नाथ जिनेन्द्राय
पूर्णार्घं निर्वपामीति स्वाहा ।।

षोडश दलकमल पूजा
विधान की जय

थव दूर, न जिसमें खामी ।
तव कथा व्यथाहर स्वामी ।।
नभ दूर दिवाकर पाते ।
खिल कमल सरोवर जाते ।।९।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो सं-भिण्ण-सोदा-राणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री मुनि-सुव्रत-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

है इसमें अचरज कैसा ।
करते तुम अपने जैसा ।।
जो सुनता सेवक विनती ।
सेठों में उसकी गिनती ।।१०।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो सयं-बुद्धाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री मुनि-सुव्रत-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

दृग् देख तुम्हें क्या आते ।
फिर कहीं चैन जा पाते ।।
जल क्षीर सिन्धु से नाता ।
तब नीर सिन्धु कब भाता ।।११।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो पत्तेय-बुद्धाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री मुनि-सुव्रत-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

थे उतने ही बड़भागी ।
परमाणु प्रशान्त विरागी ।।
बस देह आप रच जाये ।
तुम भाँत न तभी दिखाये ।।१२।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो बोहिय-बुद्धाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री मुनि-सुव्रत-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

इक सत् शिव सुन्दर नीका ।
मुख मुख वह आप सरीखा ।।
शशि लगे कहाँ तुम आगे ।
हतप्रभ ज्यों सूरज जागे ।।१३।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो उजु-मदीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री मुनि-सुव्रत-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

पूरन शशि भा-से न्यारे ।
गुण तुम लाँघें जग सारे ।।
है तेरा जिसे सहारा ।
फिर कौन रोकने वाला ।।१४।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो विउल-मदीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री मुनि-सुव्रत-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

ले चितवन रम्भा आई ।
चित चुरा कहाँ तुम पाई ।।
झंझा प्रलयी डग भरता ।
जग डिगे, मेर कब डिगता ।।१५।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो दस-पुव्वीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री मुनि-सुव्रत-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

निर्धूम तेल बिन बाती ।
पवमान बुझा नहिं पाती ।।
गुम जगत् तीन अँधियारे ।
तुम दीप अखण्ड निराले ।।१६।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो चउ-दस-पुव्वीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री मुनि-सुव्रत-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

नहिं हाथ राहु के लगते ।
अस्ताचल राह न तकते ।।
जग-दीप्त भा न घन रोके ।
ऐसे तुम सूर्य अनोखे ।।१७।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो अट्ठंग-महा-णिमित्त कु-सलाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री मुनि-सुव्रत-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

नित्योदित, मेघ न झापे ।
जग तिमिर रास्ता नापे ।।
आँखें नहिं राहु दिखाता ।
मुख चन्दर आप विधाता ।।१८।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो वि-उव्वण-इड्ढि-पत्ताणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री मुनि-सुव्रत-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

सूरज क्यों आंखें खोले ।
क्यों चॉंद रात भर डोले ।।
जब तुमने किया उजाला ।
घर नाज, व्यथा घन काला ।।१९।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो विज्जा-हराणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री मुनि-सुव्रत-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

मति मरालता के किस्से ।
तुम और न आये हिस्से ।।
जो तेज रत्न की थाती ।
कब काँच मण्डली पाती ।।२०।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो चा-रणाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री मुनि-सुव्रत-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

है गया व्यर्थ न भटकना ।
दृग् हुआ आप पर टिकना ।।
दर तेरे जब से आया ।
चित् चुरा न कोई पाया ।।२१।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो पण्ण-समणाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री मुनि-सुव्रत-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

भव मात्र एक अवतारी ।
नहिं और आप महतारी ।।
दिश् दिश् तारे अनगिनती ।
सूरज एक पूरव जनती ।।२२।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो आयास-गामीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री मुनि-सुव्रत-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

युग-पुरुष ! पन्थ-शिव नेता ।
ऊरध-रेता ! दृग् जेता ।।
मृत्युंजय एक तुम्हीं हो ।
शत्रुंजय नेक तुम्हीं हो ।।२३।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो आसी-विसाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री मुनि-सुव्रत-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

तुम नन्त ! आद्य ! व्यय-रीते ।
हरि-हर ! तीजे दृग् तीते ।।
ईश्वर ! योगीश्वर नामी ।
जगदीश्वर ! अन्तर्यामी ।।२४।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो दिट्ठि-वि-साणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री मुनि-सुव्रत-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

जल पावन, वावन चन्दन ले ।
अक्षत अछत, सुमन मोहन ले ।।
चरु ले, दीप, धूप, फल न्यारे ।
करूँ यजन, टक दो जश तारे ।।02।।
ॐ क्षां क्षीं क्षूं क्षें क्षैं क्षों क्षौं क्षं क्षः
नमोर्-ऽहते सर्वं रक्ष रक्ष हूं फट् नमः
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
षोडशदल-कमल हृदयस्-थिताय
श्री मुनि-सुव्रत-नाथ जिनेन्द्राय
पूर्णार्घं निर्वपामीति स्वाहा ।।

चतुर्विंशतिदल कमल पूजा
विधान की जय

तुम शुद्ध, बुद्ध, अविकारी |
शम-कर, शंकर, त्रिपुरारी ।।
शिव-पाथ-विधात निरीहा ।
पुरु ! पुरुषोत्तम नर-सिंहा ।।२५।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो उग्ग-तवाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री मुनि-सुव्रत-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

बीड़ा सिर पीड़ा हारी ।
भू-भूषण ढ़ोक हमारी ।।
जय थारी त्रिभुवन-स्वामी ।
जिन गुण सम्पद् आसामी ।।२६।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो दित्त-तवाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री मुनि-सुव्रत-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

मुख तलक भरा गुण खीसा ।
तुम जगत जगत् निशि-दीसा ।।
चुन लिये दोष दुनिया ने ।
नहिं कहा और ने मॉं ने ।।२७।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो तत्त-तवाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री मुनि-सुव्रत-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

पुण्योदय अशोक आया ।
आ बैठे तर तरु छाया ।।
तब दिखा दृश्य इक विरला ।
रवि बीच श्याम घन निकला ।।२८।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो महा-तवाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री मुनि-सुव्रत-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

सिंहासन बड़ा सलोना ।
मणि-मण्डित कोना कोना ।।
तन बनक कनक अनमोला ।
गिर उदय-उदित रवि-भोला ।।२९।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो घोर-तवाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री मुनि-सुव्रत-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

ले चॅंवर खड़े दिवि-वासी ।
भा-देह स्वर्ण आभा सी ।।
तट मेर झिरे-सा झरना ।
होता भा-चाँद उछलना ।।३०।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो घोर गुण-परक्-कमाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री मुनि-सुव्रत-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

आताप भास्कर हरते ।
मिस छत्र सेव शशि करते ।।
डोले लर-झालर होले ।
जग-तीन ईश इक बोले ।।३१।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो घोर-गुणाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री मुनि-सुव्रत-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

बहरी करती दिश् भेरी ।
गाती विरदावली तेरी ।।
सद्-धर्म राज जय जय हो ।
वह धर्म अहिंसा-मय जो ।।३२।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो ऽघोर-गुण-बंभ-यारीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री मुनि-सुव्रत-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

सुर-परिकर हरषा-हरषा ।
करता पुष्पों की वरषा ।।
जल-गन्ध मन्द अर पवना ।
लग पंक्ति झिरे तव वचना ।।३३।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो आमो-सहि-पत्ताणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री मुनि-सुव्रत-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

भा-उपमा जेय विशाला ।
भा-मण्डल आप निराला ।।
रवि कोटिक तेज समाया ।
छवि सौम्य सोम, है माया ।।३४।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो खेल्लो-सहि-पत्ताणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री मुनि-सुव्रत-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

शिव, स्वर्ग दिलाती पल में ।
संबोध कराती पल में ।।
सब भाष परिणमन वाली ।
थारी धुनि खास निराली ।।३५।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो जल्लो-सहि-पत्ताणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री मुनि-सुव्रत-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

विकसित पंकज भी फीका ।
नख नख-शिख चॉंद सरीखा ।।
पग-तल तुम अपने रखते ।
आ सुर-गण कमल विरचते ।।३६।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो विट्ठो-सहि-पत्ताणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री मुनि-सुव्रत-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

अनुरूप नाम सम-शरणा ।
सिंह बैठा समीप हिरणा ।।
वैभव अनमोल तिहारा ।
कब रवि-सा चमके तारा ।।३७।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो सव्वो-सहि-पत्ताणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री मुनि-सुव्रत-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

मद झरता झरने जैसा ।
रव करता भ्रमर परेशां ।।
हाथी ऐसा उत्पाती ।
आगे तुम जप गो भाँती ।।३८।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो मण-बलीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री मुनि-सुव्रत-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

गज छीन मोति भर खोवा ।
दी बढ़ा भूमि की शोभा ।।
सिंह ऐसा आये बढ़ता ।
कुछ भक्त न आप बिगड़ता ।।३९।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो वचि-बलीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री मुनि-सुव्रत-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

पवमान-प्रलय साथी है ।
जग भखने मुँह बाती है ।।
लपटें छूती नभ, दावा ।
क्या जल तुम नाम अलावा ।।४०।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो काय-बलीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री मुनि-सुव्रत-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

छाई अँखियन लाली है ।
कोकिला देह काली है ।।
ऐसा फन सांप प्रहारा ।
निष्फल जप नाम तिहारा ।।४१।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो खीर-सवीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री मुनि-सुव्रत-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

भर रहे अश्व हुंकारें ।
गजराज जहाँ चिंघाड़ें ।।
अभिजेय शत्रु हा ! सेना ।
गुम नाम सिर्फ तुम लेना ।।४२।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो सप्पि-सवीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री मुनि-सुव्रत-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

हत गज भाले नाखूनी ।
दरिया बह चाला खूनी ।।
अरि तरे जिसे ले वेगा ।
बस जीत नाम तुम देगा ।।४३।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो महुर-सवीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री मुनि-सुव्रत-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

अठपहर जन्तु-जल जागी ।
लागी वड़वा हा ! आगी ।।
हो बीच भँवर भी नैय्या ।
तट जप तुम नाम जपैय्या ।।४४।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो अमइ-सवीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री मुनि-सुव्रत-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

हा ! जाँलेवा बीमारी ।
मारी दुख-देवा भारी ।।
लेते तुम नाम दवाई ।।
ले अपने-आप विदाई ।।४५।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो अक्खीण-महा-णसाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री मुनि-सुव्रत-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

आपाद-कण्ठ तन सारा ।
जकड़ा दृढ़-सॉंकल द्वारा ।।
तुम नाम ‘निराकुल’ पढ़ते ।
बन्धन खुद ही खुल पड़ते ।।४६।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो वड्ढमाण-बुद्धि-रिसस्स
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री मुनि-सुव्रत-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

गज, सिंह, दव, विषधर काला ।
वड़वा, गद, रण, गृह-कारा ।।
भय कैसा ? क्या डरना है ।
जप आप नाम शरणा है ।।४७।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो सव्व-सिद्धा-यद-णाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री मुनि-सुव्रत-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

यह वरण-वरण गुल चुनके ।
तैयार माल-गुण बुनके ।।
जो इसे कण्ठ धारेगा ।
निष्कण्ट शिव पधारेगा ।।४८।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो भयवदो महदि
महावीर वड्ढमाण बुद्धिरिसीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री मुनि-सुव्रत-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

पूर्णार्घ
जल मीठा लें चन्दन नीका ।
तण्डुल, गुल-कुल आप सरीखा ।।
चरु ले, दीप-धूप, फल न्यारे ।
करूँ यजन, हित शिरपुर द्वारे ।। ।।03।।
श्री वृषभादि वर्धमान पर्यंत
परम-देव भगवन् तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
चतुर्विंशति दल कमल
हृदयस्-थिताय
श्री मुनि-सुव्रत-नाथ जिनेन्द्राय
पूर्णार्घं निर्वपामीति स्वाहा ।।

महा-अर्घं
दीप, चरु, जल, धूप, गुल, फल, गन्ध, अक्षत ।
ले खड़ा तुम द्वार पर, दे रहा दस्तक ।
सुख ‘निराकुल’ हाथ में मेरे लगेगा,
आश रख विश्वास चरणन रखा मस्तक ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
नव देव भगवन् तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
अष्ट-चत्वारिंशद्-दलकमल
हृदयस्-थिताय
श्री मुनि-सुव्रत-नाथ जिनेन्द्राय नमः
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

:: जाप्य ::
।। ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री मुनिसुव्रत नाथ तीर्थंकराय नमः ।।

जयमाला
सुव्रत मुनि गुण-मूल थाती ।
पाप विगलिल घात घाती ।।
समशरण अहि, कर्तृ-केका ।
मुनि सु-व्रत जिन ! नुति अनेका ।।१।।

विभा कण्ठ मयूर तरुणा ।
प्रभा फीकी चन्द्र किरणा ।।
कान्ति-मान दिशा प्रतेका ।
मुनि सु-व्रत जिन ! नुति अनेका ।।२।।

देह सुरभित लोहु श्वेता ।
सत्य, शिव, सुन्दर, नि-श्वेदा ।।
और मन, वच, वृति न देखा ।
मुनि सु-व्रत जिन ! नुति अनेका ।।३।।

जग चराचर भ्रात-बहना ! ।
ध्रौव्य, व्यय, उत्पाद लखना ।।
चीन सर्वग अमिट लेखा ।
मुनि सु-व्रत जिन ! नुति अनेका ।।४।।

अग्नि निरुपम शुक्ल ध्याना ।
दुरित रूप कलंक हाना ।।
जा लगे शिव समय एका ।
मुनि सु-व्रत जिन ! नुति अनेका ।।५।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री मुनि-सुव्रत-नाथ जिनेन्द्राय नमः
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

दोहा
दृष्टि आप चरणन टिकी,
दृष्टिवान मतिमन्द ।
कृपा आप यह कृति लिखी,
पुनि पुनि धोक अनंत
(पुष्पांजलि क्षिपामि)

श्री सरसुति-मंत्र*
ॐ ह्रीम्
अर्हन् मुख कमल-वासिनि
पा-पात्म क्षयंकरि
श्रुत-ज्ञान
ज्वाला सहस्र प्रज्ज्वलिते
सरस्वति !
मत् पापम् हन हन दह दह
क्षाम् क्षीम् क्षूम् क्षौम् क्षः
क्षीरवर-धवले
अ-मृत संभवे
वम् वम् हूम् फट् स्वाहा
मम सन्-निधि-करणे
मम सन्-निधि-करणे
मम सन्-निधि-करणे ।
ॐ ह्रीं जिन मुखोद्-भूत्यै
श्री सरस्वति-देव्यै
अर्घं निर्वपामीति स्वाहा

शांति पाठ
अथ पौर्वाह-निक (अप-राह-निक)
देव-शास्त्र-गुरु-वन्दना-क्रियायाम्
पूर्वाचार्या-नुक्-क्रमेण,
सकल-कर्मक्-क्षयार्-थम्,
भाव-पूजा-वन्दना-स्तव समेतम्
श्री शांति-भक्ति कायोत्सर्गम् करोम्यहम्
(९ बार णमोकार )

*चौपाई*
दर्शन मात्र मेंटता दुखड़ा ।
भाँत चन्द्रमा सुन्दर मुखड़ा ।।
नासा टिके नैन मनहारी ।
करें वन्दना नाथ ! तुम्हारी ।।१।।

आप चक्रधर-पञ्चम नामी ।
वन्द्य इन्द्र शत, अन्तर्-यामी ।।
प्रभो शान्ति-जिन करके करुणा ।
करो शान्ति ! जश निरखो अपना ।।२।।

छत्र, सिंहासन, वृक्ष-अशोका ।
धुनि, दुन्दुभि, दल-चँवर अनोखा ।।
भा-मण्डल झिर-पुष्प-अनूठी ।
प्रातिहार्य-वसु आप विभूती ।।३।।

अर्चित-जगत् ! शान्ति करतारी ।
ढ़ोक करो स्वीकार हमारी ।।
प्राण-भूत, सत्, जीव समस्ता ।
पायें परिणति शान्त प्रशस्ता ।।४।।

देवों में जो देव बड़े हैं ।
चरणों में हित सेव खड़े हैं ।।
हंस-वंश वे जग उजियारे ।
करें शान्ति मण्डित जग सारे ।।५।।
(निम्न श्लोक को पढ़कर
जल छोड़ना चाहिए)

शान्ति कीजिये गाँव-गाँव में ।
विश्व लीजिये पाँव-छाँव में ।।
डूब ‘साध-जन’ उतरें गहरे ।
लहर लहर-पचरंगा लहरे ।।६।।

नृप धार्मिक बलशाली होवे ।
विकृत-प्रकृत मनमानी खोवे ।।
धर्म-चक्र-जिन सौख्य प्रदाता ।
रहे प्रवाहित यूँ हि विधाता ।।७।।

द्रव्य सुमंगल-कारी होवे ।
क्षेत्र अमंगल-हारी होवे ।।
होवे काल सुमंगल-कारी ।
होवें भाव अमंगल-हारी ।।८।।

कर्मन-घात घात मद सारा ।
सहजो सिद्ध रिद्ध परिवारा ।।
आदि आदि अर्हन् चौबीसा ।
शान्ति प्रदान करें निशि दीसा ।।९।।

*दोहा*
किया शान्ति जिन भक्ति का,
भगवन् कायोत्सर्ग ।।
करूँ दोष आलोचना,
जो प्रद-स्वर्ग-पवर्ग ।।१०।।

*चौपाई*
पाँच सभी कल्याणक धारी ।
आठ प्राति-हारज मन-हारी ।।
अतिशय तीस चार मण्डित हैं ।
अर बत्तीस इन्द्र वन्दित हैं ।।११।।

चौ-विध संघ नखत मानिन्दा ।
राम श्याम चक्री, प्रभु ! चन्दा ।।
‘निलय-विनय’ अन-गिनत गभीरा ।
आद-आद जिन अंतिम वीरा ।।१२।।

अर्चन-पूजन-वन्दन करता ।
उनका मैं अभिनन्दन करता ।।
पीड़ा-दुक्ख-दरद-भय खोवे ।
मेरे कर्मों का क्षय होवे ।।१३।।

रत्नत्रय का मुझे लाभ हो ।
मेरी ‘गति-पंचम-उपाध’ हो ।।
मृत्यु-महोत्सव मना सकूँ मैं ।
जिन-गुण-सम्पद् कमा सकूँ मैं ।।१४।।
अथ पौर्वाह-निक (अप-राह-निक)
देव-शास्त्र-गुरु-वन्दना-क्रियायाम्
पूर्वाचार्या-नुक्-क्रमेण,
सकल-कर्मक्-क्षयार्-थम्,
भाव-पूजा-वन्दना-स्तव समेतम्
श्री समाधि-भक्ति कायोत्सर्गम्
करोम्यहम्
(९बार णमोकार )

*चौपाई*
सदा शास्त्र अभ्यास करूँ मैं ।
सन्त समीप निवास करूँ मैं ।।
मौन धरूँ क्यूँ, गुणी दिखाये ।
गौण करूँ, यूँ दोष-पराये ।।१५।।

भावन-आत्म तत्व, नम-नयना ।
हित-मित रखूँ मधुरतम वयना ।।
जब तक राधा-मुक्ति रिझाऊँ ।
इन्हें जन्म जन्मान्तर पाऊँ ।।१६।।

तारण हारे…शरण सहारे ।
हृदय हमारे…चरण तुम्हारे ।।
चरण तुम्हारे…हृदय हमारा ।
रहे, तलक जब भव-जल-धारा ।।१७।।

स्वर-अक्षर पद मात्रा गलती ।
हुईं, चाहते बिन अनगिनती ।।
हो अपराध क्षमा यह मेरा ।
‘जैसा भी’ मैं अपना तेरा ।।१८।।

*दोहा*
किया समाधी, भक्ति का,
भगवन् कायोत्सर्ग ।।
करूँ दोष आलोचना,
जो प्रद-स्वर्ग-पवर्ग ।।१९।।

*चौपाई*
सम्यक्-दर्शन, सम्यक्-ज्ञाना ।
सम्यक्-चारित, ताना-बाना ।।
रूप अनूप ध्यान परमातम ।
बुद्ध-विशुद्ध ज्ञान धर आतम ।।२०।।

पूजन नित वन्दन करता हूँ ।
अर्चन अभिनन्दन करता हूँ ।।
क्षय होवें दुख संकट सारे ।
क्षय हो जावें कर्म हमारे ।।२१।।

मुझे लाभ रत्नत्रय होवे ।
सुगति गमन, भय-सप्तक खोवे ।।
पाऊँ मरण-समाधी स्वामी ।
बनूँ रतन जिन-गुण आसामी ।।२२।।
‘पुष्पाञ्जलिं क्षिपेत्’
( यहाँ पर नौ बार णमोकार मंत्र
पढ़ना चाहिए )

विसर्जन पाठ
अञ्जन को पार किया ।
चन्दन को तार दिया ।।
नहिं तोर दया का पार ।
नागों का हार किया ।।१।।

धूली-चन्दन-बावन ।
की शूली सिंहासन ।।
धरणेन्द्र देवी-पद्मा ।
मामूली अहि-नागिन ।।२।।

अगनी ‘सर’ नीर किया ।
भगिनी ‘सर’ चीर किया ।।
नहिं तोर दया का पार ।
केशर महावीर किया ।।३।।

बन पड़ीं भूल से भूल ।
कृपया कर दो निर्मूल ।।
बिन कारण तारण हार ।
नहिं तोर दया का पार ।।४।।
दोहा
बस आता, अब धारता,
ईश आशिका सीस ।
कृपा निराकुल आपकी,
बनी रहे निशि-दीस ।।
(पुष्पांजलि क्षिपामि)

आरती
आरतिया, आरतिया…
मुनि-सुव्रत भगवान की ।
करुणा-दया निधान की ।।
आरतिया, आरतिया…

सुत सुमित्र जग-पाल की ।
माँ सोमा के लाल की ।।
प्रथम गर्भ कल्यान की ।
मुनि-सुव्रत भगवान की ।।

आरतिया, आरतिया …
करुणा-दया निधान की ।।
आरतिया, आरतिया …

राजगृही अवतार की ।
हरि कुल राज-कुमार की ।।
द्वितिय जन्म कल्याण की ।
मुनि-सुव्रत भगवान की ।।

आरतिया, आरतिया …
करुणा-दया निधान की ।।
आरतिया, आरतिया …

दशमी वदि वैशाख की ।
भींजी तीजी आँख की ।।
तृतिय त्याग कल्याण की ।
मुनि-सुव्रत भगवान की ।।

आरतिया, आरतिया …
करुणा-दया निधान की ।।
आरतिया, आरतिया …

सार्थ नाम सम-शर्ण की ।
‘कूर्म’ विभूषित चर्ण की ।।
तुरिय ज्ञान कल्याण की ।
मुनि-सुव्रत भगवान की ।।

आरतिया, आरतिया …
करुणा-दया निधान की ।।
आरतिया, आरतिया …

कृष्ण द्वादशी फाग की ।
शिव-राधा बढ़-भाग की ।।
‘सहज-निराकुल’ थान की ।
मुनि-सुव्रत भगवान की ।।

आरतिया, आरतिया …
करुणा-दया निधान की ।।
आरतिया, आरतिया …

लघु चालीसा

साढ़े पाँच कोटि-सन्यासी ।
माँ रेवा-तट शिव अधिशासी ॥
यहीं नदी से निकलीं प्रतिमा ।
अतिशय मंडित जिनकी महिमा ॥ ०१ ॥

गाँव-गाँव प्रभु-दर्श-तृषातुर ।
पाँव-पाँव ले जाने आतुर ॥
पर-प्रभु-तीन, गाँव कई सारे ।
लड़-भिड़-कर आखिर जब हारे ॥ ०२ ॥

किया सभी ने एक फैसला ।
रख गाड़ी में इन्हें दो चला ॥
बिन सवार, नन्दी ले जाके ।
गाँव रुकेंगे, जिस भी आके ॥ ०३ ॥

वहाँ बनेगा मन्दिर न्यारा ।
होगा तीर्थ धाम-वह प्यारा ॥
तीनों प्रतिमाएँ चल दीनीं ।
केशर बरसे झींनी-झींनी ॥ ०४ ॥

गाड़ी इक नेमावर ठहरी ।
गूँज-उठी जय-हो सुर लहरी ॥
देव-देव परमेश्वर जिसमें ।
बाबा आदि जिनेश्वर जिसमें ॥ ०५ ॥

और गाड़ियाँ दो बढ़ चालीं ।
और-और दिश् में मुड़ चालीं ॥
खाते-गाँव रुकी इक आके ।
दूजी ठहरी, हरदा जाके ॥ ०६ ॥

कच्छप चिह्न बड़ा मन-हारी ।
खाते-गाँव धन्य नर-नारी ॥
अश्रु-खुशी-के पा दृग् भींजे ।
मुनि-सुव्रत-जिन जिन-पे रीझे ॥ ०७ ॥

सहज-निराकुल, भोले-भाले ।
श्रावक हरदा बड़े निराले ॥
रीझे जिन-पे शान्ति-जिनेशा ।
रहें न जिन-के भक्त परेशाँ ॥ ०८ ॥

रहे लगा भक्तों का ताँता ।
उर-दयाल ये आप बताता ॥
यहाँ माँगना नहीं जरूरी ।
मनो कामना होती पूरी ॥ ०९ ॥

गिनें…गिने जा सकें सितारे ।
दिखे न पे जश-आप किनारे ॥
बना हाथ सो श्री फल अपने ।
लूँ विराम, संपूरो सपने ॥ १० ॥
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री मुनि-सुव्रत-नाथ जिनेन्द्राय नमः
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

दोहा
सभी तीन जिन-बिम्ब ये,
अपने जैसे एक ।
अश्रु किसी की आँख में,
अब तक सके न देख ।।

 

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