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तीर्थक्षेत्र पूजन

पारोला के पार्श्वनाथ भगवान का विधान

By मुनि श्री निराकुल सागर जी महाराज 

 

पारोला के
पार्श्वनाथ भगवान् की पूजन
देव आराध्य हमारे हैं ।
हमें प्राणों से प्यारे हैं ।।
पार्श्व चिन्तामणि पारोला,
विरद खुद जैसा अनमोला ।।
चिन्त-मणि चिन्तन लेता है ।
तब कहीं जा सुख देता है ।।
दिया मन-भर, सुदूर मुख से,
भक्त ने आंखों से बोला ।
पार्श्व चिन्तामणि पारोला ।।
हमारे तारणहारे हैं ।
तीन जग एक सहारे हैं ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री पार्श्व-नाथ जिनेन्द्र !
अत्र अवतर अवतर संवौषट्
(इति आह्वानन)
अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ:
(इति स्थापनम्)
अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट्
(इति सन्निधिकरणम्) ।

सौम्य मुद्रा अपने जैसी ।
वीतरागी हित उपदेशी ।।
कहे मन बालक वत् कोरा ।
पार्श्व चिन्तामणि पारोला ।।
देव आराध्य हमारे हैं ।
हमें प्राणों से प्यारे हैं ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री पार्श्व-नाथ जिनेन्द्राय नमः
जलं निर्वपामीति स्वाहा ।।

टिका नाला हग बैठे हैं ।
उतर जा भीतर पैठे हैं ।।
आत्म हीरा रह-रह खोला ।
पार्श्व चिन्तामणि पारोला ।।
देव आराध्य हमारे हैं ।
हमें प्राणों से प्यारे हैं ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री पार्श्व-नाथ जिनेन्द्राय नमः
चंदनं निर्वपामीति स्वाहा ।।

झुका कुछ बैठे है गर्दन ।
शंख आर्वत शोभते धन ।।
डालता मन न फिरे डोरा ।
पार्श्व चिन्तामणि पारोला ।।
देव आराध्य हमारे हैं ।
हमें प्राणों से प्यारे हैं ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री पार्श्व-नाथ जिनेन्द्राय नमः
अक्षतं निर्वपामीति स्वाहा ।।

बाल घूँघर वाले काले ।
कान कांधे छूने वाले ।।
उड़ा राखा न देह चोला ।
पार्श्व चिन्तामणि पारोला ।।
देव आराध्य हमारे हैं ।
हमें प्राणों से प्यारे हैं ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री पार्श्व-नाथ जिनेन्द्राय नमः
पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा ।।

हाथ पर हाथ रखे बैठे ।
देव जितने सब में जेठे ।।
रगों में बहे रक्त धौरा ।
पार्श्व चिन्तामणि पारोला ।।
देव आराध्य हमारे हैं ।
हमें प्राणों से प्यारे हैं ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री पार्श्व-नाथ जिनेन्द्राय नमः
नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

उदर में पड़ीं तीन बल हैं ।
न कवलाहारी निच्छल हैं ।।
और हित नीर नयन ढोला ।
पार्श्व चिन्तामणि पारोला ।।
देव आराध्य हमारे हैं ।
हमें प्राणों से प्यारे हैं ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री पार्श्व-नाथ जिनेन्द्राय नमः
दीपं निर्वपामीति स्वाहा ।।

मेरुवत् थिर आसन माड़ा ।
कहा घूमा सब संसारा ।।
दौड मृग हाथ न सुख थोड़ा ।
पार्श्व चिन्तामणि पारोला ।।
देव आराध्य हमारे हैं ।
हमें प्राणों से प्यारे हैं ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री पार्श्व-नाथ जिनेन्द्राय नमः
धूपं निर्वपामीति स्वाहा ।।

लिया दीवाल कब सहारा ।
योग अभ्रातप तर-झाड़ा ।।
अगम चारित छव चित चोरा ।
पार्श्व चिन्तामणि पारोला ।।
देव आराध्य हमारे हैं ।
हमें प्राणों से प्यारे हैं ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री पार्श्व-नाथ जिनेन्द्राय नमः
फलं निर्वपामीति स्वाहा ।।

नीर, चन्दन, अक्षत-शाली ।
पुष्प, चरु, दीप, धूप न्यारी ।।
दिव्य फल स्वीकारो मोरा ।
पार्श्व चिन्तामणि पारोला ।।
देव आराध्य हमारे हैं ।
हमें प्राणों से प्यारे हैं ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री पार्श्व-नाथ जिनेन्द्राय नमः
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

कल्याण अर्घ्य

कल…यान, कल…यान, कल…यान
जय जयतु जयतु जय, पार्श्व भगवान्

अम्बर से ।
रतन बरसे ।
गर्भ माँ तीर्थंकर पहचान ।
जय जयतु जयतु जय, पार्श्व भगवान् ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
वैशाख-कृष्ण-द्वितीयायां
गर्भ कल्याणक प्राप्ताय
श्री पार्श्व-नाथ जिनेन्द्राय नमः
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

न्हवन जलसा ।
क्षीर कलशा ।
करें सौधर्म स्वर्ण से आन ।
जय जयतु जयतु जय पार्श्व भगवान् ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
पौष-कृष्ण-एकादश्यां
जन्म कल्याणक-प्राप्ताय
श्री पार्श्व-नाथ जिनेन्द्राय नमः
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

दूज कक्षा ।
नगन दीक्षा ।
भोग, फण-नाग नाम अर जान ।
जय जयतु जयतु जय पार्श्व भगवान् ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
पौष-कृष्ण-एकादश्यां
दीक्षा कल्याणक प्राप्ताय
श्री पार्श्व-नाथ जिनेन्द्राय नमः
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

सम शरणा ।
सिंह हिरणा ।
सहज, कर जात वैर अवसान ।
जय जयतु जयतु जय पार्श्व भगवान् ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
चैत्र-कृष्ण-त्रयोदश्यां
ज्ञान कल्याणक प्राप्ताय
श्री पार्श्व-नाथ जिनेन्द्राय नमः
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

भीतर जा ।
पटा करजा ।
समय जा पहुँचे शिव रजधान ।
जय जयतु जयतु जय पार्श्व भगवान् ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्रावण-शुक्ल-सप्तम्यां
मोक्ष कल्याणक प्राप्ताय
श्री पार्श्व-नाथ जिनेन्द्राय नमः
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

दोहा
पारोला प्रभु पार्श्व की,
महिमा बड़ी विशाल ।
बदले किस्मत भी लिखी,
कहती भक्त कतार ।।

जयमाला
महिमा अपरम्पार ।
पारोला के बड़े बाबा का,
इक साँचा दरबार ।।

जिसने यहाँ किया अभिषेक ।
सुख-समृद्धि उकेरी रेख ।
लेख अकेले ना दो चार ।
महिमा अपरम्पार ।
पारोला के बड़े बाबा का,
इक साँचा दरबार ।।

जिसने छतर चढ़ाया है ।
मुँँह-माँगा वर पाया है ।
रख श्रृद्धा आ लगा गुहार ।
महिमा अपरम्पार ।
पारोला के बड़े बाबा का,
इक साँचा दरबार ।।

दी प्रदक्षिणा आ के तीन ।
संकट विघन किये छवि-छीन ।
लगी न यूँ ही भक्त कतार ।
महिमा अपरम्पार ।
पारोला के बड़े बाबा का,
इक साँचा दरबार ।।

आ जिसने कीं आरतिंयाँ ।
मैंटीं अशुभ पाप गतिंयाँ ।।
सहज-निराकुल बेड़ा‌ पार ।
महिमा अपरम्पार ।
पारोला के बड़े बाबा का,
इक साँचा दरबार ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री पार्श्व-नाथ जिनेन्द्राय नमः
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

दोहा
पारोला प्रभु पार्श्व से,
विनती यही अखीर ।
हॅंसी, न अब दुनिया हॅंसे,
दिखलाऊॅं बन वीर ।।
।। पुष्पांजलि क्षिपामि ।।

विधान प्रारंभ

अष्ट दलकमल पूजा
विधान की जय
श्री णमो णमो अरि-हं-ता-णं ।
सिद्-धा-णं श्री आ-यरि-या-णं ।।
श्री णमो णमो उ-वज्-झा-या-णं ।
लो…ए णमो सव्व सा-हू-णं ।।१।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो जिणाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री पार्श्व-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

बुध मंगल, लोकोत्तम, शरणा ।
सिध मंगल, लोकोत्तम, शरणा ।।
मुनि मंगल, लोकोत्तम, शरणा ।
धुनि मंगल, लोकोत्तम, शरणा ।।२।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो ओहि जिणाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री पार्श्व-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

श्री आदि, अजित, संभव, नन्दन ।
जिन सुमति, पद्म, सुपार्श्व वन्दन ।।
प्रभ-चन्द्र, सुविधि, शीतल स्वामी ।
नुति श्रेय, पूज्य अन्तर्यामी ।।
श्री विमल, अनन्त, धर्म-नाथा ।
नुति शांति, कुन्थ, अर वरदाता ।।
श्री मल्लि, सुव्रत, नम दृग-रेवा ।
नुति नेम, पार्श्व, सन्मत देवा ।।३।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो परमोहि जिणाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री पार्श्व-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

अरिहन्ता, सिद्धा-अगणन्ता ।
आ-यरिया, उवज्ञाया, सन्ता ।।
जिन-धर्म, जिनागम-जगदम्बा ।।
जिन बिम्बालय, जय जिन-बिम्बा ।।४।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो सव्वोहि जिणाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री पार्श्व-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

तुम से लागी लगन ।
ले लो अपनी शरण, पारस प्यारा ।
मेंटो मेंटो जी संकट हमारा ।।
कल्या-णिक मंदिरा ।
सत्यम् शिव सुन्दरा, भव-जल तारा ।
मेंटो मेंटो जी संकट हमारा ।।५।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो अणंतोहि जिणाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री पार्श्व-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

गाथा कह ना सके ।
सुर-गुरु नयना झुके, मैं मत-बाला ।
मेंटो मेंटो जी संकट हमारा ।।६।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो कोट्ठ-बुद्धीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री पार्श्व-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

दिन में अंधा रहे ।
कौशिक रवि छवि कहे, दृग जल धारा ।
मेंटो मेंटो जी संकट हमारा ।।७।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो बीय-बुद्धीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री पार्श्व-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

केवल ज्ञानी जतन ।
गणना कब जल रतन, कृत अविचारा ।
मेंटो मेंटो जी संकट हमारा ।।८।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो पदाणु-सारीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री पार्श्व-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

जल, मनहारी चन्दन झारी ।
अक्षत शाली, नन्दन क्यारी ।।
स्वीकारो, मम आराध्य-देव,
चरु, दीप, धूप, श्री-फल थाली ।।01।।
ॐ ह्रां ह्रीं ह्रूं ह्रौं ह्र:
अ-सि-आ-उ-सा नमः
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
अष्टदल कमल हृदयस्-थिताय
श्री पार्श्व-नाथ जिनेन्द्राय
पूर्णार्घं निर्वपामीति स्वाहा ।।

षोडश दलकमल पूजा
विधान की जय

बांहें फैला कहा ।
सागर कितना रहा, शिशु उपकारा ।
मेंटो मेंटो जी संकट हमारा ।।९।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो सं-भिण्ण-सोदा-राणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री पार्श्व-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

चिड़िया चहकी सुबह ।
देख, पाऊँ न रह, जश विस्तारा ।
मेंटो मेंटो जी संकट हमारा ।।१०।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो सयं-बुद्धाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री पार्श्व-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

हरती ग्रीषम तपन ।
सरवर बहती पवन, सिमरन न्यारा ।
मेंटो मेंटो जी संकट हमारा ।।११।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो पत्तेय-बुद्धाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री पार्श्व-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

सुन धुन मोरन झटत ।
अहि-गण चन्दन झरत, धन ! जयकारा ।
मेंटो मेंटो जी संकट हमारा ।।१२।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो बोहिय-बुद्धाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री पार्श्व-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

क्या गो-स्वामी लखा ।
तस्कर टिक ना सका, नो दो ग्यारा ।
मेंटो मेंटो जी संकट हमारा ।।१३।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो उजु-मदीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री पार्श्व-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

भीतर मारुत झलक ।
तिर तट लगती मसक, तुम आधारा ।
मेंटो मेंटो जी संकट हमारा ।।१४।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो विउल-मदीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री पार्श्व-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

वडवा सोखत जलध ।
यूं जल अगनी बुझत, मन्मथ हारा ।
मेंटो मेंटो जी संकट हमारा ।।१५।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो दस-पुव्वीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री पार्श्व-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

उर गुरु तुमको धरे ।
जाने किमि भवि तिरे, चारित न्यारा ।
मेंटो मेंटो जी संकट हमारा ।।१६।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो चउ-दस-पुव्वीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री पार्श्व-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

फसलें जातीं झुलस ।
पाला शीतल परस, कुप् संहारा ।
मेंटो मेंटो जी संकट हमारा ।।१७।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो अट्ठंग-महा-णिमित्त कु-सलाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री पार्श्व-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

मध कमलन कर्णिका ।
खोजत केसर मिला, उर श्रृंगारा ।
मेंटो मेंटो जी संकट हमारा ।।१८।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो वि-उव्वण-इड्ढि-पत्ताणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री पार्श्व-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

पाथर सोना खरा ।
पामर जोना-हरा, चिन्तन थारा ।
मेंटो मेंटो जी संकट हमारा ।।१९।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो विज्जा-हराणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री पार्श्व-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

लीना उर क्या बिठा ।
दीना विग्रह मिटा, अचरज यारा ! ।
मेंटो मेंटो जी संकट हमारा ।।२०।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो चा-रणाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री पार्श्व-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

जिन, जप सोऽहं भगत ।
विष-हर जल कह अमृत, अतिशय न्यारा ।
मेंटो मेंटो जी संकट हमारा ।।२१।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो पण्ण-समणाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री पार्श्व-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

पीला जग, पीलिया ।
तुमको ही कह दिया, हर, करतारा ।
मेंटो मेंटो जी संकट हमारा ।।२२।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो आयास-गामीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री पार्श्व-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

तरु अन-शोका सजल ।
रवि जग जागा कमल, गुण गुणकारा ।
मेंटो मेंटो जी संकट हमारा ।।२३।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो आसी-विसाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री पार्श्व-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

डण्ठल सुमना अधः ।
झिर सम-शरणा सदा, सत् संचारा ।
मेंटो मेंटो जी संकट हमारा ।।२४।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो दिट्ठि-वि-साणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री पार्श्व-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

जल, मनहारी चन्दन झारी ।
अक्षत शाली, नन्दन क्यारी ।।
स्वीकारो, मम आराध्य-देव,
चरु, दीप, धूप, श्री-फल थाली ।।02।।
ॐ क्षां क्षीं क्षूं क्षें क्षैं क्षों क्षौं क्षं क्षः
नमोर्-ऽहते सर्वं रक्ष रक्ष हूं फट् नमः
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
षोडशदल-कमल हृदयस्-थिताय
श्री पार्श्व-नाथ जिनेन्द्राय
पूर्णार्घं निर्वपामीति स्वाहा ।।

चतुर्विंशतिदल कमल पूजा
विधान की जय

जनमत उर-जल गहन ।
सेवत अमरित वचन, आखर धारा ।
मेंटो मेंटो जी संकट हमारा ।।२५।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो उग्ग-तवाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री पार्श्व-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

झुक फिर उठते चॅंवर ।
‘नत उन्नत’ दें खबर, साठर चारा ।
मेंटो मेंटो जी संकट हमारा ।।२६।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो दित्त-तवाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री पार्श्व-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

श्यामल तन, हट बनक ।
तुम सिंहासन कनक, गिरि घन बाला ।
मेंटो मेंटो जी संकट हमारा ।।२७।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो तत्त-तवाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री पार्श्व-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

भावृत श्यामल इतर ।
फीकी छव तरु पतर, पुन रखवाला ।
मेंटो मेंटो जी संकट हमारा ।।२८।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो महा-तवाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री पार्श्व-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

सुर दुन्दुभि ने कहा ।
भक्ता आओ यहां, तारणहारा ।
मेंटो मेंटो जी संकट हमारा ।।२९।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो घोर-तवाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री पार्श्व-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

छाया सिर पर अधर ।
पूरण शशि मिष छतर, झल्लर तारा ।
मेंटो मेंटो जी संकट हमारा ।।३०।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो घोर गुण-परक्-कमाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री पार्श्व-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

जश, परतापा, चमक ।
चाँदी, सोना, मणक, धन ! तिय साला ।
मेंटो मेंटो जी संकट हमारा ।।३१।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो घोर-गुणाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री पार्श्व-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

तज सुर मुकुटन सु-मन ।
लें तुम चरणन शरण, हित उद्धारा ।
मेंटो मेंटो जी संकट हमारा ।।३२।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो ऽघोर-गुण-बंभ-यारीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री पार्श्व-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

घट बिन पाकिक शरत ।
लग तुम पीछे तिरत, भव संसारा ।
मेंटो मेंटो जी संकट हमारा ।।३३।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो आमो-सहि-पत्ताणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री पार्श्व-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

लिख ना सकते अखर ?।
किमि ज्ञानी जड़ नजर, धनि ! अनगारा ।
मेंटो मेंटो जी संकट हमारा ।।३४।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो खेल्लो-सहि-पत्ताणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री पार्श्व-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

फेंकी रज नभ कमठ ।
दृग आ भरती पलट, हा ! अंधियारा ।
मेंटो मेंटो जी संकट हमारा ।।३५।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो जल्लो-सहि-पत्ताणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री पार्श्व-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

पानी बिजुरी हवा ।
छाया तक ना छुवा, किल्विष हारा ।
मेंटो मेंटो जी संकट हमारा ।।३६।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो विट्ठो-सहि-पत्ताणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री पार्श्व-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

अगनी छोड़ें वदन ।
विरथा प्रेता-गमन, लग यम द्वारा ।
मेंटो मेंटो जी संकट हमारा ।।३७।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो सव्वो-सहि-पत्ताणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री पार्श्व-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

दूजा कारज तजा ।
पूजा तुमसे भजा, धन ! अवतारा ।
मेंटो मेंटो जी संकट हमारा ।।३८।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो मण-बलीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री पार्श्व-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

वाणी तुम ना सुनी ।
डसती दुख सर्पिणी, निशि, दिन सारा ।
मेंटो मेंटो जी संकट हमारा ।।३९।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो वचि-बलीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री पार्श्व-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

पूजा नाहीं तुम्हें ।
लागी व्याधी हमें, लख हज्जारा ।
मेंटो मेंटो जी संकट हमारा ।।४०।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो काय-बलीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री पार्श्व-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

तुमको लख ना सका ।
मोहन पर्दा ढका, फल गत चारा ।
मेंटो मेंटो जी संकट हमारा ।।४१।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो खीर-सवीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री पार्श्व-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

किरिया भावन बिना ।
निष्फल कहते जिना, लूं पतवारा ।
मेंटो मेंटो जी संकट हमारा ।।४२।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो सप्पि-सवीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री पार्श्व-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

परहित दृग निर्झरा ! ।
दुख अंकुर दो जला, मैं भी थारा ।
मेंटो मेंटो जी संकट हमारा ।।४३।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो महुर-सवीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री पार्श्व-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

पाके तेरे चरण ।
मेंटा ना भव भ्रमण, हूॅं भू भारा ।
मेंटो मेंटो जी संकट हमारा ।।४४।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो अमइ-सवीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री पार्श्व-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

डूबूं सागर जनम ।
‘कर’ दे करके रहम, कर दो पारा ।
मेंटो मेंटो जी संकट हमारा ।।४५।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो अक्खीण-महा-णसाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री पार्श्व-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

फल तुम सेवा लहूँ ।
बनके सेवक रहूँ, भव भव थारा ।
मेंटो मेंटो जी संकट हमारा ।।४६।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो वड्ढमाण-बुद्धि-रिसस्स
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री पार्श्व-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

संस्तव यह जो पढ़े ।
दिव आगे शिव बढ़े, तोड़े कारा ।
मेंटो मेंटो जी संकट हमारा ।।४७।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो सव्व-सिद्धा-यद-णाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री पार्श्व-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

कुमुदिक चन्द्रा कृपा ।
पथ ‘नीरा-कुल’ नपा, वन्दन म्हारा ।
मेंटो मेंटो जी संकट हमारा ।।४८।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो भयवदो महदि
महावीर वड्ढमाण बुद्धिरिसीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री पार्श्व-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

पूर्णार्घ
जल, मनहारी चन्दन झारी ।
अक्षत शाली, नन्दन क्यारी ।।
स्वीकारो, मम आराध्य-देव,
चरु, दीप, धूप, श्री-फल थाली ।।03।।
श्री वृषभादि वर्धमान पर्यंत
परम-देव भगवन् तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
चतुर्विंशति दल कमल
हृदयस्-थिताय
श्री पार्श्व-नाथ जिनेन्द्राय
पूर्णार्घं निर्वपामीति स्वाहा ।।

महा-अर्घं
पारोला प्रभु पार्श्व से,
और ना दूजे देव ।
जब तक तन जीवन वसे,
करनी ठानूॅं सेव ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
नव देव भगवन् तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
अष्ट-चत्वारिंशद्-दलकमल
हृदयस्-थिताय
श्री पार्श्व-नाथ जिनेन्द्राय नमः
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

:: जाप्य ::
।। ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री पार्श्व-नाथ तीर्थंकराय नमः ।।

दोहा
चिन्तामणि श्री पार्श्व की,
महिमा अपरम्पार ।
दृग क्या ? चरणों से टिकीं,
खुशियों से दृग चार ।।

जयमाला
पारस पार लगाते हैं ।
सहजो-सन्त बताते हैं ।।
लेते भक्त आँख मोती ।
देते दृग् भीतर ज्योती ।।१।।

शूल सिंहासन बन चाली ।
फूलमाल नागन काली ।।
ज्वाला बदली पानी में ।
ग्वाला पंकती ज्ञानी में ।।२।।

पारस पार लगाते हैं ।
सहजो-सन्त बताते हैं ।।
लेते श्रीफल हाथों का ।
भय हरते भय सातों का ।।३।।

लगे पाँव पट खुल चाले ।
भरे घॉंव झट खुल ताले ।।
वज्जर अंग अंग अञ्जन ।
घर चन्दन त्रिशला नन्दन ।।४।।

पारस पार लगाते हैं ।
सहजो-सन्त बताते हैं ।।
लेते सिर्फ सुमन श्रद्धा ।
देते कण्ठ बिठा विद्या ।।५।।

क्षितिज छू चले पट धागे ।
जीव गिंजाई तट लागे ।।
नन्दी राज-घरानों में ।
‘जन्मा’ श्वान विमानों में ।।६।।

पारस पार लगाते हैं ।
सहजो-सन्त बताते हैं ।।
लेते बस गदगद बोली ।
देते मुख तक भर झोली ।।७।।

मेंढ़क ‘नाक’ राख पानी ।
धीवर मीन अभय दानी ।।
मैना सुन्दर पत राखी ।
मोती ज्वार, स्वर्ण पाखी ।।८।।

पारस पार लगाते हैं ।
सहजो-सन्त बताते हैं ।।
लेते ढ़ोक फर्श एका ।
देते मुंह मांगा देखा ।।९।।

मैं भी किस्मत का मारा ।
सुना जहाज बड़ा थारा ।
रख लो ना दे इक कोना ।
चाह ‘निराकुल’ सुख जो ना ।।१०।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री पार्श्व-नाथ जिनेन्द्राय नमः
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

दोहा
पारस पत्थर नाम का,
बढ़ पारस तुम नाम ।
जिह्वा अब-तब जब छुये,
भव स्वर्णिम परिणाम ।।
।। पुष्पांजलि क्षिपामि ।।

श्री सरसुति-मंत्र*
ॐ ह्रीम्
अर्हन् मुख कमल-वासिनि
पा-पात्म क्षयंकरि
श्रुत-ज्ञान
ज्वाला सहस्र प्रज्ज्वलिते
सरस्वति !
मत् पापम् हन हन दह दह
क्षाम् क्षीम् क्षूम् क्षौम् क्षः
क्षीरवर-धवले
अ-मृत संभवे
वम् वम् हूम् फट् स्वाहा
मम सन्-निधि-करणे
मम सन्-निधि-करणे
मम सन्-निधि-करणे ।
ॐ ह्रीं जिन मुखोद्-भूत्यै
श्री सरस्वति-देव्यै
अर्घं निर्वपामीति स्वाहा

शांति पाठ
अथ पौर्वाह-निक (अप-राह-निक)
देव-शास्त्र-गुरु-वन्दना-क्रियायाम्
पूर्वाचार्या-नुक्-क्रमेण,
सकल-कर्मक्-क्षयार्-थम्,
भाव-पूजा-वन्दना-स्तव समेतम्
श्री शांति-भक्ति कायोत्सर्गम् करोम्यहम्
(९ बार णमोकार )

*चौपाई*
दर्शन मात्र मेंटता दुखड़ा ।
भाँत चन्द्रमा सुन्दर मुखड़ा ।।
नासा टिके नैन मनहारी ।
करें वन्दना नाथ ! तुम्हारी ।।१।।

आप चक्रधर-पञ्चम नामी ।
वन्द्य इन्द्र शत, अन्तर्-यामी ।।
प्रभो शान्ति-जिन करके करुणा ।
करो शान्ति ! जश निरखो अपना ।।२।।

छत्र, सिंहासन, वृक्ष-अशोका ।
धुनि, दुन्दुभि, दल-चँवर अनोखा ।।
भा-मण्डल झिर-पुष्प-अनूठी ।
प्रातिहार्य-वसु आप विभूती ।।३।।

अर्चित-जगत् ! शान्ति करतारी ।
ढ़ोक करो स्वीकार हमारी ।।
प्राण-भूत, सत्, जीव समस्ता ।
पायें परिणति शान्त प्रशस्ता ।।४।।

देवों में जो देव बड़े हैं ।
चरणों में हित सेव खड़े हैं ।।
हंस-वंश वे जग उजियारे ।
करें शान्ति मण्डित जग सारे ।।५।।
(निम्न श्लोक को पढ़कर
जल छोड़ना चाहिए)

शान्ति कीजिये गाँव-गाँव में ।
विश्व लीजिये पाँव-छाँव में ।।
डूब ‘साध-जन’ उतरें गहरे ।
लहर लहर-पचरंगा लहरे ।।६।।

नृप धार्मिक बलशाली होवे ।
विकृत-प्रकृत मनमानी खोवे ।।
धर्म-चक्र-जिन सौख्य प्रदाता ।
रहे प्रवाहित यूँ हि विधाता ।।७।।

द्रव्य सुमंगल-कारी होवे ।
क्षेत्र अमंगल-हारी होवे ।।
होवे काल सुमंगल-कारी ।
होवें भाव अमंगल-हारी ।।८।।

कर्मन-घात घात मद सारा ।
सहजो सिद्ध रिद्ध परिवारा ।।
आदि आदि अर्हन् चौबीसा ।
शान्ति प्रदान करें निशि दीसा ।।९।।

*दोहा*
किया शान्ति जिन भक्ति का,
भगवन् कायोत्सर्ग ।।
करूँ दोष आलोचना,
जो प्रद-स्वर्ग-पवर्ग ।।१०।।

*चौपाई*
पाँच सभी कल्याणक धारी ।
आठ प्राति-हारज मन-हारी ।।
अतिशय तीस चार मण्डित हैं ।
अर बत्तीस इन्द्र वन्दित हैं ।।११।।

चौ-विध संघ नखत मानिन्दा ।
राम श्याम चक्री, प्रभु ! चन्दा ।।
‘निलय-विनय’ अन-गिनत गभीरा ।
आद-आद जिन अंतिम वीरा ।।१२।।

अर्चन-पूजन-वन्दन करता ।
उनका मैं अभिनन्दन करता ।।
पीड़ा-दुक्ख-दरद-भय खोवे ।
मेरे कर्मों का क्षय होवे ।।१३।।

रत्नत्रय का मुझे लाभ हो ।
मेरी ‘गति-पंचम-उपाध’ हो ।।
मृत्यु-महोत्सव मना सकूँ मैं ।
जिन-गुण-सम्पद् कमा सकूँ मैं ।।१४।।
अथ पौर्वाह-निक (अप-राह-निक)
देव-शास्त्र-गुरु-वन्दना-क्रियायाम्
पूर्वाचार्या-नुक्-क्रमेण,
सकल-कर्मक्-क्षयार्-थम्,
भाव-पूजा-वन्दना-स्तव समेतम्
श्री समाधि-भक्ति कायोत्सर्गम्
करोम्यहम्
(९बार णमोकार )

*चौपाई*
सदा शास्त्र अभ्यास करूँ मैं ।
सन्त समीप निवास करूँ मैं ।।
मौन धरूँ क्यूँ, गुणी दिखाये ।
गौण करूँ, यूँ दोष-पराये ।।१५।।

भावन-आत्म तत्व, नम-नयना ।
हित-मित रखूँ मधुरतम वयना ।।
जब तक राधा-मुक्ति रिझाऊँ ।
इन्हें जन्म जन्मान्तर पाऊँ ।।१६।।

तारण हारे…शरण सहारे ।
हृदय हमारे…चरण तुम्हारे ।।
चरण तुम्हारे…हृदय हमारा ।
रहे, तलक जब भव-जल-धारा ।।१७।।

स्वर-अक्षर पद मात्रा गलती ।
हुईं, चाहते बिन अनगिनती ।।
हो अपराध क्षमा यह मेरा ।
‘जैसा भी’ मैं अपना तेरा ।।१८।।

*दोहा*
किया समाधी, भक्ति का,
भगवन् कायोत्सर्ग ।।
करूँ दोष आलोचना,
जो प्रद-स्वर्ग-पवर्ग ।।१९।।

*चौपाई*
सम्यक्-दर्शन, सम्यक्-ज्ञाना ।
सम्यक्-चारित, ताना-बाना ।।
रूप अनूप ध्यान परमातम ।
बुद्ध-विशुद्ध ज्ञान धर आतम ।।२०।।

पूजन नित वन्दन करता हूँ ।
अर्चन अभिनन्दन करता हूँ ।।
क्षय होवें दुख संकट सारे ।
क्षय हो जावें कर्म हमारे ।।२१।।

मुझे लाभ रत्नत्रय होवे ।
सुगति गमन, भय-सप्तक खोवे ।।
पाऊँ मरण-समाधी स्वामी ।
बनूँ रतन जिन-गुण आसामी ।।२२।।
‘पुष्पाञ्जलिं क्षिपेत्’
( यहाँ पर नौ बार णमोकार मंत्र
पढ़ना चाहिए )

विसर्जन पाठ
अञ्जन को पार किया ।
चन्दन को तार दिया ।।
नहिं तोर दया का पार ।
नागों का हार किया ।।१।।

धूली-चन्दन-बावन ।
की शूली सिंहासन ।।
धरणेन्द्र देवी-पद्मा ।
मामूली अहि-नागिन ।।२।।

अगनी ‘सर’ नीर किया ।
भगिनी ‘सर’ चीर किया ।।
नहिं तोर दया का पार ।
केशर महावीर किया ।।३।।

बन पड़ीं भूल से भूल ।
कृपया कर दो निर्मूल ।।
बिन कारण तारण हार ।
नहिं तोर दया का पार ।।४।।
दोहा
बस आता, अब धारता,
ईश आशिका सीस ।
कृपा निराकुल आपकी,
बनी रहे निशि-दीस ।।
(पुष्पांजलि क्षिपामि)

आरती
जय पारस, जय पारस बोलो ।
बनता साध मौन जब खोलो ।।

माँ वामा के राज दुलारे ।
अश्वसेन कुल नभ ध्रुवतारे ।।
जन्मे काशी नाम नगरिया ।
बढ़ घी-मिसरी बोल मुरलिया ।।
पुण्य अपूर्व सातिशय बो लो ।
बनता साध मौन जब खोलो ।
जय पारस, जय पारस बोलो ।।१।।

राग रंग सर चढ़ ना पाया ।
बाल उमर वैराग्य समाया ।।
वस्त्र उतारे, केश उखारे ।
चार ज्ञान धर, तारणहारे ! ।।
हर्ष अश्रु से नयन भिंजो लो ।
बनता साध मौन जब खोलो ।
जय पारस, जय पारस बोलो ।।२।।

सार्थक नाम सम-शरण लागा ।
दृग्-नम मृग, सिंह, मेंढ़क, नागा ।।
घात अघात ब्याह शिव राधा ।
हित सुख ‘निराकुलम्’ आराधा ।।
सम दृग्, ज्ञान, चरित मण गो लो ।
बनता साध मौन जब खोलो ।
जय पारस, जय पारस बोलो ।।३।।

 

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