
‘धन्य घड़ी, धन्य भाग’
‘धन्य घड़ी, धन्य भाग’
टूट चली चिर निद्रा,
जुड़ चली अपूर्व जाग ।
चीर घना अंधकार,
एक जग उठा चिराग ।
‘धन्य घड़ी, धन्य भाग’
‘धन्य घड़ी, धन्य भाग’
हाथ लगी कस्तूरी,
दूर दिखी दौड़-भाग ।
यादें अवशेष द्वेष,
चित् खाने चार राग ।
‘धन्य घड़ी, धन्य भाग’
‘धन्य घड़ी, धन्य भाग’
भँवरे-सा पहर-पहर,
पिऊँ स्वानुभव पराग ।
अहा ! साँझ से पहले,
प्रकट हो चला विराग ।
‘धन्य घड़ी, धन्य भाग’
‘धन्य घड़ी, धन्य भाग’
शरण अलौकिक त्रिभुवन चार
होकर आत्म ध्यान लवलीन ।
किये घातिया कर्म विलीन ।।
सत्य अहिंसा धर्म प्रचार ।
नुति भगवत् अरहत शत-बार ।।
शरण अलौकिक त्रिभुवन चार
मिटा कर्म वसु नाम निशान ।
समय एक पहुँचे शिव-थान ।।
लेना और ना अब अवतार ।
नन्त सिद्ध नुति बारम्बार ।।
शरण अलौकिक त्रिभुवन चार
शशि सित, रवि जित, सिन्ध गभीर ।
अवहित मन श्रुत-पादप-कीर ।।
रतन तीन गुण-गण अविकार ।
नुति मुनि मन वच काय सम्हार ।।
शरण अलौकिक त्रिभुवन चार
जिओ और जीने दो गीत ।
केवलि जिन मुखरित संगीत ।।
अमित, अमिट शिव सुख करतार ।
धर्म अहिंसा जय जय कार। ।
शरण अलौकिक त्रिभुवन चार
नव वधु से मुनि पग रखते हैं
खोई निधि पाने मचले हैं
विधि-बन्धन विहँसे निकले हैं ।।
चलें रात-दिन, वैशाखी बिन,
शिव मारग, किस पल थकते हैं ।
नव वधु से मुनि पग रखते हैं
नयन तीर तिय असफल सारे ।
त्राहि-माम् शर सुमन पुकारे ।।
न्यार नार लख भगवत् सत्ता,
भरे वासना कब तकते हैं ।।
नव वधु से मुनि पग रखते हैं
करें न स्वीकृत रञ्च वञ्चना ।
निज निवसे, उलझें प्रपञ्च ना ।।
कलि जुग जनम विजय लख वैरिन,
कम लिखते, ज्यादा लखते हैं ।।
नव वधु से मुनि पग रखते हैं
साधो ! स्वाभिमान मत खोना
कर तर कर मत करना अपना ।
श्वान भाँति मुख पर ना तकना ।।
झाँकी बगलें, बगुले बन के,
निर्जन पुनि ना नैन भिंगोना ।।
साधो ! स्वाभिमान मत खोना
सजन ! अनर्गल वचन न बोलो ।
कुछ कहने से पहले तोलो ।।
उगले विष ऐसे तरुओं के,
बागवान ! पुनि बीज न बोना ।।
साधो ! स्वाभिमान मत खोना
चेहरा आईना ‘रे मन का ।
अपनाया मारग क्यों वन का ।।
प्रश्न स्वयं से कर ये, दिल का,
नित टटोलते रहना कोना ।।
साधो ! स्वाभिमान मत खोना
भव जल का आ गया किनारा
एक समय में छुआ लोक सिर ।
घृत, कब बनता दूध कहो फिर ।।
एक अनेक, मगर अपने में,
दिखे न ऐसा और नजारा ।।
भव जल का आ गया किनारा
पहने मुकुट सितारों वाला ।
पलकें बिछा राह, ले माला ।।
लुप-छुप अव-गुण्ठित घूँघट से,
शिव राधा शिव कन्त निहारा ।।
भव जल का आ गया किनारा
आ सुख अव्याबाध गया कर ।
झट दामन गुण नन्त गया भर ।।
ज्ञान शरीरी सिद्ध अपरिमित,
तिन्हें अपरिमित नमन हमारा ।।
भव जल का आ गया किनारा
पकरे सबर घुरे मुख मिसरी
अरे ! बाबरे, रे ! नव-सीखे ।
फल कब ऋत पहले तरु दीखे ।।
ढ़ोल न सुन, गगरी पे गगरी ।
पकरे सबर घुरे मुख मिसरी ।।
‘रे ये क्या नादानी करता ।
कब नासूर पलक में भरता ।।
रुक उड़ेल मत मरहम सबरी ।
पकरे सबर घुरे मुख मिसरी ।।
‘लीला उसकी’ साँच कही है ।
अंगुलि इशारे नाँच रही है ।।
बेवश बड़ी हाय ! कठपुतली ।
पकरे सबर घुरे मुख मिसरी ।।
मनुआ ‘जय-सन्मत-जय’ कह ले ।
जिस विध राखें तिस-विध रह ले ।।
बह धारा तट लगती लकरी ।
पकरे सबर घुरे मुख मिसरी ।।
समशरण, समशरण, समशरण
बैर भाव छोड़ के
सभी हाथ जोड़ के
बैठे अरहत चरण
समशरण, समशरण, समशरण
अव्रती हुये व्रती
हो व्रती महाव्रती
मेंटें जामन-मरण
समशरण, समशरण, समशरण
मान-थम्भ ज्यों छुआ
मान थम्भ त्यों हुआ
मुस्कुराये पन करण
समशरण, समशरण, समशरण
बैठ पास सींह मृग
कहें टिका आप दृग्
और न तारण तरण
समशरण, समशरण, समशरण
प्रातिहार्य अठ सभी
भूमि, धूप-घट सभी
चित्त का करें हरण
समशरण, समशरण, समशरण
सहस-जिह्वा भले
करने वर्णन चले
कर न सकेगा धरण
समशरण, समशरण, समशरण
यम कब दे दस्तक आया है
बख्तर पहिन खड्ग लो कर में
बाँधे हाथ न बैठो घर में
कौन बिना अभ्यास शत्रु को,
बोलो धूल चटा पाया है
यम कब दे दस्तक आया है
पंछी कहाँ विहँसने वाला
खोल उड़े पिंजरे का ताला
पिंजरा मिला नया पंछी को,
गीत मधुर फिर से गाया है
यम कब दे दस्तक आया है
पी पियूष जग कौन अवतरा
किसे परेशाँ करे ना ‘जरा’
कितना और रहोगे इसमें,
हुई जर-जरित ये काया है
यम कब दे दस्तक आया है
संभलो दिन ढ़लने वाला है
क्षितिज छोर या, है जल स्रोता
आते आते ओझल होता
रुक जाओ ना मृग पैरों में,
पड़ने वाला अब छाला है
संभलो दिन ढ़लने वाला है
झुलस चला लौं लगा पतंगा
पद्म पाँख चिर-निन्द्रित भृंगा
चढ़े, उतरने को कब राजी,
मोह मदिर ऐसी हाला है
संभलो दिन ढ़लने वाला है
साधो ! सिर्फ द्वेष मत छोड़ो
सुनो, राग से भी मुख मोड़ो
शीतल होने पर भी फसलें,
क्या ना जला रहा पाला है
संभलो दिन ढ़लने वाला है
माँ किस-सी मुश्किल कह पाना
दिन भर भान उगलता शोले
दुनिया शशि मृग-लाञ्छन बोले
नखत एक दिन खिर गिर जाना
माँ किस-सी मुश्किल कह पाना
नाम निम्नगा नदिया पाती
ले मुस्कान कली झर जाती
रंग बदल मौसम का आना
माँ किस-सी मुश्किल कह पाना
हा ! पानी सागर का खारा
दिया तले पनपे अंधियारा
सछिद्र मुरली ताना-बाना
माँ किस-सी मुश्किल कह पाना
श्रमण नाम है निश्छलता का
जलज भाँत जग जल रहने का
निर्झर सरित् भाँत बहने का
सुख में सुखी, दुखी ना दुख में,
नित अभिनन्दन अविकलता का
श्रमण नाम है निश्छलता का
सहज बेत से झुक जाने का
विहर गहल मृग रुक जाने का
भ्रमण चतुर्गत अनाद लख के,
निर्मूलन उच्छृंखलता का
श्रमण नाम है निश्छलता का
कूर्म भाँति इन्द्रिय गोपन का
दर्प चक्री तिय गत जोवन का
मान-सरोवर राज-हंस सी,
बाह्य भीतरी उज्ज्वलता का
श्रमण नाम है निश्छलता का
हित चिन्तक निन्दक जग माहीं
आप स्वयं बलखाते चलता
मन, इससे ले सीख संभलता
चल शिक्षक यह एक कहाहिं
हित चिन्तक निन्दक जग माहीं
बोझ आईने का ले घूमे
विहँस कलंक गगन मन झूमे
कौन बागवां इसके घाहिं
हित चिन्तक निन्दक जग माहीं
लिये रबर यह रहे हमेशा
मेरा चित्र बन चला ऐसा
देश-विदेश भाँति इस नाहिं
हित चिन्तक निन्दक जग माहीं
बड़ा यद्पि अपराध हमारा
ठोक-पीट दे हाथ सहारा
बात न गरमा पाई सिराहिं
हित चिन्तक निन्दक जग माहीं
फुरसत कहाँ गैर जो आके
हित अपनों के टोके-टाके
सुन, न इसे कह गैर उलाहिं
हित चिन्तक निन्दक जग माहीं
संभल, गरूर न पैर जमा ले
जल छिन मीन, चीटिंयाँ खातीं
जल बिन, मीन चीटियाँ खातीं
वक्त आज इस, कल उस पाले
संभल, गरूर न पैर जमा ले
सुबह अहा’ रे खिल मुस्कुराते
साँझ-सकारे गुल मुरझाते
दिन फिरते, जुग लगें न ‘लाले’
संभल, गरूर न पैर जमा ले
कीमत कहीं लकड़ियाँ पातीं
भील लड़कियाँ कही जलातीं
रहते समय, गहल विहँसा ले
संभल, गरूर न पैर जमा ले
थका न था करके उजियाला
राहु-केतु मुख बना निवाला
मुदें आँख सब काल छुड़ा ले
संभल, गरूर न पैर जमा ले
पद्म पाँख अलि दे जीवन दे
पद्म पाँख अलि ले जीवन ले
मरण सफल अवीचि बना ले
संभल, गरूर न पैर जमा ले
‘अप्प दीप भव’ पन्थ चालिये’
गुजरा कल कब आने वाला
गुजरा कब, कल आने वाला
तब सँभलेगा, अब संभालिये
‘अप्प दीप भव’ पन्थ चालिये
हो जब पर्वत ऊपर चढ़ना
कब आसान बोझ ले बढ़ना
गद संग्रह संग्रहणी टालिये
‘अप्प दीप भव’ पन्थ चालिये
सः यानी ‘कि वह, अब हारा
कहे खुदबखुद शब्द सहारा
वैशाखी सब हटा डालिये
‘अप्प दीप भव’ पन्थ चालिये
कल रुलाये वो काम न करना
बुने जा रही ताना-बाना
था ये कब मकड़ी ने जाना
फँस इस मुझे एक दिन मरना
कल रुलाये वो काम न करना
अंधों के अंधे होते हैं
दुष्ट भले जब तक सोते हैं
चीर हरण ‘इति-हास’ सिहरना
कल रुलाये वो काम न करना
दूध कहाँ इतना भी मीठा
कहे जमा…ना माँ…सी पीटा
मींच न नैन, खोज ले शरणा
कल रुलाये वो काम न करना
बनो न बेंट कुदाल सहारे
दृग् घड़ियाल सजल कई सारे
वृक्ष बचेगा एक न वरना
कल रुलाये वो काम न करना
काँटे बन रक्षक आते हैं
खबर न लगे, कहर ढ़ाते हैं
लाड़ो ! सँभल-सँभल पग धरना
कल रुलाये वो काम न करना
लो अपना, फिर पंक उछालो
लख भी निरख न छिद्र पाओगे
दोष मढ़े सिर स्वयं जाओगे
सिर्फ नाक से भार हटा लो
लो अपना, फिर पंक उछालो
जो अब तलक न्याय माँगे था
समाधान वो मन माँगेगा
चल ‘पग…ले-उस’ देख जरा लो
लो अपना, फिर पंक उछालो
मनस् सजा-ए-मौत लिखे था
खड़े कटघरे स्वयं दिखेगा
सिक्के और ओर दृग् ला लो
लो अपना, फिर पंक उछालो
लड़ने पल पहले मचले था
लाड़ प्यार करने मचलेगा
दृग् रस्ते दिल उसे बिठा लो
लो अपना, फिर पंक उछालो
जादू नेह है हि कुछ ऐसा
कमी स्वयं की दिखे हमेशा
गीत विश्व-वत्सल आ गा लो
लो अपना, फिर पंक उछालो
दूर न दुख, सुख आस-पास भो
खिलीं खुलीं गुल गुलशन पाँखें
शूल न कम तरेरते आँखें
चुन लो आये भ्रमर रास जो
दूर न दुख, सुख आस-पास भो
सर-मानस मणि-मुक्ता खानी
मछली तो पानी की रानी
हंस चाह जो बना ग्रास लो
दूर न दुख, सुख आस-पास भो
ईख चूमते-गगन, न कम हैं
लहरा रहें फणिन परचम हैं
चाह स्वाति-जल करो श्वास वो
दूर न दुख, सुख आस-पास भो
लहर-लहर गुमराह सिन्धु की
दीप थम्भ भी, छाह इन्दु की
चाह पंछी कर लो प्रवास वो
दूर न दुख, सुख आस-पास भो
चरण न, सन्त छुओ आचरणा
माँझी पा बाछें खिल जाना
कब पर्याप्त नाव मिल जाना
तल-हित जल में पड़े उतरना
चरण न, सन्त छुओ आचरणा
कब काफी सिर हाथ बागबाँ
गर छूने की आश आसमाँ
गहरे माटी पड़े बिखरना
चरण न, सन्त छुओ आचरणा
माटी, कृपा कुम्हार न काफी
दिल्ली दूर, न घट भर हाँपी
अभी परीक्षा-अग्नि बिसर ना
चरण न, सन्त छुओ आचरणा
माना माँ ला देगी दाना
रख मुख भी माँ देगी माना
तुम्हें पड़ेगा मगर निगलना
चरण न, सन्त छुओ आचरणा
धूमिल इक-सा अतीत सबका
और कठिन भी मार्ग न शिव का
चल घुटने बल-ही चल पड़ ना
चरण न, सन्त छुओ आचरणा
सिर्फ सर्प पग सर्प दीखते
धिक् लख बक करतूतें कालीं
कर गन्दला मुख दी जो गालीं
बुध ! ये वचन न तुम्हें ठीक थे
सिर्फ सर्प पग सर्प दीखते
धुला दूध का कौन यहाँ है
धुंधला धुंध न कोन यहाँ है
तुम कब कल चल रहे लीक थे
सिर्फ सर्प पग सर्प दीखते
तलहट से देखा पर्वत को
पर्वत से देखा तलहट को
दिखे नजारे कब सटीक थे
सिर्फ सर्प पग सर्प दीखते
होगी कुछ उसकी मजबूरी
श्रृद्धा कब सब पास सबूरी
सभी कखहरा यहाँ सीखते
सिर्फ सर्प पग सर्प दीखते
ठोकर जिन पैरों ने खाई
पीर समझ गैरों की पाई
देखो पंकज पंक पीकते
सिर्फ सर्प पग सर्प दीखते
माँ रहती है साथ हमारे
बला न इतना भी इतराओ
भला, लौट पग उलटे जाओ
वरना दिन दीखेगे तारे
माँ रहती है साथ हमारे
माटी छुऊँ बन चले सोना
हाथ लग चला जादू टोना,
पुण्य पूर्व कृत पाँव पसारे
माँ रहती हैं साथ हमारे
चाँद उतर आये उस आँगन
टक सितार चालें उस दामन
बढ़ क्या इससे स्वर्ग नजारे
माँ रहती है हमारे साथ
दुनिया बुरी, भली भी दुनिया
छीन जिन्दगानी ले पानी
बहुत जरूरी जीने पानी
रूठी, मिली-जुली भी दुनिया
दुनिया बुरी, भली भी दुनिया
मुख ‘कण्टक’ इक आह निकाले
संकट हर इक वाह निकाले
कण्टक, खिली कली भी दुनिया
दुनिया बुरी, भली भी दुनिया
रक्षक दाँत वही इक म्याऊँ
भक्षक दाँत वही इक म्याऊँ
बन्द किताब, खुली भी दुनिया
दुनिया बुरी, भली भी दुनिया
बिन्दु स्वाति इक वंशा मोती
इक भुजंग मुख ध्वंसा होती
उधड़ी हुई, सिली भी दुनिया
दुनिया बुरी, भली भी दुनिया
चाले सुख ‘गाड़ी झुक-झुक सी’
घड़ी चले दुख में रुक-रुक सी
धूमिल, दूध-धुली भी दुनिया
दुनिया बुरी, भली भी दुनिया
आसाँ समझ न पाना माँ को
माँ जिराफ दे जन्म धकेले
शिशु उठ जब-तक साथ न खेले
पड़े ‘जि’ वज्र बनाना माँ को
आसाँ समझ न पाना माँ को
माँ म्याऊँ शिशु दाँत दबाया
देख कहे जग कलिजुग आया
पड़े ‘मुँ’ गोद बनाना माँ को
आसाँ समझ न पाना माँ को
माँ नागिन कब भूखी इतनी
कल जाने जाँ ले ये कितनी
ममता पड़े लजाना माँ को
आसाँ समझ न पाना माँ को
माँ कपि शिशु जाँ पड़ी गवानी
ऊपर नाक देख के पानी
बच्चे और रखाना माँ को
आसाँ समझ न पाना माँ को
माँ चिड़िया ना लाई दाना
हो जो चुका पंख का आना
भरना पेट सिखाना माँ को
आसाँ समझ न पाना माँ को
जागो मन, क्या साधु न होना
देता दंश नाग अनगणना
पर छू-मन्तर चिढ़ना, कुड़ना
तब रीझी चन्दन छव सोना
जागो मन, क्या साधु न होना
पत्थर बरसा रहा जमाना
ले मीठे फल उसे खिलाना
आओ तरु से कुछ सीखो ना
जागो मन, क्या साधु न होना
छाती भूम चीर दी गहरी
फूटी धारा माफिक मिसरी
सरल न परहित आँख भिंगोना
जागो मन, क्या साधु न होना
छीन साँप ने लिया घरौंदा
मुँह दाबा फिर माटी लौंदा
दीमक ने तज रोना धोना
जागो मन, क्या साधु न होना
हाथी घोड़ा चढ़े पालकी
सकुचा अंग, न आँख लाल की
कछु…आ पास न जादू टोना
जागो मन, क्या साधु न होना
अब तो फतह सुनिश्चित साथी
मौन कुदाल प्रहार सहे है
पैर प्रहार सहे न कहे है
देती अग्नि परीक्षा माटी
अब तो फतह सुनिश्चित साथी
छूना गगन लिये ये सपना
मिला बजूद खाक ‘कण’ अपना
झाँका चीर भूमि की छाती
अब तो फतह सुनिश्चित साथी
खिला दही मिश्री माँ दीना
बिदा तोड़ तिनके है कीना
लिये कलश पनहारिन आती
अब तो फतह सुनिश्चित साथी
पल मरणा-वीचिन् जग बीते
पर दुख कातर दृग् जुग तीते
उपनय खड़े, मृत्यु पढ़ पाती
अब तो फतह सुनिश्चित साथी
दुनिया माया जाल सरीखी
यहाँ टाँग सब खींच रहे हैं
सभी हाथ में कीच लिये हैं
दुनिया मिर्च संभलना तीखी
दुनिया माया जाल सरीखी
आँखों में घड़ियाली आँसू
जुबां-कर्ण ‘पल-पृष्ठ’ पिपासू
दुनिया दूर ढ़ोल सी नीकी
दुनिया माया जाल सरीखी
यहाँ सभी पिछलग बगुले के
चित सकुचित पौधे गमले के
दुनिया ऋत पतझड़ वत् फीकी
दुनिया माया जाल सरीखी
गिदगदान गुर रखने वाले
दूध धुले तन मन विष प्याले
दुनिया भिड़ा लड़ाना सीखी
दुनिया माया जाल सरीखी
आ मन के झाँसे मत जाना
भोजन कहो जरूरी जितना
गज ! कब भोग जरूरी उतना
छोड़ो ना क्या छल अपनाना
आ मन के झाँसे मत जाना
जिह्वा ले चुटकी ले मीना
खेल जुआ, कब पार सफीना
सार्थ सुरक्षित ‘सफर’ सुहाना
आ मन के झाँसे मत जाना
सुनो ! भ्रमर कुछ कहती नासा
आशा तब तक, जब तक श्वासा
कहो, तुम्हें क्या श्वास गवाना
आ मन के झाँसे मत जाना
माना जीवन दीप तिहारा
तू भी उसे बता क्या प्यारा
पता न गर, फिर क्यों दीवाना
आ मन के झाँसे मत जाना
लगे न मृग, कोकिल सुर लहरी
छल तो नहीं, देख बन पहरी
जाल रहे छुप, दीखे दाना
आ मन के झाँसे मत जाना
किसे न पुल तारीफ बँधाना
सुधी ! सूर्य का मुख जिस तरफी
सूर्य-मुखी का मुख तिस तरफी
चाहे हटके रंग जमाना
किसे न पुल तारीफ बँधाना
देख आम-वन बौरें आईं
कोकिल कुछ-कुछ सी बौराईं
लुभा चला मन मानस गाना
किसे न पुल तारीफ बँधाना
तोता राम ज्योतिषी खासे
राम-राम रटते रसना से
ये कुछ हटके जग ने जाना
किसे न पुल तारीफ बँधाना
छीना-झपटी छोड़-छाड़ के
श्वान खड़ा जिह्वा निकाल के
दुम लहरा चाहे नजराना
किसे न पुल तारीफ बँधाना
रंग बिरंगी प्रकृति समूची
पर-हित रही बिखेर विभूती
सिर्फ खुराख न आबोदाना
किसे न पुल तारीफ बँधाना
मन को कर आगे मत चलना
पेट भले आकण्ठ भरा था
आस-पास मल दिखो जरा क्या
हो जाता मन श्वान मचलना
मन को कर आगे मत चलना
चंचल यूँहि, पिये कपि हाला
बिच्छू डसा, हुआ मतवाला
मन उससे भी चपल, संभलना
मन को कर आगे मत चलना
तुला मँगाया, मँहगा वाला
रखा एक, दूजा भग चाला
कठिन बड़ा मेंढक तुल सकना
मन को कर आगे मत चलना
साधो ! आप गिरेबां झाको
वह कर्मों का हाय ! सताया
भला बुरा क्या जान न पाया
नहीं किसी को टोको-टाँको
साधो ! आप गिरेबां झाको
जिसके पास बुद्धि है जितनी
सुलझाये वह उलझन उतनी
दृग् न किसी पे रोको-राखो
साधो ! आप गिरेबां झाको
छुपी किसी मुट्ठी मिट्टी है
गई किसी की खुल मुट्ठी है
आप पड़ी क्या ? बा को-ताँको
साधो ! आप गिरेबां झाको
अच्छे समय मजाक लतीफा
गर्दिश बने लतीफा तीखा
नहीं किसी को ओछा आको
साधो ! आप गिरेबां झाको
आओ, आ आपे में जाओ
चोला हंस, काम बगुले के
और भले न, मन तो देखे
अपनी कौम सींह न लजाओ
आओ, आ आपे में जाओ
सिंह मारे गज, भखे जमा…ना
ऐसा भी क्या पाप कमाना
चादर लाँघ न पैर बढ़ाओ
आओ, आ आपे में जाओ
दे मद रहे हृदय क्यों कोना
सब पाकर जब इक दिन खोना
गीत वत्स-गो वत्सल गाओ
आओ, आ आपे में जाओ
बना मील पत्थर सिरहाना
मान मुकाम न मग सुस्ताना
सिसके प्रिया न उसे भुलाओ
आओ, आ आपे में जाओ
सुनो क्रोध धोखे की टाटी
श्वान भाँति न भूसो लाठी
मान कर्म भव पूर्व सिराओ
आओ, आ आपे में जाओ
शत्रु न मन, मन ! मित्र हमारा
पास न दीप ज्योति मन थाती
ठुकरा नेह शलभ झुलसाती
जगत् हँसे यह देख नजारा
शत्रु न मन, मन ! मित्र हमारा
अहि ने आ घर पैर जमाये
मन बिन दीमक कर क्या पाये
ढ़ुलका चली मोति दृग् धारा
शत्रु न मन, मन ! मित्र हमारा
भेद कमल की पाँख न पाता
लकड़ी में सुराख कर जाता
मिला न मन का चूँकि सहारा
शत्रु न मन, मन ! मित्र हमारा
कान पकड़ते रहना मन के
लगे डाट नभ शिष्य दिखाये
लगे डाँट तट नौका आये
पटल परसने नभ आँगन के
कान पकड़ते रहना मन के
लगे चोट हो माटी मटकी
लगे चोट चढ़ती भ्रू भट की
हेत स्रोत सुख चैन अमन के
कान पकड़ते रहना मन के
लगे लगाम अश्व न मचले
लगे लगाम जुबां न फिसले
अनुचर बन रहने माहन के
कान पकड़ते रहना मन के
झकझोरे फल दे तरु मीठे
पीटे दे मृदंग सुर मीठे
रुदन विहँसने निर्जन वन के
कान पकड़ते रहना मन के
बरसे घन छाये खुशहाली
बरसे धन ! मन चले दिवाली
मालिक होने समता धन के
कान पकड़ते रहना मन के
साधु न आसाँ आत्म झलकना
विरद विदिश्-दिश यूँहि न गमके
पुष्प तोड़ लाने सा खम् के
घिस चन्दन सा पड़े महकना
साधु न आसाँ आत्म झलकना
चार चाँद लग यूँहि न जाते
नादाँ जब पत्थर बरसाते
दे तरु-से फल, पड़े हरखना
साधु न आसाँ आत्म झलकना
आश आसमां यूँहि न सीझे
आँचल कोर बिन्दु श्रम भींजे
अरुक सरित् सा पड़े सरकना
साधु न आसाँ आत्म झलकना
वाह-वाह जग यूँहि न होती
मेहनत भागीरथ भी ओछी
बेंत भाँत झुक पड़े बरकना
साधु न आसाँ आत्म झलकना
कोहनूर मिल यूँहि न जाये
भले लौट फिर बचपन आये
पर-हित भू सा पड़े दरकना
साधु न आसाँ आत्म झलकना
हरगिज़ निज हिम्मत न हारना
राम-सेतु पल एक गिलहरी
कर गगरी निज देह रूपहली
सुखा रही सागर ! निहार ना
हरगिज़ निज हिम्मत न हारना
ले चीनी चींटी है चढ़ती
गिर उठ फिर के आगे बढ़ती
पा मंजिल जाती, विसार ना
हरगिज़ निज हिम्मत न हारना
पिय-पिय कह चातक नभ ताँके
अमृत सुलभ भी बिन्दु चाखे
स्वाति प्रणय ‘पाती’ नकार ना
हरगिज़ निज हिम्मत न हारना
हाथ दुकाँ मणि-माणिक लागी
दौड़-धूप मल रही हाथ है
हाट शोरगुल विनत माथ है
चिन्ता फिकर पलट पग भागी
हाथ दुकाँ मणि-माणिक लागी
पीछा मोल-भाव से छूटा
नगदी का व्यापार अनूठा
आप हो चला जग अनुरागी
हाथ दुकाँ मणि-माणिक लागी
धोखा-धड़ी धुने सिर अपना
मौका घड़ी घड़ी वर सपना
थे हतभागी, अब बड़भागी
हाथ दुकाँ मणि-माणिक लागी
चैनो-अमन करे अठखेली
सर-मानस पवमान सहेली
कहाँ पहेली ? परणति जागी
हाथ दुकाँ मणि-माणिक लागी
आमद हासिल क्षितिज छोर सी
परसित गगन पतंग डोर सी
बोलें मुड़ेर कागा-कागी
हाथ दुकाँ मणि-माणिक लागी
मर न मरण से पहले जाना
माँगी मिन्नत दर-दर जा के
रत्न मिला, क्यों खोते पा के
क्या फिर जोन भटकना नाना
मर न मरण से पहले जाना
भव-भव भोगे भोग अनेका
क्यों तक रहे बिन्दु-मधु एका
क्या प्रण कूख, हुआ विसराना
मर न मरण से पहले जाना
रहें अंगीठी, जिये अँगारा
खो बजूद दे जिद का मारा
नेह न अपनों का ठुकराना
मर न मरण से पहले जाना
सभी चल रहे घुटने के बल
लेख-देख गंदले सबके कल
हँसना, हँसी न कभी उड़ाना
मर न मरण से पहले जाना
और कोई नहीं मटकी,
है वही पद दलित माटी ।
नहीं घाटी हुई नाटी,
सिर्फ खाई गई पाटी ।।
करना नहीं है वार, उसका-
वार बस नाकाम करना ।
भाँति कछुये के छिपा के,
अंग सब आराम करना ।।
भूत, भावी, वर्तमाँ गुरु,
पञ्च जिस-जिस थान संस्थित,
शाम अपनी तीन उनके,
बिना-कारण नाम करना ।।
हो भले घनघोर अंधर,
उठाना ना हाथ लाठी,
तेल मीठा डाल बाती,
जगाना बस दीप साथी ।
और कोई नहीं मटकी,
है वही पद दलित माटी ।
नहीं घाटी हुई नाटी,
सिर्फ खाई गई पाटी ।।
पड़ा रहने नीर देना,
हंस सा पी क्षीर लेना ।
नहीं देना पीर-पर, पर-
बने अपहर पीर लेना ।।
कर्म जड़ क्या दोष इनका,
बपे हमनें बीज थे कल,
चुकाने में कर्ज, करना-
हर्ज क्या, धर धीर लेना ।।
सिर्फ गिरना हारना कब,
जब खड़े फिर कमर बाँधे,
भले नाटी, चढ़ ना जाती,
कहो ? चींटी शिखर घाटी ।।
और कोई नहीं मटकी,
है वही पद दलित माटी ।
नहीं घाटी हुई नाटी,
सिर्फ खाई गई पाटी ।।
स्वार्थ बिन कर नाम आना,
खुशी औरन ‘रे सरित सी ।
बन सके करना मदद,
निःसंग बन, जितनी मरुत सी ।।
प्रकृति सारी देख लो ना,
छल बिना दे बार जीवन ।
जहर होंठों से लगा,
मुस्कान लौटाना अमृत सी ।।
गहल वानर, श्वान, नाहर,
मीन, मृग, गज, कीर विसरा,
तीर पाने वृषभ तेली,
बन न कसना आँख पाटी ।।
और कोई नहीं मटकी,
है वही पद दलित माटी ।
नहीं घाटी हुई नाटी,
सिर्फ खाई गई पाटी ।।
‘कहाँ’ सीखा अहो श्रीजी,
शत्रु भी कर मित्र लेना ।
लगा ताताँ, कहाँ सीखा,
चुरा सबका चित्त लेना ।।
पास बैठे जात बैरी,
परस्पर गल बाँह डाले ।
हंस से मन हो चले हैं,
जो रहे पल पूर्व काले ।
दश न बस हो चले थे भव,
पड़ चले ‘के पोर कमती,
मिट चले कैसे ? न जाने,
झलकते लहु हृदय छाले ।।
शब्द नफरत सार्थ न…फरत,
नाम पाया पास आके ।
सभी खेते नाव पानी,
कहाँ सीखा रेत खेना ।।
‘कहाँ’ सीखा अहो श्रीजी,
शत्रु भी कर मित्र लेना ।
लगा ताताँ, कहाँ सीखा,
चुरा सबका चित्त लेना ।।
विभव सब, छू रहे ‘पर’ कब,
उठ चले ऊपर गजब है ।
फूल फल युगपत् सभी ऋत,
उग चले भू पर गजब है ।।
वर्ष अठ अन्तर्-मुहूरत,
अधिक असमय वृद्ध जनहित,
माल ले वधु मुक्ति थित,
पहने मुकुट नूपुर गजब है ।।
छलकती झोली सभी की,
दिख रही मुख तक भरी जो,
कहाँ सीखा बिना स्वारथ,
आप निधिंयॉं लुटा आना ।।
‘कहाँ’ सीखा अहो श्रीजी,
शत्रु भी कर मित्र लेना ।
लगा ताताँ, कहाँ सीखा,
चुरा सबका चित्त लेना ।।
चार दिश् दिख रहा मुख इक,
जिसे लख दृग् चकित साथी ।
इन्द्र नेत्र हजार भी लख,
कब हुआ दृग् थकित साथी ।।
निरख मानस्तम्भ विगलित,
हो चला मद, कब छुपा है,
दिखा कब मिथ्या तिमिर, मन-
ज्यों हुआ ‘दृग्’ सहित साथी ।।
दिखा भा-मंडल रहा भव,
सुलट तो भवि ! जा किसी विध ।
कहाँ सीखा पीर-पर पल
बना लेना सजल नैना ।।
‘कहाँ’ सीखा अहो श्रीजी,
शत्रु भी कर मित्र लेना ।
लगा ताताँ, कहाँ सीखा,
चुरा सबका चित्त लेना ।।
थाम लीजे ‘अर’ हमारा,
‘कर’, कहीं हम गिर ना जायें ।
सिखा दीजे व्यूह भेदन,
प्रभु ! कहीं हम घिर ना जायें ।।
जन्म जन्मान्तर संजोया,
पुण्य फल नर जन्म पाया ।
यहाँ विषयों की मदिर कुछ,
अलग ही छा रही माया ।।
भाँत मर्कट पूर्व ही मन,
और ये हा ! मदिर हाला,
कर्म बीछू डसा मुझको,
देख नटवर भी लजाया ।।
धन्य ! जो तुमने बचा के,
उड़ा दिग् के दिये अम्बर,
पे कठिन चलना खडग खर,
धार शिशु हम लड़खड़ायें ।
थाम लीजे ‘अर’ हमारा,
‘कर’, कहीं हम गिर ना जायें ।
सिखा दीजे व्यूह भेदन,
प्रभु ! कहीं हम घिर ना जायें ।।
कह रहे गुरु आठ-दश-दश,
प्रश्न हल करना सभी ही ।
कहाँ पूरक परीक्षा,
आलस नहीं करना कभी भी ।।
भूल कर भी आज कारज,
काल पे मत डाल देना,
कमर कसना मुझे कारज,
आज का करना अभी जी ।।
सामने गुरुदेव के सिर,
डुलायें कठपुतलियों से,
बचा के हा ! नजर फिरके,
श्वान सा मल खोज लायें ।।
थाम लीजे ‘अर’ हमारा,
‘कर’, कहीं हम गिर ना जायें ।
सिखा दीजे व्यूह भेदन,
प्रभु ! कहीं हम घिर ना जायें ।।
सहारे घुटने खिसकते,
आ पड़ाव गया अखीरी ।
झोंक जीवन ज्ञान हवि कुछ,
हाथ लग पाई अमीरी ।।
मरण आवीचि पलक,
जागृत रहे वा-उम्र फिर भी,
कह रहा मन, बार इस फिर,
लजा ना जाये फकीरी ।।
ढ़ेर पीछी कमण्डल का,
लग चला जिनवाण कहती,
पीस निशिभर, बार इस फिर,
हा ! न पारे में उठायें ।।
थाम लीजे ‘अर’ हमारा,
‘कर’, कहीं हम गिर ना जायें ।
सिखा दीजे व्यूह भेदन,
प्रभु ! कहीं हम घिर ना जायें ।।
काया पड़ी यहीं रहनी
माया साथ नहीं चलनी
बोलता रहता काहे झूठ
बोल ‘ना’ करता काहे लूट
यहीं की साथी बस दमड़ी
माया साथ नहीं चलनी
नाक पे रखता काहे रोष
आँख में रखता काहे दोष
यहीं की साथी बस रमणी
जाया साथ नहीं चलनी
है सराय कहता काहे गेह
सँवारा करता काहे देह
यही की साथी बस चमड़ी
ले भी लो हाथ सुमरणी
काया पड़ी यहीं रहनी
माया साथ नहीं चलनी
मतलबी सिर पहने ताज है
काया बड़ी धोखेबाज है
अमृत भी भर के रक्खो घड़े
कभी भूल से जो गिर पड़े
फूटे, करे भी न आवाज है
काया बड़ी धोखेबाज है
मतलबी सिर पहने ताज है
तर भले दाने-अनार गला
पिंजरा तोते को खुला क्या मिला
उड़े, जा शून छेड़े साज है
काया बड़ी धोखेबाज है
मतलबी सिर पहने ताज है
दिया सोने का बाती कपूर
पल जिया, ये क्या ज्योति काफूर
लगा के हवा के परवाज है
काया बड़ी धोखेबाज है
मतलबी सिर पहने ताज है
काया बड़ी धोखेबाज है.
सिद्धों के कुल में आता
मैं ज्ञाता-दृष्टा कहाता
तन मृणमय
मैं चिन्मय
मेरा जड़ से क्या नाता
मैं ज्ञाता-दृष्टा कहाता
सिद्धों के कुल में आता
तन गलता
तन जलता
तन मरता
अमरता
मुझे वरदान विधाता
मैं ज्ञाता-दृष्टा कहाता
सिद्धों के कुल में आता
न शगुन साँ !
घुन जैसा
धन-पैसा
औगुन नशा
मुझे मदहोश बनाता
मैं ज्ञाता-दृष्टा कहाता
सिद्धों के कुल में आता
रख तैयारी
कल अपनी भी बारी
पीला पत्ता झर गया
साँझ मुर्झा गुल गया
फल पका न टिका डाली
कल अपनी भी बारी
रख तैयारी
टूट तारा गिर गया
साँझ सूरज ढ़ल गया
बस अमर नाम के खाली
कल अपनी भी बारी
रख तैयारी
पंछी रात्रि रुक, गया
तेल बाती चुक गया
रही मनने से दीवाली
कल अपनी भी बारी
रख तैयारी
रहे न मैली , परणति मेरी
रहे न मैली ।
परणति मेरी ।।
और कुछ भी न चाहूँ मैं ।
सर समयसार अवगाहूँ मैं ।।
धोकर हाथ पड़ा है पीछे ।
अपनी और मुझे है खींचे ।।
मुँह की खाये अबकी वैरी ।
रहे न मैली ।
परणति मेरी ।।
और कुछ भी न चाहूँ मैं ।
छीने राग-द्वेष ने सपने ।
मोह रँगा लेता रॅंग अपने ।।
बदले दिन में रात अँधेरी ।
रहे न मैली ।
परणति मेरी ।।
और कुछ भी न चाहूँ मैं ।
स्वानुभवन हो स्वानुभूति हो ।
दर्शन, ज्ञान, चरित विभूति हो ।।
रहे न भीतर डूब पहेली
रहे न मैली ।
परणति मेरी ।।
और कुछ भी न चाहूँ मैं ।
सर समयसार अवगाहूँ मैं ।।
पुद्-गल कर्म प्रदेशों में ठहरा हूँ ।
हाय ! मैं कब गहरे उतरा हूँ ।।
क्यूँ न कहलाऊँ ।
मूढ़ मत कहलाऊँगा ।।
क्यूँ न कहलाऊँ ।
भूल रत कहलाऊँगा ।।
मूढ़ मत कहलाऊँगा ।।
लगाये चेहरे पे चेहरा हूँ ।
हाय ! मैं कब गहरे उतरा हूँ ।।
पुद्-गल कर्म प्रदेशों में ठहरा हूँ ।
हाय ! मैं कब गहरे उतरा हूँ ।।
क्यूँ न कहलाऊँ ।
जड़ बुद्ध कहलाऊँगा ।।
क्यूँ न कहलाऊँ ।
अति-गृद्ध कहलाऊँगा ।।
जड़ बुद्ध कहलाऊँगा ।।
बदलने औरों को निकला हूँ ।
लगाये चेहरे पे चेहरा हूँ ।
हाय ! मैं कब गहरे उतरा हूँ ।।
पुद्-गल कर्म प्रदेशों में ठहरा हूँ ।
हाय ! मैं कब गहरे उतरा हूँ ।।
सच
‘पुद्-गल कर्म प्रदेशों में ठहरा,
हा ! गया ठगा’
बन्ध के लिये न कहीं सन्ध है ।
एकत्व में आनन्द ही आनन्द है ।।
सत्यम् शिवम् सुन्दरम् ।
कोई ।
जहाँ दोई ।।
जो सत्यम् शिवम् सुन्दरम् ।
तो एकत्व है ।
न विसंवाद है, न द्वन्द है ।
एकत्व में आनन्द ही आनन्द है ।।
बन्ध के लिये न कहीं सन्ध है ।
एकत्व में आनन्द ही आनन्द है ।।
गदगद हृदय नैन नम ।
कोई ।
जहाँ दोई ।।
जो गदगद हृदय नैन नम ।
तो एकत्व है
स्वर्ण आत्म अनुभवन सुगंध है ।
न विसंवाद है, न द्वन्द है ।
एकत्व में आनन्द ही आनन्द है ।।
बन्ध के लिये न कहीं सन्ध है ।
एकत्व में आनन्द ही आनन्द है ।।
सच
‘खोजा बाहर
क्या सत्, शिव, सुन्दर ?
पाया अन्दर’
भाव ज्ञायक तूलिका ले,
चित्र लिखना मुझे अपना ।
चित्र खींचा और का हा !
स्वानुभूत विभूत सपना ।।
रहे पनदश जो प्रमादा,
रूप वह मेरा नहीं है ।
कहे पनदश निज प्रमादा,
कूप मण्डूका वही है ।।
कहो मैं कैसा ? सुनो तो,
एक ज्ञायक शुद्ध-बुद्धा ।
निराकुल मैं, निरा-कुल मैं,
ज्ञान-घन चिन्मय प्रसिद्धा ।।
भाव जो अप्रमत्त चर्चित,
रूप वह मेरा नहीं है ।
जो कहे अप्रमत्त हूँ मैं,
कूप मण्डूका वही है ।।
देह मृणमय विनाशी है,
और मैं अविनाश साधो !
हेत मंगल चलो करते,
‘जय-निजातम’ मन्त्र जपना ।
चित्र खींचा और का हा !
स्वानुभूत विभूत सपना ।।
सच
‘साधो !
एक ज्ञायक सिवाय
औ’ गुण कहाय’
फीका ना व्यवहार ।
नासा भार उतार ।
उठा न लाठी ।
प्रकटा बाती ।।
क्षण भंगुर अँधियार ।
फीका ना व्यवहार ।।
साधक, श्रद्धा चारित ज्ञाना ।
नय व्यवहार न कम गुणवाना ।।
हाथ ताँव सोला जब लौं ना ।
भुला ताँव पन्द्रादिक दो ना ।
सुन लो बाल सुनार ।
फीका ना व्यवहार ।।
परम भाव दर्शी, व्रति, ज्ञानी ।
स्वर्ण शुद्ध नय सोला-वानी ।।
भुला ताँव पन्द्रादिक दो ना ।
हाथ ताँव सोला अब लो ना ।।
चुन लो बाल सुनार ।
फीका ना व्यवहार ।।
नव सीखा लेय सहारा ।
सम्मत सन्मत व्यवहारा ।।
पर द्रव्य अछूता मैं ।
चिन्मात्र अनूठा मैं ।।
बह चलूँ न क्यूँ शुध धारा ।
सम्मत सन्मत व्यवहारा ।
नव सीखा लेय सहारा ।।
गतराग अनोखा मैं ।
निम्मम निम्मोहा मैं ।।
मैं केवल जाननहारा ।
सम्मत सन्मत व्यवहारा ।
नव सीखा लेय सहारा ।।
निस्संग निराला मैं ।
मति हंस मराला मैं ।।
शुध रत्नत्रयी पिटारा ।
सम्मत सन्मत व्यवहारा ।
नव सीखा लेय सहारा ।।
नव तत्त्वों में रहती है ।
आत्म ज्योति वह ।
चुन नय शुद्ध प्रकटती है ।।
आत्म ज्योति वह ।
वर्ण वर्ण आ मिल चाले ।
दिये ताव सोला न्यारे ।
हाथ स्वर्ण निध होती वह
आत्म ज्योति वह ।
नव तत्त्वों में रहती है ।
आत्म ज्योति वह ।
चुन नय शुद्ध प्रकटती है ।।
अन्य द्रव्य से भिन्न सदा ।
तद् नैमित्तिक भाव जुदा ।
आद अनाद बपौती वह
आत्म ज्योति वह ।
नव तत्त्वों में रहती है ।
आत्म ज्योति वह ।
चुन नय शुद्ध प्रकटती है ।।
चिच्-चैतन्य चमत्कारी ।
पर्यय-पर्यय बलिहारी ।।
एक स्वरूप अनोखी वह
आत्म ज्योति वह ।
नव तत्त्वों में रहती है ।
आत्म ज्योति वह ।
चुन नय शुद्ध प्रकटती है ।।
भेद नाश के ।
जो भी अनुभवे ।।
तेज पुंज आत्मा
नत विनत नय रमा ।
तेज पुंज आत्मा नमो नमः ।।
नमो नमः, नमो नमः, नमो नमः ।
तेज पुंज आत्मा नमो नमः ।।
निक्षेप अवसान ।
अस्त लो प्रमाण ।।
लो छुआ आसमाँ ।
नत विनत नय रमा ।
लो छुआ आसमाँ ।
तेज पुंज आत्मा नमो नमः ।।
नमो नमः, नमो नमः, नमो नमः ।
तेज पुंज आत्मा नमो नमः ।।
क्या बताये हम ।
द्वैत भाव गुम ।।
‘रे न जाने कहाँ ।
नत विनत नय रमा ।
लो छुआ आसमाँ ।
तेज पुंज आत्मा नमो नमः ।।
नमो नमः, नमो नमः, नमो नमः ।
तेज पुंज आत्मा नमो नमः ।।
पर भाव भिन्न ।
निजात्म अनन्य ।।
विगत संकल्प ।
आत्म निर्विकल्प ।।
चुनो चनो, चुनो चुनो, चुनो चुनो ।
सुनो सुनो, सुनो सुनो, सुनो सुनो ।।
है शुद्ध नय वो ।
निज स्वभाव का दे परिचय जो ।।
है शुद्ध नय वो ।
विमुक्त आद्यन्त ।
निजात्म सुगन्ध ।।
आपूर्ण एक ।
निजात्म, सुलेख ।।
चुनो चनो, चुनो चुनो, चुनो चुनो ।
सुनो सुनो, सुनो सुनो, सुनो सुनो ।।
है शुद्ध नय वो ।
निज स्वभाव का दे परिचय जो ।।
है शुद्ध नय वो ।a
स्वानुभव गम ।
सत्यं शिवं सुन्दरम् ।।
अतिशय महिमावान ।
वो भगवान् ।
जो भीतर विराजमान ।
हटात् प्रकटा ।।
विद्रूप, मिथ्यात्व रूप,
अज्ञान क्या हटा ।
व्यक्त निकलंक ।
विभक्त कर्म पंक ।
जग शून, अंक समान
वो भगवान् ।
जो भीतर विराजमान ।
हटात् प्रकटा ।।
विद्रूप, मिथ्यात्व रूप,
अज्ञान क्या हटा ।
ध्रुव, नित्य, एक ।
शाश्वत अभिलेख ।।
सहजो सौख्य निधान ।
वो भगवान् ।
जो भीतर विराजमान ।
हटात् प्रकटा ।।
विद्रूप, मिथ्यात्व रूप,
अज्ञान क्या हटा ।
वो भगवान् ।
जो भीतर विराजमान ।
हटात् प्रकटा ।।
ज्ञान-घन , ज्ञान-घन, ज्ञान-घन ।
देखना हमें
बैठ के अपनी ही आत्मा में
अपना ही आत्मा प्रत्येक क्षण ।
देखना हमें
ज्ञान-घन, ज्ञान-घन, ज्ञान-घन ।।
एक है, एक है, एक है ।
आत्मानुभूति कहो ।
या ज्ञानानुभूति अहो ! ।।
एक है, एक है, एक है ।
वाक्-तन, वाक्-तन, वाक्-तन ।
करके एकाग्र, और अपना ये मन ।।
देखना हमें
बैठ के अपनी ही आत्मा में
अपना ही आत्मा प्रत्येक क्षण ।
देखना हमें
ज्ञान-घन, ज्ञान-घन, ज्ञान-घन ।।
एक है, एक है, एक है ।
आत्मानुभूति कहो ।
या ज्ञानानुभूति अहो ! ।।
एक है, एक है, एक है
सत् जो ज्ञेय भिन्न अखण्ड ।
जानन मात्र चित् घन-पिण्ड ।।
पाने छुओ गहराई ।
मुझमें सदा लहराई ।
हा ! अनभिज्ञ मैं भाई ।।
आकुलता न नाम निशान ।
इक आनन्द आप समान ।।
बस लो लगन प्रगटाई ।
पाने छुओ गहराई ।
मुझमें सदा लहराई ।
हा ! अनभिज्ञ मैं भाई ।।
रखना सहजता बस मीत |
प्राणी मात्र निस्पृह प्रीत ।।
अर लो आत्म झलकाई ।
बस लो लगन प्रगटाई ।
पाने छुओ गहराई ।
मुझमें सदा लहराई ।
हा ! अनभिज्ञ मैं भाई ।।
गुड़ में यथा सहज मिठास ।
वह चैतन्य दिव्य प्रकाश ।।
मुझमें सदा लहराई ।
हा ! अनभिज्ञ मैं भाई ।।
कहके शुभ प्रवृत्त अमोल ।
काया बना लो मत दोल ।।
कछुआ शत्रु भू सगरी ।
साधो ! डूब अब गहरी ।
छेड़ो आत्म सुर लहरी ।।
मुख से निकालो मत बोल ।
हित मित भले मिसरी घोल ।।
कोयलिया गई पकरी ।।
साधो ! डूब अब गहरी ।
छेड़ो आत्म सुर लहरी ।।
घूमे बैल कोल्हू गोल ।
नाहक मन हिरण मत डोल ।।
अध्यातम गली सकरी ।
साधो ! डूब अब गहरी ।
छेड़ो आत्म सुर लहरी ।।
खोकर साध्य साधक भाव ।
ज्ञायक एक शुद्ध, स्वभाव ।।
साधो ! डूब अब गहरी ।
छेड़ो आत्म सुर लहरी ।।
है ही ऐसा शुद्ध नय ।
है ही ऐसा शुद्ध नय ।
मोहा, कोहा रीता ।
रागा, द्वेषा वीता ।।
है ही ऐसा शुद्ध नय ।
ज्ञान और आत्मा ।
और गात एक जाँ ।।
न दर्शन ही आत्मा ।
आचरण भी आत्मा ।।
आत्मा ही आत्मा ।
आत्मा ही आत्मा ।
और क्या ? और क्या ?
सिवाय एक आत्मा ।।
आत्मा ही आत्मा ।
आत्मा ही आत्मा ।
क्यूँ बेचूँ स्वाभिमान ।
जाने क्यूँ रखूँ गुमान ।।
हाय ! रक्खा ही क्या ?
इन बेछोर बातन में ।
जानन-जानन, जानन मैं ।।
क्यूँ रँग लाऊँ जेब ।
जाने क्यूँ रचूँ फरेब ।।
हाय ! रक्खा की क्या ?
इन मृग दौड़ बातन में ।
जानन-जानन, जानन मैं ।।
क्यूँ दिखलाऊँ आंख ।
जाने क्यों तकूँ सुराख ।।
हाय ! रक्खा ही क्या ?
इन बद-खोर बातन में ।
जानन-जानन, जानन मैं ।।
जानन जानन, जानन जानन ।
जानन-जानन, जानन मैं ।।
जाननहार, जाननहार ।
मैं बस जाननहार ।।
मुझमें नाहिं विकार ।
चिच्-चैतन्य चमत्कार ।
मैं बस जाननहार ।।
बढ़ा सिर्फ संसार ।
बनकर के कर्तार ।।
बनकर के कर्तार ।
हिस्से आई हार ।।
जाननहार, जाननहार ।
मैं बस जाननहार ।।
दिया प्रशय ममकार ।
नामे भेड़ कतार ।।
नामे भेड़ कतार ।
क्यूँ न भरूँ दहाड़ ।।
जाननहार, जाननहार ।
मैं बस जाननहार ।।
चढ़ना खड़ा पहाड़ ।
क्यूँ रखना सर भार ।।
क्यूँ रखना सर भार ।
मुक्ति रमा भर्तार !।।
जाननहार, जाननहार ।
मैं बस जाननहार ।।
न गोरा हूँ, न काला हूँ ।
न छोरा हूँ, न बाला हूँ ।।
बस और बस मैं जाननहारा हूँ ।।
न दुबला हूँ, न मोटा हूँ ।
न लम्बा हूँ, न नाटा हूँ ।।
बस और बस मैं जाननहारा हूँ ।।
न पोचा हूँ, न पहुँचा हूँ ।
न वृद्धा हूँ, न बच्चा हूँ ।।
बस और बस मैं जाननहारा हूँ ।।
जाननहारा, जाननहारा, जाननहारा हूँ
बस और बस मैं जाननहारा हूँ ।।
मेरा मन बड़ा अच्छा है ।
हाँ ! हाँ ! ! दिल का सच्चा है ।
अपनी बात का पक्का है ।
मेरा मन बड़ा अच्छा है ।।
न, ना, न खोटा नहीं ।
न, ना, न खट्टा नहीं ।
हाँ ! हाँ ! ! खट्टा-मिठ्ठा है ।
मेरा मन बड़ा अच्छा है ।।
न आस-पास यहीं
मेरा यह अपना मन
हो भले जहाँ कहीं
सब काम छोड़ के
आ जाता है दौड़ के ।
सुनते ही मेरी आवाज
है मुझे इस अपने मन पे नाज ।
बाहर क्या सिवाय जादू-टोना ।
धन, यौवन, आयु इसे इक दिन खोना ।।
बाहर कुछ ना अपना
बाहर क्या सिवाय नजर बंदी ।
मोह से आँखें न किसकी अंधी ।
बाहर कुछ ना अपना
बाहर क्या सिवाय तेरा मेरा ।
छुप रह चले दीया तले अंधेरा ।।
बाहर कुछ ना अपना
बाहर है क्या अपना
अपना सब कुछ भीतर है
बाहर कुछ ना अपना
दीया तले,
अंधेरा पले
बाहर काला जादू चले
न सिर्फ मनचले,
बाहर हैं लोग दोगले
भूल भुलैय्या से बाहर निकलें
चलो चलो, चलो चलो,
चलो चलो, भीतर चलें
साबुत निगले
माँ ना…गिन बने बच ले
दीया तले,
अंधेरा पले
बाहर काला जादू चले
भूल भुलैय्या से बाहर निकलें
चलो चलो, चलो चलो,
चलो चलो, भीतर चलें
अपनी आँख बन्द कर
मैंने झाँका अन्दर
दिखा मुझे एक शान्त समुन्दर
आहा ! अहा !
मैं अन्दर ही अन्दर
बड़ा खुश हुआ
पर हा ! हहा !
जाने ये क्या हुआ
आ विकल्प ने मुझे छुआ
यानि ‘कि किसी ने फेंका कंकर
फिर ? फिर क्या
दिखा मुझे लहर खाता समुन्दर
हा ! हहा !
मैं अन्दर ही अन्दर
बड़ा दुखी हुआ
‘के मैंने चलाकर
क्यूँ विकल्प छुआ
भाग-दौड़ है
दौड़-धूप है
बाहर और कुछ भी नहीं
किन्तु क्या कुछ नहीं
भीतर, चेतन चिद्रूप है
चिन्मय, चिन्मयानन्द
चिदानन्द, चिच्-चिदानन्द
अमृतानन्द कूप है
भीतर, चेतन चिद्रूप है
ज्ञान-घन ज्ञानानन्द
आनन्द पिण्ड सहजानन्द
अक्षयानन्त रूप है
भीतर, अमृतानन्द कूप है
बाहर टोका-टोकी है
अन्दर निधी अनोखी है
अन्दर नीका नीका है
बाहर फीका फीका है
बाहर थारी म्हारी है
बाहर माथा भारी है
बाहर झूठी यारी है
अन्दर आत्म हमारी है
बाहर हेरा-फेरी है
अन्दर डूब घनेरी है
अन्दर नीका नीका है
बाहर फीका फीका है
बाहर थारी म्हारी है
बाहर माथा भारी है
बाहर झूठी यारी है
अन्दर आत्म हमारी है
स्वार्थ भरी दुनिया
बेदाग दामन कहाँ
हहा ! माँ नागन यहाँ
अंधेरा पले, तले दीया
स्वार्थ भरी दुनिया
मन ध्याओ सुबहो-शाम
एक आत्मा राम
अपना एक आत्मा राम
जमा…ना
है जमाना दोगला
गिरगिट रंग बदलू
यहाँ गड़ियाली आँसू
धोखा खिलाना कला
जमा…ना
है जमाना दोगला
मन ध्याओ सुबहो-शाम
एक आत्मा राम
अपना एक आत्मा राम
मतलबी रिश्ते नाते
मीन मुख मीन दबी
श्वान श्वान अजनबी
कसाई खाने माते
मतलबी रिश्ते नाते
मन ध्याओ सुबहो-शाम
एक आत्मा राम
अपना एक आत्मा राम
धीरे-धीरे सब उड़ रहा है
न’ कि धीरे-धीरे सब जुड़ रहा है
जोड़ा छोड़ना इक दिन
‘रे हिरणा दौड़ ना रुक छिन
धीरे-धीरे सपना खो रहा हूँ
न’ कि धीरे-धीरे सब
अपना हो रहा है
‘रे कफन ओढ़ना इक दिन
जोड़ा छोड़ना इक दिन
‘रे हिरणा दौड़ ना रुक छिन
धीरे हीरे कोयले ही’रे
न ‘कि धीरे-धीरे कोयले हीरे
घरौंदा तोड़ना इक दिन
‘रे कफन ओढ़ना इक दिन
जोड़ा छोड़ना इक दिन
‘रे हिरणा दौड़ ना रुक छिन
भीतर आओ
तुम भी तर आओ
अनगढ़ भीतर आये
भव जलधि तर आये
शिवभूति से भी तर गये ।
न भट कोटि से ही तर गये ।।
चोर अंजन से भी तर गये ।
न सिर्फ चन्दन से ही तर गये ।।
जीव गिंजाई से भी तर गये ।
न दीप स्थाई से ही तर गये ।।
भीतर आओ
तुम भी तर आओ
अनगढ़ भीतर आये
भव जलधि तर आये
चोर अंजन से भी तर गये ।
न सिर्फ चन्दन से ही तर गये ।।
क्या लाये, क्या ले चलना ।
पाप आप मत्थे मढ़ना ।।
बंधी मोह पाटी खोलो
भाग-दौड़ को बस बोलो
बन्जारे जैसा डेरा ।
क्यूँ करना तेरा-मेरा ।।
सहजो समता रस घोलो ।
भाग-दौड़ को बस बोलो
आगे नाक कहाँ अपना ।
पीछे पीठ, रहा सपना ।।
सरगम भीतर सुन तो लो ।
भाग-दौड़ को बस बोलो
बाहरी विकल्प सारे छोड़ दो ।
सुनो,
अपना एक आत्मा चुनो
कुछ भी साथ नहीं जायेगा ।
जोड़ा यही रह जायेगा ।।
सिवाय एक आत्मा
कुछ भी साथ नहीं जायेगा ।
सवार चला जायेगा ।
घोड़ा यही रह जायेगा ।।
जोड़ा यही रह जायेगा ।।
सिवाय एक आत्मा
कुछ भी साथ नहीं जायेगा ।
उड़ चालेगा रंग,
कट चलेगी पतंग ।
डोरा यही रह जायेगा ।।
जोड़ा यही रह जायेगा ।।
सिवाय एक आत्मा
कुछ भी साथ नहीं जायेगा ।
हटो हटो, दूर हटो
सक्लेश तुम
अय ! राग द्वेष तुम
हटो हटो, दूर हटो
मान माय तुम
अय ! नो कषाय तुम
हटो हटो, दूर हटो
विसम्वाद तुम
अय ! प्रमाद तुम
हटो हटो, दूर हटो
अय ! विकल्प तुम
निर्विकल्प हम
समयसार कह रहा, निर्विकल्प हम
छिपकली साध ले छत को
रुक श्वान रोक ले रथ को
मैं कर्ता नहीं किसी का
इक मत आचार्य सभी का
मैं ज्ञाता हूँ, मैं दृष्टा हूँ
मैं कर्ता नहीं किसी का
इक मत आचार्य सभी का
नभ बिच्छू पूंछ संभाले
बढ़ जड़ मग धरण चुरा ले
मेंढ़क बन चाले ‘छत-पत’
गर्दन नभ छू ले गिरगट
मैं कर्ता नहीं किसी का
इक मत आचार्य सभी का
मैं ज्ञाता हूँ, मैं दृष्टा हूँ
मैं कर्ता नहीं किसी का
इक मत आचार्य सभी का
माटी मोह की ।
परिपाटी द्रोह की ।।
क्यूॅं न उतार फेंकूॅं मैं
ज्ञान घन, ज्ञान घन, ज्ञान घन,
ज्ञान घन हूँ मैं
हाय ! अब तक रहा अंधेरे में ।
क्यूँ न उतरूँ आज गहरे में ।।
‘के बस जानूँ और देखूँ मैं ।
ज्ञान घन हूँ मैं
और क्या सिवाय ।
कागज का फूल काय ।।
हूॅं आती-जाती खुशबू मैं
ज्ञान घन, ज्ञान घन, ज्ञान घन,
ज्ञान घन हूँ मैं
हाय ! अब तक रहा अंधेरे में ।
क्यूँ न उतरूँ आज गहरे में ।।
‘के बस जानूँ और देखूँ मैं ।
ज्ञान घन हूँ मैं
मद से, प्रमाद से
कर्म कृत उपाध से
मैं शून हूँ
मैं पून हूँ, मैं पून हूँ, मैं पून हूँ
ताव से, तनाव से
संक्लेश भाव से
मैं शून हूँ
मैं पून हूँ, मैं पून हूँ, मैं पून हूँ
द्वेष और राग से
मृग दौड़ भाग से
मैं शून हूँ
मैं पून हूँ, मैं पून हूँ, मैं पून हूँ
मैं कम नहीं किसी से ।
मैं कम नहीं कहीं से ।।
मैं पून हूँ, मैं पून हूँ, मैं पून हूँ
मुझमें नाहिं पर की गन्ध ।।
जड़ से ना मेरा संबंध ।
बस और बस, हूँ मैं सच्चिदानन्द ।।
है अन्य जाति का द्वेष ।
भिन मुझसे मोह कलेश ।।
हित राग प्रवेश न सन्ध ।
जड़ से ना मेरा संबंध ।
बस और बस, हूँ मैं सच्चिदानन्द ।।
क्रोधाद भाव परभाव ।
जानन इक मोर स्वभाव ।।
मैं चिन्मय मृणमय बन्ध ।
जड़ से ना मेरा संबंध ।
बस और बस, हूँ मैं सच्चिदानन्द ।।
सहजानन्द स्वरूपी मैं ।
रूपी देह, अरूपी मैं ।।
हल्का, भारी, कड़ा, नरम ।
रूखा, चिकना, शीत-गरम ।।
जड़ के धरम अरूपी मैं ।
सहजानन्द स्वरुपी मैं ।।
नीला, पीला या अश्वेत ।
लाल वर्ण या वर्ण सुफेद ।।
पुद्-गल भेद, अरूपी मैं ।
सहजानन्द स्वरूपी मैं ।।
रस कषायला या तीखा ।
कड़वा या खट्टा, मीठा ।।
तन परिणमन अरूपी मैं ।
सहजानन्द स्वरूपी मैं ।।
शब्द भेद सा, रे, गा, मा ।
पा, धा, नि श्रुत नमो नमः ।।
जड़ पर्याय, अरूपी मैं ।
सहजानन्द स्वरूपी मैं ।।
भेद गन्ध दो, पहला गन्ध ।
दूजा गन्ध भेद दुर्गन्ध ।।
पुद्-गल स्वांग अरूपी मैं ।
सहजानन्द स्वरूपी मैं ।।
बोधी न जगा पायें ।
क्यूँ क्रोधी बन जायें ।
पाकर परिपाक करम,
क्यों कर रोयें गायें ।।
हम भगवान् आत्मा हैं ।
पानी न बचा पायें ।
क्यूँ मानी बन जायें ।
पाकर परिपाक करम,
क्यों कर रोयें गायें ।।
हम भगवान् आत्मा हैं ।
आगी न बुझा पायें ।
क्यूँ रागी बन जायें ।
पाकर परिपाक करम,
क्यों कर रोयें गायें ।।
हम भगवान् आत्मा हैं ।
अंखिया न खोल पायें ।
क्यूँ ठगिया बन जायें ।
पाकर परिपाक करम,
क्यों कर रोयें गायें ।।
हम भगवान् आत्मा हैं ।
मुझमें नाहिं पर की गन्ध ।
मैं घन-पिण्ड चित् आनन्द ।।
वैभव है मिरा न्यारा ।
मैं नभ बीच ध्रुव तारा ।।
मुझसे भिन्न मोह कलेश ।
जात विभिन्न राग व द्वेष ।।
जग विख्यात अविकारा ।
वैभव है मिरा न्यारा ।।
शाश्वत ठिकाना शिव गाँव ।
दर्शन ज्ञान मोर स्वभाव ।।
जीता मैं, करम हारा ।
वैभव है मिरा न्यारा ।।
मुझमें नाहिं नाम निशान ।
लालच क्रोध, माया, मान ।।
बहती ज्ञान सुध धारा ।
वैभव है मिरा न्यारा ।।
‘अहमिक्को खलु शुद्धो’ आ जपो मन
ले मनके धड़कन, आ जपो मन
‘अहमिक्को खलु शुद्धो’ आ जपो मन
करके थारी म्हारी
रख नजर हाय ! काली
क्यूँ करना चादरा मैला
कल छोड़ के मेला
पंछी उड़े अकेला
क्यूँ करना चादरा मैला
करके खेंचा-तानी
हा ! करके मनमानी
करके जोरा जोरी
हा ! भरके तिजोरी
क्यूँ करना चादरा मैला
कल छोड़ के मेला
पंछी उड़े अकेला
क्यूँ करना चादरा मैला
प्रतिशोध न रखूँगा
अब मैं कोध न करूँगा
अनबुझ ज्योती हाथ लगी मेरे
समझ अनोखी हाथ लगी मेरे
राग न करूँगा
द्वेष न करूँगा
अब मैं संक्लेश न करूँगा
मोहन निन्दा टूट चली मेरी ।
आँखन पाटी छूट चली मेरी ।।
व्यामोह न रखूँगा
अब मैं लोभ न करूँगा
मुझे हो चली अपनी अनुभूति
भीतर धारा एक अमृत फूटी
राग न करूँगा
द्वेष न करूँगा
अब मैं संक्लेश न करूँगा
मोहन निन्दा टूट चली मेरी ।
आँखन पाटी छूट चली मेरी ।।
शुद्ध बुद्ध मैं एक स्वभावी ।
रागी-द्वेषी नहीं विभावी ।।
खुद को पर द्रव्यों का कहता ।
पर द्रव्यों को खुद का कहता ।।
जाने धूल मोहनी हावी ।
शुद्ध बुद्ध मैं एक स्वभावी ।।
भला बुरा न करने वाला ।
जब मैं केवल जाननहारा ।।
छुऊँ न जाने क्यूँ बेताबी ।
शुद्ध बुद्ध मैं एक स्वभावी ।।
ना मैं गोरा, ना मैं काला ।
ना मैं बाला, ना मैं छोरा ।।
ना मैं मुग्धा, ना मेधावी ।
शुद्ध बुद्ध मैं एक स्वभावी ।।
काया माटी की ।
मुझसे भिन्न जाति की ।।
काची है काया ।
वाँची जिनराया ।।
चिच्चिन्मय स्वरुपी मैं ।
तन मृणमय अरूपी मैं ।।
लाल न मैं नीला, पीला ।
सारी पुद्-गल की लीला ।।
स्वाद न मुझमें अम्ल, मिरच ।
सब पुद्-गल का जमा खरच ।।
कड़ा न मैं हल्का, भारी ।
पुद्-गल की लीला सारी ।।
गन्ध न मुझमें दुर्गन्धा ।
जड़ विरचा गौरख धंधा ।।
सुर सा, रे, गा, मा, भिन मैं ।
सांठ-गांठ पुद्-गल इनमें ।।
शुद्ध, बुद्ध, अविनाशी मैं
अक्षर धाम निवासी मैं
अखर अंक हूँ
हेम पंक हूँ
निष्कलंक हूँ
साथी ! मैं, कह रहा हूँ सांची मैं
ऊर्ध्व रेत हूँ
मैं अभेद हूँ
अच्छेद्य हूँ
साथी ! मैं, कह रहा हूँ सांची मैं
चिदानन्द हूँ
सिध अनन्त हूँ
विगत बन्ध हूँ
साथी ! मैं, कह रहा हूँ सांची मैं
गत उपाध हूँ
निराबाध हूँ
रत समाध हूँ
साथी ! मैं, कह रहा हूँ सांची मैं
सहित जाग हूँ
महाभाग हूँ
वीतराग हूँ
साथी ! मैं, कह रहा हूँ सांची मैं
विगत क्रोध हूँ
अमृत स्रोत हूँ
परम ज्योत हूँ
साथी ! मैं, कह रहा हूँ सांची मैं
शुद्ध, बुद्ध, अविनाशी मैं
अक्षर धाम निवासी मैं
निस्पंद हूँ
गत द्वन्द हूँ
भद्र हूँ
मैं अबद्ध हूँ
शुद्ध हूँ
मैं बुद्ध हूँ
हॉं होगा कोई क्रुद्ध
हॉं होगा कोई रुद्र
मैं सिद्धों की जाति का हूँ
मैं माटी का नहीं
कर्म परिपाटी का नहीं
निकलंक हूँ
मैं अखण्ड हूँ
सानन्द हूँ
अनिरुद्ध हूँ
शुद्ध हूँ
मैं बुद्ध हूँ
हॉं होगा कोई क्रुद्ध
हॉं होगा कोई रुद्र
मैं सिद्धों की जाति का हूँ
मैं माटी का नहीं
कर्म परिपाटी का नहीं
मैं ले रहा हूँ
और गहरी मुस्कान
और गहरी और गहरी
और गहरी मुस्कान
मन कहेगा क्यूँ
चूंकि भावी भगवान्
धन ! धन ! गुण अनन्त निधान
गुण-गुण गुण सौख्य प्रधान
चूंकि भावी भगवान्
मैं ले रहा हूँ
और गहरी मुस्कान
झोरी अब जन्म पुमान
बुध हंस अबकि वरदान
धन ! धन ! गुण अनन्त निधान
गुण-गुण गुण सौख्य प्रधान
चूंकि भावी भगवान्
मैं ले रहा हूँ
और गहरी मुस्कान
भले रहूँ देह में
देह से विभिन्न मैं
अक्षत अखण्ड मैं
काहे खेद खिन्न मैं
वीतराग सन्त ने
कहा मुझे ग्रन्थ में
ज्ञान सघन पिण्ड मैं
चिच्-चिदानन्द मैं
फूल तन, सुगन्ध मैं
चिच्-चिदानन्द मैं
तन पतंग, डोर मैं
धन ! किरण विभोर मैं
मीन देह, नीर मैं
धन्य ! धीर, वीर मैं
वीतराग सन्त ने
कहा मुझे ग्रन्थ में
ज्ञान सघन पिण्ड मैं
चिच्-चिदानन्द मैं
फूल तन सुगन्ध मैं
चिच्-चिदानन्द मैं
भीतर छाँव, बाहर धूप
भीतर खूब
भीतर डूब
बाहर धूप, भीतर छाँव
भीतर ठाव, भीतर आव
‘रे अरे तुम भी… तर आव
सागर मोति कब ऊपर
गोता खोर चला अन्दर
चाहिये मोति जिसे,
वह मौत से डरता नहीं
भूपर कहाँ स्वर्ण पत्थर
जुहरी खोद चला अन्दर
चाहिये ज्योति जिसे,
मेहनत से डरता नहीं
खारा देख जल समन्दर
प्यासा खोद चला अन्दर
चाहिये ज्योति जिसे,
मेहनत से डरता नहीं
चाहिये मोति जिसे,
वह मौत से डरता नहीं
इन्द्रिय और मन दरवाजा
अहो ! आत्मन्, अहो ! आत्मन्
इन्द्रिय और मन दरवाजा
ना जा बाहर,
अन्दर आ जा
अन्दर ज्ञान समन्दर है
अन्दर सत् शिव सुन्दर है
बाहर बाहरि चमक दमक
बिजुरी टिकती तनक मनक
अन्दर भगवत् मन्दर है
अन्दर सत् शिव सुन्दर है
बाहर चाकरि मात्र सिरफ
दुनिया साधे स्वार्थ सिरफ
अन्दर कछु…आ अन्तर् है
अन्दर सत् शिव सुन्दर है
अपनी नाक से आगे
अपनी पीठ से पीछे
अपने सिर से ऊपर
अपने पाँव से नीचे
अपना कुछ भी नहीं है
और ये जो कुछ भी है
वह एक सपना है
कहाँ वह अपना है
प्यारा दुलारा बेटा
आंखों का तारा बेटा
चिता को आग देता
ऐसा ये कैसा मेरा प्यारा बेटा है
हाय ! मोरी
सिर्फ कोरी, यह कल्पना है
कहाँ वह अपना है
जग भर से न्यारा पैसा
प्राणों से प्यारा पैसा
देता न साथ हमेशा
ऐसा ये कैसा रुपया पैसा है
हाय ! मोरी
सिर्फ कोरी, यह कल्पना है
कहाँ वह अपना है
बाहर से मोड़ो मुखड़ा
दूर दिखेगा जा दुखड़ा
मिलते हैं रतन
करते ही जतन
बस थोड़ा ठहरो
भीतर उतरो, भीतर उतरो
अब वो धुन सुनो,
सुन सकते हैं जिसे
न सिर्फ कान वाले
सुन सकते है उसे, है जो बहरे
अब वो दृश्य चुनो,
चुन सकते हैं जिसे
न सिर्फ आंख वाले
चुन सकते है उसे, विषयांध ‘रे
अहसास वो गुनो,
गुन सकते हैं जिसे
न सिर्फ मन वाले
गुन सकते है उसे,
दीवाने पगले
अपनी पलकें झपा के
जर्रा जा मुस्कुराके
थोड़ा ध्यान लगा के
मैंने झाँका भीतर
जगमगाती ज्योती
दिखी मुझको भीतर
नख से लेकर शिख तक
जगमगाती ज्योती
दिखी मुझको भीतर
अपनी पलकें झपा के
जर्रा जा मुस्कुराके
थोड़ा ध्यान लगा के
मैंने झाँका अन्दर
चमचमाता मोती
दिखा मुझको अन्दर
पग से लेकर सिर तक
बाहर रास्ते कई
क्या सही ? क्या गलत ?
जाने न कोई
बाहर रास्ते कई
मंझधार नाव है
बाहर भटकाव है
आओ, भीतर आओ
भीतर तरु छाँव है
बाहर भटकाव है
बाहर रास्ते कई
क्या सही ? क्या गलत ?
जाने न कोई
बाहर रास्ते कई
कस्तूर
कब दूर
हिरना
बस हिल ना
भीतर सुख ठाव है
बाहर भटकाव है
बाहर रास्ते कई
क्या सही ? क्या गलत ?
जाने न कोई
बाहर रास्ते कई
कपूर
कापूर
हवा ले
बच हवा से
भीतर शिव गाँव है
बाहर भटकाव है
बाहर
दन्द-फन्द, द्वन्द है
कोहरा है, धुन्ध है
कर्मों का बन्ध है
अन्दर,
आनन्द ही आनन्द है
सोने सुगन्ध है
परिणति सन्त है
भावी भगवन्त है
शान्ति अनन्त है
अन्दर,
आनन्द ही आनन्द है
सार सभी ग्रन्थ है
मोक्ष का पन्थ है
भावी भगवन्त है
शान्ति अनन्त है
अन्दर,
आनन्द ही आनन्द है
जल से भिन्न कमल हूँ मैं
दर्पन सा निर्मल हूँ मैं
भले कीचड़ में आ पड़ा
मैं हूँ सोना खरा
अनन्त गुण से भरा
जल से भिन्न कमल हूँ मैं
दर्पन सा निर्मल हूँ मैं
भले भेड़ों में आ खड़ा
मैं हूँ शेरनी लला
मैं हूँ शेर-बब्बरा
भले भेड़ों में आ खड़ा
जल से भिन्न कमल हूँ मैं
दर्पन सा निर्मल हूँ मैं
पलकें पल के लिये खोलो
और भीतर हो लो
कितने भीतर,
कितने भीतर, कितने भीतर
तो, और भीतर
और भीतर, और भीतर
जा रहा है गोताखोर
देखो, देखो
वो आ रहा है मोती बटोर
बैठ किनारे,
‘रे न आंखों के मोती ढ़ोलो
और भीतर हो लो
जा रही है कुदाल
देखो, देखो
वो आ रही है मीठे पानी की धार
चलो उठो,
बढ़ो, देख अपनी शक्ति तो लो
और भीतर हो लो
दे करके मोती
वो चिन्मय ज्योती
न खरीद सकते उसे
पैसों से,
न खरीद सकते जिसे
वो चीज हैं अन्दर है
है जो सत्य शिव सुन्दर
‘रे लहरता है अन्दर
आनन्द का समन्दर
देकर सारा धन
घन पिण्ड वो चेतन
न खरीद सकते उसे
पैसों से,
अन्दर है जादू मन्तर
दुख हो जाता छू-मन्तर
आ उतरें गहरे
मिलने उससे
पैसों से,
न खरीद सकते जिसे
ध्यान करना
आसान बड़ा
बस आशा न बढ़ा
‘रे आ शान बड़ा
आती जाती श्वास देखो
बात मन में जो चुभ रही
भले किसी ने भी हो कही
निकाल वो फांस फेंको
आती जाती श्वास देखो
ध्यान करना
आसान बड़ा
बस आशा न बढ़ा
‘रे आ शान बड़ा
सुनो धक-धक करती धड़कन
अन्तर् मन में जो पल रही है
भले किसी से भी चल रही
निकाल वो फेंको अनबन
सुनो धक-धक करती धड़कन
चलो कुछ भीतर चालें
उतर कुछ गहरे चालें
आ भीतर देश चालें
राग व द्वेष नहीं
जहां संक्लेश नहीं
मॉं जिनवाणी का
बस उपदेश यही
कुछ हटके आनन्द मना लें
‘रे चलो उत्सव मना लें
जहां काम, क्रोध ना
माया, मान, लोभ ना
माँ जिनवाणी की
बस यही देशना
कुछ हटके रंग जमा लें
‘रे चलो उत्सव मना लें
न गम से आंखें नम
जहाँ न भ्रम, न मिथ्यातम
मॉं जिनवाणी का
संदेश यही आतम
मुक्ति का रस्ता बना लें
‘रे चलो उत्सव मना लें
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