आद्य संस्तुति-लघु भक्तामर
देवन देव । कर तुम सेव ।।१।।
सुरपति तीर । दृग् मम नीर ।।२।।
रखना लाज । बुध सरताज ।।३।।
सुर-गुरु हार । माप तुम्हार ।।४।।
करे मुखरी । भक्ति तुमरी ।।५।।
पिक चित् चोर । हेतिक बौंर ।।६।।
सुमरण आप । विघटन पाप ।।७।।
आप प्रसाद । हाथ मुराद ।।८।।
कथा थारी । व्यथा हारी ।।९।।
अपने भाँत । करते नाथ ।।१०।।
सुन्दर एक । पद गज-रेख ।।११।।
विरच तुम तन । खतम रज कण ।।१२।।
मनहर आप । मन निष्पाप ।।१३।।
लाँघें लोक । गुण बिन-रोक ।।१४।।
मन अविकार । हतप्रभ नार ।।१५।।
अगम्य पवन । दीप रतनन ।।१६।।
बिन आताप । दिनकर आप ।।१७।।
गुम मोह तम । चाँद अनुपम ।।१८।।
रवि, शशि भार । मुख तम हार ।।१९।।
केवल ज्ञान । स्वयं समान ।।२०।।
कृपा सराग । तुम से राग ।।२१।।
सूरज पूर्व । मात अपूर्व ।।२२।।
मृत्यु बसंत । पद शिव पन्थ ।।२३।।
तुमरे नाम । ब्रह्मा, राम ।।२४।।
शम्भु, विशुद्ध । इक तुम बुद्ध ।।२५।।
जग शृंगार । जय-जय कार ।।२६।।
गुण परिपून । औ-गुण शून ।।२७।।
तन आलोक । वृक्ष अशोक ।।२८।।
आसन सींह । आप निरीह ।।२९।।
चौंसठ चॅंवर । तीस-दु अमर ।।३०।।
जगत् ईश्वर । भाषत छतर ।।३१।।
भुवन फेरी । गहन भेरी ।।३२।।
वर्षा सुमन । सुगन्ध पवन ।।३३।।
इक भा-वलय । जग भा निलय ।।३४।।
भव्य प्राणी । दिव्य वाणी ।।३५।।
कमल पदतल । रचना कमल ।।३६।।
बारह सभा । अप्रतिम भा ।।३७।।
हाँप भय गज । आप जय भज ।।३८।।
हुआ सिंह वश । छुआ तुम जश ।।३९।।
जल थवन तव । दे बुझा दव ।।४०।।
ध्याया आप । भागा साँप ।।४१।।
आप सुमरण । दे जिता रण ।।४२।।
शत्रु हारे । तुम सहारे ।।४३।।
जलधि अपार । बल तुम पार ।।४४।।
तम रोग क्षय । तुम जोग दय ।।४५।।
ध्या तुम्हें लें । बन्धन खुलें ।।४६।।
भय और भय । क्षय, तोर जय ।।४७।।
आ तार दे । माँ शारदे ।।४८।।
मम आराध्य
खोना वाले बाबा का
पूजन-विधान
पार करना तुम्हें आता ।
प्यार करना तुम्हें आता ।।
हाथ देना तुम्हें आता ।
साथ देना तुम्हें आता ।।
जोड़ भगवन् भक्त नाता ।
तभी लागा भक्त ताँता ।।
कौन मेरा तुम अलावा ।
खोना वाले बाबा ! मेरे खोना वाले बाबा ! ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्र !
अत्र अवतर अवतर संवौषट्
(इति आह्वानन)
अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ:
(इति स्थापनम्)
अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट्
(इति सन्निधिकरणम्) ।
आप मम आराध्य देवा ।
देव करते आप सेवा ।।
क्यूँ न सेवा करूँगा मैं,
भक्ति आप विमुक्ति नावा ।
खोना वाले बाबा ! मेरे खोना वाले बाबा ! ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय नमः
जलं निर्वपामीति स्वाहा ।।
दूर से, या द्वार आया ।
पुकारे अपना-पराया ।।
दौड़ उसके पास आते,
धूप जग, तुम कृपा छाँवा ।
खोना वाले बाबा ! मेरे खोना वाले बाबा ! ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय नमः
चंदनं निर्वपामीति स्वाहा ।।
नेह शिशु माँ भात गहरा ।
आप पढ़ लें खूब चेहरा ।।
यहाँ उठती नजर थोड़ी,
वहाँ उठ चाले तनावा ।
खोना वाले बाबा ! मेरे खोना वाले बाबा ! ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय नमः
अक्षतं निर्वपामीति स्वाहा ।।
क्यूँ मुझे अन्यत्र जाना ।
हो रहा सब यही पाना ।।
लगाना कब पड़ी अरजी,
नाव पंछी आप ठाँवा ।
खोना वाले बाबा ! मेरे खोना वाले बाबा ! ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय नमः
पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा ।।
थामना बस आप छिंगरी ।
बना देते आप बिगड़ी ।।
दिखा देते आप करके,
स्वप्न भी करते न दावा ।
खोना वाले बाबा ! मेरे खोना वाले बाबा ! ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय नमः
नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।
एक तुम अपने हमारे ।
देखता सपने तुम्हारे ।।
इक यही दरबार साँचा,
जहाँ रंच न छल छलावा ।
खोना वाले बाबा ! मेरे खोना वाले बाबा ! ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय नमः
दीपं निर्वपामीति स्वाहा ।।
आखरी हो आश हमरी ।
हो प्रथम विश्वास तुम ही ।।
आशुतोष ! सिवाय तुमरे,
देव और न यूँ प्रभावा ।
खोना वाले बाबा ! मेरे खोना वाले बाबा ! ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय नमः
धूपं निर्वपामीति स्वाहा ।।
चढ़ाया हो किसी ने भी ।
हाथ का श्री फल भले ही ।।
पूर्ण हो मन कामना सो,
तुम्हीं काशी जैन काबा ।
खोना वाले बाबा ! मेरे खोना वाले बाबा ! ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय नमः
फलं निर्वपामीति स्वाहा ।।
नीर, चन्दन, धान-शाली ।
पुष्प, व्यञ्जन, घृत दिवाली ।।
धूप अनुपम, फल रसीले,
बस यही जो कुछ चढ़ावा ।
खोना वाले बाबा ! मेरे खोना वाले बाबा ! ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय नमः
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।
कल्याण अर्घ्य
माह छह पूरब गरभ से ।
झिर लगाकर रतन बरसे ।
देखती माँ रात सपने,
पूछती फल उठ सवेरे ।
खोना वाले, खोना वाले, खोना वाले बाबा ! मेरे ।।
आपका मैं, आप मेरे ।
रोज आता द्वार तेरे ।।
है मुझे विश्वास पूरा,
छटेंगे काले अँधेरे ।
खोना वाले, खोना वाले, खोना वाले बाबा ! मेरे ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
आषाढ़-कृष्ण-द्वितीयायां
गर्भ कल्याणक प्राप्ताय
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय नमः
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।
क्षीर जल भर उठा गगरी ।
रत न्हवन पुरि-इन्द्र सगरी ।।
रूप नूप द्वयक्ष सुरपति,
बना अक्ष सहस्र हेरे ।
खोना वाले, खोना वाले, खोना वाले बाबा ! मेरे ।।
आपका मैं, आप मेरे ।
रोज आता द्वार तेरे ।।
है मुझे पूरा भरोसा,
छटेंगे काले अँधेरे ।
खोना वाले, खोना वाले, खोना वाले बाबा ! मेरे ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
चैत्र-कृष्ण-नवम्यां
जन्म कल्याणक प्राप्ताय
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय नमः
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।
आन वन पट फेंक दीने ।
ठान मन कच खेंच लीने ।।
गली सकरी मुक्त नगरी,
सोच यह निकले अकेले ।
खोना वाले, खोना वाले, खोना वाले बाबा ! मेरे ।।
आपका मैं, आप मेरे ।
रोज आता द्वार तेरे ।।
लोरियों में कहा माँ ने,
छटेंगे काले अँधेरे ।
खोना वाले, खोना वाले, खोना वाले बाबा ! मेरे ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
चैत्र-कृष्ण-नवम्यां
दीक्षा कल्याणक प्राप्ताय
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय नमः
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।
घात घात अरात सहसा ।
नन्त-निधि ! आनन्द बरसा ।।
लग कतार विहार दिव-पुर,
दल सहस्र कमल बिखेरे ।
खोना वाले, खोना वाले, खोना वाले बाबा ! मेरे ।।
आपका मैं, आप मेरे ।
रोज आता द्वार तेरे ।।
है मुझे आशा ‘कि अबकी,
छटेंगे काले अँधेरे ।
खोना वाले, खोना वाले, खोना वाले बाबा ! मेरे ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
फागुन-कृष्ण-एकादश्यां
ज्ञान कल्याणक प्राप्ताय
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय नमः
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।
जगा अगनी शुक्ल ध्याना ।
दग्ध कर्म अघात नाना ।।
सुख ‘निराकुल’ नगर पहुंचे,
अब न देना पुनः फेरे ।
खोना वाले, खोना वाले, खोना वाले बाबा ! मेरे ।।
आपका मैं, आप मेरे ।
रोज आता द्वार तेरे ।।
कह रहा, दे जोर मनुआ,
छटेंगे काले अँधेरे ।
खोना वाले, खोना वाले, खोना वाले बाबा ! मेरे ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
माघ-कृष्ण-चतुर्दश्यां
मोक्ष कल्याणक प्राप्ताय
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय नमः
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।
जयमाला
दोहा
भूले भटके आ भले,
यह न देखते कौन ? ।
उठा लगा लेते गले,
आदि-प्रभो खरगोन ।।
जय जयकारा बाबा खोना ।
मुझ पर चले ना जादू-टोना ।
निशि चाँदी, दिन मेरा सोना ।।
जय जयकारा बाबा खोना ।।
मुझे किसी से जलन न होती ।
परहित नयन चढ़ाते मोती ।।
हाथ बनाना पड़ा न दोना ।
जय जयकारा बाबा खोना ।।१।।
याद न बात कटी हो मेरी ।
बनती बात न लगती देरी ।।
मैं ऊँचा, नभ लगता बौना ।
जय जयकारा बाबा खोना ।।२।।
अपनापन बहता नस नस में ।
मन मेरा रहता है वश में ।।
आया बनना पाछी पौना ।
जय जयकारा बाबा खोना ।।३।।
सिर चढ़ के न बोलते पैसे ।
हैं परिणाम न ऐसे वैसे ।।
लोना भी है मुझे सलोना ।
जय जयकारा बाबा खोना ।।४।।
अपनी लगती दुनिया सारी ।
भली न लगती दुनियादारी ।।
रोता फिरूॅं न दर दर रोना ।
जय जयकारा बाबा खोना ।।५।।
बगुला भक्ति रिझा ना पाती ।
आत्म भावना मेरी साथी ।।
भाता मुझे न नीर बिलौना ।
जय जयकारा बाबा खोना ।।६।।
नेकी कर मैं डालूॅं दरिया ।
हूॅं आगे, है पीछे दुनिया ।।
शाबाशी देता हर कोना ।
जय जयकारा बाबा खोना ।।७।।
और न सिर्फ एक अभिलाषा ।
पल समाध तुम चरण निवासा ।।
लागे हाथ निराकुल जोना ।।
जय जयकारा बाबा खोना ।।८।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय नमः
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।
दोहा
आदि-प्रभो खरगोन-सा,
देव न दूजा और ।
रहता तो है मौन सा,
काम साधता दौड़ ।।
(पुष्पांजलि क्षिपामि)
विधान प्रारंभ
अष्ट दलकमल पूजा
विधान की जय
जिनके नख दर्पण में भाई ।
मुकुट-बद्ध मुख शतक दिखाई ।।
वे जग तीन, अकेले स्वामी ।
सेवक ! बना रखें अनुगामी ।।१।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो जिणाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।
शस्त्र सुसज्जित देवों द्वारा ।
जिनका अभिनन्दित जय कारा ।।
पार उतारन भव जल नैय्या ।
करें हमारे ऊपर छैय्या ।।२।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो ओहि जिणाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।
ध्यायें बुध मन थिर इक करके ।
पाद-पीठ तुम मस्तक धर-के ।।
ऐसे तुम, मैं बालक नन्हा ।
थव-तव करना काले पन्ना ।।३।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो परमोहि जिणाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।
गुण तुमरे गा सका कौन है ।
सुर-गुरु भी जब लिया मौन है ।।
एक भक्त वत्सल तुम जग में ।
संस्थित करो हमें शिव-मग में ।।४।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो सव्वोहि जिणाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।
बचपन से मति मेरी मोटी ।
ऊपर से मति मेरी खोटी ।।
फिर भी गूँथूँ तुम गुण माला ।
कारज पुण्य कराने वाला ।।५।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो अणंतोहि जिणाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।
हँसी उड़ायेंगे बुध मेरी ।
प्रेरित करे भक्ति पर तेरी ।।
तभी करूँ जिनपति तुम पूजा ।
और न भक्त सहाई दूजा ।।६।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो कोट्ठ-बुद्धीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।
आये पाप बँधे भव-भव से ।
आप आप छूटें तव-थव से ।।
तभी करूँ बस यजन आप का ।
ताकि न हो आ-गमन पाप का ।।७।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो बीय-बुद्धीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।
संस्तुति बेड़ा पार लगाई ।
ऐसा सुन, थुति आप रचाई ।।
आप धाम-शिव नाम किया है ।
तभी शाम तव नाम लिया है ।।८।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो पदाणु-सारीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।
जल ले के, चन्दन ले के मैं ।
अक्षत लिये, सुमन ले के मैं ।।
चरु ले, दीप, धूप, फल न्यारे ।
करूँ यजन, दो लगा किनारे ।।01।।
ॐ ह्रां ह्रीं ह्रूं ह्रौं ह्र:
अ-सि-आ-उ-सा नमः
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
अष्टदल कमल हृदयस्-थिताय
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय
पूर्णार्घं निर्वपामीति स्वाहा ।।
षोडश दलकमल पूजा
विधान की जय
रहे दूर गुण संस्तव थारा ।
अरुक-अथक सुर-गुरु विस्तारा ।।
व्यथा-कथा भी तुम हर लेती ।
अता पता नहिं लगने देती ।।९।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो सं-भिण्ण-सोदा-राणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।
होता निमिष न तुम्हें सुमरते ।
सुनते तुम समान खुद करते ।।
रस-पारस तुम आगे झूठा ।
तव-थव पारस-पर्श अनूठा ।।१०।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो सयं-बुद्धाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।
एक तुम्हारा साँचा द्वारा ।
दर्शन तुम निरसन भवकारा ।।
और दिलाते सिर्फ दिलासा ।
एक आप पूरण अभिलाषा ।।११।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो पत्तेय-बुद्धाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।
रूप आपका सुन्दर जैसा ।
कहाँ तीन जग अन्दर वैसा ।।
चन्दर-चन्दन दाग-नाग-से ।
सदा परेशां भान-आग से ।।१२।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो बोहिय-बुद्धाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।
सुर-नर-नाग मान अपहारी ।
अनुपमेय तुम मुख अविकारी ।।
विरच आप मुख समेत काया ।
बचे द्रव्य से चाँद बनाया ।।१३।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो उजु-मदीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।
गुण-अनन्त ! जो तुम्हें सुमरते ।
निर्भय देव समान विचरते ।।
देखें उन्हें बलाएँ डरतीं ।
देखें उन्हें कलाएँ वरतीं ।।१४।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो विउल-मदीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।
शर-कटाक्ष ले सुर-तिय आईं ।
अचल आप मन डिगा न पाईं ।।
घुटने टेक झुका फिर माथा ।
चलीं भक्त भगवन् ले नाता ।।१५।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो दस-पुव्वीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।
जगत प्रकाशित करने वाले ।
आप अलौकिक दीप निराले ।।
नाम न निशाँ धूम का भाई ।
दिया तले न तिमिर दिखाई ।।१६।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो चउ-दस-पुव्वीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।
आखर आप प्रभाकर न्यारे ।
पाप शर्बरी नाशन-हारे ।।
लख भवि पद्म तुम्हें खिल जाते ।
तभी भक्त-वत्सल कहलाते ।।१७।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो अट्ठंग-महा-णिमित्त कु-सलाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।
आप पूर्णिमा वाले चन्दा ।
सिन्धु-भविक इक प्रद आनन्दा ।।
न सिर्फ छिन, दिन रात अकेले ।
मेंट रहे पन-पाप अंधेरे ।।१८।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो वि-उव्वण-इड्ढि-पत्ताणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।
दूर उठाना-नजर तुम्हारा ।
मुख हरने वाला अँधियारा ।।
कान्ति मान ही भान दूसरा ।
सौम्य सोम भी मान दूसरा ।।१९।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो विज्जा-हराणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।
देव ! पास तुम जो प्रभाव है ।
उसका औरों में अभाव है ।।
उर-सर भाँति विराजो हंसा ।
कौन सिवा-तुम पूरण मन्शा ।।२०।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो चा-रणाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।
दर्पण जैसा दर्शन तेरा ।
मेंटे पाप कलंक घनेरा ।।
मन पावन क्या आप समाये ।
भर दामन खुशिंयों से जाये ।।२१।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो पण्ण-समणाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।
अद्भुत माँ-बेटे का नाता ।
बड़ी भागशाली वह माता ।।
जिसने जन्म दिया है तुम को ।
तुमने ‘दिया’ दिखाया हम को ।।२२।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो आयास-गामीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।
आप नाम जो सुमरण करते ।
आप शाम वो सु-मरण वरते ।।
पाप घातने भीतर जाऊँ ।
आप भाँत मैं भी-तर जाऊँ ।।२३।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो आसी-विसाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।
बुद्ध, ब्रह्म, क्या विष्णु, महेशा ।
ख्यात नाम अर देश विदेशा ।।
सभी आप गुण तथा नाम हैं ।
सिवा आप क्या चार धाम हैं ।।२४।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो दिट्ठि-वि-साणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।
भर लाया जल-चन्दन झारी ।
धान-शालि-सित, पुष्प पिटारी ।।
चरु ले, दीप, धूप, फल न्यारे ।
करुँ यजन, दुख मैंटो सारे ।।02।।
ॐ क्षां क्षीं क्षूं क्षें क्षैं क्षों क्षौं क्षं क्षः
नमोर्-ऽहते सर्वं रक्ष रक्ष हूं फट् नमः
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
षोडशदल-कमल हृदयस्-थिताय
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय
पूर्णार्घं निर्वपामीति स्वाहा ।।
चतुर्विंशतिदल कमल पूजा
विधान की जय
बुद्ध प्रबुद्ध सु-बुद्धि प्रदाता ।
कृत विधान शिव पन्थ विधाता ।।
शंकर ! कर देते सुखिया हो ।
पुरुषोत्तम, सुनु-मनु मुखिया हो ।।२५।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो उग्ग-तवाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।
विपदा-हरण आप की जय हो ।
जगदा-भरण आप की जय हो ।।
जय हो जय हो त्रिभुवन शरणा ।
जय हो जय हो तारण तरणा ।।२६।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो दित्त-तवाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।
प्रभो आपके सद्-गुण उतने ।
है सागर में जल-कण जितने ।।
दोष कोश हाँ होगा कोई ।
इक निर्दोष जगत् तुम दोई ।।२७।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो तत्त-तवाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।
पुण्य उदय तरु अशोक आया ।
करे घनी तुम ऊपर छाया ।
यथा नाम गुण तथा हुआ है ।
जब से पद जुग आप छुआ है ।।२८।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो महा-तवाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।
मनहर सिंहासन सोने का ।
पार्श्व खचित मणि रत्न अनेका ।।
दल सहस्र तिस ऊपर साजे ।
मुद पद्मासन आप विराजे ।।२९।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो घोर-तवाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।
निर्मल जैसे गंगा धारा ।
चौषठ वैसे चँवरों द्वारा ।।
देवों के मिल अधिपति सारे ।
अर्चन करें, लगा जयकारे ।।३०।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो घोर गुण-परक्-कमाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।
राज त्रिजग इक छत्र प्रमाणा ।
छत्र-त्रय शशि कान्ति समाना ।।
जिन्हें रत्न झालर-कुल घेरे ।
घूम रहे प्रभु ऊपर तेरे ।।३१।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो घोर-गुणाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।
बाजे नभ सुर गभीर भेरी ।
जय जय कार करे इक तेरी ।।
कहे यहाँ शिव नाव खिवैय्या ।
और अभी खाली शिव नैय्या ।।३२।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो ऽघोर-गुण-बंभ-यारीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।
बरसे गन्धोदक गद-हारी ।
बहे पवन धीमी गुण-कारी ।।
दिव्य नव्य पुष्पों की बरसा ।
देख जिसे मन कौन न हरषा ।।३३।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो आमो-सहि-पत्ताणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।
अनगिन सूरज भी जिस आगे ।
लगते फीके-से हत-भागे ।।
रुतवा भा-मण्डल का इतना ।
फिर क्या तन-मण्डल का कहना ।।३४।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो खेल्लो-सहि-पत्ताणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।
नाव स्वर्ग शिव खेने वाली ।
राज हंस मति देने वाली ।।
दिव्य अलौकिक तेरी वाणी ।
सहज जिसे समझें सब प्राणी ।।३५।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो जल्लो-सहि-पत्ताणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।
अवसर तव विहार जब आता ।
दल देवों का कमल बिछाता ।।
अंगुल चार अधर पग धरते ।
रख-‘कर-चार’ नजर पग धरते ।।३६।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो विट्ठो-सहि-पत्ताणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।
विभव आप का अद्भुत जैसा ।
वैभव और न त्रिभुवन वैसा ।।
दिन-तारक में तेज महा जो ।
तारक-गण में तेज कहाँ वो ।।३७।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो सव्वो-सहि-पत्ताणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।
मद हाथी का लगता कँपने ।
‘मनके’ नाम आप बस जपने ।।
कर से फूल माल पहरा के ।
करे नमन गज सूड़ उठा के ।।३८।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो मण-बलीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।
लाल लाल दृग् मानो शोला ।
सुन गर्जन मन दिग्-गज डोला ।।
लख ऐसा सिंह बढ़ते आते ।
भक्त तुम्हारे भय नहिं खाते ।।३९।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो वचि-बलीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।
झपटे जन-धन ग्रास बनाने ।
लपटें लगी गगन बतियाने ।।
पा यूँ आग नाम तुम पानी ।
रुख ले मोड़, छोड़ मनमानी ।।४०।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो काय-बलीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।
खड़ा पूँछ-पे फणा उठाये ।
फुन्कारे भू-गगन डुलाये ।।
सम्मुख नाग भयंकर भारी ।
करे-पार तुम नाम-पुजारी ।।४१।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो खीर-सवीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।
तान भृकुटिंयाँ आँख दिखाये ।
हद उलाँघ बढ़ता ही आये ।।
रण अजेय पर-चक्र पलक में ।
आप भक्त के होता हक में ।।४२।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो सप्पि-सवीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।
शत्रु शक्तिशाली हा ! ज्यादा ।
करने रक्त पात आमादा ।।
भक्त आपका बाजी मारे ।
जोधा देखे दिन में तारे ।।४३।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो महुर-सवीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।
पवन-प्रलय जिसको झकझोरे ।
जहाँ न मच्छ-मगर हैं थोड़े ।।
सागर ऐसा अपरम्पारा ।
ले भुजबल तिर भक्त तुम्हारा ।।४४।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो अमइ-सवीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।
रोग प्राण-लेवा आ कोई ।
आँखें भिंजा रहा हा ! दोई ।।
लेते ही तुम नाम दवाई ।
लेता अपने आप बिदाई ।।४५।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो अक्खीण-महा-णसाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।
नख-शिख बन्धन श्रृंखल वाला ।
छाया तम कारा-गृह काला ।।
नाम आप-भर लेता जाये ।
बाहर कारा आ दिखलाये ।।४६।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो वड्ढमाण-बुद्धि-रिसस्स
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।
ऐसी और और बाधाएँ ।
देख तुम्हें थर-थर कँप जाये ।।
पग उलटे फिर भागें ऐसे ।
देख मोर अहि-काले जैसे ।।४७।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो सव्व-सिद्धा-यद-णाणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।
भक्तामर यह गौरव गाथा ।
कण्ठ इसे भवि जो पधराता ।।
भोग-भोग वो स्वर्गिक सारे ।
करे पहुँच शिव वारे न्यारे ।।४८।।
ॐ ह्रीं अर्हं णमो भयवदो महदि
महावीर वड्ढमाण बुद्धिरिसीणं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।
पूर्णार्घ
जल पावन, वावन चन्दन ले ।
अक्षत अछत, सुमन मोहन ले ।।
चरु ले, दीप, धूप, फल न्यारे ।
करूँ यजन, टक दो जश तारे ।।03।।
श्री वृषभादि वर्धमान पर्यंत
परम-देव भगवन् तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
चतुर्विंशति दल कमल
हृदयस्-थिताय
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय
पूर्णार्घं निर्वपामीति स्वाहा ।।
महा-अर्घं
दोहा
जल मीठा लें चन्दन नीका ।
तण्डुल, गुल-कुल आप सरीखा ।।
चरु ले, दीप-धूप, फल न्यारे ।
करूँ यजन, हित शिरपुर द्वारे ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
नव देव भगवन्
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
अष्ट-चत्वारिंशद्-दलकमल
हृदयस्-थिताय
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय नमः
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।
:: जाप्य ::
।। ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री आदि-नाथ तीर्थंकराय नमः ।।
जयमाला
बाल हो चले बड़े ।
माह छह अचल खड़े ।।
चल हजार-चार इन ।
त्याग तपस्या कठिन ।
जयतु जयतु आदि जिन ।।१।।
प्यास लगी जोर से ।
प्राण कण्ठ में फंसे ।।
दीन पिया जल नदिन ।
त्याग तपस्या कठिन ।
जयतु जयतु आदि जिन ।।२।।
‘योग ओम्’ मुड़ चले ।
रोग रोम जुड़ चले ।।
थमे पास औषधिन ।
त्याग तपस्या कठिन ।
जयतु जयतु आदि जिन ।।३।।
रंग केश उड़ चला ।
सामने खड़ी जरा ।।
चोट सिर, शिला विधिन ।
त्याग तपस्या कठिन ।
जयतु जयतु आदि जिन ।।४।।
याद तिया जुड़ चली ।
भेद जिया बढ़ चली ।।
रात डसे, चुभे दिन ।
त्याग तपस्या कठिन ।
जयतु जयतु आदि जिन ।।५।।
भूख सताने लगी ।
कर्ज मॅंगाने लगी ।।
बीन भखे फल विपिन ।
त्याग तपस्या कठिन ।
जयतु जयतु आदि जिन ।।६।।
रूप लाड़-का शशी ।
लाड़-की हृदय वसी ।।
अश्रु झिर लगी नुछिन ।
त्याग तपस्या कठिन ।
जयतु जयतु आदि जिन ।।७।।
ध्यान मग्न थे भले ।
भेद-ज्ञान चिग चले ।।
सार्थ ‘गुल’ सुगंध बिन ।
त्याग तपस्या कठिन ।
जयतु जयतु आदि जिन ।।८।।
चिन्त-मण मनन श्रुता ।
चिन्त मनस् घुन पता ! ।।
गैल बैल तेलिइन ।
त्याग तपस्या कठिन ।
जयतु जयतु आदि जिन ।।९।।
हाथ क्या ? लगा नया ।
गांठ का चला गया ।।
राम न माया मिलिन ।
त्याग तपस्या कठिन ।
जयतु जयतु आदि जिन ।।१०।।
‘जन्म’ मन तरंग दे ।
कर्म घोर रंग दे ।।
छेड़ चले बिल फणिन ।
त्याग तपस्या कठिन ।
जयतु जयतु आदि जिन ।।११।।
भूल मच्छ तन्दुला ।
पूर्व भोग मन जुड़ा ।।
हा ! मुये अवीचि छिन ।
त्याग तपस्या कठिन ।
जयतु जयतु आदि जिन ।।१२।।
पाठ पढ़ चले नया ।
सार्थ नाम ‘विष-मया’ ।।
‘तम दिया तले’ श्रुतिन ।
त्याग तपस्या कठिन ।
जयतु जयतु आदि जिन ।।१३।।
धुआं धुआं तप जला ।
रुआं रुआं कॅंप चला ।।
सुन निनाद सिंह-करिन ।
त्याग तपस्या कठिन ।
जयतु जयतु आदि जिन ।।१४।।
देह श्वेद-कण सनी ।
धूल जम चली घनी ।।
शगुन अ-स्नान घिन ।
त्याग तपस्या कठिन ।
जयतु जयतु आदि जिन ।।१५।।
बढ़ जुडे संयोग से ।
हो दुखी वियोग से ।।
स्वयं हुये खेद खिन ।
त्याग तपस्या कठिन ।
जयतु जयतु आदि जिन ।।१६।।
भृकुटियां तना गया ।
शत्रु मनस् छा गया ।।
आंख छोड़ती अगिन ।
त्याग तपस्या कठिन ।
जयतु जयतु आदि जिन ।।१७।।
नींद आंख जुग भरी ।
आंख नाक डिग चली ।।
दृगस्-नात अंजुलिन ।
त्याग तपस्या कठिन ।
जयतु जयतु आदि जिन ।।१८।।
वहां राज मद रहा ।
महाराज मद यहां ।।
पांत जा खड़े कुधिन ।
त्याग तपस्या कठिन ।
जयतु जयतु आदि जिन ।।१९।।
दोहा
लोग बड़े, रख लें भले,
बड़े-बड़े अरमान ।
मरण-समाधी का मुझे,
दे दो बस वरदान ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय नमः
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।
श्री सरसुति-मंत्र*
ॐ ह्रीम्
अर्हन् मुख कमल-वासिनि
पा-पात्म क्षयंकरि
श्रुत-ज्ञान
ज्वाला सहस्र प्रज्ज्वलिते
सरस्वति !
मत् पापम् हन हन दह दह
क्षाम् क्षीम् क्षूम् क्षौम् क्षः
क्षीरवर-धवले
अ-मृत संभवे
वम् वम् हूम् फट् स्वाहा
मम सन्-निधि-करणे
मम सन्-निधि-करणे
मम सन्-निधि-करणे ।
ॐ ह्रीं जिन मुखोद्-भूत्यै
श्री सरस्वति-देव्यै
अर्घं निर्वपामीति स्वाहा
शांति पाठ
अथ पौर्वाह-निक (अप-राह-निक)
देव-शास्त्र-गुरु-वन्दना-क्रियायाम्
पूर्वाचार्या-नुक्-क्रमेण,
सकल-कर्मक्-क्षयार्-थम्,
भाव-पूजा-वन्दना-स्तव समेतम्
श्री शांति-भक्ति कायोत्सर्गम् करोम्यहम्
(९ बार णमोकार )
*चौपाई*
दर्शन मात्र मेंटता दुखड़ा ।
भाँत चन्द्रमा सुन्दर मुखड़ा ।।
नासा टिके नैन मनहारी ।
करें वन्दना नाथ ! तुम्हारी ।।१।।
आप चक्रधर-पञ्चम नामी ।
वन्द्य इन्द्र शत, अन्तर्-यामी ।।
प्रभो शान्ति-जिन करके करुणा ।
करो शान्ति ! जश निरखो अपना ।।२।।
छत्र, सिंहासन, वृक्ष-अशोका ।
धुनि, दुन्दुभि, दल-चँवर अनोखा ।।
भा-मण्डल झिर-पुष्प-अनूठी ।
प्रातिहार्य-वसु आप विभूती ।।३।।
अर्चित-जगत् ! शान्ति करतारी ।
ढ़ोक करो स्वीकार हमारी ।।
प्राण-भूत, सत्, जीव समस्ता ।
पायें परिणति शान्त प्रशस्ता ।।४।।
देवों में जो देव बड़े हैं ।
चरणों में हित सेव खड़े हैं ।।
हंस-वंश वे जग उजियारे ।
करें शान्ति मण्डित जग सारे ।।५।।
(निम्न श्लोक को पढ़कर
जल छोड़ना चाहिए)
शान्ति कीजिये गाँव-गाँव में ।
विश्व लीजिये पाँव-छाँव में ।।
डूब ‘साध-जन’ उतरें गहरे ।
लहर लहर-पचरंगा लहरे ।।६।।
नृप धार्मिक बलशाली होवे ।
विकृत-प्रकृत मनमानी खोवे ।।
धर्म-चक्र-जिन सौख्य प्रदाता ।
रहे प्रवाहित यूँ हि विधाता ।।७।।
द्रव्य सुमंगल-कारी होवे ।
क्षेत्र अमंगल-हारी होवे ।।
होवे काल सुमंगल-कारी ।
होवें भाव अमंगल-हारी ।।८।।
कर्मन-घात घात मद सारा ।
सहजो सिद्ध रिद्ध परिवारा ।।
आदि आदि अर्हन् चौबीसा ।
शान्ति प्रदान करें निशि दीसा ।।९।।
*दोहा*
किया शान्ति जिन भक्ति का,
भगवन् कायोत्सर्ग ।।
करूँ दोष आलोचना,
जो प्रद-स्वर्ग-पवर्ग ।।१०।।
*चौपाई*
पाँच सभी कल्याणक धारी ।
आठ प्राति-हारज मन-हारी ।।
अतिशय तीस चार मण्डित हैं ।
अर बत्तीस इन्द्र वन्दित हैं ।।११।।
चौ-विध संघ नखत मानिन्दा ।
राम श्याम चक्री, प्रभु ! चन्दा ।।
‘निलय-विनय’ अन-गिनत गभीरा ।
आद-आद जिन अंतिम वीरा ।।१२।।
अर्चन-पूजन-वन्दन करता ।
उनका मैं अभिनन्दन करता ।।
पीड़ा-दुक्ख-दरद-भय खोवे ।
मेरे कर्मों का क्षय होवे ।।१३।।
रत्नत्रय का मुझे लाभ हो ।
मेरी ‘गति-पंचम-उपाध’ हो ।।
मृत्यु-महोत्सव मना सकूँ मैं ।
जिन-गुण-सम्पद् कमा सकूँ मैं ।।१४।।
अथ पौर्वाह-निक (अप-राह-निक)
देव-शास्त्र-गुरु-वन्दना-क्रियायाम्
पूर्वाचार्या-नुक्-क्रमेण,
सकल-कर्मक्-क्षयार्-थम्,
भाव-पूजा-वन्दना-स्तव समेतम्
श्री समाधि-भक्ति कायोत्सर्गम्
करोम्यहम्
(९बार णमोकार )
*चौपाई*
सदा शास्त्र अभ्यास करूँ मैं ।
सन्त समीप निवास करूँ मैं ।।
मौन धरूँ क्यूँ, गुणी दिखाये ।
गौण करूँ, यूँ दोष-पराये ।।१५।।
भावन-आत्म तत्व, नम-नयना ।
हित-मित रखूँ मधुरतम वयना ।।
जब तक राधा-मुक्ति रिझाऊँ ।
इन्हें जन्म जन्मान्तर पाऊँ ।।१६।।
तारण हारे…शरण सहारे ।
हृदय हमारे…चरण तुम्हारे ।।
चरण तुम्हारे…हृदय हमारा ।
रहे, तलक जब भव-जल-धारा ।।१७।।
स्वर-अक्षर पद मात्रा गलती ।
हुईं, चाहते बिन अनगिनती ।।
हो अपराध क्षमा यह मेरा ।
‘जैसा भी’ मैं अपना तेरा ।।१८।।
*दोहा*
किया समाधी, भक्ति का,
भगवन् कायोत्सर्ग ।।
करूँ दोष आलोचना,
जो प्रद-स्वर्ग-पवर्ग ।।१९।।
*चौपाई*
सम्यक्-दर्शन, सम्यक्-ज्ञाना ।
सम्यक्-चारित, ताना-बाना ।।
रूप अनूप ध्यान परमातम ।
बुद्ध-विशुद्ध ज्ञान धर आतम ।।२०।।
पूजन नित वन्दन करता हूँ ।
अर्चन अभिनन्दन करता हूँ ।।
क्षय होवें दुख संकट सारे ।
क्षय हो जावें कर्म हमारे ।।२१।।
मुझे लाभ रत्नत्रय होवे ।
सुगति गमन, भय-सप्तक खोवे ।।
पाऊँ मरण-समाधी स्वामी ।
बनूँ रतन जिन-गुण आसामी ।।२२।।
‘पुष्पाञ्जलिं क्षिपेत्’
( यहाँ पर नौ बार णमोकार मंत्र
पढ़ना चाहिए )
विसर्जन पाठ
अञ्जन को पार किया ।
चन्दन को तार दिया ।।
नहिं तोर दया का पार ।
नागों का हार किया ।।१।।
धूली-चन्दन-बावन ।
की शूली सिंहासन ।।
धरणेन्द्र देवी-पद्मा ।
मामूली अहि-नागिन ।।२।।
अगनी ‘सर’ नीर किया ।
भगिनी ‘सर’ चीर किया ।।
नहिं तोर दया का पार ।
केशर महावीर किया ।।३।।
बन पड़ीं भूल से भूल ।
कृपया कर दो निर्मूल ।।
बिन कारण तारण हार ।
नहिं तोर दया का पार ।।४।।
दोहा
बस आता, अब धारता,
ईश आशिका सीस ।
कृपा निराकुल आपकी,
बनी रहे निशि-दीस ।।
(पुष्पांजलि क्षिपामि)
आरती
भक्त हम केवल तुम्हारे ।
तुम हृदय रहते हमारे ।।
आरती करता रहूँ मैं,
साँझ ले घृत दीप न्यारे ।
बाबा खोना वाले ! मेरे बाबा खोना वाले ! ।।
आरती पल गरभ पहली ।
रतन बरसा नभ रुपहली ।।
रात पिछली निरखती माँ,
सुपन सोला सार्थ सारे ।
बाबा खोना वाले ! मेरे बाबा खोना वाले ! ।।१।।
आरती पल जनम दूजी ।
बधाई साकेत गूंजी ।।
पात्र शचि इक भवातारी,
मात्र तुम दर्शन सहारे ।
बाबा खोना वाले ! मेरे बाबा खोना वाले ! ।।२।।
आरती पल त्याग तीजी ।
आँख प्राणी-मात्र भींजी ।।
पट उतारे राज-चिन भी,
आन वन धन ! लट उतारे ।।
बाबा खोना वाले ! मेरे बाबा खोना वाले ! ।।३।।
आरती पल ज्ञान चौथी ।
प्रकट बढ़-चन्द्रार्क ज्योती ।।
दिव्य धुन सिंह-हिरण सुनते,
जात-वैर किया किनारे ।
बाबा खोना वाले ! मेरे बाबा खोना वाले ! ।।४।।
आरती पल मोक्ष पंचम ।
नाँचती वधु-मोक्ष छम-छम ।।
जा लगे बस इक समय में,
‘सुख निराकुल पुरम्’ द्वारे ।।
बाबा खोना वाले ! मेरे बाबा खोना वाले !
भक्त हम केवल तुम्हारे ।
तुम हृदय रहते हमारे ।।
आरती करता रहूँ मैं,
साँझ ले घृत दीप न्यारे ।
बाबा खोना वाले ! मेरे बाबा खोना वाले ! ।।५।।
चालीसा
दोहा
ढ़ोक, भेंट ले, कर रहे,
भक्तों का कल्याण ।
खोना अतिशय क्षेत्र के,
आदि नाथ भगवान् ।।
चौपाई
भारत देशा, मध्यप्रदेशा ।
रायसेन इक जिला विशेषा ।।१।।
हंस-बुद्ध नर, नार प्रभावा ।
प्रसिद्ध खोना वाले बाबा ।।२।।
पता नाम यह पड़ा किसलिये ।
मिलती खोई चीज इसलिये ।।३।।
सहज-निराकुल श्री फल लाना ।
बिन मांगे मनचाहा पाना ।।४।।
पता ? कहाँ बैठे हैं बाबा ।
मीठी इमली की है छांवा ।।५।।
उड़ती धूल अंग जा लागी ।
चन्दन बनी, बड़ी बढ़भागी ।।६।।
इन्द्र करे अभिषेक चुमासा ।
रहे सहस-अख भी लख प्यासा ।।७।।
पड़े धूप, तरु बनते छाता ।
पंखा मारुत्-मन्द झलाता ।।८।।
चिड़िया चहक गीत गाती है ।
बगिया महक अगर बाती है ।।९।।
खुद को बड़ा भागवाँ गिनते ।
ताजे-ताजे फुलवा गिरते ।।१०।।
कच्ची पकी इमलिंयाँ अनगिन ।
चढ़ी रहें चरणों में निशदिन ।।११।।
जब तब जन ग्रामीण निकलते ।
रोक-टोक बिन दर्शन मिलते ।।१२।।
छोटे बाबा यहाँ पधारे ।
नहीं अकेले संघ महा ले ।।१३।।
सामायिक से उठ बतलाया ।
स्वानुभवन कुछ हट के पाया ।।१४।।
देर माँगने की बस मन्नत ।
बाबा आतुर देने जन्नत ।।१५।।
यूँ ही लगा न रहता ताँता ।
गुड़ चींटी का अनाद नाता ।।१६।।
आश दरश गुरु-विद्या नामी ।
मुनि भूषण कुल-रत्नन् स्वामी ।।१७।।
जिन संस्कृति संरक्षक न्यारे ।
कर्नाटक से यहाँ पधारे ।।१८।।
देख प्रभू तरु इमली नीचे ।
सिसकी भरते, आँखें मींचे ।।१९।।
जाने तब क्या मन में आया ।
शिल्पी नाम विनोद बुलाया ।।२०।।
युग-चतुर्थ से चूॅंकि यहीं थे ।
नैन-नक्स घिस चुके सभी थे ।।२१।।
शिल्पी देख-परख करता है ।
कमर बाँध आगे बढ़ता है ।।२२।।
कुछ ग्रामीण विपक्ष खड़े थे ।
नव न गढ़े मरती अड़े थे ।।२३।।
स्वप्न रात्रि में उनको आया ।
है यह बाबा की ही माया ।।२४।।
विघ्न न डालो, पुण्य कमालो ।
आपस में हिल-मिल कर चालो ।।२५।।
फिर क्या पलक बिठा निर्ग्रन्था ।
मंजिल दिखी नाप डग पन्था ।।२६।।
मूर्ति सविधि निष्ठापन कीनी ।
शिल्पकार छैनी चल दीनी ।।२७।।
पैनी नजर पारखी ऐसी ।
मूरत गढ़ दी पहले जैसी ।।२८।।
काल जेय मूरत हो अबकी ।
वज्र लेप मन-भावन सब की ।।२९।।
वज्र-लेप चढ़ते ही भाई ।
देह रूपसी और दिखाई ।।३०।।
हुई प्रतिष्ठा धूम-धाम से ।
भक्त जुड़े आ दूर ग्राम से ।।३१।।
जैनी थे, कब बात अजूबा ।
इतर समाज भक्ति में डूबा ।।३२।।
ढ़ोलक, ढ़पली, तुरही बाजी ।
शंख, मजीरा, मुरली साजी ।।३३।।
और अभी अतिशय था बाकी ।
नभ ने गंधोदक वर्षा की ।।३४।।
साफ आसमाँ धूप खिली थी ।
तलक सुदूर न इक बदली थी ।।३५।।
तेज हवा का झोंका आया ।
तरु इमली ने मौका पाया ।।३६।।
टप-टप इमली गिरने लागी ।
माने तरु खुद को बड़भागी ।।३७।।
हुआ चढ़ावा अन्तिम लाना ।
चूँकि बाद अब छप्पर छाना ।।३८।।
कहूँ कहाँ तक छोर न आता ।
शशि हित शिशु पै दौड़ न जाता ।।३९।।
बस वैसी थिति आज हमारी ।
रखी, राखना लाज हमारी ।।४०।।
दोहा
‘सहज निराकुल’ लो बना,
आप मुझे निज भाँत ।
ओ ! खोना बाबा बड़े,
विनय यही नत माथ ।।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं
तुष्टिं पुष्टिं च वर्धनं
श्री आदि-नाथ जिनेन्द्राय नमः
अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।
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