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तीर्थक्षेत्र पूजन

चोपडा के चन्द्र प्रभु भगवान् का पूजन विधान

By मुनि श्री निराकुल सागर जी महाराज 

 

चोपडा के
चन्द्र-प्रभु भगवान् की पूजन
चोपडा के चन्द्र-प्रभ की, मूर्ति मनहारी ।
सौम्य, अन्तर्मुखी-मुद्रा ! दृष्टि थिर नासा ।
हास-मन्द ! विलास-आत्म ! विकास-उल्लासा ! ।।
कहे भीतर चलो, बाहर क्या ? रखा अपना ।
तोड़ दे दम आश पानी भटक मृग प्यासा ।।
क्या ? न करना पूर्ण देखा युगों से सपना ।
दे रही उपदेश मौन महान उपकारी ।
चोपडा के चन्द्र-प्रभ की, मूर्ति मनहारी ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्र !
अत्र अवतर अवतर संवौषट्
(इति आह्वानन)
अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ:
(इति स्थापनम्)
अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट्
(इति सन्निधिकरणम्) ।

चोपडा के चन्द्र-प्रभ जी ।
सुना, सुनते शीघ्र अरजी ।।
तभी चरणों में खड़ा हूँ ।
कर रहा हूँ धार जल की ।।
नरक के दुख से डरा हूँ ।
लो लगा पीछे मुझे भी,
चोपडा के चन्द्र-प्रभ जी ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय नमः
जलं निर्वपामीति स्वाहा ।।

चोपडा के चन्द्र-प्रभ की,
देशना शीतल यथा‌ ।
नहीं शीतल चन्द्र, चन्दन,
हिमरु गंगा जल तथा ।।
तभी लाये चढ़ाने गिर,
मलय का चन्दन घिसा ।
और नहिं बस आश केवल,
पा सकूॅं में भी दिशा ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय नमः
चंदनं निर्वपामीति स्वाहा ।।

चोपडा प्रभ-चन्द्र की महिमा बड़ी है ।
पैर उल्टे मुसीबत जाने खड़ी है ।।
मैं न कहता, कहे सति सोमा यही ।
माल निकली निकाली, थे घट अही ।।
चढ़ाऊॅं इक बार तो अक्षत सही ।
खुशी के आशुओं की लगती झड़ी है ।
चोपडा प्रभ-चन्द्र की महिमा बड़ी है ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय नमः
अक्षतं निर्वपामीति स्वाहा ।।

जैन मान-गुमान हैं ।
चोपडा की शान हैं ।
और कोई न वो बाबा,
चन्द्र-प्रभ भगवान् हैं ।
समर्पित उनके चरण में,
पुष्प स्वर्ग बगान हैं ।
भगत देव विमान हैं ।
देव देव प्रधान हैं ।
जैन मान-गुमान हैं ।
चोपडा की शान हैं ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय नमः
पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा ।।

चोपड़ा के चन्द्र-प्रभ आराध्य मेरे ।
रात मेरी रजत-मय स्वर्णिम सवेरे ।
नहीं आशा ही मुझे विश्वास पूरा,
और इस संसार के दूँगा न फेरे ।‌।
चढ़ाऊॅं मैं क्यूॅं न फिर व्यंजन नवेले ।
चोपड़ा के चन्द्र-प्रभ आराध्य मेरे ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय नमः
नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

चोपडा के चन्द्र-प्रभ जी ज्ञान दो ।
हो दयालू ! प्रार्थना पर ध्यान दो ।।
जगाऊँ मैं ज्योति अनबुझ रात-दिन,
सकूॅं साध समाधि बस वरदान दो ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय नमः
दीपं निर्वपामीति स्वाहा ।।

चोपडा के चन्द्र-प्रभ स्वामी ।‌
देखते मॉं भॉंत कब खामी ।
भुला देते ‘भूल’ सुन ‘गलती’,
गला देते कह “अरे चलती” ।।
क्यूॅं न भेंटूॅं गन्ध दश पंक्ती ।
भक्त-वत्सल एक जग-नामी ।
चोपडा के चन्द्र-प्रभ स्वामी ।‌।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय नमः
धूपं निर्वपामीति स्वाहा ।।

चोपडा के चन्द्र-प्रभ की,
कृपा छप्पर फाड़ बरसे ।
दृष्टि क्या पड़ चली ऊपर,
आत्म हरिक प्रदेश हरसे ।।
द्वार क्यूॅं मैं तकूॅं इस-उस,
काम जब बन गये मेरे,
नैन निर्झर, बोल गद‌गद,
बुदबुदा दुख सिरी फल से ।
चोपडा के चन्द्र-प्रभ की,
कृपा छप्पर फाड़ बरसे ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय नमः
फलं निर्वपामीति स्वाहा ।।

दीप, चरु, जल, धूप, गुल, फल, गन्ध, अक्षत ।
लिये द्वारे चोपडा प्रभ-चन्द्र दस्तक ।
सुख ‘निराकुल’ हाथ में मेरे लगेगा,
आश रख विश्वास चरणन रखा मस्तक ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय नमः
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

कल्याण अर्घ्य

रतन वर्षण, गर्भ पूरब सुपन दर्शन आहा ।
चोपडा प्रभ-चन्द्र अर्घ्यं निर्व-पामिति स्वाहा ।।
पुण्य पूरब धन्य मॉं आनंद सर अवगाहा ।
चोपडा प्रभ-चन्द्र अर्घ्यं निर्व-पामिति स्वाहा ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
चैत्र कृृष्ण पंचम्यां
गर्भ कल्याणक प्राप्ताय
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय नमः
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

चोपडा के चन्द्र-प्रभ चित चोर हैं ।
मैं न कहता, कह रही देवी शची ।
यातरा जिसका न कोई छोर है,
जन्म केवल एक भव मानव बची ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
पौष कृष्ण एकादश्यां
जन्म कल्याणक प्राप्ताय
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय नमः
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

चोपडा प्रभ-चन्द्र सबके ।
दृग् निरख पर पीर झलके ।।
कौन मैं आया कहाँ से ।
कहाँ अब जाना यहॉं से ।
सोच वन को चल पड़े हैं,
हा ! दुखद सॅंयोग तज के ।
चोपडा प्रभ-चन्द्र सबके ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
पौष-कृष्ण-एकादश्यां
दीक्षा कल्याणक प्राप्ताय
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय नमः
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

चोपडा के चन्द्र-प्रभ का सम-शरण न्यारा ।
हिरण बैठा, सींह बैठा, मोर अहि काला ।
वस्तु तत्त्व विचार चाले ।
जात वैर विसार चाले ।।
दिव्य धुन सुन दृगन-लोहू गंग-दुध धारा ।
चोपडा के चन्द्र-प्रभ का सम-शरण न्यारा ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
फाल्गुुन-कृष्ण-सप्तम्यां
ज्ञान कल्याणक प्राप्ताय
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय नमः
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

चोपडा के चन्द्र-प्रभ की बात दूजी ।
स्वर्ग तक सबकी कहॉं जयकार गूॅंजी ।।
कर्म ध्यानानल जला इक समय लागा ।
जा लगे शिव, मुक्ति वधु का भाग जागा ।।
स्वप्न कब साक्षात् अब शुद्धात्म पूॅंजी ।
चोपडा के चन्द्र-प्रभ की बात दूजी ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
फाल्गुन-शुक्ल-सप्तम्यां
मोक्ष कल्याणक प्राप्ताय
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय नमः
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

दोहा
विशाल मानस्-तम्भ है,
खान-देश की शान ।
कर दर्शन पल-मात्र में,
चूर-चूर अभिमान ।।

जयमाला
चोपडा प्रभ-चन्द्र-देवा ।
देव करते आप सेवा ।।
क्यूँ न सेवा करूॅंगा मैं,
आप मम आराध्य देवा ।।

वीतरागी ! विगत-द्वेषी ! ।
एक सर्वग ! हितुप-देशी ! ।।
रत्न खन-खन तीन जेबा ।
देव करते आप सेवा ।
आप मम आराध्य देवा ।।

नन्त दर्शन, ज्ञान नन्ता‌ ।
सुख अनन्ता वीर्यवन्ता ।।
तट चतुष्ट्य-नन्त खेवा‌ ।
देव करते आप सेवा ।
आप मम आराध्य देवा ।।

छत्र, चॉंवर, पुष्प बरसा ।
सिंहासन, धुनि-दिव्य सरसा ।।
भा-वलय, तर-तूर-देवा ।
देव करते आप सेवा ।
आप मम आराध्य देवा ।।

चॅंवर, पंखा, छतर, ढोना ।
कलश, झारी, ध्वज सलोना ।।
सार्थ दर्प-ण मं-गलेवा ।
देव करते आप सेवा ।
आप मम आराध्य देवा ।।

पूर्ण शशि मुख नयन-हारी ।
चन्द्र प्रभ छव गौर न्यारी ।।
विनिर्गत परिणत फरेबा ।
देव करते आप सेवा ।
आप मम आराध्य देवा ।।

माथ रवि तम-बाह्य हाना ।
मण-प्रदीवा शुक्ल ध्याना ।।
विहर तम मानस कुटेवा ।
देव करते आप सेवा ।
आप मम आराध्य देवा ।।

वचन जिन सिंह-नाद दूजी‌ ।
धुनि ‘दिगम्बर-आदि’ गूॅंजी ।।
ताम्र कब ? दृग् गंग-रेवा ।
देव करते आप सेवा ।
आप मम आराध्य देवा ।।

ज्ञान केवल दृगस्-थाई ।
धन्य ! शासन दुख विदाई‌ ।।
खुश गगन उड़ते परेवा ।
देव करते आप सेवा ।
आप मम आराध्य देवा ।।

कुमुद भवि प्रति-बुद्ध चन्दा ।
दोष घन-हन, प्रदानन्दा ! ।।
कृपा बरसाते सदैवा ।
चोपडा प्रभ-चन्द्र-देवा ।
देव करते आप सेवा ।।
क्यूँ न सेवा करूॅंगा मैं,
आप मम आराध्य देवा ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय नमः
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

दोहा
गुरु-विद्या चिन चरण ले,
थित पाषाण गयन्द ।
जयतु चोपड़ा गौरवम्,
ममाराध्य प्रभु-चन्द ।।
(पुष्पांजलि क्षिपामि)

विधान प्रारंभ

अष्ट दलकमल पूजा
विधान की जय

नमस्कार माझा
अरि-हं-ताना, श्री सिद्-धाना ।
आ-चार्याना, उवझा-याना ।
नमस्कार माझा, नमस्कार माझा,
लोकातील सव्व सा-धुना नमस्कार माझा ।।१।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो जिणाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

बुध मंगल, लोकोत्तम, शरणा ।
सिध मंगल, लोकोत्तम, शरणा ।।
मुनि मंगल, लोकोत्तम, शरणा ।
धुनि मंगल, लोकोत्तम, शरणा ।।२।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो ओहि जिणाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

श्री आदि, अजित, संभव, नन्दन ।
जिन सुमति, पद्म, सुपार्श्व वन्दन ।।
प्रभ-चन्द्र, सुविधि, शीतल स्वामी ।
नुति श्रेय, पूज्य अन्तर्यामी ।।
श्री विमल, अनन्त, धर्म-नाथा ।
नुति शांति, कुन्थ, अर वरदाता ।।
श्री मल्लि, सुव्रत, नम दृग-रेवा ।
नुति नेम, पार्श्व, सन्मत देवा ।।३।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो परमोहि जिणाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

अरिहन्ता, सिद्धा-अगणन्ता ।
आ-यरिया, उवज्ञाया, सन्ता ।।
जिन-धर्म, जिनागम-जगदम्बा ।।
जिन बिम्बालय, जय जिन-बिम्बा ।।४।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो सव्वोहि जिणाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

किया दर्शन देव देवा ।
स्वर्ग शिरपुर पार खेवा ।।
सार्थ दर्शन अघ छुड़ा के ।
टिके जल कब छिद्र पा के ।।५।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो अणंतोहि जिणाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

पद्म-राग समान मुखड़ा ।
देखते ही दूर दुखड़ा ।।
दर्श जिन रूपी रवि का ।
अघ अंधेरा दूर दीखा ।।६।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो कोट्ठ-बुद्धीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

दर्श जिनवर रूप चन्द्रा ।
उमड़ता बढ़ सिन्धु नन्दा ।।
खिर चली धुनी ओम् न्यारी ।
जयतु जय जिनवर तुम्हारी ।।७।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो बीय-बुद्धीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

सच्चिदा-नन्दैक रूपा ।
सिद्ध परमातम अनूपा ।।
अन्यथा रक्षक न कोई ।
शरण इक तुम जहां दोई ।।८।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो पदाणु-सारीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

जल, मनहारी चन्दन झारी ।
अक्षत शाली, नन्दन क्यारी ।।
स्वीकारो, मम आराध्य-देव,
चरु, दीप, धूप, श्री-फल थाली ।।01।।
ॐ ह्रां ह्रीं ह्रूं ह्रौं ह्र:
अ-सि-आ-उ-सा नमः
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
अष्टदल कमल हृदयस्-थिताय
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय
पूर्णार्घं निर्वपामीति स्वाहा ।।

षोडश दलकमल पूजा
विधान की जय

आप रक्षक गगन गूॅंजा ।
तुम सिवा रक्षक न दूजा ।।
भक्ति जिन नित मिले मुझको ।
भक्ति जिनपत मिले मुझको ।।९।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो सं-भिण्ण-सोदा-राणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

दया बिन पद चक्रि बोझा ।
दृग् सजल निर्धन सरोजा ।।
देव दर्शन पाप-हारी ।
विहर भव जर यम बिमारी ।।१०।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो सयं-बुद्धाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

दर्शन देवा ।
दिव-शिव खेवा ।।
माटी माधो ।
दर्शन ‘साधो’ ।।
पाप निकन्दा ।
जाप जिनन्दा ।।
‘सूर’ सबेरा ।
दूर अंधेरा ।।११।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो पत्तेय-बुद्धाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

नुति जिन चन्दा ।
अमृता-नन्दा ।।
प्रशान्त रूपा ।
जय चिद्रूपा ।।
वधु शिव कन्ता ।
सिद्ध अनन्ता ।।
करण्ड करुणा ।
शरण्य शरणा ।।१२।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो बोहिय-बुद्धाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

रक्षक कोई ? ।
तुम जग दोई ।।
मिले हमेशा ।
भक्ति जिनेशा ।।
भला गरीबा ।
दया करीबा ।।
तोर सहारे ।
रोग किनारे ।।१३।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो उजु-मदीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

दर्शन जिनन्द, हन पाप बन्ध ।
जल-यान स्वर्ग, अपवर्ग स्यन्द ।।
दर्शन जिनेश, निरसन कलेश ।
जल छिद्र ओक, रिसता अशेष ।।१४।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो विउल-मदीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

लख पद्म-राग, मुख तुम विराग ।
अघ विघट प्रकट झट एक जाग ।।
जिन सूर दर्श, मन पद्य हर्ष ।
तम नाश प्रकाश, अपूर्व पर्श ।।१५।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो दस-पुव्वीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

लख चन्द पून, सुख सिन्ध दून ।
वृष अमृत बिन्द, भव दाह शून ।।
सम्यक्त्व आद, गुण युक्त आठ ।
वन्दन प्रशान्त ! अन्तस् विराट ।।१६।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो चउ-दस-पुव्वीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

सिद्धात्म नन्त, परमात्म पन्थ ।
वन्दन सदैव, आनन्द-वन्त ।।
जुग चरण तोर, इक शरण मोर ।
रक्षक न और, तुम चरण छोड़ ।।१७।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो अट्ठंग-महा-णिमित्त कु-सलाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

त्राता जहान, अपने समान ।
तुम आगत, नागत, वर्तमान ।।
जिन भक्ति लाभ, जिन भक्ति लाभ ।
मिल सके सदा, प्रद अमित आभ ।।१८।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो वि-उव्वण-इड्ढि-पत्ताणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

जिन धर्म छाड़, पद चक्र भार ।
दारिद्र भला, जिन-धर्म धार ।।
वैतरण वर्ण, लख आप चर्ण ।
क्षय आप आप, भव जरा-मर्ण ।।१९।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो विज्जा-हराणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

दर्शन देव दिव सोपान ।
दर्शन देव शिव जलयान ।।
दर्शन पाप परिहारी ।
पूरब उदय पुन भारी ।।२०।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो चा-रणाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

अंजुल छिद्र रिसता नीर ।
कज्जल कब ठहरता पीर ।।
वन्दन साध त्रिपुरारी ।
दरश जिनन्द बलिहारी ।।२१।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो पण्ण-समणाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

भा मण पद्य-राग समान ।
मुख गत-राग लख भगवान् ।।
दुर्मति द्वार यम प्यारी ।।
दरश जिनन्द बलिहारी ।।२२।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो आयास-गामीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

दरश जिनेश रूपी सूर ।
अघ अंधियार करता दूर ।।
भवि मन फुल्ल फुलवारी ।।
दरश जिनन्द बलिहारी ।।२३।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो आसी-विसाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

दर्शन चन्द्र अपने भॉंत ।
वर्धन सुख, अमृत बरसात ।।
भव भव दाह मिट चाली ।।
दरश जिनन्द बलिहारी ।।२४।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो दिट्ठि-वि-साणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

जल, मनहारी चन्दन झारी ।
अक्षत शाली, नन्दन क्यारी ।।
स्वीकारो, मम आराध्य-देव,
चरु, दीप, धूप, श्री-फल थाली ।।02।।
ॐ क्षां क्षीं क्षूं क्षें क्षैं क्षों क्षौं क्षं क्षः
नमोर्-ऽहते सर्वं रक्ष रक्ष हूं फट् नमः
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
षोडशदल-कमल हृदयस्-थिताय
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय
पूर्णार्घं निर्वपामीति स्वाहा ।।

चतुर्विंशतिदल कमल पूजा
विधान की जय

धुन दिव तत्त्व सत् जीवाद ।
गुण सम्यक्त्व आदिक आठ ।।
रूप प्रशान्त अविकारी ।।
दरश जिनन्द बलिहारी ।।२५।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो उग्ग-तवाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

चित् आनन्द एक स्वरूप ।
आतम तत्त्व ज्योत अनूप ।।
अष्टम भूमि अधिकारी ।।
दरश जिनन्द बलिहारी ।।२६।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो दित्त-तवाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

आप शरण अकारण एक ।
शरणा इक अमिट अभिलेख ।।
रक्षा कीजिये म्हारी ।।
दरश जिनन्द बलिहारी ।।२७।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो तत्त-तवाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

त्राता लोक तीन अकेल ।
दाता कहाँ तुम सा मेल ।।
करुणा क्षमा भण्डारी ।।
दरश जिनन्द बलिहारी ।।२८।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो महा-तवाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

पाऊँ भक्ति-जिन दिन रात ।
और न दूसरी फरियाद ।।
मंशा पूर्ण जश-धारी ।।
दरश जिनन्द बलिहारी ।।२९।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो घोर-तवाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

दीन भला करीब जिनेन्द्र ।
विरथा जिन सुदूर नरेन्द्र ।।
जाते पाप-पुन खाली ।।
दरश जिनन्द बलिहारी ।।३०।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो घोर गुण-परक्-कमाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

पाप मिटाता है ।
स्वर्ग भिटाता है ।
प्रभु जिनेन्द्र दर्शन,
मोक्ष पठाता है ।।३१।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो घोर-गुणाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

दर्शन भगवन् का ।
वन्दन मुनि-गण का ।
छिद्र-हस्त जल त्यों,
शत्रु पाप पन का ।।३२।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो ऽघोर-गुण-बंभ-यारीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

मुख वीतराग तुम ।
प्रभ पद्म-राग सम ।
लखा, ’कि दूर दिखा,
कल्मष जनम-जनम ।।३३।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो आमो-सहि-पत्ताणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

दर्शन जिन दिनकर ।
फुल्ल पद्म मन-सर ।
एक प्रकाशक जग,
सहे न तम छिन-भर ।।३४।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो खेल्लो-सहि-पत्ताणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

दर्शन जिन चन्दा ।
दाह-भव निकन्दा ।
धर्मामृत वर्षण,
हित जल-आनन्दा ।।३५।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो जल्लो-सहि-पत्ताणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

आठ-गुण समन्दर ।
तत्त्व विद् दिगम्बर ।
ढ़ोक सतत् शत-शत,
शिव सत् अर सुन्दर ।।३६।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो विट्ठो-सहि-पत्ताणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

अक्ष पन विजेता ।
सिद्ध ऊर्ध्व रेता ।
चिदानन्द चिन्मय,
प्रनुत श्रुत-प्रणेता ।।३७।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो सव्वो-सहि-पत्ताणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

है नहिं अन्य शरण ।
आप अनन्य शरण ।
करुणा-कर करुणा,
कर, कीजे रक्षण ।।३८।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो मण-बलीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

एक आप त्राता ।
भावि-भूत गाता ।
सिवा तुम न रक्षक,
दाता सुख साता ।।३९।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो वचि-बलीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

मिले भक्ति अरहत् ।
मिले भक्ति अरहत् ।
न पाऊँ जब-तलक,
अरहत् गुण सम्पद् ।।४०।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो काय-बलीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

रहित धर्म माहन ।
वृथा-चक्र का धन ।
दारिद पन अच्छा,
सहित धर्म माहन ।।४१।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो खीर-सवीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

थिर, सिंचित सारे ।
चिर संचित हा ! ’रे ।
तुम्हें देखते ही,
हों यम को प्यारे ।।४२।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो सप्पि-सवीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

छाँव दिव देने वाला ।
नाव शिव खेने वाला ।।
वज्र मनु पाप पहारा ।
छिद्र अंजुल जल धारा ।।४३।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो महुर-सवीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

विरागी वक्त्र निहारा ।
कोटि भव पाप विडारा ।।
दूर मानस अँधियारा ।
सूर पारस जयकारा ।।४४।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो अमइ-सवीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

दर्शन जिन चन्द्र तिहारा ।
दाह भव एक किनारा ।।
दिगम्बर शान्त निराला ।
दृष्टि सम्यक् करतारा ।।४५।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो अक्खीण-महा-णसाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

अपूर्वानन्द नजारा ।
सहज शुद्धातम प्यारा ।।
अकारण एक सहारा ।
एक निस्पृह रखवाला ।।४६।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो वड्ढमाण-बुद्धि-रिसस्स
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

अकेला तारणहारा ।
जगत त्राता अवतारा ।।
भक्ति जिन रवि शशि तारा ।
अनवरत मंगल-कारा ।।४७।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो सव्व-सिद्धा-यद-णाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

दीनता तिल परिवारा ।
बिना जिस पद नृप खारा ।।
निराकुल करने वाला ।
आपका दर्शन न्यारा ।।४८।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो भयवदो महदि
महावीर वड्ढमाण बुद्धिरिसीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

पूर्णार्घ
जल, मनहारी चन्दन झारी ।
अक्षत शाली, नन्दन क्यारी ।।
स्वीकारो, मम आराध्य-देव,
चरु, दीप, धूप, श्री-फल थाली ।।03।।
श्री वृषभादि वर्धमान पर्यंत
परम-देव भगवन् तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
चतुर्विंशति दल कमल
हृदयस्-थिताय
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय
पूर्णार्घं निर्वपामीति स्वाहा ।।

महा-अर्घं
दोहा
आज तुम्हें ज्यों ही किया,
मैंने नैनन द्वार ।
मात्र चुलुक भर रह गया,
मेरा जल संसार ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
नव देव भगवन् तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
अष्ट-चत्वारिंशद्-दलकमल
हृदयस्-थिताय
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय नमः
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

:: जाप्य ::
।। ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री चन्द्रप्-प्रभ तीर्थंकराय नमः ।।

जयमाला
हमारी रोज दिवाली है ।
तुम्हारी कृपा निराली है ।।

स्व…स्थ तन-मन ।
विदा अनबन ।
जेब खनखन ।
झुकी डाली, हरियाली है ।
तुम्हारी कृपा निराली है ।।१।।

चैन निंदिया ।
सुलझी धिया ।
मित्र दुनिया ।
नज़र काली झर चाली है ।
तुम्हारी कृपा निराली है ।।२।।

साधु संगत ।
पुण्य सम्पत ।
शान्त परणत ।
हार हारी बलिहारी है ।
तुम्हारी कृपा निराली है ।।३।।

भीगे नयन ।
मीठे वचन ।
सीझे सुपन ।
चुनर शश तारों वाली है ।
तुम्हारी कृपा निराली है ।।४।।

जग कुटुम है ।
जलन गुम है ।
दुख खतम है ।
खड़ी दर यम बदहाली है ।
तुम्हारी कृपा निराली है ।।५।।

दोहा
हाथ ‘निराकुलता’ लगी,
किरपा सिर्फ तुम्हार ।
धका धका यूॅं दो लगा,
नैय्या मेरी पार ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री चन्द्रप्-प्रभ जिनेन्द्राय नमः
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।

श्री सरसुति-मंत्र*
ॐ ह्रीम्
अर्हन् मुख कमल-वासिनि
पा-पात्म क्षयंकरि
श्रुत-ज्ञान
ज्वाला सहस्र प्रज्ज्वलिते
सरस्वति !
मत् पापम् हन हन दह दह
क्षाम् क्षीम् क्षूम् क्षौम् क्षः
क्षीरवर-धवले
अ-मृत संभवे
वम् वम् हूम् फट् स्वाहा
मम सन्-निधि-करणे
मम सन्-निधि-करणे
मम सन्-निधि-करणे ।
ॐ ह्रीं जिन मुखोद्-भूत्यै
श्री सरस्वति-देव्यै
अर्घं निर्वपामीति स्वाहा

शांति पाठ
अथ पौर्वाह-निक (अप-राह-निक)
देव-शास्त्र-गुरु-वन्दना-क्रियायाम्
पूर्वाचार्या-नुक्-क्रमेण,
सकल-कर्मक्-क्षयार्-थम्,
भाव-पूजा-वन्दना-स्तव समेतम्
श्री शांति-भक्ति कायोत्सर्गम् करोम्यहम्
(९ बार णमोकार )

*चौपाई*
दर्शन मात्र मेंटता दुखड़ा ।
भाँत चन्द्रमा सुन्दर मुखड़ा ।।
नासा टिके नैन मनहारी ।
करें वन्दना नाथ ! तुम्हारी ।।१।।

आप चक्रधर-पञ्चम नामी ।
वन्द्य इन्द्र शत, अन्तर्-यामी ।।
प्रभो शान्ति-जिन करके करुणा ।
करो शान्ति ! जश निरखो अपना ।।२।।

छत्र, सिंहासन, वृक्ष-अशोका ।
धुनि, दुन्दुभि, दल-चँवर अनोखा ।।
भा-मण्डल झिर-पुष्प-अनूठी ।
प्रातिहार्य-वसु आप विभूती ।।३।।

अर्चित-जगत् ! शान्ति करतारी ।
ढ़ोक करो स्वीकार हमारी ।।
प्राण-भूत, सत्, जीव समस्ता ।
पायें परिणति शान्त प्रशस्ता ।।४।।

देवों में जो देव बड़े हैं ।
चरणों में हित सेव खड़े हैं ।।
हंस-वंश वे जग उजियारे ।
करें शान्ति मण्डित जग सारे ।।५।।
(निम्न श्लोक को पढ़कर
जल छोड़ना चाहिए)

शान्ति कीजिये गाँव-गाँव में ।
विश्व लीजिये पाँव-छाँव में ।।
डूब ‘साध-जन’ उतरें गहरे ।
लहर लहर-पचरंगा लहरे ।।६।।

नृप धार्मिक बलशाली होवे ।
विकृत-प्रकृत मनमानी खोवे ।।
धर्म-चक्र-जिन सौख्य प्रदाता ।
रहे प्रवाहित यूँ हि विधाता ।।७।।

द्रव्य सुमंगल-कारी होवे ।
क्षेत्र अमंगल-हारी होवे ।।
होवे काल सुमंगल-कारी ।
होवें भाव अमंगल-हारी ।।८।।

कर्मन-घात घात मद सारा ।
सहजो सिद्ध रिद्ध परिवारा ।।
आदि आदि अर्हन् चौबीसा ।
शान्ति प्रदान करें निशि दीसा ।।९।।

*दोहा*
किया शान्ति जिन भक्ति का,
भगवन् कायोत्सर्ग ।।
करूँ दोष आलोचना,
जो प्रद-स्वर्ग-पवर्ग ।।१०।।

*चौपाई*
पाँच सभी कल्याणक धारी ।
आठ प्राति-हारज मन-हारी ।।
अतिशय तीस चार मण्डित हैं ।
अर बत्तीस इन्द्र वन्दित हैं ।।११।।

चौ-विध संघ नखत मानिन्दा ।
राम श्याम चक्री, प्रभु ! चन्दा ।।
‘निलय-विनय’ अन-गिनत गभीरा ।
आद-आद जिन अंतिम वीरा ।।१२।।

अर्चन-पूजन-वन्दन करता ।
उनका मैं अभिनन्दन करता ।।
पीड़ा-दुक्ख-दरद-भय खोवे ।
मेरे कर्मों का क्षय होवे ।।१३।।

रत्नत्रय का मुझे लाभ हो ।
मेरी ‘गति-पंचम-उपाध’ हो ।।
मृत्यु-महोत्सव मना सकूँ मैं ।
जिन-गुण-सम्पद् कमा सकूँ मैं ।।१४।।
अथ पौर्वाह-निक (अप-राह-निक)
देव-शास्त्र-गुरु-वन्दना-क्रियायाम्
पूर्वाचार्या-नुक्-क्रमेण,
सकल-कर्मक्-क्षयार्-थम्,
भाव-पूजा-वन्दना-स्तव समेतम्
श्री समाधि-भक्ति कायोत्सर्गम्
करोम्यहम्
(९बार णमोकार )

*चौपाई*
सदा शास्त्र अभ्यास करूँ मैं ।
सन्त समीप निवास करूँ मैं ।।
मौन धरूँ क्यूँ, गुणी दिखाये ।
गौण करूँ, यूँ दोष-पराये ।।१५।।

भावन-आत्म तत्व, नम-नयना ।
हित-मित रखूँ मधुरतम वयना ।।
जब तक राधा-मुक्ति रिझाऊँ ।
इन्हें जन्म जन्मान्तर पाऊँ ।।१६।।

तारण हारे…शरण सहारे ।
हृदय हमारे…चरण तुम्हारे ।।
चरण तुम्हारे…हृदय हमारा ।
रहे, तलक जब भव-जल-धारा ।।१७।।

स्वर-अक्षर पद मात्रा गलती ।
हुईं, चाहते बिन अनगिनती ।।
हो अपराध क्षमा यह मेरा ।
‘जैसा भी’ मैं अपना तेरा ।।१८।।

*दोहा*
किया समाधी, भक्ति का,
भगवन् कायोत्सर्ग ।।
करूँ दोष आलोचना,
जो प्रद-स्वर्ग-पवर्ग ।।१९।।

*चौपाई*
सम्यक्-दर्शन, सम्यक्-ज्ञाना ।
सम्यक्-चारित, ताना-बाना ।।
रूप अनूप ध्यान परमातम ।
बुद्ध-विशुद्ध ज्ञान धर आतम ।।२०।।

पूजन नित वन्दन करता हूँ ।
अर्चन अभिनन्दन करता हूँ ।।
क्षय होवें दुख संकट सारे ।
क्षय हो जावें कर्म हमारे ।।२१।।

मुझे लाभ रत्नत्रय होवे ।
सुगति गमन, भय-सप्तक खोवे ।।
पाऊँ मरण-समाधी स्वामी ।
बनूँ रतन जिन-गुण आसामी ।।२२।।
‘पुष्पाञ्जलिं क्षिपेत्’
( यहाँ पर नौ बार णमोकार मंत्र
पढ़ना चाहिए )

विसर्जन पाठ
अञ्जन को पार किया ।
चन्दन को तार दिया ।।
नहिं तोर दया का पार ।
नागों का हार किया ।।१।।

धूली-चन्दन-बावन ।
की शूली सिंहासन ।।
धरणेन्द्र देवी-पद्मा ।
मामूली अहि-नागिन ।।२।।

अगनी ‘सर’ नीर किया ।
भगिनी ‘सर’ चीर किया ।।
नहिं तोर दया का पार ।
केशर महावीर किया ।।३।।

बन पड़ीं भूल से भूल ।
कृपया कर दो निर्मूल ।।
बिन कारण तारण हार ।
नहिं तोर दया का पार ।।४।।
दोहा
बस आता, अब धारता,
ईश आशिका सीस ।
कृपा निराकुल आपकी,
बनी रहे निशि-दीस ।।
(पुष्पांजलि क्षिपामि)

आरती
ऐरा नन्दा ।
बाबा चन्दा ।।
स्वर्ण सुगंधा ।
पाप निकन्दा ।
जयतु जयतु जय, चन्द्र जिनन्दा ।।
दीप हाथ ले ।
भक्ति साथ ले ।
करूँ आरती मैं सानन्दा ।।
जयतु जयतु जय, चन्द्र जिनन्दा ।।

आरती प्रथम गर्भ कल्याणा ।
इन्द्र कुबेर रत्न बरसाना ।।
साँझ साँझ ले भक्ति अमन्दा ।
करूँ आरती मैं सानन्दा ।
जयतु जयतु जय, चन्द्र जिनन्दा ।।१।।

आरती द्वितिय जन्म कल्याणा ।
मेर न्हवन सौधर्म रचाना ।
ताण्डव करे भक्त बन अंधा ।
करूँ आरती मैं सानन्दा ।
जयतु जयतु जय, चन्द्र जिनन्दा ।।२।।

आरती तृतिय त्याग कल्याणा ।
कच लुञ्चल, दैगम्बर बाना ।
छोड़ छाड़ सब गौरख धंधा ।
करूँ आरती मैं सानन्दा ।
जयतु जयतु जय, चन्द्र जिनन्दा ।।३।।

आरती तुरिय ज्ञान कल्याणा ।
सींह हिरण समशरण दिखाना ।
बैठे दे कंधे से कंधा ।
करूँ आरती मैं सानन्दा ।
जयतु जयतु जय, चन्द्र जिनन्दा ।।४।।

आरती और मोक्ष कल्याणा ।
समय मात्र ऋज गति शिव थाना ।
टूट चला वसु कर्मन फंदा ।
जयतु जयतु जय, चन्द्र जिनन्दा ।।
दीप हाथ ले ।
भक्ति साथ ले ।
करूँ आरती मैं सानन्दा ।।
जयतु जयतु जय, चन्द्र जिनन्दा ।।५।।

 

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